हिंदुआ सूरज महाराणा प्रताप का जीवन परिचय

Maharana Pratap ki Jivani: आज के इस लेख के माध्यम से हम ऐसे शूरवीर महाराजा की बात करने वाले हैं जिनका नाम इतिहास के पन्नों में वीरता और दृढ़ के लिए अमर है। जी हां, आज के इस लेख के माध्यम से हम आपको महावीर प्रतापी राजा महाराणा प्रताप सिंह जी के बारे में संपूर्ण जानकारी प्रदान करवाने वाले हैं।

Maharana Pratap ki Jivani
Maharana Pratap ki Jivani

महाराणा प्रताप ने अनेकों बार मुगल वंश को युद्ध में हराया और विजय प्राप्त की। आज के इस लेख के माध्यम से हम आपको महाराणा प्रताप का जीवन परिचय (Biography of Maharana Pratap in Hindi) और महाराणा प्रताप की कुछ युद्ध नीति के बारे में चर्चा करेंगे। आइए इस लेख को शुरू करें।

महाराणा प्रताप का जीवन परिचय – Maharana Pratap ki Jivani

महाराणा प्रताप जीवनी एक नज़र में

नाममहाराणा प्रताप
जन्म9 मई 1540
आयु95 वर्ष (मृत्यु तक)
जन्म स्थानराजस्थान राज्य के कुंभलगढ़ दुर्ग
पिता का नाममहाराजा उदया सिंह
माता का नामरानी जयवंता कवर
पत्नी का नाम
पेशामहाराजा
घोड़ाचेतक
बच्चे
मृत्युवर्ष 1597 में 19 जनवरी
मृत्यु स्थानकुंभलगढ़ दुर्ग
भाई-बहन
राज्यकुंभलगढ़ दुर्ग
Maharana Pratap Biography in Hindi

महाराणा प्रताप कौन थे?

महाराणा प्रताप उदयपुर मेवाड़ में सिसोदिया नामक राजवंश के एक कुशल शासक थे। महाराणा प्रताप इतने प्रतापी और शूरवीर थे कि उनके वीरता और उनकी दृढ़ प्रण की गाथा इतिहास के पन्नों में सदा के लिए अमर हो गए। यहां तक कि महाराणा प्रताप ने बादशाह अकबर के साथ अनेकों वर्षों तक संघर्ष किया और महाराणा प्रताप जी ने मुगल वंश को अनेकों बार युद्ध में पराजित भी किया।

महाराणा प्रताप जी का जन्म राजस्थान राज्य के कुंभलगढ़ में महाराजा उदय सिंह और माता रानी जयवंता कवर के घर में हुआ था। महाराणा प्रताप अपने शौर्य और वीरता के दम पर अनेकों राज्य को अपने अधीन किया था, परंतु उन्होंने उन राज्यों पर शासन ना करके वहां के राजाओं को अपना मित्र बनाया और उन राज्यों को उन्हीं राजाओं को सौंप दिया, जो वहां के मूल राजा थे। ऐसा कहा जाता है कि जब महाराणा प्रताप किसी भी प्रकार का प्रण कर लेते हैं तो वह अपने प्रण से पीछे नहीं हटते और अपने प्राण को अपनी जान देकर भी निभाते हैं।

महाराणा प्रताप के पास एक बहुत ही समझदार घोड़ा था जोकि महाराणा प्रताप का सच्चा साथी था। महाराणा प्रताप के इस घोड़े के विषय में नीचे विशेष रूप से चर्चा की जाएगी। महाराणा प्रताप के पास अनेकों शूरवीर सैनिक थे और इन सैनिकों ने महाराणा प्रताप की जान बचाने के लिए अपने प्राण को भी दाव पर लगा दिया अर्थात वे महाराजा महाराणा प्रताप के प्रमुख सैनिक थे।

महाराणा प्रताप का जन्म कहां और कब हुआ था

महाराणा प्रताप का जन्म राजस्थान राज्य के कुंभलगढ़ दुर्ग में महाराणा उदय सिंह और रानी जयवंता कवर के घर में हुआ था। महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 में हुआ था। महाराणा प्रताप राजपूत के वंशज थे अर्थात इनका जन्म राजपूताना घराने में हुआ था। महाराणा प्रताप जी के पिता की महारानी जयवंता के अलावा और भी पत्नियां थी जिनमें से रानी धीरबाई राजा उदय सिंह की प्रिय पत्नी थी।

रानी धीरबाई की यह इच्छा थी कि उनका पुत्र जगमाल महाराजा उदय प्रताप सिंह का उत्तराधिकारी बने। महाराणा उदय प्रताप सिंह के राणा प्रताप और जगमाल के अलावा अन्य दो पुत्र शक्ति सिंह और सागर सिंह भी थे। इन दोनों के मन में भी राणा उदय प्रताप सिंह के बाद राज गद्दी संभालने की प्रबल इच्छा थी। परंतु प्रजा और राणा उदय सिंह जी ने दोनों को ही अपना उत्तराधिकारी माना था। इसी कारण यह तीनो भाई महाराणा प्रताप से अत्यंत घृणा करते थे।

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महाराणा प्रताप की लंबाई और उनका वजन

क्या आप जानते हैं कि महाराणा प्रताप की लंबाई और वजन कितना रहा होगा? यदि नहीं तो हम आपकी जानकारी के लिए बता दे कि महाराणा प्रताप का कद लगभग साडे 7 फुट का था और इसके साथ ही महाराणा प्रताप लगभग 110 किलो ग्राम के थे। महाराणा प्रताप के सुरक्षा कवच का वजन लगभग 72 किलोग्राम का था और उनके भाले का वजन 80 किलो था।

महाराणा प्रताप के तलवार ढाल वाला और कवच आदि को मिलाने पर उन सभी का वजन लगभग 200 किलोग्राम से भी अधिक था अर्थात महाराणा प्रताप 200 किलोग्राम से भी अधिक वजन के साथ लड़ाई करने जाते थे। महाराणा प्रताप के कवच तलवार इत्यादि जैसी बहुमूल्य वस्तुएं आज के समय में भी उदयपुर राजघराने के संग्रहालय में सुरक्षा पूर्वक रखा गया है।

महाराणा प्रताप का प्रारंभिक जीवन (Maharana Pratap ka Jivan Parichay)

महाराणा प्रताप बहुत ही प्रतापी और साहसी राजा थे। उन्होंने अपने बचपन में ही पराक्रम दिखाना शुरू कर दिया। बचपन में सभी लोग शूरवीर महाराणा प्रताप को कीका नाम से पुकारते थे। शूरवीर महाराणा प्रताप बचपन से ही परम प्रतापी, शूरवीर, साहसी, स्वाभिमानी और स्वतंत्रता प्रिय थे।

महावीर राणा प्रताप ने सिंहासन धारण करते हैं, उनके सामने एक बहुत ही संकटकारी विपत्ति आन पड़ी, परंतु महाराणा प्रताप ने इस विपत्ति का सामना बड़े ही धैर्य और साहस के साथ किया और उन्होंने इस विपत्ति को हरा भी दिया। महाराणा प्रताप के पिता के द्वारा उन्हें ढाल और तलवार चलाने का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया जाता था क्योंकि उनके पिता महाराणा प्रताप को एक कुशल योद्धा बनाना चाहते थे। महाराणा प्रताप ने बहुत ही छोटी सी उम्र में ही अपने विशाल साहस का परिचय लोगों को दिया।

महाराणा प्रताप जब भी अपने बचपन में बच्चों के साथ घूमने के लिए जाते थे तो वह बात ही बात में अपना एक दल तैयार कर लेते थे और अपने दल के बच्चों के साथ वे ढाल और तलवार चलाने की शिक्षा का अभ्यास करते थे। महाराणा प्रताप अपने इसी दल टुकड़ियों के साथ तलवार और ढाल चलाने के खेल के माध्यम से ही इस कला में बहुत ही पारंगत हो गए और महाराणा प्रताप को इस कला में हराना किसी के बस की बात नहीं रही।

महाराणा प्रताप अपने प्रण के लिए बहुत ही कर्तव्यनिष्ठ थे और उन्होंने अपने पिता की अंतिम इच्छा के अनुसार उन्होंने अपने सौतेले भाई जगमाल को राजा बनाने का निश्चय किया। परंतु मेवाड़ के विश्वासपात्र राजपुरोहित ने जगमाल के विषय में ऐसा बताया कि यदि जगमाल को मेवाड़ का सिंहासन दे दिया जाता है तो यह मेवाड़ वासियों के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है और इसी के साथ जगमाल को राजगद्दी छोड़ने के लिए बाद कर दिया गया।

जगमाल राज गद्दी छोड़ने के लिए इच्छुक नहीं थे और जब उनसे राजगद्दी छुड़ा ली गई। तब हुए गुस्से में अकबर की सेना के साथ मिल गए और उन्होंने मेवाड़ की सारी जानकारी अकबर को बता दी। इसके बदले में जगमाल को जहाजपुर की जागीर जलालुद्दीन अकबर के द्वारा भेंट स्वरूप दे दी गई।

महाराणा प्रताप की वीरता के संबंध में बहुत ही आदर्श मत प्रस्तुत किया गया है और यह मत बहुत ही अद्वितीय है अर्थात ऐसा वर्णन अन्य किसी भी राजा के लिए नहीं किया गया था। महाराणा प्रताप ने जिन परिस्थितियों में संघर्ष किया है, वैसा करना अन्य किसी भी राजा के लिए असंभव साबित होता है। ऐसी परिस्थितियों में भी उन्होंने संघर्ष किया और कभी हार नहीं मानी। यदि हम बात करें कि हिंदू राजपूतों को भारत के इतिहास में सम्मान पूर्वक स्थान मिल सका है, तो वह केवल महाराणा प्रताप के द्वारा ही मिला है अर्थात ऐसा होने का श्रेय सिर्फ और सिर्फ महाराणा प्रताप को जाता है।

महाराणा प्रताप की युद्ध नीति

महाराणा प्रताप बहुत से युद्ध में हिस्सा लिया और उन युद्धों को बड़ी ही सफलतापूर्वक विजय प्राप्त कर ली। ऐसे में क्या आप जानते हैं महाराणा प्रताप अपने युद्धों में किन युद्ध नीतियों का प्रयोग करते थे। यदि नहीं तो कृपया नीचे दिए गए निम्नलिखित बिंदुओं को अवश्य पढ़ें:

  • महाराणा प्रताप की युद्ध नीति में सबसे ऊपर उनकी किसी भी अधीनता के विरुद्ध हार नहीं मानना आता है।
  • महाराणा प्रताप का कहना था कि आप किसी भी युद्ध को लड़ने जाएं तो उसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह होती है कि आप स्वयं पर आत्मा विश्वास रखें।
  • आपको किसी भी युद्ध में हिस्सा लेने से पहले उस युद्ध के संबंध में कुछ आवश्यक प्रण कर लेनी चाहिए।
  • आपको किसी भी युद्ध में जीत हासिल करने के लिए कुशल एवं निपुण सैनिक और सेनानायक की आवश्यकता होगी।

मातृभूमि के रक्षक महाराणा प्रताप

जिस समय महाराणा प्रताप राजा बने थे, उस समय मेवाड़ राज्य बड़ा ही शक्तिहीन राज्य था। 1572 तक जलालुद्दीन अकबर ने मेवाड़ राज्य को उत्तर पूर्व और पश्चिम मुगल प्रदेशों से पूर्णतः गिर चुका था। अकबर यह चाहता था कि महाराणा प्रताप आर्थिक रूप से कमजोर हो जाएं। अकबर महाराणा प्रताप पर आर्थिक, सैनिक, राजनीतिक इत्यादि प्रकार के दबाव डालकर युद्ध किए बिना ही मेवाड़ राज्य को हथियाना चाहता था।

जैसा कि हमने आपको बताया राणा प्रताप का सौतेला भाई जगमाल जलालुद्दीन अकबर का जागीर पाकर के उसका गुलाम बन चुका था, अब केवल महाराणा प्रताप के पास मेवाड़ राज्य का संकुचित पर्वती क्षेत्र ही बचा हुआ था। इस पर्वतीय क्षेत्र की लंबाई लगभग 30 किलोमीटर और लगभग इतनी ही उसकी चौड़ाई भी थी। अकबर के पास बहुत ही काफी मात्रा में धन संपत्ति थी, इसके मुकाबले मेवाड़ राज्य कुछ भी नहीं था। परंतु फिर भी महाराणा प्रताप ने अपने शौर्य और वीरता के साथ अकबर को हराया और उन्होंने अपने मातृभूमि की रक्षा भी की।

महाराणा प्रताप की हल्दीघाटी का युद्ध

वर्ष 1576 में अप्रैल माह को मान सिंह के नेतृत्व में अकबर ने अपनी एक संघ सेना की टुकड़ी भेजी, परंतु महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी की सुरक्षा के लिए पूर्णता मोर्चाबंदी कर दी थी। हल्दीघाटी के समान रंग वाली अत्यंत ही संकीर्ण पहाड़ी भूमि में महाराणा प्रताप सिंह जी की सेना और मुगल बादशाह जलालुद्दीन अकबर की सशस्त्र सेना आ पहुंची।

मुगल राजवंश के सेनापति मानसिंह की सेना में लगभग 80,000 सैनिक थे, इसके विपरीत महाराणा प्रताप के अधीन लगभग 20,000 सैनिक ही थे। मुगल वंश और राणा प्रताप के मध्य यह भीषण युद्ध लगभग 3 घंटों तक चला। इसी युद्ध में महाराणा प्रताप का प्रिय घोड़ा चेतक मारा गया।

हल्दीघाटी के युद्ध में सेना की भारी क्षति हुई और इसी के साथ-साथ महाराणा प्रताप की सेना के लगभग 500 सैनिक दिवंगत हो गए। महाराणा प्रताप की सेना के साथ-साथ ग्वालियर के राजाराम शाह और उनके 3 पुत्र जयमल राठौड़, राम सिंह, वीरभाला सिंह यह चारों लोग इस युद्ध में वीरता पूर्वक लड़ाई करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए।

इस युद्ध में महाराणा प्रताप को न ही बंदी बनाया जा सका और ना ही महाराजा को मारा जा सका। फिर भी मान सिंह की सेना की विजय हो गई। मानसिंह की सेना के विजई होने के बावजूद भी राणा प्रताप हार कर भी विजई हुए।

इसके बाद वर्ष 1577 ईस्वी में जलालुद्दीन अकबर ने अपनी एक विशाल सेना की टुकड़ी भेज करके महाराणा प्रताप को बंदी बनाने का कठोर प्रयत्न किया। महाराणा प्रताप के 7 अनेकों लोगों ने गद्दारी की जिसके कारण मेवाड़ राज्य और सुरक्षित हो गया। इसके उपरांत वर्ष 1578 से 1585 तक सैनिक महावीर राणा प्रताप को अधीनता स्वीकार कराने के लिए उन्हें ढूंढते रहे। महाराणा प्रताप और उनके परिवार के साथ वे पहाड़ी में ही थे।

अकबर के सैनिकों ने लगातार कड़ी परिश्रम के साथ महाराणा प्रताप की खोज करते रहे। महाराणा प्रताप और उनका परिवार अनेक वर्षों तक कंदमूल खाकर इधर-उधर भटकता रहा। इतना ही नहीं महाराणा प्रताप के पुत्रों को घास की रोटियां तक खानी पड़ी।

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महाराणा प्रताप के अंतिम पल

महाराणा प्रताप ने वर्ष 1586 में अपनी एक नई सेना का गठन किया और इसके बाद उन्होंने उदयपुर, मांडलगढ़, कुंभलगढ़ इत्यादि को अपने कब्जे में कर लिया। महाराणा प्रताप के लिए सबसे दुखद बात यह थी कि वह चित्तौड़ को अपने कब्जे में नहीं कर पाए। चित्तौड़ राज्य को प्राप्त करने के लिए महाराणा प्रताप ने युद्ध किया।

1597 में 19 जनवरी को 57 वर्ष की उम्र में चावंड राजधानी में धनुष की डोर खींचते समय प्रताप के आंत में एक चोट लगी, जिसके कारण इनकी मृत्यु हो गई। जब महाराणा प्रताप की मृत्यु हुई थी तब इनके मृत्यु की खबर सुनकर अकबर की आखों में भी आंसू आ गये थे।

निष्कर्ष

आज के इस लेख “महाराणा प्रताप का इतिहास (Maharana Pratap History in Hindi)” के द्वारा हमने आपको महाराणा प्रताप के बारे में जानकारी प्रदान कराई। ऐसे में इस कहानी का मुख्य उद्देश्य यह है कि हमें कभी भी हार नहीं माननी चाहिए और निरंतर संघर्ष करते रहना चाहिए। यदि आपको यह लेख “Maharana Pratap ki Jivani” पसंद आया हो तो कृपया इसे शेयर करें।

महाराणा प्रताप का जन्म कब और कहां हुआ?

महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को राजस्थान राज्य के कुंभलगढ़ दुर्ग में महाराणा उदय सिंह और रानी जयवंता कवर के घर में हुआ था।

महाराणा प्रताप की कितनी बीवियां थी?

महाराणा प्रताप की 11 रानियाँ थी।

महाराणा प्रताप के पुत्र का नाम क्या था?

महाराणा प्रताप के पुत्र का नाम अमर सिंह था।

महाराणा प्रताप के कितने पुत्र थे?

महाराणा प्रताप की कुल 22 संताने थी जिनमें 17 पुत्र और 5 पुत्रियाँ थी जिनमें महाराणा प्रताप के अजाब्दे से पैदा हुए पुत्र अमर सिंह उत्तराधिकारी बनाये गये थे

महाराणा प्रताप की पत्नी अजबदे की मृत्यु कब हुई?

हल्दीघाटी के युद्ध के बाद 1576 में चोट के कारण महारानी अजबदे का निधन हो गया था।

महाराणा प्रताप की पहली पत्नी कौन थी?

महाराणा प्रताप की पहली पत्नी का नाम अजबदे पंवार था।

महाराणा प्रताप की राजधानी कौन सी थी?

महाराणा प्रताप द्वारा शासित मेवाड़ की अन्तिम राजधानी चावंड थी जो कि इतिहास में प्रसिद्ध कस्बा है। यह सराड़ा तहसील में पड़ता है जो उदयपुर से 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

महाराणा प्रताप की मृत्यु कब हुई थी?

1597 में 19 जनवरी को 57 वर्ष की उम्र में चावंड राजधानी में धनुष की डोर खींचते समय प्रताप के आंत में एक चोट लगी, जिसके कारण इनकी मृत्यु हो गई।

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इनका नाम राहुल सिंह तंवर है, इन्होंने स्नातक (रसायन, भौतिक, गणित) की पढ़ाई की है और आगे की भी जारी है। इनकी रूचि नई चीजों के बारे में लिखना और उन्हें आप तक पहुँचाने में अधिक है। इनको 3 वर्ष से भी अधिक SEO का अनुभव होने के साथ ही 3.5 वर्ष का कंटेंट राइटिंग का अनुभव है। इनके द्वारा लिखा गया कंटेंट आपको कैसा लगा, कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। आप इनसे नीचे दिए सोशल मीडिया हैंडल पर जुड़ सकते हैं।

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