सम्पूर्ण हिंदी व्याकरण

हिंदी व्याकरण (Hindi Vyakaran): किसी भी भाषा को पूर्ण रूप से सीखने के लिए हमें उसकी व्याकरण का ज्ञान होना बहुत ही जरूर है। यदि व्याकरण का सम्पूर्ण ज्ञान होगा तभी हम उस भाषा को अच्छे से समझने के साथ ही लिख, बोल और पढ़ सकते हैं। इसी प्रकार यदि हमें हिंदी भाषा की व्याकरण (Hindi Grammer) का सम्पूर्ण ज्ञान होगा तो हम हिंदी भाषा को अच्छे से समझ पाएंगे।

Hindi Vyakaran
Image: Hindi Vyakaran | Hindi Basic Grammar

यहाँ पर हम संपूर्ण हिंदी व्याकरण (Sampurn Hindi Vyakaran) के रूप में जानकारी उपलब्ध कर रहे है, जिसे सभी हिंदी ग्रामर (Hindi Grammar) के बिन्दुओं को ध्यान में रखकर लिखा गया है। यदि आपको कहीं पर भी त्रुटी दिखे तो कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

सम्पूर्ण हिंदी व्याकरण | Sampurn Hindi Vyakaran | Hindi Grammar

विषय सूची

हिन्दी व्याकरण क्या है?

हिन्दी व्याकरण उसे कहते हैं, जो कि हिंदी भाषा को शुद्ध रूप से लिखने और बोलने की विधि को बताता है। हिंदी व्याकरण हिंदी भाषा के अध्ययन के लिए अति महत्वपूर्ण अंग माना गया है। हिंदी के सभी स्वरूपों को चार खंडों में विभक्त करके अलग-अलग अध्ययन किया जाता है।

जैसे कि वर्ण विचार के अंतर्गत ध्वनि और वर्ण आते हैं, शब्द विचार के अंतर्गत शब्द से संबंधित विभिन्न नियम आते हैं, वाक्य विचार के अंतर्गत व वाक्य से संबंधित संबंधित विभिन्न परिस्थितियां आती है और ठंड विजार्ड में साहित्यिक साहित्यिक और रचनाओं के शिल्पगत संबंधों पर विचार किया जाता है।

आधुनिक मानक के अनुसार हिंदी हिंदुस्तान भाषा का मानकीकृत और संस्कृतकृत पाठ है। अंग्रेजी भाषा के साथ देवनागरी लिपि में लिखी गई भाषा हिंदी भाषा होती है और हिंदी भाषा को भारत का अधिकारिक भाषा भी कहा जाता है। यह भारत गणराज्य की 22 अनुसूचित भाषाओं में एक महत्वपूर्ण अंग हो गया है।

हिंदी भाषा की परिभाषा और इतिहास

हिंदी भाषा की परिभाषा (Vyakaran ki Paribhasha), राज्यभाषा, राष्ट्रभाषा, राजभाषा और इतिहास– विभिन्न व्यक्तियों ने हिंदी भाषा को लेकर कई परिभाषाएं दी है, जो कि निम्न है:

एक भाषा कई लिपियों में लिखी जा सकती है और दो या दो से अधिक भाषाओं की एक ही लिपि हो सकती है और सभी भाषाएं संस्कृत से आई है और सभी भाषाएं उसी का अंग भी है। रामविलास शर्मा ने यह बात कही है।

भाषा वह माध्यम है, जिसके माध्यम से हम सोचते हैं, अपने विचार को व्यक्त करते हैं, मनुष्य अपने विचार भावनाओं और अनुभूतियों को भाषा के माध्यम से व्यक्त करता है। भाषा मुख्य रूप से उच्चारित होने वाले शब्दों और वाक्यों का समूह होता है, जिसके द्वारा मन की बात दूसरे को बताई जाती है।

भाषा मुख्य रूप से मुंह से बोलने वाली शब्दों और वाक्यों का समूह है, जिसके द्वारा कोई भी व्यक्ति अपने मन की बात को दूसरे व्यक्ति को बताता है। किसी भी भाषा की सभी ध्वनि एक व्यवस्था में मिलकर एक संपूर्ण भाषा का निर्माण करती है, जिसकी सहायता लेकर किसी एक समाज या देश के लोग अपने मन के भाव को तथा विचारों को दूसरे व्यक्तियों के सामने प्रकट कर पाते हैं।

मुंह से निकलने वाले हर शब्द और वाक्य का समूह जो व्यक्ति अपने मन की बातों को दूसरे व्यक्ति को बोलते हैं, वह सभी भाषा कहलाते हैं। जैसे की बोली, जवान, वाणी आदि।

भाषा को दूसरे शब्दों में समझा जाए तो इस संसार में सारे प्राणी प्राय: व्यक्ति हजारों प्रकार की भाषाएं बोल पाते हैं, जो कि साधारण से अपने भाषाओं को छोड़कर दूसरे लोगों की समझ में नहीं आती है| हमारा भारत देश में अनेक भाषा, अनेक सभ्यता और संस्कृति है। हमारे समाज या देश की भाषा तो लोग बचपन से ही बोलते है उन्हें समझ में आ जाती है। लेकिन जब दूसरे देशों की भाषाओं को समझने की बात आती है तो उसे समझने में हमें कठिनाई होती है। हम उनकी भाषाओं को अच्छी तरह से नहीं समझ पाते हैं।

भाषा की परिभाषा हिंदी में

भाषा जो कि प्राचीन काल से ही मनुष्य उपयोग करते आ रहे हैं और इसे परिभाषित करने की कोशिश की जाए तो इसके कुछ मुख्य रूप हैं, जो कि नीचे निम्न परिभाषाएं हैं:

भाषा शब्द संस्कृत के भाषा धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है बोलना, कहना, जिसके द्वारा हम अपने बातों को व्यक्त कर सकें।

प्लूटो के अनुसार स्वप्न में विचार तथा भाषा के संबंध में लिखते हुए कहा है कि विचार और भाषाओं में थोड़ा ही अंतर होता है। विचार आत्मा की मुख और अध्ययन यात्रा चित है। पर वही जब ध्यानात्मक होकर होठों पर प्रकट होती है तो उसे भाषा की संज्ञा दी जाती है।

वेंद्री के अनुसार भाषा एक तरह का चिन्ह है, जिनसे आश्रय है उन प्रतीकों से है, जिनके द्वारा मानव अपने विचारों को दूसरों के सामने प्रकट करते हैं। यह प्रतीक कई प्रकार के होते हैं जैसे शुद्ध भाषा की दृष्टि से स्रोत ग्रह प्रतीक ही सर्वश्रेष्ठ है।

ब्लॉक तथा टैगोर के अनुसार भाषा या संस्कृति वह तंत्र है, जिसके द्वारा एक सामाजिक समूह सहयोग करता है।

भाषा एक प्रकार का व्यवहार है जो कि एक व्यक्ति से संबंधित होकर यह पूरे विश्व में फैलता है और भाषा किसी देश की या किसी संपूर्ण विश्व की दृष्टि तक करती है। किसी व्यक्ति और समाज के बीच का जो व्यवहार होता है, वह खास तौर पर उसके भाषा पर निर्भर करता है और उसकी परंपरा से अर्जित की गई भाषाओं से ही अनेक रूप उनकी संपत्ति होती है। समाज में निरपेक्षता और सापेक्षता लाने के लिए भाषा का होना अनिवार्य माना गया है। ठीक वैसे ही जैसे किसी व्यक्ति की सापेक्षता यानी साक्षरता।

भारतीय संविधान में राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए हिंदी के अतिरिक्त एक अन्य भाषाओं को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया है। राज्यों की विधानसभा में बहुमत के आधार पर किसी भी एक भाषा को अथवा चाहे एक से अधिक भाषाओं को अपने राज्य की भाषा घोषित कर सकती है।

राष्ट्रभाषा संपूर्ण राष्ट्र की एक भाषा होती है, संपूर्ण राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करती है। यह आधिकारिक लोगों द्वारा बोली और समझी जाने वाली भाषाओं में से एक है।

हिंदी भाषा का वर्गीकरण और इतिहास

भाषा की उत्पत्ति प्राचीन काल से ही हो चुकी है। कुछ विद्वानों की मानें तो यह विषय भाषा विज्ञान का नहीं है। इस तथ्य की पुष्टि के लिए कुछ विद्वानों ने कहा है कि विषय मात्र संभावनाओं के आधार पर माना जाता है। भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन को भाषा विज्ञान कहते हैं। यदि भाषा का विकास और उसके संबंधित रूप का रूप का अध्ययन किया जाता है तो उसे भाषा विज्ञान का अध्ययन कहा जाता है। तो भाषा की उत्पत्ति निश्चय ही भाषा विज्ञान का संबंध रखती है। भाषा की उत्पत्ति का विषय अत्यंत ही विरोधाभास है।

विभिन्न प्रकार के भाषा के वैज्ञानिकों ने भाषा की उत्पत्ति पर अपने-अपने विचार दिए हैं। किंतु अधिकांश मतों कल्पना के आधार पर ही दिया गया है। इनमें से कोई भी तर्क संगत या पूर्ण प्रमाणिक रूप से या वैज्ञानिक रूप से नहीं है। इसी कारण किसी को भी मत देना, उसे स्वीकृति नहीं मिली है।

वर्ण

वर्ण उस मूल ध्वनि को कहते हैं, जिसके टुकड़े नहीं किए जा सकते या दूसरे शब्दों में हिंदी भाषा के प्रयुक्त सबसे छोटी इकाई वाले शब्द को वर्ण कहलाते हैं।

आपको बताते चलें कि उच्चारित ध्वनि को जब लिखकर बताना होता है तब उनके लिए कुछ लिखित चिन्ह बनाए जाते हैं। ध्वनि को व्यक्त करने के लिए लिपिक इन चिन्ह को ही वर्ण कहते हैं। वर्ण भाषिक रूप में ध्वनि के लिखित रूप होते हैं। हिंदी में इन वर्गों को आरक्षण भी कहा जाता है, यह भी भाषा की लघुतम इकाई होती है।

वर्ण विभाग

भाषा हिंभाषा हिंदी में प्रयोग होने वाला ”वर्ण” सबसे छोटी इकाई के रूप में जाना जाता है। जैसा कि आपको अपने पूर्व ज्ञान के आधार पर यह पता होगा कि हम जिन ध्वनियों का उच्चारण करते हैं। यदि उन्हें लिखकर बताना है तो उसके लिए कुछ विशेष चिन्ह निर्मित किए गए हैं तथा इन्हीं चिन्हों का प्रयोग हम अपनी ध्वनि को व्यक्त करने के लिए कहते है और इन्हे वर्ण का नाम देते है।

लिपि

किसी भाषा के लिखने के ढंग या भाषा की लिखावट को लिपि कहा जाता है। किसी ध्वनि या आवाज़ को लिखना हो, पढ़ना हो या उसे देखने योग्य बनाना, उसे लिपि कहते हैं। आपको बताते चले ध्वनियां अस्थायी होती है परंतु जो लिपि होती है वो स्थाई होती है। हमारे वाणी से ध्वनि का संचार होता है परंतु ध्वनियों को लिपि के जरिये लिखित रुप प्रदान किया जाता है।

हिंदी वर्णमाला

कई लोगों का सवाल होता है कि हिंदी वर्णमाला क्या होती है? जिस भाषा के माध्यम से हम अपने विचारों को दूसरे के सामने रखते है और जो बोलते हैं, वे ध्वनियां हैं। इन सभी की अभिव्यक्ति के लिए हमें किसी वर्णमाला की जरूरत होती है। वर्णमाला के माध्यम से हम अपने विचार और भावनाएं लिख सकते है और अन्य लोगों को समझा सकते हैं।

ध्वनियों को लिखने या समझने के लिए चिन्ह का उपयोग होता है, चिन्हों को वर्ण कहते हैं। वर्णमाला में भाषा की सबसे छोटी इकाई भी वर्ण को कहा जाता है। वर्णों के विशेष समूह को अक्षर कहा जाता है। हम इसे अक्षर भी कहते है, जिसका अर्थ होता है जिसका कभी नाश नहीं होता वही अक्षर है। इन सभी सभी वर्णों और अक्षरों को मिलाकर वर्णमाला बनती है, जिसका उपयोग हम बोलने के लिए या लिखने के लिए करते है।

हिंदी बारहखड़ी

बारहखड़ी व्यंजन और स्वर के योग से बनने वाले मिश्रित वर्ण है, इसका उपयोग हिंदी भाषा को लिखने और पढ़ने में किया जाता है।

स्वर

वर्तमान में परंपरागत रूप से हिंदी भाषा में लेखनी के आधार पर स्वर की संख्या 13 मानी गई है, इस 13 स्वर में से 2 अनुस्वार (अं, अ:), एक अर्ध अनुस्वार (ऋ) और 10 स्वर (अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ) माने गए हैं। हिंदी भाषा में मूल रूप से स्वरों की संख्या 11 होती है, जिसमें अर्ध अनुस्वार जुड़ा हुआ होता है, इसमें अनुस्वार को नहीं जोड़ा जाता।

व्यंजन

साधारण बोलचाल की भाषा में क से ज्ञ तक वर्णों को उपयोग में लाया जाता है, उन सभी बड़ों को व्यंजन कहते हैं। साधारणतया व्यंजन की संख्या 33 मानी जाती है, परंतु चार संयुक्त व्यंजन और दो द्विगुण व्यंजन को साधारण व्यंजन से मिलाने के बाद कुल व्यंजनों की संख्या 39 मानी गई है। हिंदी व्याकरण में किसी भी शब्द की उत्पत्ति का श्रेय व्यंजन को ही जाता है।

वर्णों का उच्चारण स्थान और वर्गीकरण

मुख से ध्वनियों के रूप में जो शब्द निकलते है, उन्हें वर्ण कहते है तथा जब मुहं के अन्दर वायु को जगह जगह दबा कर ध्वनि निकलते है, तो वर्णों की उच्चारित में भिन्नता देखने को मिलती है। हमारे मुहं के अन्दर कुल 5 विभाग
पाए जाते है, जिन्हें स्थान के नाम से जाना जाता है।

स्वराघात

हम बोलते हैं तो बोलते समय हमारी ध्वनियों का उच्चारण एक समान रूप में नहीं रहता है। कभी-कभी किसी वाक्य के एक शब्द पर ही हमारा सबसे अधिक बल होता है या फिर कभी दूसरे किसी शब्दों पर ही हमारा ज्यादा बल होता है। और कभी कभी एक शब्द के एक ही अक्षर पर पूरा बल दिए रहते हैं तो कभी दूसरी अक्षर पर उच्चारण के बल को देते हैं। इसी गुण को ही स्‍वराघात कहते हैं।

शब्द

शब्द विचार हिंदी व्याकरण का दूसरा महत्वपूर्ण खंड है, जिसके अंतर्गत शब्द की परिभाषा, भेद, उपवेद, संधि विच्छेद, रूपांतरण से संबंधित आदि नियमों का विचार आता है। एक या अधिक वर्णों से बनी हुई स्वतंत्र और सार्थक ध्वनि शब्द के रूप में व्यक्त की जाती है।

शब्द शक्ति

कोई ऐसा शब्द जिसमें अन्य शब्द का अर्थ छिपा होता है, ऐसे शब्दों को प्रकाशित करने वाले शब्द को शब्द शक्ति कहते हैं। हिंदी व्याकरण में शब्द से अर्थ का बोध होता है। हिंदी व्याकरण में शब्द को बोधक अर्थात शब्दों का अर्थ प्रकट करने वाला और अर्थ को बोध्य कहा जाता है अर्थात जिस शब्द का बोध कराया जा रहा हो।

पद

वाक्य में प्रयोग होने वाले प्रत्येक शब्द को पद कहा जाता है। वाक्य में प्रयोग होने वाले शब्दों में शब्दों के अंतर्गत संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया-विशेषण, संबोधन आदि प्रकार के शब्दों का प्रयोग होता है। हिंदी व्याकरण में पद परिचय के लिए यह बताना होता है कि इस वाक्य की दृष्टि से कौन-कौन से पद का प्रयोग हुआ है।

वाक्य

जब दो या दो से अधिक पदों के सार्थक समूह को अर्थात जिस का पूरा अर्थ निकलता है, उसे वाक्य कहा जाता है। हिंदी व्याकरण के अनुसार एक वाक्य का उदाहरण ले जैसे कि “अच्छाई पर बुराई की जीत होती है।” इस एक वाक्य में क्योंकि पूरा का पूरा अर्थ निकल रहा है। जिसमें बताया जा रहा है कि अच्छाई जो कि हमेशा बुराई पर जीतती है। यह केवल वाक्य नहीं है बल्कि इसका अर्थ भी निकल रहा है।

विराम चिन्ह

विराम शब्द वि+रम्+घं से बना हुआ है, जिसका मूल अर्थ होता है आराम करना या किसी ठहराव करना आदि। जिन सर्वसंमत चिन्ह द्वारा अर्थ स्पष्ट निकलता है। वाक्य को भिन्न-भिन्न भागों में विभक्त करती है। व्याकरण या रचना शास्त्र में उन्हें विराम कहा जाता है।

हिंदी व्याकरण में विराम का अंग्रेजी समानार्थी शब्द होता है ‘स्टॉप’। किंतु प्रयोग में इसके अर्थ में पंक्चुएशन शब्द मिलता है। पंचूएशियन का संबंध लैटिन शब्द पंक्चुए से हुआ है, जिसका अर्थ होता है बिंदु। इस प्रकार का अर्थ होता है बिंदु यानी कि रखना या वाक्य में बिंदु रखना होता है।

संज्ञा

संसार में वस्तुओं या चीजों के कोई ना कोई नाम जरूर हैं, इन्हीं नाम को संज्ञा कहते हैं। अर्थात् व्यक्ति, भाव, स्थान, जाति, वस्तु आदि के नाम को संज्ञा कहा जाता है।

सर्वनाम

यह संज्ञा के स्थान पर प्रयोग किया जाता है। हिंदी व्याकरण में इसका प्रयोग व्यक्तिवाचक संज्ञा के रूप में की जाती है। इसका प्रयोग स्त्री और पुरुष दोनों के लिए किया जा सकता है।

विशेषण

जब संज्ञा तथा सर्वनाम शब्दों की विशेषता अर्थात संख्या, परिमाण आदि बताते हो। वैसे शब्द वाले हिंदी व्याकरण को विशेषण कहते हैं। इसका उदाहरण है लंबा, छोटा, दयालु, गुस्से, लाभाड़ी, सुंदर, हल्का, बड़ा, छोटा, सीधा, तेरा, मेरा, एक, दो, मजबूत, कायर, आदि।

क्रिया

वाक्य शब्द या शब्द समूह के द्वारा किसी कार्य के होने या किए जाने का बोध होता हो, उसे क्रिया कहते हैं। जैसे कि मीरा खाना पका रही है। सीता पढ़ा रही है। मीरा गाना गा रही है।

क्रिया विशेषण

जिस शब्दों से क्रिया की विशेषता का पता चलता हो, वैसे शब्द को क्रियाविशेषण कहते हैं। जैसे कि वह धीरे-धीरे काम करता है। मोहन बहुत ही तेजी से काम करता है। इस प्रकार इन वाक्यों में धीरे-धीरे या तेजी से जो शब्द का प्रयोग किया गया है, उसकी विशेषता को बताता है। इस प्रकार क्रियाविशेषण की हिंदी व्याकरण में यही उपयोगिता होती है।

सयुंक्त क्रिया

संयुक्त क्रिया ऐसे किया है, जो किन्ही दो क्रियाओं के मिलने से पर बनती है। ऐसी क्रियाओं को संयुक्त क्रिया कहते हैं। दूसरे शब्दों में कहें, तो जब दो तरह की क्रिया मिलकर किसी तीसरे नई क्रिया का अविष्कार करती हो, तो वह नई किया संयुक्त क्रिया के नाम से जानी जाएगी।

समुच्चय बोधक

जिन शब्दों के कारण दो या दो से अधिक वाक्य बनते हो, शब्द बनते हो, वाक्यांश बनते हो, उन्हें समुच्चयबोधक कहा जाता है। हिंदी व्याकरण में समुच्चयबोधक के रूप में तब, और, वरना, किंतु, परंतु, इसलिए, बल्कि, ताकि, क्योंकि, अथवा, या, एवं, तथा, अन्यथा, आदि शब्द होते हैं। जिस वाक्य में इस तरह के शब्दों का प्रयोग किया जाता है, उसे समुच्चयबोधक कहा जाता है।

विस्मयादिबोधक

हिंदी वाक्य शब्दों या वाक्यांशों में आश्चर्य का प्रयोग हो या हर्ष का प्रयोग हो, शोक हो, गिरना हो, इस तरह के भाव निकलते हो, वैसे वाक्यों को विस्मयादिबोधक वाक्य कहा जाता है। हिंदी व्याकरण में इन वाक्यों को (!) का उपयोग किया जाता है।

संबंधबोधक

जो शब्द संज्ञा अथवा सर्वनाम के संबंध के वाक्य के अन्य शब्दों को बताता हो अर्थात हिंदी व्याकरण में जो संबंध को बताता हो वैसे वाक्यों को संबंधबोधक कहते हैं। या जो अविकारी शब्द संज्ञा व सर्वनाम के बाद आकर वाक्यों को एक दूसरे से संबंधित करें, वैसे वाक्यों को हिंदी व्याकरण में संबंधबोधक कहा जाता है।

निपात अवधारक

जब किसी बात में अतिरिक्त भार देने के लिए शब्दों का उपयोग किया जाता है। हिंदी व्याकरण में उसे निपात या अबधारक कहते हैं। जैसे कि भी, तो, तक, केवल, ही, मात्र, आदि और उदाहरण के लिए जैसे कि तुम आज रात बाहर मत जाना। सोहन ने तो हद ही पार कर दी।

अव्यय

अव्यय ऐसे शब्द क्यों कहते हैं जिन शब्दों में लिंग, कारक, वचन आदि के कारण कोई भी परिवर्तन नहीं आता हो, उन्हें अव्यय अविकारी शब्द के नाम से जाना जाता है। यह शब्द हमेशा परिवर्तित होते हैं।

संस्कृत भाषा की एक उक्ति “न व्ययेती इति अव्ययम” के अनुसार जिस किसी भी शब्दों में लिंग, वचन या विभक्ति आदि के कारण कोई परिवर्तन नहीं होती है, वह अवयव कहलाती है।

लिंग

लिंग संस्कृत का शब्द है, जिसका अर्थ होता है निशान। जिस संज्ञा शब्द से व्यक्ति की जाति का पता चले, उसे लिंग कहा जाता है। यह पता चलता है कि वह पुरुष जाति का है या फिर स्त्री जाति का। हिंदी व्याकरण में 2 लिंग होते हैं पुलिंग और स्त्रीलिंग। जबकि संस्कृत में 3 लिंग होते हैं पुल्लिंग, स्त्रीलिंग, नपुंसकलिंग।

वचन

भाषा विज्ञान में एक संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया आदि की संबंध श्रेणी में आती है जो कि इनकी संख्या को सूचित करती है। जैसे कि एक दो अनेक आदि। अधिकांश भाषाओं में दो वचन ही होते हैं एकवचन और बहुवचन। किंतु संस्कृत तथा कुछ और भाषाओं में द्विवचन भी होता है। हिंदी व्याकरण में केवल 2 वचन होते हैं एकवचन और बहुवचन।

कारक

संज्ञा या सर्वनाम को जिस रूप में व्यक्त करने के लिए वाक्य के अलावा अन्य शब्दों के साथ उसके संबंध का बोध कराया जाए, वैसे शब्द को यह वाक्य को कारक कहा जाता है। हिंदी व्याकरण में आठ प्रकार के कारक होते हैं कर्ता, कर्म, करण, संप्रदान, उपादान, संबंध, अधिकरण, और संबोधन। हिंदी व्याकरण में विभक्त कारकों का बोध होता है, उसकी स्थिति का बोध होता हो, उन्हें विभक्ति या परसर्ग कहा जाता है।

पुरुष

व्यक्ति या मनुष्य जो कि बोलते समय उसकी संपूर्ण भागीदारी होती है, उसे पुरुष कहा जाता है। जैसे कि मेरा नाम सोहन है। इस वाक्य में जो सोहन है, वह अपने बारे में बता रहा है। इस संवाद से भागीदारी है एवं इसमें श्रोता भी है।

उपसर्ग

संस्कृत एवं संस्कृत से निकलने वाले भाषाओं में अव्यय शब्द का उपसर्ग कहते हैं। जो कुछ शब्दों के यह वाक्यों के आरंभ में लगकर उसके अर्थ का विस्तार करें अथवा उसमें कोई विशेषता का उत्पन्न करें और दूसरे शब्दों में यदि किसी शब्द के आगे कुछ और शब्द जोड़कर उसके अर्थ को एक विशेष रूप में बदल दे या उसमें एक विशेषता निकाले तो वैसे शब्द को उपसर्ग कहा जाता है। उपसर्ग हिंदी व्याकरण में उपसर्ग के रूप में अनु, वी, आदि प्रकार के अनेक उपसर्ग का उपयोग किया जाता है।

प्रत्यय

प्रत्यय यह शब्दों के बाद उसमें जुड़कर उसके शब्दों का अलग अर्थ निकाले। जैसे कि जो शब्दांश के अंत में जोड़े जाते हैं, उसे प्रत्यय कहते हैं। जैसे कि दूसरे शब्दों में समझें कि जब कोई शब्द के अंत में कोई नए शब्द को जोड़कर उस शब्द की एक नया अर्थ निकलता है या फिर उस शब्द के अंत में जोड़कर कोई नया शब्द एक नया शब्द निकालता है, उस शब्द की विशेषता को बढ़ा देता है, वैसे शब्द को हिंदी व्याकरण में प्रत्यय कहा जाता है।

जैसे कि बड़ा शब्द में आई प्रत्यय को जोड़ दे तो बराई बन जाता है। जिसका अर्थ होता है कि जब हम किसी व्यक्ति की विशेषता या फिर उसके व्यक्तित्व की लड़ाई करें तो उसे बहुत अच्छा लगता है। उसकी विशेषता को बढ़ा देता है, उसकी विशेषता को विस्तृत रूप से बनाता हो।

अवयव

जब किसी भाषा के शब्द होते हैं, जिसमें लिंग, वचन, पुरुष, कारक, काल, इत्यादि के कारण कोई विकार उत्पन्न ना हो तो वैसे शब्द या वाक्य को अवयव कहा जाता है। हिंदी व्याकरण में ऐसे शब्द हर स्थिति में अपने मूल रूप में बने रहते हैं। क्योंकि अभी अब का रूपांतरण या उसे दूसरे रूप में चेंज नहीं किया जा सकता है। इसीलिए ऐसे शब्द को अविकारी शब्द भी कहा जाता है। हिंदी व्याकरण में अवयव का शाब्दिक अर्थ अगर समझे तो जो वह ना हो पाए जो व्यय ना हो पाए।

संधि

संधि (सम् +धि) शब्द का अर्थ होता है मेल करना। जब दो निकटवर्ती वर्णों के परस्पर मेल से जो विकार जो परिवर्तन होता हो, वैसे उसे संधि कहा जाता है। जैसे कि उदय+भान=उदयभान।

हिंदी व्याकरण में अर्थात हमारी हिंदी भाषा में संधि के द्वारा पूरे शब्दों को लिखने की परस्पर आवश्यकता नहीं होती है।

छंद

छंद वैसे शब्द को कहते हैं जिसमें चद् धातु से बना होता है और जिसका अर्थ होता है आह्लादित करना, आता ही करना या फिर खुश करना आता। वह आह्लाद वर्ण मात्रा की नियमित संख्या के विन्यास से उत्पन्न हुई होती है। इस प्रकार हिंदी व्याकरण में छंद की परिभाषा होगी। वर्णो या मात्राओं के नियमित संख्या, संख्या के विन्यास से यदि आह्लाद पैदा हो तो उसे छंद कहा जाएगा।

समास

समास का अर्थ होता है संक्षिप्तीकरण करना। इसका शाब्दिक अर्थ होता है किसी भी वाक्य वाक्यांश को छोटे रूप में व्यक्त करना। जब दो या दो से अधिक शब्द मिलकर जो नया शब्द और जो छोटा शब्द बनाता है, उस शब्द को हिंदी व्याकरण में समास कहा जाता है। जैसे कि पूजा घर को ले तो इसे पूजा के लिए घर कहते हैं। लेकिन इसका अगर समास बनाए तो पूजाघर कहा जाएगा।

अलंकार

किसी भी भाषा को शब्दार्थ से सूजन, सुसज्जित, तथा सुंदर बनाने वाले चमत्कार पूर्ण मनोरंजक ढंग से व्यक्त करने की प्रक्रिया को अलंकार कहा जाता है। हिंदी भाषा में या हिंदी व्याकरण में अलंकार का शाब्दिक अर्थ होता है आभूषण।

जिस प्रकार किसी शब्द को या किसी वाक्य को सुंदर रूप से लिखने के लिए अलंकार का उपयोग किया जाता है, उसी प्रकार आभूषण किसी भी सुंदर स्त्री के शरीर को शोभा बढ़ाने के लिए उपयोग किया जाता है। इस प्रकार काव्य अलंकारों से काव्य की विशेषता निकलती है।

रस

रस का शाब्दिक अर्थ समझे तो इसका अर्थ होता है आनंद। काव्य को पढ़ने वाले या सुनने वाले इसमें रस की अनुभूति अनुभूति करते हैं, आनंद की अनुभूति करते हैं, उसे हिंदी व्याकरण में रस कहा जाता है।

हिंदी व्याकरण में रस को काव्य की आत्मा माना गया है। प्राचीन भारतीय वर्ष में रस का बहुत महत्वपूर्ण स्थान था। हिंदी व्याकरण में रस संचार के बिना कोई भी प्रयोग सफल नहीं हो पाता है।

हिंदी गिनती

विलोम शब्द

विलोम का अर्थ होता है किसी भी शब्द का उल्टा शब्द होना। जब किसी शब्द के उलटे या विपरीत अर्थ को जानने के लिए जिस शब्द का प्रयोग किया जाता है, हिंदी व्याकरण में उसे विलोम शब्द के नाम से जाना जाता है।

अर्थात जब एक का दूसरा विपरीत अर्थ निकाले या उसका उल्टा अर्थ निकाले, वैसे शब्द को विलोम शब्द कहा जाता है। हिंदी व्याकरण में या इसे दूसरे शब्दों में विपरीतार्थक शब्द भी कहा जाता है।

तत्सम और तद्भव

आधुनिक भारतीय भाषाओं में प्रयोग होने वाले ऐसे शब्द जिनको संस्कृत से नहीं बनाया गया हो, जैसे कि हिंदी, बांग्ला, मराठी, गुजराती, तमिल, पंजाबी, कन्नड, मुलायम, आदि बहुत शब्द जो कि संस्कृत से नहीं लिए गए हैं। क्योंकि इनमें कई भाषाएं संस्कृत से जन्मी है, इसीलिए हिंदी व्याकरण में से तत्सम या तथा तद्भव शब्दों का बहुत महत्व दिया जाता है।

पर्यायवाची शब्द

पर्यायवाची शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है कि एक अर्थ का विभिन्न प्रकार के एक शब्द का अर्थ निकलना। दूसरे शब्दों में जिन शब्दों के अर्थ की समानता होती है अर्थात उसके समान दूसरे शब्द भी निकलते हो समानार्थक शब्द या पर्यायवाची शब्द कहा जाता है।

जब किसी शब्द के विशेष के लिए प्रयोग होने वाले समानार्थक शब्द को प्रयोग करते हैं तो वैसे शब्द को पर्यायवाची शब्द कहते हैं। हिंदी व्याकरण में यद्यपि पर्यायवाची शब्द के अर्थ में समानता होती है। लेकिन प्रत्येक शब्द की अपनी अपनी एक अलग विशेषता होती है और प्रत्येक शब्द का अपना-अपना एक अलग होता है तो एक दूसरे से मिलने वाले शब्द जो कि अलग-अलग भाव रखते हो, ऐसे शब्द को पर्यायवाची शब्द कहा जाता है।

अनेक शब्दों के लिए एक शब्द

वैसे शब्द जो कि अनेक शब्दों के स्थान पर केवल 1 शब्दों का प्रयोग किया जाए, उसे अनेक शब्दों के लिए एक शब्द कहा जाता है। हिंदी व्याकरण में अर्थात हिंदी भाषा में कई शब्दों की जगह एक शब्द को बोलकर उस वाक्य को पूरा किया जाता है या भाषा को बहुत ही प्रभावशाली बनाया जा सकता है। हिंदी व्याकरण में अनेक शब्दों के एक शब्द का प्रयोग करने से वाक्य के भाव भी बदल जाते हैं और बाकी के भाव को बहुत ही कम समय में समझा जा सकता है।

एकार्थक शब्द

हिंदी व्याकरण में वैसे शब्द जिनका अर्थ देखने और सुनने में एक सा लगता हो, परंतु वह समानार्थी नहीं होता हो, वैसे शब्द को एकार्थक शब्द कहते हैं। ध्यान से देखने पर पता चलता है कि उसमें कुछ ना कुछ अंतर होता ही है वैसे शब्द को एकार्थक शब्द कहा जाता है।

अनेक आर्थिक शब्द

अनेक आर्थिक शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है किसी भी शब्द के एक से अधिक अर्थ निकलना। हिंदी व्याकरण में बहुत ऐसे शब्द है, जिसके एक से अधिक अर्थ निकलते हैं। ऐसे शब्द का अर्थ भिन्न-भिन्न प्रयोग में किया जाता है और यह प्रयोग अनुसार ही स्पष्ट हो पाता है।

युग्म शब्द या समोच्चरित भिन्नार्थक शब्द

वैसे शब्द जो उच्चारण की दृष्टि से और समान होते हुए भी उसका अर्थ और भाव समान हो, वैसे शब्द को युग्म शब्द अथवा श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्द या युग्म शब्द या समोचरित भिन्नार्थक शब्द कहते हैं। श्रुतिसमभिन्नार्थक का अर्थ होता है कि सुनने में समान हो, परंतु उसका जो अर्थ होता है, वह भिन्न होता है। जैसे कि अंस-अंश पहले वाले का अर्थ होता है कंधा और दूसरे वाले का अर्थ होता है हिस्सा।

वर्तनी शब्द एवं वाक्य शुद्धिकरण

वर्तनी किसी भी शब्द को लिखने में प्रयोग होने वाले वर्णों के क्रम को वर्तनी या अक्षरी कहा जाता है। अंग्रेजी में वर्तनी को स्पेलिंग कहा जाता है और उर्दू में इसे हिज्जे कहते हैं। हिंदी व्याकरण इसे वर्तनी कहते हैं।

मुहावरे और लोकोक्तियां

जिस शब्द समूह से लक्षणाजन्य और कभी-कभी व्यंजनाजन्य कुछ विशिष्ट अर्थ निकलता हो हिंदी व्याकरण में उसे मुहावरा कहते हैं। कई बार यह व्यंजन आत्मक भी होते हैं। मुहावरे को भाषा को सुदृढ़ गतिशील और रुचि कार मानते हैं। मुहावरे के प्रयोग से भाषा में अद्भुत चित्र में आता रहती है।

हिंदी व्याकरण में मुहावरे के बिना भाषा निस्तेज निरस्त और निस प्राण हो जाती है। हिंदी भाषा में बहुत अधिक प्रचलित है और लोगों को मुंह पर आसानी से आ जाती है। वह लोकोक्तियां के तौर पर की जाने वाले वाक्यों के प्रयोग को मुहावरा कहा जाता है। इन वाक्यों में जनता के अनुभव के सार होते हैं।

हिंदी की प्रमुख रचनाएं

हिंदी का प्रारंभिक साहित्य अपभ्रंश में मिलता है कि हिंदी में तीन प्रकार के साहित्य हैं। जैसे कि गघ, पघ और चम्पू। हिंदी की जो पहली रचना थी, इस विषय में विवाद है। लेकिन ज्यादातर साहित्यकार देवकीनंदन जी द्वारा लिखे गए उपन्यास चंद्रकांता को हिंदी की पहली प्रमाणिक गद्य रचना मानते हैं।

हिंदी की प्रमुख गद्य रचनाएं एवं रचीयता

किसी भी भाषा के बोलक और लिखित समूह को साहित्य कहा जाता है। दुनिया में सबसे पुराना वार्षिक साहित्य हमें आदिवासी भाषाओं में मिलता है। इसके अनुसार आदिवासी साहित्य ही सबसे पुरानी साहित्य है और साहित्य का मूल स्रोत भी है।

जीवन परिचय प्रमुख साहित्यकार

किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के जीवन के अंतर्गत होने वाली संपूर्ण घटनाओं के आधार पर जब क्रियात्मक और कलात्मक रूप से चित्रण करते हुए उसके बारे में व्याख्या की जाती है। इसके द्वारा उसके गुण दोष में व्यक्तित्व की व्याख्या की जाती है।

सामान्यतः दूसरे शब्दों में कहा जाए तो किसी की जीवनी लिखी जाती है। किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति ने अपने सारे जीवन में किए हुए कार्यों का जो वर्णन किया जाता है, उसे जीवन परिचय कहा जाता है और इसमें किसी भी नियम का पालन नहीं किया जाता है।

पत्र लेखन

आधुनिक युग में पत्र लेखन लगभग समाप्त हो गया है। पत्र एक और सामाजिक व्यवहार के अपरिहार्य अंग होते हैं तो दूसरी ओर उनकी व्यवहारिक आवश्यकता भी रहती है। पत्र लेखन एक कला है जो लोगों को अपने व्यक्तित्व अपने दृष्टिकोण और अपनी मानसिकता को व्यक्त करने के लिए परिचालित हुई थी।

निबंध लेखन

निबंध रचना को कहा जाता है, जिसमें एक सीमित आकार के भीतर किसी एक विशेष शब्द या विषय का वर्णन किया जाए। एक विशेष निजी पर उसकी सहजीविता संगति उससे संबंधित हर एक शब्द को प्रयोग किया जाए। हर एक मतलब को बताया जाए, उसे निबंध कहा जाता है। निबंध में लेखक अपना व्यक्तित्व महत्वपूर्ण छाप छोड़ता है।

इनका नाम राहुल सिंह तंवर है, इन्होंने स्नातक (रसायन, भौतिक, गणित) की पढ़ाई की है और आगे की भी जारी है। इनकी रूचि नई चीजों के बारे में लिखना और उन्हें आप तक पहुँचाने में अधिक है। इनको 3 वर्ष से भी अधिक SEO का अनुभव होने के साथ ही 3.5 वर्ष का कंटेंट राइटिंग का अनुभव है। इनके द्वारा लिखा गया कंटेंट आपको कैसा लगा, कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। आप इनसे नीचे दिए सोशल मीडिया हैंडल पर जुड़ सकते हैं।

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