राजपूतों का इतिहास एवं उत्पत्ति

History of Rajput in Hindi: राजपूत एक ऐसा हैं, नाम जिसको सुनते ही दिल में जोश और जुनून भर जाता है। हमारे देश के मध्यकालीन इतिहास में कई ऐसे राज्य थे, जहां पर राजपूत राजाओं ने राज किया था। राजपूताने के साथ उत्तर भारत में भी राजपूत राजाओं का ही राज रहा है।

History of Rajput in Hindi
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राजपूतों का समय 12वीं शताब्दी से ही माना जाता है। इस समय के बाद से राजपूत काफी सक्रीय रहे हैं। ख़ासकर राजस्थान राज्य में प्राचीन समय में राजपुताना के नाम से जाना जाने वाला राज्य भारत में राजपूत एक शूरवीर जाति के नाम से जाती थी। इस लेख में आपको राजपूत के इतिहास (Rajput History in Hindi) और राजपूतों के शौर्य के बारे में बताया जा रहा है। अतः आप इस लेख को अंत तक पढ़े।

राजपूत की उत्पति

राजपूत शब्द जिसका अर्थ राज का पुत्र होता है। यह राज करने के लिए ही पैदा होते हैं। माना जाता है एक राजपूत राजा के कुल में ही पैदा होता है। हालांकि राजा के कुल में मात्र जन्म ले लेने से कोई राजपूत नहीं बन जाता है, राजा के कुल में कई जातियां पैदा होती है।

लेकिन राजपूत राज कुल में पैदा होना ही केवल महत्व नहीं रखता बल्कि एक राजपूत के लिए वह गुण भी होना चाहिए, जिससे उन्हें राजा के पद के लिए योग्य माना जा सके। इतिहास में जितने भी राजपूत राज आए हुए, उन्होंने अपने प्रजा और धर्म के लिए अपने जीवन को समर्पित कर दिया।

हिंदू धर्म के इतिहास में जातियों को 4 वर्णो में विभाजित किया गया था और उन जातियों के हिसाब से ही उनके कार्य भी थे। जैसे ब्राह्मण जाति के लोग शिक्षा विद का काम करते थे, वह पंडित और विद्वान होते थे। वहीँ बनिया जाति के लोग व्यापार का काम करते थे। शूद्र जाति के लोग साफ-सफाई जैसे छोटे काम किया करते थे।

इन चार वर्णों के बाद भी कई जातियां बनती गई। चंदबरदाई के द्वारा लिखे गए कथा के अनुसार राजपूतों को भी 36 जातियों में विभाजित किया गया था। लेकिन उनमें से कुशवाहा, दहिया, गोत्र राठौड़, पंवार, चौहान, सिसौदिया, जादो आदि राजपूत की प्रमुख गौत्र थी।

कई इतिहासकार का मानना है कि राजपूत काल के समय सूर्यवंशी और चंद्रवंशी राजघराने का विस्तार बहुत ही ज्यादा था। क्योंकि उस समय इन्हीं वर्ग के लोग युद्ध कौशल में निपुण हुआ करते थे और राजपूत और क्षत्रिय युद्ध में हिस्सा लिया करते थे, जिसके कारण यह पूरे राज्य की भी जिम्मेदारी संभालते थे।

धीरे-धीरे राजपूत राजाओं में अहंकार और आपसी लड़ाई झगड़े एवं मतभेद होने लगे, जिसके कारण भारत छोटे-छोटे राज्य में बट गया। लगभग सातवीं और बारहवीं शताब्दी के बीच राजपूतों का भारत के मुख्य हिस्सों पर कब्जा था।

इतिहास के अनुसार भारत में ज्यादातर हिस्से में राजपूतों राजाओं का शासन था। राजा हर्षवर्धन एकमात्र ऐसे राजपूत राजा थे, जिन्होंने बहुत लंबे समय तक भारत पर शासन किया था। भारत में अंग्रेजों का शासन था, उस समय राजपूत को राजपूताना कहा जाता था।

राजपूतों की उत्पत्ति के सिद्धांत

राजपूतों की उत्पत्ति के कई सिद्धान्त इतिहासकारों ने बनाए हैं। कई इतिहासकार तो राजपूतों की उत्पत्ति आबू पर्वत खंड से अग्निकुंड से मानते हैं। राजपूतों की उत्पत्ति छठी शताब्दी से मानी जाती हैं। इस समय के बाद 12वीं शताब्दी में राजपूतों को विशेष दर्जा मिला। भारतीय इतिहास में राजपूतों को शासकीय जाति 12वी शताब्दी से माना गया।

वैसे तो राजपूतों की उत्पत्ति के कई सिद्धांत हैं, उनमें से कुछ सिद्धांत के बारे में आगे बताया गया हैं। राजस्थान में इतिहास के जनक माने जाने वाले कर्नल जेम्स टॉड द्वारा दिए गए एक सिद्धांत के अनुसार राजपूतों की उत्पत्ति विदेशी मूल यानी विदेशी जाति से मानी जाती हैं।

कर्नल जेम्स टॉड ने राजपूतों को राजपूत कुषाण, शक और हूणों के वंशज के रूप में माना था। कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार चूंकि राजपूत जाति के लोग अग्नि की पूजा किया करते थे और यह कार्य विदेशी जाति कुषाण और शक भी अग्नि की पूजा करते थे। इसी सिद्धांत के आधार पर कर्नल जेम्स टॉड ने राजपूतों की उत्पत्ति शको और कुषाणों से बताई थी।

दूसरे एक सिद्धांत के अनुसार राजपूतों को विदेशी न मानकर उन्हें क्षत्रिय जाति ही माना जाता हैं। राजपूताने के कई इतिहासकार राजपूतों को देशी जाती मानते थे। राजपूतों की उत्पत्ति मुख्य रूप से अग्निकुंड से मानी जाती थी, अग्निकुंड से वशिष्ठ मुनि ने 4 राजपूत जातियों की उत्पत्ति की थी, जिसमें से क्षत्रिय भी एक जाति थी।

वहीं कुछ इतिहासकार राजपूतों को आर्य मानते हैं। चूँकि आर्य भारत के ही मूल निवासी थे और इतिहासकार आर्य से ही राजपूतो की उत्पत्ति मानते हैं। राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में चौथा सिद्धार्थ चंदबरदाई द्वारा रचित ग्रंथ पृथ्वीराज रासो से मिला हुआ माना जाता है।

चंदबरदाई ने राजपूतों को भारत की मूल जाति माना है। वे राजपूतों को अग्नि से उत्पन्न जातियों में से मानते हैं। इतिहासकार राजपूतों को भले की अलग-अलग मानते हो पर हम तो राजपूतों को भारतीय ही मानते हैं।

राजपूतों का निवास स्थान

बात करें राजपूतो के निवास स्थान की तो राजपूतों की शुरुआत माउंट आबू से मानी जाती हैं। उसके बाद राजपूत उत्तरी भारत के राज्यों में बसने लगे। राजपूतों ने सबसे पहले दिल्ली में अपने शासक की शुरुआत की थी, उसके बाद वे राजपूताने में भी अपनी धाक ज़माने लगे।

16वीं शताब्दी के बाद राजपूत तत्कालीन भारत के कई हिस्सों में अपना वर्चस्व जमाने लगे। राजस्थान के अलावा राजपूत उत्तरी भारत के दिल्ली, वर्तमान उत्तर प्रदेश इत्यादि राज्यों के साथ कन्नौज में भी शासन किया था। राजपूतों के मूल स्थान की बात करें तो राजस्थान में ही राजपूतों का मूल स्थान माना जाता है।

राजपूतों का इतिहास (History of Rajput in Hindi)

राजपूतों के इतिहास (History of Rajput in Hindi) की बात करें तो राजपूतों को तो मध्यकालीन इतिहास से ही महान माना जाता हैं। राजपूतों का इतिहास वैसे तो काफी पुराना है। राजपूत जाति शौर्य और बलिदान के लिए जानी जाती हैं। आज भी स्कूल और कॉलेज में इनके इतिहास से जुडी उन सभी घटनाओं के बारे में पढाया जाता हैं, जिन्हें पढ़ कर हम भी गर्व महसूस करते हैं।

हम महाराणा प्रताप और राणा कुम्भा को कैसे भूल सकते हैं, जिन्होंने अपनी प्रजा और अपने राज्य के प्रति पूर्ण समर्पण के साथ भाव रख कर इन राज्यों पर राज किया। हम बाप्पा रावल के इतिहास को कैसे नकार सकते हैं, जिन्होंने गुहिल वंश की स्थापना की और उसी गुहिल वंश से शूरवीर महाराणा प्रताप ने जन्म लिया। अजमेर के चौहान वंश में पृथ्वीराज चौहान के इतिहास को हम आज भी पढ़ते हैं और उनके बलिदान को याद करते हैं।

हल्दीघाटी युद्ध में दिखा राजपूतों का शौर्य

16वीं शताब्दी में अकबर का सेनापति मानसिंह जो कि स्वयं एक राजपूत राजा था, ने मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप के साथ युद्ध किया, जिसमें महारण प्रताप ने अपना शौर्य दिखाया। महाराणा प्रताप ने इस युद्ध में विजय हासिल की, इस बात की जानकारी मेवाड़ के इतिहास में और मेवाड़ राजदरबार में रचित ग्रंथो में मिलती हैं।

राजस्थान के राजसमंद जिले के हल्दीघाटी में लड़े गये इस युद्ध में महाराणा प्रताप ने विजय हासिल की थी इस बात की जानकारी युद्ध के बाद मिले महाराणा प्रताप के सिक्कों से मिलती है। महाराणा प्रताप इतने महान थे कि हल्दीघाटी युद्ध के बाद भी वे जंगलों में रह कर मेवाड़ में मुगलों पर आक्रमण करते रहे और मुगलों की नाक में दम रखा था।

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राजपूतों ने दुश्मनों को दी खुली चुनौती

प्राचीन काल से ही राजपूतों ने अपने शौर्य का जौहर दिखाया हैं। पश्चिमी राज्यों से मुस्लिम राजाओं ने भारत पर जब आक्रमण किया था तब गुहिल वंश के संस्थापक गुहिलादित्य ने उन राजाओ को देश से बहार भागने के लिए अफगान तक उनके पीछे गये थे और उनको खदेड़ कर देश के बाहर निकाल दिया था।

राजपूत चाहे मेवाड़ के हो या आमेर के, अजमेर के हो या बीकानेर के सब से अपने दुश्मनों को खुली चुनोती दी थी और उनके सामने युद्ध किया, पर उनके सामने आत्मसमर्पण नही किया। राजपूतों के शौर्य के चर्चे तो विदेशों में भी देखने को मिलते हैं। राजपूतों ने अपने खून के आखिरी कतरे के गिरने तक दुश्मनों से लड़ते रहे।

राजपूत रानियों ने निभाया जौहर व्रत

रानी पद्मिनी को आज कौन नहीं जानता। मेवाड़ के इतिहास मे रानी पद्मिनी का इतिहास भी काफी शोर्य भरा हैं। मेवाड़ के राजा रावल रतन सिंह की अर्धांगिनी रानी पद्मिनी थी, वह श्रीलंका की राजकुमारी थी। इस समय यानी 1303 में दिल्ली का सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने मेवाड़ पर आक्रमण किया था।

इस युद्ध का उदेश्य मेवाड़ की इस रानी पद्मिनी को पाना ही था। इस युद्ध में रावल रतन सिंह वीरगति को प्राप्त हो गये थे और इस युद्ध में रावल रतन सिंह की पत्नी रानी पद्मिनी ने जौहर व्रत किया था और खुद को कई अन्य रानियों के साथ अग्नि के हवाले कर दिया।

रणथम्भौर का जौहर

चित्तोड़ के इस जौहर से पहले रणथम्भौर के किल्ले का एक प्रसिद्ध साका 1301 ईस्वी में भी हुआ जब रणथम्भोर के पराक्रमी शासक राव हम्मीर देव चौहान ने दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोह सेनापतियों को अपने किले में आश्रय देकर अपने शरणागत वत्सलता के आदर्श और रना हम्मीर ने अपने आन की रक्षा करते हुए उन सभी विश्वस्त योद्धाओं सहित वीरगति प्राप्त की तथा रानियों का दुर्ग की वीर नारियों ने जौहर का अनुष्ठान किया था।

भारत में राजपूत रियासत

भारत में राजपूतों की कुल 23 रियासतें थी। भारत में कुल रियासतों में से 19 रियासतें तो केवल राजस्थान में थी। भारत में राजपूतों के लिए राजपुताना काफी प्रसिद्ध था, जिसे वर्तमान राजस्थान कहा जाता है। राजस्थान में राजपूतों के इतिहास के कई ऐसे प्रमाण मिलते हैं, जिससे यह माना जाता हैं राजपूत एक महान शासक जाति थी।

राजपूतों का साहित्य इतिहास

राजस्थान के अलावा राजपूत कई अलग-अलग राज्यों में अपना शासन जमा चुके थे और जहां वे थे, वहाँ उन्होंने कई मंदिर और इमारतों का निर्माण करवाया था। उन मंदिरों में मेवाड़, उदयपुर के साथ पूरे राजस्थान में कई मन्दिर बनवाए हैं। रणकपुर का जैन मंदिर, चित्तोड़ का घोसुण्डी का मंदिर इत्यादि प्रशिद्ध हैं। राजपूतों ने अपने काल में कई मंदिर के साथ कई इमारते भी बनवाई हैं, जिसमे कुम्भलगढ़ का बादल महल भी काफी प्रशिद्ध हैं।

देश की आजादी के समय राजपूत

1947 में जब देश आजाद हुआ था। देश की आजादी के समय सभी राजपूत रियासत के साथ देश की सभी रियासत देश में मिल गई। राजस्थान में जब देश का एकीकरण हुआ था तब यह सभी राजपूत रियासत देश में मिल गई और यह वर्तमान भारत बना। देश की आजादी के समय राजपूतों के साथ देश के अन्य राज्य और उनकी रियासतों भी भारत में मिल गई।

राजपूतों के बारे में रोचक तथ्य

  • मध्यकाल में देवी देवताओं की बहुत पूजा पाठ होती थी। उस समय जितने भी राजपूत राजा थे, जंग में जाने से पहले वे अपनी कुलदेवी की पूजा अर्चना करके ही निकलते थे। इसके अतिरिक्त राजपूत अपने राज्य का ढोल, झंडा एवं राज्य चिन्ह एवं कुलदेवी की मूर्तियां भी अपने साथ जंग में लेकर जाते थे।
  • राजपूत राजा जब जंग में जाते थे तो उससे पहले चारण कवि उन्हें वीर रस सुना कर उनमें जोश पैदा करते थे और उनके कर्तव्यों को याद दिलाते थे ताकि वे जंग में विजय प्राप्त करके ही आए। बहुत बार जो जंग लंबे समय तक चलता था, उस जंग में उनके जोश को बनाए रखने के लिए ऐसे चारण उनके साथ जंग में जाया करते थे। यह चारण, गडवी या भाट एक प्रकार के दूत होते थे। यह राजपूत राजा के दरबार में बिना आज्ञा के और रोक-टोक के जा सकते थे। चाहे उस राजपूत राजा की किसी दुश्मन के ही चारण क्यों ना हो, वह भी उनके दरबार में बिना रोक-टोक के जा सकते थे।
  • राजपूतों की सेना में एक हरावल सेना होती थी, जो युद्ध का नेतृत्व करती थी। यह सम्मानीय स्थान होता था और इस स्थान को पाने के लिए कई बार तो राजपूत आपस में ही लड़ पड़ते थे।
  • राजपूत राजाओं की सेना जब जंग में लड़ने के लिए जाती थी और वहां पर युद्ध में धोखे का संदेह होता था तो वे घोड़े पर से उतर कर जमीनी युद्ध करते थे।
  • राजपूतों में जौहर बहुत ज्यादा प्रसिद्ध था। उस समय राजाओं के बीच जब युद्ध होता था तो जंग में विजय पाने वाला राजा पराजित राजा के राज्य के साथ उसकी सभी रानियों को अपना गुलाम बना लेता था। ऐसे में जब किसी राजपूत राजा का जंग में हार निश्चित होती थी तब राजपूत स्त्रियां अपनी पवित्रता कायम रखने के लिए अपने शादी के जोड़े वाले वस्त्र को पहनकर अपने कुल देवी देवताओं की पूजा कर तुलसी के साथ गंगा जल का पान कर जलती चिताओं में प्रवेश कर जाती थी और अपने सतीत्व की रक्षा करती थी।
  • राजपूत महिला जब जोहर करती थी तो ऐसे में गर्भवती महिलाओं को जौहर नहीं करवाया जाता था। किले में मौजूद खुफिया रास्ते से उन्हें अन्य बच्चों के साथ किसी गुप्त स्थान या दूसरे राज्य में पहुंचा दिया जाता था।
  • राजपूत शासन काल में तो बहुत से जौहर हुए लेकिन अंतिम जौहर पूरे विश्व के इतिहास में 18वीं सदी में हुआ था जब कॉल के घासेड़ा के राजपूत राजा बहादुर सिंह पर भरतपुर के जाट सूरजमल ने मुगल सेनापति के साथ मिलकर हमला किया था। बहादुर सिंह ने दुश्मनों का मुकाबला बहुत जबरदस्त तरीके से किया था लेकिन दुश्मनों की संख्या बहुत ज्यादा थी, जिसके बाद यह संदेश राजपूत रानियों को मिलने के बाद उन्होंने अग्नि में जलकर प्राण त्यागने कर निर्णय लिया इस तरीके से अंत में जोहर कर ली। इतिहास के इस घटना के बारे में “गुड़गांव जिले के गेजिएटर” में वर्णित है।
  • भारत में जब राजपूत राजाओं का शासन था तो उस समय वे अपने बालों को बड़ा रखा करते थे। इसके पीछे का भी कारण था कि जब वे युद्ध में जाया करते थे तब वे गर्दन के पीछे बालों के बीचो बीच लोहे की जाली डालते थे और वहां पर विशेष प्रकार का चिकना पदार्थ लगाते थे ताकि दुश्मन सेना के तलवार से गर्दन पर होने वाले वार से बचा जा सके।

राष्ट्रीय राजनीती में राजपूत हस्तियां

भारत में ऐसे कई राजपूत लोग हुए, जिन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में अपना योगदान दिया है। राजनीति के क्षेत्र में भी अनेक राजपूत लोग प्रतिष्ठित पदों पर विराजमान रह चुके हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं:

  • विश्वनाथ प्रताप सिंह: भारत के दसवें प्रधानमंत्री रहे थे।
  • चंद्रशेखर: भारत के 11 प्रधानमंत्री रहे थे।
  • राजनाथ सिंह
  • दिग्विजय सिंह
  • महाराज भानु प्रताप सिंह
  • भैरों सिंह शेखावत
  • भक्त दर्शन
  • जसवंत सिंह

FAQ

भारत का सबसे पुराना वंश गुहिल वंश राजपूत का समय क्या बताया गया है? 

राजपूत का समय 10 और 12 वीं शताब्दी से लेकर मध्यकाल ले अंतिम तक माना गया है।

सबसे पुराना राजपूत वंश कौन सा हैं? 

भारत का सबसे पुराना वंश गुहिल वंश हैं।

राजपूत राजाओं के शासन काल के समय महिलाएं क्या करती थी?

राजपूत राजाओं के समय महिलाओं की स्थिति काफी बेहतर थी। हालांकि उस समय भी महिलाओं से घरेलू श्रम करने की अपेक्षा की जाती थी। लेकिन राजपूत महिलाएं लड़ने के लिए भी सक्षम थी। यदि किसी राजा के सैन्य बल में कम पुरुष होते थे तो वे युद्ध में भी जाने से नहीं डरा करती थी।

गुहिल वंश की स्थापना किसने की?

गुहिल वंश की स्थापना गुहिल द्वितीय ने की हैं।

राजपूतों को विदेशी कौन मानते हैं? 

राजपूतों को विदेशी कर्नल जेम्स टॉड मानते हैं।

राजपुताना किसे कहा गया हैं? 

राजपुताना को वर्तमान में राजस्थान के नाम से जाना जाता हैं।

भारत में शासन करने वाले सभी राजपूत राजाओं के नाम क्या है?

भारत में शासन करने वाले कई राजपूत राज हुए जैसे राजा जयसिंह, महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय, राजा भोज, हर्षवर्धन, राजा मानसिंह, बप्पा रावल, पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप, बंदा बहादुर, मीराबाई, राणा सांगा, रावल रतन सिंह, जोधा बाई, अमर सिंह राठौर, वीर दुर्गादास राठौर, बाबा रामदेव आदि। इन तमाम राजपूत राजाओं में से राजा हर्षवर्धन एकमात्र ऐसे राजा थे, जिन्होंने भारत में लंबे समय तक शासन किया था।

निष्कर्ष

देश की आजादी से पहले राजपूत एक शौर्य और वीर जाति के लिए जानी जाती थी, आज भी उनके बलिदान और उनके शौर्य को याद किया जाता है। हमारे इस लेख राजपूतों का इतिहास (Rajputon ka Itihaas) में उन्ही राजपूतों के बारे में बताया गया है। उम्मीद करते हैं आपको यह लेख पसंद आया होगा।

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इनका नाम राहुल सिंह तंवर है। इनकी रूचि नई चीजों के बारे में लिखना और उन्हें आप तक पहुँचाने में अधिक है। इनको 4 वर्ष से अधिक SEO का अनुभव है और 6 वर्ष से भी अधिक समय से कंटेंट राइटिंग कर रहे है। इनके द्वारा लिखा गया कंटेंट आपको कैसा लगा, कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। आप इनसे नीचे दिए सोशल मीडिया हैंडल पर जरूर जुड़े।