वीर रस की परिभाषा, भेद और वीर रस के उदाहरण

Veer Ras in Hindi: हिंदी व्याकरण की शुरुआत विद्यार्थी जब पहली कक्षा में होता है तब हो जाती है। शुरुआत में हिंदी ग्रामर वर्णमाला से शुरू होती है, जो आगे चलकर कई अलग-अलग इकाईयों में विभाजित हो जाती है।

हिंदी ग्रामर की एक महत्वपूर्ण इकाई रस के बारे में आज हम आपको बताने वाले हैं। ग्रामर में रस 9 प्रकार के होते हैं। इन्हीं नौ रसों में वीर रस का मुख्य योगदान है। जिसके बारे में आज हम इस आर्टिकल में डिटेल में आप तक जानकारी पहुंचाएंगे।

Veer Ras In Hindi
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वीर रस की परिभाषा (Veer Ras Ki Paribhasha)

काव्य को सुनने पर जब उत्साह के से आनंद या भाव की अनुभूति होती है तो इस अनुभूति को ही वीर रस कहते हैं। अन्य शब्दों में वीर रस वह रस है, जिसमें उत्साह का भाव होता है अथवा जिसका स्थायी भाव उत्साह होता है।

वीर रस परिचय

वीर रस का काव्य के सभी नौ रसों में एक बहुत ही मत्वपूर्ण स्थान है। वीर रस, वीभत्स रस, श्रृंगार रस तथा रौद्र रस ही प्रमुख रस हैं तथा यही अन्य रसों के उत्पत्तिकारक रस हैं। वीर रस की उपस्थिती ऐसे काव्य में होती है, जिस काव्य में या काव्य की विषय वस्तु में उत्साह का समावेश होता है।

रोद्र रस चरित्र की उस मनःस्थिती को बताता है जब वह सकारात्मक या प्रतिरक्षात्मक रूप से ऊर्जावान होता है तो संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि काव्य के जिस भाग में उत्साह को प्रकट किया जाता है, वहां वीर रस होता है।

वीर रस के अवयव

  • स्थायी भाव: उत्साह।
  • आलंबन (विभाव): अन्यायी या अनाचारी या अत्याचारी व्यक्ती।
  • उद्दीपन (विभाव): कीर्ती या मान की इच्छा, विपक्षी का पराक्रम या विपक्षी का अहंकार।
  • अनुभाव: शारीरक ऊर्जा का निराकरण, धर्म के अनुकूल आचरण करना तथा प्रहार करना आदि।
  • संचारी भाव: उत्सुकता, स्मृति, आवेग, उग्रता आदि।

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वीर रस का स्थायी भाव क्या है?

वीर रस का स्थायी भाव उत्साह है।

वीर रस के भेद (Veer Ras Ke Bhed)

  1. युद्धवीर
  2. दयावीर
  3. धर्मवीर
  4. दानवीर

वीर रस के उदाहरण (Veer Ras Ke Udaharan)

चढ़ चेतक पर तलवार उठा,
करता था भूतल पानी को
राणा प्रताप सर काट काट,
करता था सफल जवानी को।।

पच्छी पर छीने ऐसे परे पर छीने वीर।
तेरी बरछी ने बर छीने हैं खलन के।।

बातन बातन बतबढ़ होइगै, औ बातन माँ बाढ़ी रार,
दुनहू दल मा हल्ला होइगा दुनहू खैंच लई तलवार।
पैदल के संग पैदल भिरिगे औ असवारन ते असवार,
खट-खट खट-खट टेगा बोलै, बोलै छपक-छपक तरवार।।

बुन्देलों हरबोलो के मुह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लागति लपटि कंठ बैरिन के नागिनी सी,
रुद्रहिं रिझावै दै दै मुंडन के माल कों।।

हमने वीर रस के 5 उदाहरण जाने। चलिए कुछ और वीर रस के उदाहरण जानते है।

धनुष उठाया ज्यों ही उसने,
और चढ़ाया उस पर बाण
धरा सिंधु नभ सहसा कांपे
विकल हुए जीवों के प्राण।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

veer ras kise kahate hain
वीर रस की परिभाषा उदाहरण

लाल छितिपाल छत्रसाल महाबाहु बली।
कहाँ लौं बखान करों तेरी कलवार कों।।

कौशल दिखलाया चालों में
उड़ गया भयानक भालों में
निर्भीक गया वह ढालों में
सरपट दौड़ा करवालों में।।

निकसत म्यान तें मयूखैं प्रलैभानु कैसी,
फारैं तमतोम से गयंदन के जाल कों।।

हमने वीर रस के 10 उदाहरण जाने लिए हैं। चलिए वीर रस के उदाहरण कुछ और जानते हैं, जिससे आपको वीर रस आसानी से समझ आ सके।

साजि चतुरंग सैन अंग उमंग धारि
सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत है।
भूषन भनत नाद बिहद नगारन के
नदी नाद मद गैबरन के रलत हैं।।

जुग सहस्त्र जोजन पर भानु
लीलेहु ताहि मधुर फल जानू।

जो तनिक हवा से बाग हिली
लेकर सवार उड़ जाता था।
राणा की पुतली फिरी नहीं
तब तक चेतक मुड़ जाता था।।

ऐसे बेहाल बेवाइन सों पग, कंटक-जाल लगे पुनि जोये।
हाय! महादुख पायो सखा तुम, आये इतै न किते दिन खोये।।
देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करिके करुनानिधि रोये।
पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सौं पग धोये।।

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सामने टिकते नहीं वनराज, पर्वत डोलते हैं,
कौतता है कुण्डली मारे समय का व्याल
मेरी बाँह में मारुत, गरुण, गजराज का बल है।

नाथ जानि अस आयसु होऊ।
कौतुकु करौं बिलोकिअ सोऊ।।
कमल नाल जिमि चाप चढ़ावौं।
जोजन सत प्रमान लै धावौं।।

वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो।
हाथ में ध्वज रहे बाल दल सजा रहे,
ध्वज कभी झुके नहीं दल कभी रुके नहीं
वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो।
सामने पहाड़ हो सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर डरो नहीं तुम निडर डटो वहीं
वीर तुम बढ़े चलो धीर तुम बढ़े चलो।

बड़े लड़ईया हैं महुबे के
इनकी मार सही न जाए
एक को मारें दुई मरि जावें
तीसर खौफ खाय मरि जाए।

सत्य कहता हूँ सखे, सुकुमार मत जानों मुझे,
यमराज से भी युद्ध में, प्रस्तुत सदा मानो मुझे।
है और कि तो बात क्या, गर्व मैं करता नही,
मामा तथा निज तात से भी युद्ध में डरता नहीं।।

कब तक द्वन्द सम्हाला जाए,
युद्ध कहाँ तक टाला जाए।
वंशज है महाराणा का
चल फेंक जहाँ तक भाला जाए।।

प्रतिभट कटक कटीले केते काटि काटि।
कालिका सी किलकि कलेऊ देति काल कों।।

यमराज स्वयं बन जाते थे
घोड़े चेतक पर चढ़ते थे
क्षत विक्षत दुश्मन हो जाते थे
नर मुंड हवा में उड़ते थे।।

हाथ गह्यो प्रभु को कमला कहै नाथ कहाँ तुमने चित धारी
तुन्दल खाई मुठी दुई दीन कियो तुमने दुई लोक बिहारी
खाय मुठी तीसरी अब नाथ कहाँ निज वास की आस बिसारी
रंकहीं आप समान कियो अब चाहत आपहिं होय भिखारी।

हम मानव को मुक्त करेंगे, यही विधान हमारा है
भारत वर्ष हमारा है,यह हिंदुस्तान हमारा है।

माता ऐसा बेटा जानिये
कै शूरा कै भक्त कहाय।

फहरी ध्वजा, फड़की भुजा, बलिदान की ज्वाला उठी।
निज जन्मभू के मान में, चढ़ मुण्ड की माला उठी।।

सौमित्रि से घननाद का रव अल्प भी न सहा गया।
निज शत्रु को देखे विना, उनसे तनिक न रहा गया।
रघुवीर से आदेश ले युद्धार्थ वे सजने लगे।
रणवाद्य भी निर्घाष करके धूम से बजने लगे।

उठो जवानों हम भारत के स्वाभिमान सरताज हैं
अभिमन्यु के रथ का पहिया , चक्रव्यूह की मार है।।

आगे नदिया पड़ी आपार,
घोड़ा कैसे उतरे पार
राणा ने सोचा इस पार,
तब तक चेतक था उस पार।।

जय के दृढ विश्वासयुक्त थे दीप्तिमान जिनके मुखमंडल
पर्वत को भी खंड-खंड कर रजकण कर देने को चंचल
फड़क रहे थे अतिप्रचंड भुजदंड शत्रुमर्दन को विह्वल
ग्राम ग्राम से निकल-निकल कर ऐसे युवक चले दल के दल।।

रण बीच चौकड़ी भर भर कर
चेतक बन गया निराला था।
राणा प्रताप के घोड़े से
पड़ गया हवा का पाला था।।

वीर रस, रौद्र रस से कैसे अलग है?

अक्सर रोद्र रस तथा वीर रस को पहचाननें में या उनमें भेद करने में लोगों के दुविधा होती है। ऐसा इसीलिए होता है क्योंकि इन दोनों ही रसों की परिस्थितियों में लक्षित व्यक्ति में ऊर्जा का संचार होता है तथा हाव भाव या भाव भंगिमा भी सामान रहती है। परन्तु इन दोनों रसों के उत्पन्न होने के लिए जो स्त्रोत परिस्थितियाँ होती हैं, उनमें अंतर होता है।

तकनीकी रूप से देखा जाए तो रोद्र रस का स्थायी भाव क्रोध है जबकी वीर रस का स्थायी भाव उत्साह होता है। रोद्र रस में एक कुछ नकारात्मक या विध्वंसात्मक ऊर्जा का संचरण होता है तथा लक्षित व्यक्ति का व्यवहार भी विध्वंसात्मक सा हो जाता है।

जबकि वीर रस में एक सकारात्मक या प्रतिरक्षात्मक ऊर्जा का संचरण होता है तथा लक्षित व्यक्ति में कुछ कर गुजरने का भाव होता है। हाँ, दोनों रसों में आलमन अवश्य सामान हो सकते हैं परन्तु लक्षित व्यक्ति कि प्रत्योत्तर प्रयोजन में अंतर पाया जाता है।

निष्कर्ष

हमने देखा कि किस वीर रस की उपस्थिति में उत्साह का भाव होता है, जो कि काव्य में किसी चरित्र के द्वारा ऐसी अत्याचार, दुराचार आदि या अन्य उत्साह योग्य परिस्थिती उत्पन्न करने के कारण लक्षित चरित्र के व्यव्हार में उत्साहयुक्त परिवर्तन को लाता है और लक्षित व्यक्ति की एक उत्सुकता विशेष आनन अभियाक्ती व शारीरिक अभिव्यक्ति को संचालित करता है।

रोद्र रस स्थायी भाव के आधार पर वीर रस से भिन्नता रखता है। जहां वीर रस का स्थायी भाव ‘उत्साह’ होता है, वहीं रोद्र रस का स्थायी भाव ‘क्रोध’ होता है।

FAQ

वीर रस किसे कहते हैं?

काव्य को सुनने पर जब उत्साह के से आनंद या भाव की अनुभूति होती है तो इस अनुभूति को ही वीर रस कहते हैं।

वीर रस का उदाहरण बताइए?

माता ऐसा बेटा जानिये
कै शूरा कै भक्त कहाय।

वीर रस का स्थायी भाव क्या है?

वीर रस का स्थायी भाव उत्साह है।

वीर रस के भेद कितने है?

युद्धवीर, दयावीर, धर्मवीर, दानवीर

अंतिम शब्द

इस लेख में हमने वीर रस किसे कहते हैं? (Veer Ras Kise Kahate Hain), वीर रस की परिभाषा उदाहरण (Veer Ras Ka Udaharan) आदि के बारे में विस्तार से जाना। उम्मीद करते हैं आपको यह जानकारी पसंद आई होगी, इसे आगे शेयर जरुर करें।

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इनका नाम राहुल सिंह तंवर है। इनकी रूचि नई चीजों के बारे में लिखना और उन्हें आप तक पहुँचाने में अधिक है। इनको 4 वर्ष से अधिक SEO का अनुभव है और 6 वर्ष से भी अधिक समय से कंटेंट राइटिंग कर रहे है। इनके द्वारा लिखा गया कंटेंट आपको कैसा लगा, कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। आप इनसे नीचे दिए सोशल मीडिया हैंडल पर जरूर जुड़े।

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