संबंध सूचक

संबंध सूचक (परिभाषा, भेद और उदाहरण) | Sambandh Soochak

हिंदी के प्रयोग के लिए शब्दों के दो भेद होते हैं।

  1. विकारी शब्द (Vikari Shabad) और
  2. अविकारी शब्द (Avikari Shabad)
  1. विकारी शब्द (Vikari Shabad): विकारी शब्द उस तरह के शब्द होते हैं, जिनमें शब्दों का रूप, लिंग, वचन, कारक और काल के अनुसार परिवर्तन होता रहता है। इन तरह के शब्दों को हम विकारी शब्द कहेंगे। विकारी शब्द में संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण तथा क्रिया आते हैं।
  2. अविकारी या अव्यय शब्द (Avikari Shabad): अविकारी शब्द उस तरह के शब्द होते हैं, जिनमें लिंग वचन कारक काल के अनुसार कोई भी विकार नहीं होता हैं।
    अर्थात
    इस तरह के शब्दों में सदैव कोई परिवर्तन नहीं होता या वैसा ही बना रहता है। ऐसे शब्दों को अविकारी शब्द कहते हैं। अविकारी शब्दों में क्रिया-विशेषण, संबंधबोधक अव्यय, समुच्चयबोधक अव्यय, तथा विस्मयादिबोधक अव्यय आदि शब्द आते हैं। इन्हें अविकारी या अव्यय शब्द कहते हैं।
Image: Sambandh Soochak

सम्बन्ध सूचक किसे कहते हैं?

संबंध सूचक ऐसे अव्यय शब्द या ऐसे शब्द समूह का मेल है। जिसमें आमतौर पर किसी संख्या या किसी सर्वनाम के आगे लगाया जाता है। और वह संबंध सूचक अव्यय उस संज्ञा या सर्वनाम का संबंध उस वाक्य में किसी दूसरे अर्थ को प्रदर्शित करता हैं, उसे सम्बन्ध सूचक कहते हैं।
अर्थात

संबंध सूचक ऐसे अव्यय शब्द है जो किसी संज्ञा शब्द के आगे आकर उस शब्द का संबंध वाक्य के किसी दूसरे शब्द के साथ स्थापित करते हैं, इस तरह के शब्द को हम संबंध सूचक कहते हैं।

उदाहरण

  • आज के जीवन में धन के बिना किसी का भी कार्य नहीं होता हैं।
  • दिन भर बाहर घूमना अच्छा नहीं हैं।

इन वाक्यों में बिना, तक और भर संबंध सूचक (Sambandh Soochak) हैं। जिसमें कि बिना पद ‘धन‘ संज्ञा का संबंध क्रिया से मिलता है।
तक रमेश का संबंध गया से मिलता है। भाग, दिन का संबंध घूमना क्रियार्थक संज्ञा के साथ जोड़ता है।

संबंध सूचक के भेद

संबंध सूचक अव्यय निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं।

  1. प्रयोग के आधार पर
  2. अर्थ के आधार पर
  3. व्युत्पत्ति के आधार पर

1.प्रयोग के अनुसार संबंध सूचक

प्रयोग के आधार पर संबंध सूचक के दो भेद होते हैं।

  1. संबद्ध संबंध सूचक
  2. अनुबद्ध संबंध सूचक
  1. संबद्ध संबंध सूचक: संबंध सूचक ऐसे शब्द होते हैं, जो संज्ञा की विभक्तियों के आगे आकर शब्द बनाते हैं। जैसे कि धन के बिना, नर की नई, पूजा से पहले, इत्यादि।
  2. अनुबद्ध संबंध सूचक: अनुबंध संबंध सूचक एक ऐसे शब्द है, जो संज्ञा के विकृत रूप के साथ आकर शब्द बनाते हैं। जैसे कि: किनारे तक, सखियों सहित, कटोरा भर, पुत्रों समेत, लड़के सरीखा इत्यादि।

2.अर्थ के अनुसार संबंध सूचक

अर्थ के अनुसार संबंध सूचक का वर्गीकरण निम्नलिखित प्रकार से किया जाता है।

  1. काल वाचक
  2. स्थान वाचक
  3. दिशावाचक 
  4. साधन वाचक
  5. हेतु वाचक
  6. विषय वाचक
  7. व्यतिरेक वाचक
  8. विनिमय वाचक
  9. सादृश्य वाचक
  10. विरोध वाचक
  11. सहचारण वाचक
  12. संग्रह वाचक
  13. तुलना वाचक
  1. कालवाचक: इसमें पहले, आगे, पीछे, वाद, पूर्व, अनंतर, पश्चात, उपरांत, लगभग, जैसे शब्द आते हैं, को हम कालवाचक कहते हैं।
  2. स्थान वाचक: स्थान वाचक में ऊपर, नीचे, तले, आगे, पीछे, समानांतर, रूबरू, पास, निकट, समीप, नजदीक, यहां, बीच, बाहर, परे, दूर, भीतर, को हम स्थान वाचक कहते हैं।
  3. दिशा वाचक: इसमें ओर, तरफ, आर-पार, आसपास, प्रति, जैसे शब्दों को दिशा वाचक कहते हैं।
  4. साधन वाचक: साधन वाचक में द्वारा, जरिया, हाथ, मार्फत, बल, करके, जवानी, सहारे, को हम साधन वाचक कहते हैं।
  5. हेतु वाचक: हेतु वाचक में लिए, निमित्त, वास्ते, हेतु, हित, खातिर, कारण, सबवे, मारे को हम हेतु वाक्य कहते हैं।
  6. विषय वाचक: विषय वाचक में बाबत, निस्बत, विषय, नाम, नामक, लिखें, जान, भरोसे, मत, दे, को हम विषय वाचे कहते हैं।
  7. व्यतिरेक वाचक: व्यतिरेक वाचक में शिवा अलावा बिना बगैर अतिरिक्त रहित जैसे को व्यतिरेक वा कहते हैं।
  8. विनिमय वाचक: विनिमय वाचक में पलटी बदले जगह दे बसंती को विनिमय वाचक कहते हैं।
  9. सदृश्य वाचक: सदृश्य वाचक में समान सम तरह भांति नई बराबर तुल्य योग्य लायक सदृश अनुसार अनुकूल देखा देखी सरिता सा ऐसा जैसा हम को हम सदृश्य वाक्यम कहते हैं।
  10. विरोध वाचक: विरोध वाचक में विरुद्ध खिलाफ उल्टा विपरीत को विरोध वाचक कहते हैं।
  11. सहचारण वाचक: सहचारण वाचक में सर साथ समेत सहित पूर्वक अधिक अधिक वश को सजा रणवा क्या कहते हैं।
  12. संग्रह वाचक: संग्रह वाचक में तक लो परियत सुधा भर मात्र को संग्रह वाचक कहते हैं।
  13. तुलना वाचक: तुलना वाचक में अपेक्षा वनस्पति आगे सामने को हम तुलना वचन कहते हैं।

नोट: ऊपर बताई गई सूची के शब्दों को कभी-कभी काल वाचक, संबंध सूचक, तो कभी स्थान वाचक, संबंध सूचक या दिशा वाचक संबंध सूचक में एक जैसा ही उपयोग करते हैं। इनके अर्थ के अनुसार एक से अधिक वर्गों में उपयोग किया जा सकता है।

3.व्युत्पत्ति के अनुसार संबंध सूचक

व्युत्पत्ति के अनुसार संबंध सूचक के दो भेद हैं।

  • मूल संबंध सूचक और
  • योगिक संबंध सूचक

मूल संबंध सूचक

मूल संबंध सूचक हिंदी में बहुत कम उपयोग होता है। जैसे कि: बिना, प्रयत्न, पूर्वक इत्यादि।

योगिक संबंध सूचक

योगिक संबंध सूचक किसी संज्ञा, विशेषण, क्रिया, क्रिया-विशेषण के द्वारा बनते हैं। इसको हम योगीक संबंध कहते हैं।

जैसे

  • संज्ञा से- पलटे, वास्ते, और, अपेक्षा, नाम, लिखे, विषय, मार्फत, इत्यादि।
  • विशेषण से- तुल्य समान उचित जवानी सरीखा योगी जैसा ऐसा इत्यादि।
  • क्रिया विशेषण से– ऊपर, भीतर, यहाँ, वाहन, पास, परे, पीछे इत्यादि।
  • क्रिया से– लिये, मारे, करके, जान इत्यादि।

इस लेख में आपने जाना संबंध सूचक (Sambandh Soochak) किसे कहते हैं और संबंध सूचक के कितने भेद होते हैं। उसके साथ आप लोगों ने संबंध सूचक के कुछ उदाहरण भी देखें। जिससे कि आपको समझ में आ गया होगा, यह कितने प्रकार के होते हैं। और किस तरह से संबंध सूचक शब्द मिलकर किसी वाक्य को परिवर्तित कर देते हैं। संबंध सूचक, परिभाषा, भेद और उदाहरण आदि सभी की जानकारी इस लेख में दी गई है।

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इनका नाम राहुल सिंह तंवर है, इन्होंने स्नातक (रसायन, भौतिक, गणित) की पढ़ाई की है और आगे की भी जारी है। इनकी रूचि नई चीजों के बारे में लिखना और उन्हें आप तक पहुँचाने में अधिक है। इनको 3 वर्ष से भी अधिक SEO का अनुभव होने के साथ ही 3.5 वर्ष का कंटेंट राइटिंग का अनुभव है। इनके द्वारा लिखा गया कंटेंट आपको कैसा लगा, कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। आप इनसे नीचे दिए सोशल मीडिया हैंडल पर जुड़ सकते हैं।

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