फेसबुक (Facebook) की सफलता की कहानी

फेसबुक की सफलता की कहानी (Success Story of Facebook in Hindi): दोस्तों जब मार्क जुकरबर्ग (Mark Zuckerberg) ने फेसबुक (Facebook) की शुरुआत की थी, तब उनको कतई यह अंदाजा नहीं था कि यह वेबसाइट एक दिन सोशल मीडिया (Social Media) की नंबर एक वेबसाइट बन जाएगी। फेसबुक (Facebook) की इस तरक्की के पीछे हाथ है उसके मालिक (Facebook Founder) मार्क जुकरबर्ग (Mark Zuckerberg Facebook) का ही हाथ है। उनके निर्णय लेने की क्षमता ही उनको अलग बनाती है।

Success Story of Facebook in Hindi

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फेसबुक की सफलता की कहानी (Success Story of Facebook in Hindi):

फेसबुक (Facebook) ने व्हाट्सएप्प (Whatsapp) को 2014 में 19 बिलियन डॉलर में ख़रीदा, ऐसी ख़बरें थी कि दूसरी कम्पनियाँ भी फेसबुक (Facebook) से ज्यादा पैसे देकर व्हाट्सएप्प (Whatsapp) को खरीदना चाहती थी, लेकिन मार्क जुकरबर्ग (Mark Zuckerberg Facebook) की रणनीति के अनुसार फेसबुक (Facebook) को इस डील में सफलता (Success) मिली। आइये जानते है मार्क में ऐसी क्या खासियत है जो उन्हें बाकी लोगों से अलग बनाती है।

दोस्ताना व्यवहार

मार्क के अनुसार जिस कंपनी को खरीदना चाहते है, पहले उन्हें अपना अच्छा दोस्त बनाते है। उसके बाद खरीदने की बात करते है। उन्होंने इन्स्टाग्राम (Instagram) को खरीदने के लिए भी यही रणनीति अपनाई और यही बात व्हाट्सएप्प के फाउंडर (Whatsapp Founder) के साथ हुई। मार्क कहते है कि उनकी मुलाकात व्हाट्सएप्प के फाउंडर (Whatsapp Founder) जन कूम (Jan Koum) से 2012 में हुई थी और 2014 में व्हाट्सएप्प (Whatsapp) को फेसबुक (Facebook) ने खरीद लिया। फेसबुक (Success Story of Facebook in Hindi) को इसमें कामयाबी इसलिए मिली क्योंकि मार्क को रिलेशनशिप के आधार पर कई मौके मिले, जिससे वो इस सम्बन्ध में बात कर सके।

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फैसले लेने में तत्परता दिखाना

जब मार्क जुकरबर्ग (Mark Zuckerberg) ओकुलस (Oculus) को खरीदने की तत्परता दिखाई। तब फेसबुक (Facebook) के टॉप डील मेकर ने उन्हें चेताया कि ओकुलस (Oculus) के कानूनी विवादों को केवल एक हफ्ते में सुलझाना खतरनाक हो सकता है, उस पर मार्क ने कहा कि जब तक हमें कुछ मिल नहीं जाता, हमें आगे बढ़ते रहना होगा। फेसबुक (Facebook) का एक कथन है “तेजी से आगे बढ़ते रहो और पुरानी चीजें बदलते रहो”। मार्क इतना जल्दी फैसला लेते है कि अपने प्रतिद्वंदियों को सोचने का मौका नहीं देते। इस पर वो कहते है कि अगर उनको इसके बारे में पता लगता है तो वो कंपनी को ज्यादा पैसे देकर डील अपने पक्ष में कर सकते है।

जरुरत पड़ने पर डर भी पैदा करना

मार्क कहते है कि उन्होंने छोटी कम्पनियों को खरीदने के लिए उनके सामने डर भी पैदा किया कि अकेले बिजनेस (Business) करना आसान नहीं होता। इसके लिए कई प्रकार की कठिनाइयों से गुजरना पड़ता है। अगर आप लोगों को अपने साथ काम करवाना चाहते है तो उनको समझाना होगा कि अकेले काम करना कितना मुश्किल होता है। अब यह स्पष्ट नहीं है कि उन्होंने इसी रणनीति का उपयोग स्नेपचैट (Snapchat) पर भी किया हो क्योंकि उन्होंने फेसबुक (Facebook) की 3 बिलियन की डील को ठुकराया था। यह आवश्यक नहीं की आप भी इस रणनीति का प्रयोग करो।

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