पर्यावरण (परिभाषा, विशेषताएँ, प्रकार, संरचना और संघटक)

पर्यावरण (परिभाषा, विशेषताएँ, प्रकार, संरचना और संघटक) | Paryavaran

Paryavaran
Image: Paryavaran

पर्यावरण क्या है?

पर्यावरण के कार्य और कार्य करने की जो भी विधियां है वो प्रकृति प्रदत्त साधनों से होती है। पर्यावरण के सभी तत्व एक दुसरे से जुड़े हुए होते हैं। पर्यावरण धरती का जीवन आधार है। यह पृथ्वी पर विद्यमान मनुष्यों और जीवो तथा जन्तुओं और वस्पतियो के उद्गम, उद्भव उसके विकास और अस्तित्व का मुख्य आधार है। यह सब पर्यावरण पर ही निर्भर करते है।

जबसे सभ्यता का विकास हुआ है, मानव जाति की जितनी भी उन्नति हुई है, वह सब पर्यावरण के कारण ही संभव हो पाया है। पर्यावरण ने इन विकासों में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। पर्यावरण का तात्पर्य वनस्पतियों एव जीवधारियो के चारो और एक आवरण है। इस आवरण को ही पर्यावरण का नाम दिया गया है।

पर्यावरण में जो शब्द है वह फ्रेंच शब्द environ से उत्पन्न हुआ है और environ का शाब्दिक अर्थ है घिरा हुआ अथवा आवृत्त। यह जैविक और अजैविक अवयव का ऐसा समिश्रण है जो किसी भी जीव को अनेक रूपों से प्रभावित कर सकता है। इन्ही पर्यावरण में कुछ ऐसे कारक भी है जो संसाधन बनकर उनके रूप में कार्यो को संपन्न करते है और इन्ही में से कुछ नियंत्रक के कार्य करने लग जाते है। कुछ वैज्ञानिक पर्यावरण को milieu कहते है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है चारों ओर विद्यमान वातावरण का समूह।

पर्यावरण अलग-अलग विषयों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। जैसे इकोसफियर (ecosphere) अथवा प्राकृतिक वास (habitat), जीवमंडल (geosphere) इत्यादि। सामान्य शब्दो में पर्यावरण का यह कार्य है कि वह ऐसी परिस्थितियों और भौतिक दशाओं का प्रदर्शन करता है जो जीवों अथवा जीवों के समूह के चारों तरफ को ढकती है और उनका प्रभाव भी जीव समूहों पर पड़ता है।

पर्यावरण की विशेषताएं

पर्यावरण की निम्नलिखित विशेषताएं हैं।

  1. जैविक तथा अजैविक तत्व जब जुड़ते हैं तो यही योग पर्यावरण (Paryavaran) कहलाता है।
  2. पर्यावरण के मुख्य तत्वों में जैव विविधता और ऊर्जा आते है। स्थान और समय का परिवर्तन पर्यावरण में होता रहता है।
  3. जैविक और अजैविक पदार्थों के कार्यकारी संबंधों पर ही पर्यावरण का आधार स्थित होता है।
  4. जबकि इसकी कार्यात्मक की निर्भरता ऊर्जा के संचार पर होती है।
  5. पर्यावरण के अंदर ही जैविक पदार्थ उत्पन्न होते हैं, जिनका कार्य अलग स्थानों पर अलग-अलग ही होता है। मुख्यत पर्यावरण सामान्य परिस्थिति को संतुलित करने की ओर ही अग्रसर होता है।
  6. इसे एक बंद तंत्र भी कह सकते हैं, इन सभी के अंतर्गत प्रकृति का पर्यावरण तंत्र नियंत्रित होता है तब इस नियंत्रक क्रियाविधि को होमियोस्टैटिक क्रिया विधि नाम से जाना जाता है। इसी से यह नियंत्रण में रहता है।

पर्यावरण के प्रकार

पर्यावरण को जैविक और भौतिक दोनों ही संकल्पना माना जाता है। इस कारण इसके अंतर्गत मानव जनित पर्यावरण को भी रखा जाता है, इसमें केवल प्राकृतिक पर्यावरण ही नहीं जोड़ा जाता है। यह मानव जनित पर्यावरण हैं – सामाजिक व सांस्कृतिक पर्यावरण।

मुख्यत: पर्यावरण के तीन भाग हैं।

  1. प्राकृतिक पर्यावरण
  2. मानव निर्मित पर्यावरण
  3. सामाजिक पर्यावरण

प्राकृतिक पर्यावरण

प्राकृतिक पर्यावरण को अंग्रेजी में natural environment कहते हैं। इसमें सभी जैविक और अजैविक तत्व भी मौजूद है, जो पृथ्वी पर प्रकृति स्वरूप मिलते हैं। यही आधार है कि प्राकृतिक पर्यावरण दो भागों में बांटा है। पहला जैविक और दूसरा अजैविक।

जैविक तत्व सूक्ष्म जीव, जंतु और पौधे प्रायोगिक है तथा अजैविक उत्सर्जन, ऊर्जा, जल, वायुमंडल की गैस, वायु, अग्नि और मृदा तथा गुरुत्वाकर्षण इसके अंतर्गत आते हैं।

मानव निर्मित पर्यावरण

मानव द्वारा निर्मित पर्यावरण अर्थात ऐसा पर्यावरण जो मानव ने स्वयं निर्मित किए हैं, जिसका रूप कृत्रिम है। उदाहरण के लिए औद्योगिक शहर अंतरिक्ष स्टेशन कृषि के क्षेत्र यह सभी मानव द्वारा निर्मित कृत्रिम पर्यावरण है। जनसंख्या का बढ़ना और आर्थिक विकास के प्रभाव के कारण मानव निर्मित पर्यावरण का क्षेत्र लगातार अपने स्थान में वृद्धि कर रहा है यह लगातार बढ़ता जा रहा है।

सामाजिक पर्यावरण

सामाजिक पर्यावरण अर्थात social environment के अंतर्गत सांस्कृतिक मूल्य और मान्यताओं का अपना सम्मिलन है। यहां इस धरती पर भाषा, धर्म, रीति-रिवाजों और मानव की जीवन शैली इन सभी के आधार पर ही सांस्कृतिक पर्यावरण के गठन व निर्माण की रचना होती है।

पर्यावरण की संरचना

पृथ्वी पर प्राप्त होने वाले पर्यावरणों (Paryavaran) की मूल संरचना का गठन चार भागों से मिलकर होता है।

ये 4 भाग निम्न है:

  1. स्थलमंडल (lithosphere)
  2. जलमंडल (hydrosphere)
  3. वायुमंडल (atmosphere)
  4. जैवमंडल (biosphere)

स्थलमंडल

स्थलमंडल को अंग्रेजी में lithosphere कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि स्थलमंडल का जो भाग है, वह पूरी पृथ्वी का लगभग 29% भाग है। स्थलमंडल का अधिकतर भाग जीव जंतु पेड़ पौधों से भरा हुआ है, इनमें मृदा, पठार, खनिज, चट्टान पहाड़ इत्यादि की भी मौजूदगी है।

स्थलमंडल की उपस्थिति जीवों की सहायता दो तरह से करती है। पहला इन्हें रहने का स्थान दिला कर और दूसरा स्थलीय अथवा जलीय जीवो के लिए खनिज का स्रोत स्थलमंडल स्वयं ही है। स्थलमंडल भी दो भागों में बांटा है। पहला शैल और दूसरा मृदा।

इसका शैल वाला भाग कठोर होता है तथा संगठित रहता है और मृदा तब बनती है। जब शैल का उनके स्थान से अपक्षय हो जाता है, मृदा मूल शैलो, जलवायु, सजीव और स्थलाकृतियों के बीच के परस्पर क्रिया करने से निर्मित होता हैं।

जलमंडल

जलमंडल यानी hydrosphere इस पर्यावरण (Paryavaran) का अति महत्वपूर्ण घटक माना जाता है। क्योंकि इसका कार्य पृथ्वी पर स्थल जीवन और जलीय जीवन को संभावित करना है। जल ही वह मुख्य कारण है, जिससे स्थल पर जीवन संभव है। इसके अंतर्गत धरातल के जल व भूमिगत जल को शामिल किया गया है।

अनेक रूपों में पृथ्वी पर जल की उपस्थिति पाई जाती है, इसके उदाहरण निम्न है:

  • महासागर (ocean)
  • बांध (dam)
  • नदिया (rivers)
  • हिमनद (glacier)
  • स्थल के नीचे का भूगर्भिक जल (surface water)

जल को जीव जंतु अपने भिंड भिंड उपापचय की क्रियाओं के लिए इसे उपयोग में लाते हैं। इसके अलावा जल जीवद्रव्य का सबसे अधिक महत्वपूर्ण घटक है।

जलमंडल पर अधिकतर जल लवण के रूप में ही है और यह लवणीय जल सागर और महासागर में अधिक पाए जाते हैं। किंतु यह मनुष्य के लिए प्रत्यक्ष रूप से प्रयोग में नहीं लाया जा सकता है। अलवणीय जल अर्थात स्वच्छ जल का संग्रह मुख्य रूप से नदियों और हिम नदियों तथा भूमिगत जल में होता है। पृथ्वी पर उपयोग में लाए जाने वाले जल, कुल जल का मात्र 1% अथवा उससे भी कम मात्रा में उपलब्ध है।

वायुमंडल

वायुमंडल को अंग्रेजी में atmosphere कहते हैं। यह मानव जीवन के अति महत्वपूर्ण घटकों में से एक है, इसके बिना जीवन अकाल्पनिक है। वायुमंडल विभिन्न गैसों का सम्मिश्रण होता है। इसमें नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड तत्व मौजूद होते हैं।

वायुमंडल में पाई जाने वाली विभिन्न गैसों का सम्मिश्रण:

क्र. सं.गैस का नाममात्रा
01नाइट्रोजन78.8%
02ऑक्सीजन20.25%
03ऑर्गन0.93%
04कार्बन डाइऑक्साइड0.036%
05नियॉन0.002%
06हीलियम0.0005%
07क्रिप्टान0.001%
08जेनान0.00009%
09हाइड्रोजन0.00005%

वायुमंडल निम्न 4 भागों में विभक्त है:

  1. क्षोभमंडल
  2. समतापमंडल
  3. मध्यमंडल
  4. तापमंडल

क्षोभमंडल

यह वायु मंडल का सबसे नीचे वाला हिस्सा है। इसको ध्रुव पर 8 किलोमीटर और विषुवत रेखा पर 18 किलोमीटर की ऊंचाई तक मापा जा सकता है। क्षोभमंडल में तापमान गिरने की दर 165 मीटर ऊंचा और 1 डिग्री सेल्सियस तथा किलोमीटर की ऊंचाई 6.4 डिग्री सेल्सियस होता है।

क्षोभमंडल वायुमंडल की कुल राशि का लगभग 90% भाग है बादल, बारिश, तेज आंधियां यह सभी प्राकृतिक घटनाएं क्षोभमंडल से ही होती है। यह वही मंडल है, जिससे धरातल के सभी जीव जुड़े हुए हैं। इसी मंडल के अंतर्गत भारी गैस से जलवाष्प और धूल के कण का अधिकतम भाग यही अवस्थित रहता है। गर्मियों में इस मंडल की ऊंचाई बढ़ जाती है जबकि सर्दियों में ऐसा नहीं होता है। क्षोभमंडल में अवस्थित सबसे ऊपर की सीमा को क्षोभ सीमा नाम दिया गया है।

समताप मंडल

वायुमंडल के क्षोभ मंडल की सबसे ऊपर वाली परत जिसे हम समताप मंडल के नाम से जानते हैं। समताप मंडल की ऊंचाई 18 से 50 किलोमीटर तक है विषुवत रेखा पर। समताप मंडल में ही ओजोन की परतें अवस्थित है, इसीलिए इसे एक और नाम दिया गया है ओजोनोस्फीयर (ozonsphere)।

मध्य मंडल

मध्य मंडल की माप के बारे में यदि बताया जाए तो इसकी ऊंचाई 50 से 80 किलोमीटर तक है। इसके तापमान में अचानक गिरावट होना एक सामान्य घटना है। जैसे-जैसे मध्य मंडल की ऊंचाई बढ़ती है, इसके तापमान का ह्रास हो जाता है। मध्य मंडल की सबसे ऊपरी सीमा डिग्री सेल्सियस से निर्धारित की जाती है, जिसका नाम मेसोपाज है।

तापमंडल

ताप मंडल मध्य मंडल जो 80 किमी तक है के ऊपरी वायुमंडलीय भाग जिसकी ऊंचाई अनिश्चित है, में पाया जाता है। तापमंडल में ऊंचाई के साथ साथ ही तापमान में वृद्धि होती है, ताप मंडल का तापमान बहुत अधिक होता है। लेकिन यहां ग्रीष्म ऋतु का अनुभव नहीं होता है। क्योंकि इतनी ऊंचाई पर गैस अविरल हो जाती है और ऊष्मा का रखाव कम ही रहता है।

यह मंडल दो भागों में विभक्त है।

  1. आयन मंडल
  2. वाह्य मंडल

आयन मंडल: आयन मंडल का विस्तार 80 से 640 किलोमीटर तक मध्य मंडल के ऊपरी भाग में होता है। आयन मंडल में विद्युत आवेशित कण अधिक मात्रा में होते हैं। इसी भाग में चुंबकीय घटनाएं और विस्मित कर देने वाली विद्युतीय घटनाएं होती हैं और ब्रह्मांड की किरणे भी परिलक्षित होती हैं।

इसी मंडल से परावर्तित होकर संचार कर पाना संभव होता है, रेडियो तरंगे इसी मंडल से संचार को संभव कर पाती हैं। यदि रेडियो तरंगे आयन मंडल की सहायता ना ले तो रेडियो तरंगे जमीन पर नहीं आएंगी, वह सीधे आकाश में असीमित ऊंचाई तक पहुंच जाएंगी। आयन मंडल तापमान के सबसे निचले भाग में अवस्थित होता है।

वाह्यमंडल: वाह्यमंडल 640 किलोमीटर से ऊपर तक विस्तृत है। यह वही मंडल है, जिसकी समाप्ति के बाद वायुमंडल का अंतरिक्ष में विलय हो जाता है।

जैवमंडल

पृथ्वी का वह हिस्सा जहां जीवन की संभावनाएं हैं, उसे जैवमंडल के नाम से जाना जाता है। एक ऐसा क्षेत्र जहां पर स्थलमंडल, जलमंडल और वायुमंडल सभी आपस में मिल जाते हैं, वह क्षेत्र जैवमंडल का ही है। इसके अंतर्गत निचला वायुमंडल, जलमंडल और स्थलमंडल आते है। जहां जीवित प्राणी अथवा जीव रहते हैं और समायोजन स्थापित करते हैं तथा अपने जीवित रहने के लिए सभी आवश्यक तत्वों की पूर्ति जैव मंडल से ही प्राप्त करते हैं।

जैवमंडल में समुद्र तल की माप के अनुसार 200 मीटर नीचे गहराई तक तथा 6000 मीटर ऊपर ऊंचाई तक जीवन संभव है। कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहां जैवमंडल की अनुपस्थिति पाई जाती है, उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव, ऊंचे पर्वत, गहरे महासागर इनकी जलवायु विषम होती है, इसीलिए यहां जीवन असंभव है। अतः यहां जैवमंडल उपस्थित नहीं होता।

जैव मंडल में ही सूर्य उपस्थित होता है और सूर्य की ऊर्जा द्वारा ही जीवन की संभावनाएं होती हैं तथा जीव के पोषक तत्व की पूर्ति जल, मृदा एवं वायु द्वारा हो जाती है। यहां जीवों का वितरण असमान है क्योंकि ध्रुवीय क्षेत्र ऐसा स्थान है, जहां कुछ विशेष प्रकार के जीव ही पाए जाते हैं। जबकि विषुवतीय वर्षा के कारण वन अत्यधिक जीव प्रजातियां से भरा हुआ है।

पर्यावरण के संघटक

पर्यावरण अनेक तत्वों के सम्मिश्रण से बना हुआ है, इसमें जितने भी तत्व पाए जाते हैं। सभी का अपना एक महत्वपूर्ण स्थान है। प्राकृतिक पर्यावरण में पाए जाने वाले तत्व और पारिस्थितिकी में पाया जाने वाला तत्व दोनों समान है। परिस्थितिकी का सबसे मूल घटक पर्यावरण (Paryavaran) को ही मानते हैं।

पर्यावरण के तत्व का सामान्य स्तर पर दो समूहों में वर्गीकरण किया गया है।

  1. जैविक घटक
  2. अजैविक घटक

जैविक घटक

पर्यावरण (Paryavaran) में जैविक घटक के अंतर्गत आने वाले तत्व हैं: पौधे प्राणी (मानव, जीव जंतु सूक्ष्मजीव और परजीवी) एवं अवघटक।

परितंत्र में जैविक घटक तथा अजैविक घटक इनकी पृष्ठभूमि का परस्पर क्रियान्वयन होता हैं, इस क्रियान्वयन से प्राथमिक उत्पादक (स्वपोषी) तथा उपभोक्ता (परपोषी) प्राप्त होते हैं।

प्राथमिक उत्पादक (primary producer)

प्राथमिक उत्पादक को स्वपोषी भी (autotroph) कहते हैं, प्राथमिक उत्पादक से उत्पन्न जीव आधारभूत रूप से हरे रंग का पौधा, कुछ विशेष शैवाल और जीवाणु, जो स्वपोषी होते है। अर्थात स्वयं अपना पोषण करते हैं तथा सूर्य के प्रकाश की सहायता से सरल और जैविक पदार्थों की उपयोगिता द्वारा स्वयं का भोजन बनाते हैं, वह प्राथमिक उत्पादन के अंतर्गत आते हैं।

उपभोक्ता (consumers)

उपभोक्ता को परपोषी (heterotrophs) कहते हैं। यह उस प्रकार के जीव है, जो अपना भोजन स्वयं नहीं तैयार करते हैं बल्कि अन्य जीवों को अपना आहार बनाते हैं। भोजन के लिए ये दूसरों पर निर्भर रहते हैं। उपभोक्ता के अंतर्गत 3 उपवर्ग शामिल किए जाते हैं।

प्राथमिक उपभोक्ता, द्वितीयक उपभोक्ता तथा तृतीयक उपभोक्ता या जिसे सर्वाहारी भी कह सकते हैं।

प्राथमिक उपभोक्ता के अंतर्गत वे जीव आते हैं जो शाकाहारी (herbivores) होते हैं, अर्थात जिनका भोजन घास पत्ते और शाक-सब्जियां होती हैं।

द्वितीयक उपभोक्ता के अंतर्गत ऐसे जीव आते हैं जो भोजन के रूप में दूसरे जीवो का मांस खाते हैं, उन्हें मांसाहारी (carnivores) कहते हैं।

तृतीयक उपभोक्ता के अंतर्गत सर्वाहारी (Ominivores) जीव आते हैं, सर्वाहारी का अर्थ होता है सभी प्रकार का भोजन ग्रहण करने वाला। जो मांसाहारी और शाकाहारी दोनों प्रकार के भोजन का सेवन करते हैं।

वियोजक या अपघटक

योजक या घटक के अंतर्गत विशेष प्रकार के सूक्ष्मजीव आते हैं। ऐसे सूक्ष्मजीव जो मृत हुए पौधों जैविक पदार्थों और जंतु का वियोजन करते हैं, वियोजन से तात्पर्य सड़ना और गलना से है। यह ऐसी प्रक्रिया है, जिसके दौरान सूक्ष्मजीव अपने भोजन का निर्माण करते हैं और जटिल कार्बनिक पदार्थों को एक दूसरे से अलग कर उन्हें सामान्य रूप दे देते हैं, जिनको स्वपोषी तथा प्राथमिक उत्पादक हरे पौधे उपयोगी बनाते हैं। इनमें अधिकतर जीव कवक और सूक्ष्म बैक्टेरिया के रोप में मृदा के रूप में उपस्थित रहते हैं।

अजैविक घटक

पर्यावरण (Paryavaran) के जैविक घटक के अंतर्गत प्रकाश, तापमान, वर्षण, आर्द्रता एवं जल, अक्षांश, ऊंचाई, उच्चावच आदि आते हैं। जिनका वर्णन इस प्रकार हैं –

प्रकाश

हरे पौधों को बढ़ने के लिए प्रकाश की अति आवश्यकता होती है, वह सूर्य के प्रकाश द्वारा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया करते हैं। सभी प्राणियों की ,हरे पौधे द्वारा निर्माण किए गए भोज्य पदार्थों पर ही प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से निर्भरता होती है। जीवो के लिए सौर ऊर्जा अर्थात सूर्य से प्राप्त किया जाने वाला प्रकाश ही ऊर्जा के रूप में अंतिम स्रोत होता है।

तापमान

तापमान पर्यावरण (Paryavaran) के सबसे महत्वपूर्ण घटकों में से एक है। तापमान जीवों की उत्तरजीविता बृहद रूप से प्रभावित करती है। लेकिन प्राणी अपने वृद्धि के लिए केवल एक निश्चित सीमा तक ही तापमान सह सकते हैं। आवश्यकता से अधिक या कम तापमान जीवो की वृद्धि में रुकावट पैदा कर सकती है।

वर्षण

कोहरे, हिमपात, ओलावृष्टि इत्यादि का सबसे महत्वपूर्ण और अजैविक कारक वर्षण के नाम से जाना जाता है। अधिकतर जीवों की निर्भरता प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किसी न किसी प्रकार वर्षण पर निर्भर करती है। यह प्रक्रिया अधोभूमि से होती है, वर्षा की मात्राएं भिन्न-भिन्न प्रकार से होती हैं, जिनके निर्भरता इस बात पर निर्भर करती है कि आप अथवा आप का निवास स्थान पृथ्वी पर कहां और किस जगह स्थित है।

आर्द्रता एवं जल

अनेक प्रकार के पौधे और प्राणी जिनके लिए वायु में नमी होना महत्वपूर्ण है, जिससे कि उनका कार्य सही प्रकार से चल सके। कुछ ऐसे भी प्राणी पाए जाते हैं, जिनकी सक्रियता रात में अधिक होती है जब आर्द्रता की अधिकता होती है। जलीय आवास पर, रसायन एवं गैसे उनकी मात्राओं में होने वाले परिवर्तन का तथा गहराइयों में अंतर आने से वे प्रभावित होते हैं।

अक्षांश

जैसे-जैसे हम विषुवत रेखा से उत्तर अथवा दक्षिण की ओर आगे बढ़ते जाते हैं वैसे वैसे सूर्य की कोणीय दूरी भी कम होती जाती है, जिससे औसत तापमान में कमी आ जाती है।

ऊंचाई

अलग-अलग ऊंचाइयों पर वर्षण और तापमान दोनों ही भिन्न-भिन्न पाए जाते हैं। वर्षण ऊंचाई के साथ आमतौर पर बढ़ता जाता है लेकिन ज्यादा ऊंचा जाने पर इसमें कमी हो जाती है।

उच्चावच

उच्चावच को भू आकार भी कहते हैं। यह पर्यावरण (Paryavaran) का महत्वपूर्ण तत्व है, पूरी पृथ्वी का धरातल विविधता से भरा हुआ है। इन विविधताओं में महाद्वीप के स्तर से लेकर स्थानीय स्तर भी शामिल है। सामान्य उच्चावच के स्वरूपों के तीन उदाहरण है पठार पर्वत और मैदान।

पर्वत और मैदान में ऊंचाई संरचना विस्तारित की क्षेत्रीय विविधताएं देखने को मिलती हैं। जब अपरदन और अपक्षय क्रियाएं होती हैं तब भू – रूप से अनेक नई स्थलाकृतियों का निर्माण होता है। जैसे कहीं-कहीं पर मरुस्थली स्थलाकृति है तो कहीं पर चूना प्रदेश की आकृति तो वही एक ओर हिमानीकृत भी है तो एक ओर नदी द्वारा निर्माण किया गया मैदानी डेल्टा से युक्त प्रदेश।

पर्यावरण अध्ययन

पर्यावरण के अध्ययनों को ही पर्यावरणीय अध्ययन के नाम से जाना जाता है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जो रासायनिक, भौतिक, चिकित्सीय, जीव, जन स्वास्थ्य तथा कृषि विज्ञान आदि की शाखाओं से संयुक्त है।

पर्यावरण के अध्ययन करने के निम्न कारण हो सकते हैं:

  • जीवन के प्रत्येक स्वरूप में पर्यावरण का अपना स्थान है। पर्यावरण (Paryavaran) सभी के जीवन में एक महत्व रखता है, वह महत्त्व छोटा या बड़ा दोनों हो सकता है।
  • इसीलिए पृथ्वी पर मानवीय जीवन को अस्तित्व में रखने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि जैव विविधता का संरक्षण किया जाए इस कारण पर्यावरण के अध्ययन की आवश्यकता और अधिक बढ़ जाती है।
  • प्रकृति की संरचना अति विशिष्ट है। प्रकृति के जो भी कार्य और क्रियाएं हैं, इसके पीछे अवश्य ही कोई निश्चित उद्देश्य होता है। कभी प्रत्यक्ष तो कभी अप्रत्यक्ष रूप में प्रकृति सदैव मानव के जीवन को प्रभावित करती है। यदि प्रकृति में थोड़ा बदलाव आ जाए तो मनुष्य के जीवन पर बड़े संकट आ सकते हैं। इस कारण पर्यावरणीय संरचना का ध्यान रखना प्रत्येक मानव के लिए अति महत्वपूर्ण है।
  • जनसंख्या और संसाधनों के मध्य अनुकूल संबंध स्थापित हो इसके लिए पर्यावरणीय अध्ययन आवश्यक है।
  • पर्यावरण का अध्ययन करके ही पर्यावरण के विषय में जागरूकता का प्रचार एवं प्रसार करके सतत विकास और आर्थिक उन्नति की बढ़ोतरी की जा सकती है।

पर्यावरण के अध्ययन के विषय क्षेत्र

वर्तमान में समय के अनुसार पर्यावरणीय संबंध में निम्न विषयों का विशेषत: अध्यापन किया जा रहा है।

  • मनुष्य द्वारा पर्यावरणीय तापमान वृद्धि और वायुमंडलीय तापमान वृद्धि एवं जलवायु में हो रहे परिवर्तन।
  • वायु प्रदूषण के कारण ओजोन परत में होल हो जाना।
  • दैवीय अथवा प्राकृतिक आपदा का अध्ययन एवं अध्यापन तथा मनुष्य द्वारा वनों का नष्ट किया जाना।
  • जैव विविधता का ह्रास हो जाना।
  • मानव संसाधन का सही उपयोग तथा उन्हें संरक्षित करना।
  • प्राकृतिक संसाधनों का हिसाब तैयार करना और जैव विविधता से समाज के सभी वर्गों तक लाभ पहुंचाना।

मानव और पर्यावरण

प्रायः मनुष्य और पर्यावरण के परस्पर संबंध का अध्यापन भूगोल विषय में होता है। प्रसिद्ध अमेरिकी भूगोलवेत्ता
एलेन सी सैंपल के कथनानुसार मनुष्य अपने पर्यावरण (Paryavaran) की ही उत्पत्ति है। भूगोलवेत्ताओ ने मनुष्य और पर्यावरण के संबंध में कई अवधारणाएं प्रस्तुत की हैं, जो निम्न है:

निश्चय अथवा नियतीवादी

प्रसिद्ध वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन ने 1859 कहा था कि मनुष्य अपने पर्यावरण में संघर्षशील रहकर ही आज वर्तमान स्वरूप तक पहुंचा है। डार्विन के संघर्ष सिद्धांत का जिक्र सबसे पहले एफ रेटाजिल (F.Ratzel) ने अपनी किताब एंथ्रोपोज्योज्योग्राफी में किया था। वैज्ञानिक रेटाजिल ने मनुष्य और पर्यावरण (Paryavaran) के संबंध में निश्चयवाद विचारधारा का प्रतिपादन किया।

संभववादी

भूगोल के ज्ञाताओ का मानना है कि मनुष्य अपनी स्वयं की आवश्यकता और सुविधा के लिए पर्यावरण को परिवर्तित करने की क्षमता रखता है। अतः पर्यावरण (Paryavaran) से अधिक मनुष्य के जीवन का महत्व है। यह विचारधारा विडाल – डी – लाब्लश की है।

नव निश्चयवादी

वर्तमान समय में इन दोनों विचारधाराओं से भिंड लेकिन सम्मिलन रूप में नवनिश्चयवाद (neo-Determinism) अति महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिससे मनुष्य और पर्यावरण (Paryavaran) के बीच संतुलन को महत्वपूर्ण बनाकर सतत विकास का आधार तैयार किया जा रहा है। नवनिश्चयवाद को एक अन्य नाम से जाना जाता है, जिसे “रुको और जाओ नियतिवाद “कहते हैं। इस विचार का प्रतिपादन ग्रिफिथ टेलर ने किया था।

मनुष्य के जीवन पर पर्यावरण का प्रभाव

पूरा विश्व नगरीय जनसंख्या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कहीं ना कहीं भौतिक पर्यावरण से प्रभाव में रहती हैं। पर्यावरणीय भौतिक तत्व सबसे अधिक मानव समाज और उसकी जीवन शैली को प्रभावित करता है। इसके समकक्ष मध्य एशिया क्षेत्र और अफ्रीका और भी कई विषम जलवायु वाले क्षेत्र में वहां के निवासियों के लिए पर्यावरण (Paryavaran) उनके जीवन पर स्पष्ट रूप से प्रभाव डालता है।

उदाहरण के लिए मद्ध एशिया क्षेत्र के लोग पशुओं को चारण के द्वारा तथा कालाहारी और कांगो बेसिन के निवासी शिकारी बनकर तथा पारंपरिक रूप से की जाने वाली खेती करके और ध्रुवीय क्षेत्रों के निवासी बर्फ के घर (इग्लू) में रहने और साथ ही उन क्षेत्रों में उपलब्ध जीव जंतुओं के सहारे ही अपना जीवन व्यतीत करते हैं। इसके अलावा जलवायु, प्रत्यक्ष रूप से वहा रहने वाले प्रजातियों के रंग रूप, आंख, शारीरिक बनावट, सिर, चेहरे की आकृति को भी प्रभावित करती है।

पर्यावरण पर मनुष्य का प्रभाव

पर्यावरण पर पड़ने वाला माननीय प्रभाव मुख्यता दो रूपों में विभक्त है:

  1. प्रत्यक्ष प्रभाव
  2. अप्रत्यक्ष प्रभाव

प्रत्यक्ष रूप से पड़ने वाला प्रभाव

कथित रूप से पड़ने वाले प्रभाव के अंतर्गत सुनियोजित और संकल्पित रूपों में प्रभाव का सम्मिलन है। क्योंकि मानव अपने द्वारा किए गए कार्यों के परिणामों से अच्छी तरह अवगत रहता है। जैसे -भूमि उपयोग परिवर्तित होना, नाभिकीय कार्यक्रम, मौसम को रूपांतरित कर देने वाले कार्यक्रम, निर्माण आदि।

प्रत्यक्ष प्रभाव कुछ समय के लिए ही दिखाई पड़ते हैं लेकिन यह लंबे समय तक पर्यावरण (Paryavaran) को अपने प्रभाव में रखते हैं, इनकी प्रकृति परिवर्तनीय होती है।

अप्रत्यक्ष रूप से पड़ने वाला प्रभाव

अप्रत्यक्ष रूप से पड़ने वाले प्रभाव के अंतर्गत ऐसे प्रभाव आते हैं, जो पहले से सुनियोजित नहीं होते हैं।

जैसे औद्योगिक विकास के लिए किए जाने वाला कार्य और उसके प्रभाव। यह तुरंत ही परिलक्षित नहीं हो जाता ऐसे कैसे लेकिन इनमें ज्यादातर प्रदूषण और पर्यावरण अवनयन का प्रभाव रहता है। यह पारिस्थितिकी तंत्र को कैसे प्रभावित करता है कि जो आगे चलकर मनुष्य के जीवन के लिए बहुत घातक सिद्ध होते हैं।

अंतिम शब्द

हमने यहां पर पर्यावरण (Paryavaran) की परिभाषा, विशेषता, प्रकार, संरचना और संघटक के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त की है। उम्मीद करते हैं कि आपको यह जानकारी पसंद आई होगी, इसे आगे शेयर जरूर करें। आपको यह जानकारी कैसी लगी, हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

Read Also

इनका नाम राहुल सिंह तंवर है, इन्होंने स्नातक (रसायन, भौतिक, गणित) की पढ़ाई की है और आगे की भी जारी है। इनकी रूचि नई चीजों के बारे में लिखना और उन्हें आप तक पहुँचाने में अधिक है। इनको 3 वर्ष से भी अधिक SEO का अनुभव होने के साथ ही 3.5 वर्ष का कंटेंट राइटिंग का अनुभव है। इनके द्वारा लिखा गया कंटेंट आपको कैसा लगा, कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। आप इनसे नीचे दिए सोशल मीडिया हैंडल पर जुड़ सकते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here