श्रीकृष्ण की सम्पूर्ण लीला (जन्म से मृत्यु तक)

Story of Lord Krishna in Hindi: भगवान श्री कृष्ण को उनके भक्त उन्हें अनेकों नाम से बुलाते हैं और भगवान श्री कृष्ण की कथाओं में आपको इनके प्रत्येक नाम के पीछे कोई ना कोई कहानी तो अवश्य देखा होगा। भगवान श्री कृष्ण की जन्मदिवस पर संपूर्ण भारतवर्ष में काफी चहल-पहल मची रहती है और आप सभी लोगों को चारों तरफ एक ही नारा हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की सुनाई देता होगा।

आप सभी लोगों में से बहुत से लोग ऐसे होंगे, जिन्हें भगवान श्री कृष्ण के जन्म से लेकर उनकी मृत्यु तक के पूरी कहानी अर्थात पूरी घटनाओं को अपने दादाजी या टीवी चैनलों में अवश्य ही देखे होंगे। परंतु आप में ऐसे ही कुछ लोग ऐसे होंगे, जो भगवान श्री कृष्ण के विषय में नहीं जानते और अब आप उनके विषय में संपूर्ण जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमारा यह लेख आप सभी लोगों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होने वाला है।

Story of Lord Krishna in Hindi
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भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं का वर्णन आप सभी लोगों को बहुत से ऐसे ग्रंथ है, जहां पर मिल जाएगा परंतु उन ग्रंथों में लिखी गई जानकारियों को सुनने के लिए आपको किसी ना किसी कवि सम्मेलन या फिर महात्माओं के सत्संग में जाना पड़ेगा। परंतु आप यदि किसी भी सत्संग में ना जाकर भगवान श्री कृष्ण के जन्म से मृत्यु तक के पूरे कहानी के विषय में जानना चाहते हैं तो यह लेख अंतर अवश्य पढ़ें।

आज आप सभी लोगों को इस लेख में भगवान श्री कृष्ण कौन है? भगवान श्री कृष्ण का जन्म, भगवान श्री कृष्ण की बचपन में की गई कुछ विशेष लीलाएं, भगवान श्री कृष्ण ने कैसे किया था कंस का वध? भगवान श्री कृष्ण ने कहां से प्राप्त की थी अपनी शिक्षा दीक्षा? भगवान श्री कृष्ण का विवाह कहां हुआ था? कुरुक्षेत्र में भगवान श्री कृष्ण का योगदान, कैसे हुई थी भगवान श्रीकृष्ण की मृत्यु? इत्यादि के विषय में संपूर्ण जानकारी जानने को मिलेगी।

श्रीकृष्ण की सम्पूर्ण लीला (जन्म से मृत्यु तक) | Story of Lord Krishna in Hindi

भगवान श्री कृष्ण का जन्म

भगवान श्री कृष्ण का युद्ध बहुत ही प्राचीन समय में हुआ था, इनका जन्म त्रेता युग में माना जाता है। भगवान श्री कृष्ण का जन्म द्वापरयुग एवं श्वेता युग के मध्य में हुआ था। भगवान श्री कृष्ण ने अपने मामा कंस के कारागार में जन्म लिया था। भगवान श्री कृष्ण की जन्म दात्री माता देवकी ने भगवान श्री कृष्ण को कारागार में जन्म दिया। भगवान श्री कृष्ण की माता देवकी कंस की बहन थी और देवकी का विवाह वासुदेव के साथ हुआ था।

कंस अपनी बहन देवकी से बहुत ही प्यार करता था, परंतु उनसे भी ज्यादा वह अपनी जान से प्यार करता था, इसलिए कंस ने अपनी बहन देवकी को अपने रथ पर बिठा कर उनके ससुराल तक छोड़ने जा रहा था, कि तभी एक भविष्यवाणी होती है, कि “कंस देवकी की होने वाली आठवीं संतान तुम्हारे वध का कारण बनेगी”। कंस ने यह भविष्यवाणी सुनते ही देवकी और वासुदेव से काफी बात विचार करने के बाद यह निश्चय करता है, कि वह देवकी और वासुदेव को कारागार में बंद रखेगा।

देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद रखने के लिए वह अपने राज्य मथुरा चला जाता है और माता देवकी और वासुदेव को कारागार में डाल देता है। माता देवकी की पहली संतान हुई तभी कंस वहां पहुंचा कंस के पहुंचने के बाद माता देवकी ने कंस से कहा, कि मेरी आठवीं संतान तुम्हारी वध करेगी ना की पहली तुम मेरे अन्य बच्चों को छोड़ दो मैं आठवां बचा तुम्हें स्वयं से दे दूंगी।

परंतु कंस उनके इस बात पर नहीं माना और उसने कहा कि तुम्हारे आठ पुत्रों में से मेरा कोई वध करेगा, ना की आठवीं संतान कंस ने ऐसा इसलिए कहा, क्योंकि वह भविष्यवाणी से बहुत डरा हुआ था और इसीलिए बचपन में ही माता देवकी के सभी पुत्रों को मार देता था। धीरे-धीरे करके कंस ने माता देवकी के साथ पुत्रों की बलि दे दी।

इसके बाद माता देवकी ने अपनी आठवीं संतान भगवान श्री कृष्ण को जन्म दिया। जन्म के समय ही भगवान श्री कृष्ण अपने पिता वासुदेव के समक्ष प्रस्तुत हुए और उनसे स्वयं को वृंदावन छोड़कर यशोदा माता की बच्ची को ले आने के लिए कहा। अतः भगवान श्री कृष्ण की यह बात सुनने के बाद वासुदेव ने जन्म होते ही भगवान श्री कृष्ण को जमुना नदी के उफानते तूफान को पार करते हुए वृंदावन जाकर माता यशोदा के पास भगवान श्री कृष्ण को सुला देते हैं और माता यशोदा की पुत्री को लेकर मथुरा वापस लौट आते हैं।

उस रात भगवान श्री कृष्ण ने अपने लीला से कंस को गहरी नींद में सुला दिया था और कंस इतनी गहरी नींद में सो गया था, कि उसे कारागार में हुए किसी भी क्रियाकलाप का कोई भी वाक्य मालूम नहीं पड़ा। जब वासुदेव वृंदावन से वापस लौटे तब कंस को उसके सैनिकों के द्वारा बताए जाने पर कंस उस बच्ची को देव की माता की आखिरी एवं आठवीं संतान समझकर मारना चाहा, परंतु जैसे ही उसने इस आठवीं संतान को शीला पर पटकने के लिए उठाया वैसे ही उस बच्ची ने देवी का रूप धारण कर लिया।

बच्ची ने देवी का रूप धारण करते हैं कंस ने कहा कि “हे कंस! तेरा काल गोकुल तक पहुंच चुका है और वह बहुत जल्द ही तेरा वध करेगा और तेरे इस आतंक से मथुरा को आजाद करेगा”। कंस देवी की यह बात सुनते ही श्री कृष्ण को गोकुल में मारने के लिए अनेकों प्रकार के राक्षस भेजने शुरू कर दिए हैं, परंतु भगवान श्री कृष्ण ने उन सभी रास्तों को धूल चटा दिए और अंततः वह कंस का वध कर ही दिए।

भगवान श्री कृष्ण के द्वारा बचपन में की गई कुछ विशेष लीला

भगवान श्री कृष्ण के पिता वासुदेव ने उनकी प्राणों की रक्षा के लिए उन्हें गोकुल जाकर माता यशोदा के पालने में सुला दिया और उनकी बेटी को लेकर मथुरा पहुंचे। कंस ने जैसे ही इस बच्ची को मारने के लिए शीला पर पटक ना चाहत पर तुरंत ही यह देवी का रूप धारण कर लेती है और कौन से उसकी मृत्यु का कारण बताती है।

कल से आप बात सुनते ही क्रोधित हो गया और उनके जन्म के दिन ही वहां पर विशाल राक्षसनी पूतना को वहां भेज देता है। उतना वहां पहुंचते ही भगवान श्री कृष्ण को अपना दूध पिला कर मारना चाहती है, परंतु भगवान श्रीकृष्ण उसका खून तक चूसने लगते हैं और तुरंत ही पूछना अपने वास्तविक रूप में आ जाती है और पूरे गोकुल में हड़कंप मच जाता है। पूतना भगवान श्री कृष्ण को लेकर आकाश की तरफ उड़ जाती है और मृत्यु हो जाने पर आकाश से सीधा जमीन पर गिरती है, जिससे कि पूरा गोकुल समेत आसपास के सभी इलाके हिल जाते हैं।

जब गांव के सभी लोग और भगवान श्री कृष्ण की पालन करने वाली माता यशोदा और पिता नंद वहां पहुंचते हैं, तो देखते हैं, कि उस विशाल राक्षसनी के ऊपर भगवान श्री कृष्ण बैठे हुए हैं और खेल रहे हैं। उस विशाल राक्षसनी के पास कोई भी जाना नहीं चाहता था, अतः उसकी मृत्यु हो गई थी, इसलिए लोगों ने सीढ़ी का उपयोग करके राक्षसनी के ऊपर चढ़कर भगवान श्रीकृष्ण को नीचे उतारा।

कंस ने भगवान श्री कृष्ण को मारने का अच्छा प्रयास किया और इसके लिए समय-समय पर अनेकों राक्षस भेज तेरा परंतु भगवान श्री कृष्ण ने उन सभी को धूल चटा दिए। एक बार कंस ने पुनः बहुत ही विशाल पक्षी राज बकासुर को श्री कृष्ण को मारने के लिए भेजा भगवान श्री कृष्ण ने उस बकासुर के चोंच को ही फाड़ दिया और बकासुर की मृत्यु हो गई। इसके बाद कंस और भी ज्यादा भयभीत हो गया।

इन सभी के बाद गांव में वर्षा नहीं हो रही थी, इसलिए सभी लोग इंद्र देव की पूजा कर रहे थे। इसी बीच भगवान श्री कृष्ण ने लोगों को यह सलाह दिया कि वह तो भगवान इंद्र का स्वभाव है, वह वर्षा तो अवश्य ही करेंगे। यदि आप लोगों को पूजा करनी ही है, तो गोवर्धन पर्वत की कीजिए, क्योंकि गोवर्धन पर्वत हमें और हमारे गायों को भोजन प्रदान करता है। सभी लोगों को उनकी यह बात अच्छी लगी और सभी लोगों ने भगवान इंद्र की पूजा छोड़कर गोवर्धन की पूजा करने लगे।

इस बात से इंद्र देव बहुत ही ज्यादा क्रोधित हो गए और उस गोकुल पर अपना कहर बरसाना शुरू कर दिया, इसके बाद पूरे गांव में हड़कंप मच गया इसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी हाथ की सबसे छोटी अंगुली पर उठा लिया और सभी गोकुल वासी उस पर्वत के नीचे आ गए हैं, इसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने अपनी बांसुरी बजाई और इंद्रदेव के सभी प्रकोप को अपने बांसुरी में समा लिया। इंद्रदेव भगवान श्री कृष्ण की इस लीला को देखकर हैरान रह गए और अपने कर्मों पर उनसे माफी भी मांगी। इसी कारण भगवान श्री कृष्ण का एक नाम गोवर्धन पर्वत धारी भी है।

भगवान श्री कृष्ण ने कैसे किया था कंस का वध

जैसा ज्ञान सभी लोग मिल जाना, कि भगवान श्री कृष्ण ने कंस के द्वारा भेजे गए सभी असुरों का वध कर दिया भगवान श्री कृष्ण ने असुरों का वध कर दिया। इस कारण कंस को यह पता ही चल गया, कि यह बलशाली किशोर बालक कोई और नहीं देवकी और वासुदेव का पुत्र ही हो सकता है। यह बात जानने के बाद उसने भगवान श्री कृष्ण और भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई बलदाऊ को मथुरा आने का न्योता दिया।

इसके बाद भगवान श्री कृष्ण और महा बलशाली बलराम दोनों ही मथुरा पहुंचे। कंस ने रास्ते में ही उन्हें मारने के लिए शिरोमणि चाणूर और मोस्टिक को भेजा। भगवान श्री कृष्ण और बलराम ने इन का वध कर दिया और इसके बाद वे मथुरा पहुंच गए और कंस का वध कर दिया। कंस ने अपने पिता उग्रसेन को भी बंदी बनाकर रखा था, अतः कंस का वध कर देने के बाद भगवान श्री कृष्ण ने उनके पिता अर्थात अपने नाना उग्रसेन को मथुरा का राजा बना दिया।

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भगवान श्री कृष्ण ने कैसे प्राप्त की अपने शिक्षा दीक्षा

भगवान श्री कृष्ण के ऊपर किशोरावस्था में ही कंस ने अपने षड्यंत्र से उन्हें मारने का प्रयास शुरू कर दिया और कंस अपने इन षड्यंत्र में विफल रहा। इसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने कंस का वध कर दिया और यहीं पर उनका अज्ञातवास समाप्त हो गया। इसके बाद उनके पिता ने भगवान श्री कृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम को शिक्षा दीक्षा प्राप्त करने के लिए उज्जैन के संदीपनी आश्रम में भेज दिया।

उज्जैन के इसी आश्रम से भगवान श्री कृष्ण और बलराम दोनों ने ही शस्त्र, अस्त्र के साथ-साथ शास्त्रों का ज्ञान भी प्राप्त। इसी आश्रम में भगवान श्री कृष्ण की भेंट सुदामा से हुई और यह इनके काफी अच्छे दोस्त भी बन गए।

भगवान श्री कृष्ण की अमर प्रेम कथा

भगवान श्री कृष्ण अपने जन्म से ही बरसाने में जन्मी देवी राधा से प्रेम करते थे। भगवान श्री कृष्ण ने अपने बचपन से ही सदैव देवी राधा को परेशान करते थे और अपने नटखट रूपों से सदैव उनको खिझाते थे। राधा को भी भगवान श्री कृष्ण की यह नटखट स्वरूप बहुत ही पसंद आता था और धीरे-धीरे देवी राधा भी भगवान श्रीकृष्ण से बहुत ही गहरा प्रेम करने लगे। बाद में भगवान श्री कृष्ण और राधा एक दूसरे से अलग हो गए।

अनेकों शास्त्रों के अनुसार जब भगवान श्री कृष्ण ने राधा से अलग होते हुए यह कहा था, कि “प्रेम का अर्थ यह नहीं है, कि हम एक दूसरे से विवाह करने बल्कि प्रेम का अर्थ क्या होता है, कि एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति से दिल से जुड़ाव” जो कि भगवान श्री कृष्ण और देवी राधा के बीच में अब भी कायम है। तभी से भगवान श्री कृष्ण और देवी राधा के प्रेम का वर्णन संपूर्ण विश्व में विख्यात है और भगवान श्री कृष्ण की पत्नी रुक्मणी से ज्यादा लोग राधे कृष्ण कहना पसंद करते हैं।

भगवान श्री कृष्ण का रुकमणी विवाह कहां हुआ था?

कंस का वध करने के बाद भगवान श्री कृष्ण द्वारिका चले गए और वहीं पर भगवान श्री कृष्ण ने अपना भव्य महल बनाया। भगवान श्री कृष्ण ने यही द्वारिका में ही रुक्मणी से विवाह किया। द्वापर युग में बहुत ही प्रसिद्ध स्थान कुंदनपुर नाम से विख्यात था। कुंदनपुर के राजा भीष्मक थे। कुंदनपुर के राजा की 5 पुत्र थे, रुक्मी, कुक्कमरत, रुकमेश, रुकंबाहू, रुकमली और उनकी सबसे खूबसूरत पुत्री रुकमणी।

राजकुमारी रुकमणी स्वयं को भगवान श्री कृष्ण को अर्पित कर चुकी थी और वह भगवान श्री कृष्ण से प्रेम भी करती थी। रुक्मणी के पिता जी ने उनका विवाद चंदेरी के राजा शिशुपाल सेतन कर दिया था। इसके बाद रुक्मणी ने एक वृद्ध ब्राह्मण के हाथों से भगवान श्रीकृष्ण तक अपना संदेश भेजा। भगवान श्री कृष्ण ने रुक्मणी का संदेश पढ़ते ही कुंदनपुर की ओर निकल पड़े। 

भगवान श्री कृष्ण ने वहां पहुंचते ही रुक्मणी का अपहरण कर लिया और उन का हरण करके द्वारिका लेकर चले गए। शिशुपाल को पता चलते ही उसने भगवान श्री कृष्ण का पीछा करना शुरू किया और वहां पर शिशुपाल भी पहुंच गया। शिशुपाल ने भगवान श्री कृष्ण को मारना चाहा परंतु श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम और उनकी सेना ने शिशुपाल और उसकी समस्त सेना को समाप्त कर दिया।

इसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने रुकमणी से द्वारिका नगरी में ही विवाह कर लिया और रुक्मणी के गर्भ से ही प्रदुम का जन्म हुआ प्रदुम कामदेव के ही अवतार थे। भगवान श्रीकृष्ण की पटरानी यों में सबसे महत्वपूर्ण स्थान एवं रुकमणी कथा।

कैसे हुई थी भगवान श्रीकृष्ण की मृत्यु

जैसा कि हम सभी जानते हैं, भगवान श्री कृष्ण ने अपना निवास स्थान द्वारिका को ही चुना था, इसके लिए उन्होंने सोमनाथ के पास में ही स्थित प्रभास क्षेत्र में अपने दे अर्थात अपने प्राणों को त्याग दिया। भगवान श्री कृष्ण जी प्रभास के यादव युद्ध में चार प्रमुख व्यक्तियों ने भाग नहीं लिया जिसमें से वह बच गए थे इन चारों में से भगवान श्री कृष्ण, बलराम, दारूक सारथी और वभ्रु थे। इस युद्ध में भाग न लेने पर बलराम दुखी हो गए और समुद्र की ओर चल पड़े अतः समुद्र की ओर जाने के बाद से उनका कोई अता पता नहीं चला।

भगवान श्री कृष्ण बहुत ही ज्यादा दुखी हुए और वे द्वारिका वापस चले गए इसके बाद उन्होंने दारूक को अपने प्रिय मित्र अर्जुन के पास हस्तिनापुर भेज दिए। भगवान श्री कृष्ण शोक से व्याकुल होकर एक घने वन में चले जाते हैं और चिंतित होकर एक स्थान पर लेट जाते हैं।

तभी एक जरा नाम का बहेलिया हिरण को ढूंढते हुए भगवान श्री कृष्ण को हिरण समझकर तीर चला देता है और वह तीर भगवान श्री कृष्ण के पैर के अंगूठे में लग जाता है और वहीं पर भगवान श्री कृष्ण इस संसार को छोड़कर चले जाते हैं। ऐसा भी कहा गया है कि भगवान श्रीकृष्ण अपनी मृत्यु के समय 100 वर्ष से भी अधिक उम्र के रहे होंगे। यही भगवान श्री कृष्ण के देहांत के बाद द्वापर युग समाप्त हो गया और तभी से शुरू हुआ कलयुग।

निष्कर्ष

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इनका नाम राहुल सिंह तंवर है, इन्होंने स्नातक (रसायन, भौतिक, गणित) की पढ़ाई की है और आगे की भी जारी है। इनकी रूचि नई चीजों के बारे में लिखना और उन्हें आप तक पहुँचाने में अधिक है। इनको 3 वर्ष से भी अधिक SEO का अनुभव होने के साथ ही 3.5 वर्ष का कंटेंट राइटिंग का अनुभव है। इनके द्वारा लिखा गया कंटेंट आपको कैसा लगा, कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। आप इनसे नीचे दिए सोशल मीडिया हैंडल पर जुड़ सकते हैं।

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