राजपूतों का इतिहास

History of Rajput in Hindi: राजपूत एक ऐसा नाम जिसको सुनते ही दिल में जोश और जुनून भर जाता है। हमारे देश के मध्यकालीन इतिहास में कई ऐसे राज्य थे, जहां पर राजपूत राजाओं ने राज किया था। राजपूताने के साथ उत्तर भारत में भी राजपूत राजाओं का ही राज रहा है।

History of Rajput in Hindi
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राजपूतो का समय 12वीं शताब्दी से ही माना जाता है। इस समय के बाद से राजपूत काफी सक्रीय रहे हैं। ख़ासकर राजस्थान राज्य में प्राचीन समय में राजपुताना के नाम से जाना जाने वाला राज्य भारत में राजपूत एक शूरवीर जाति के नाम से जाती थी। इस लेख में आपको राजपूत के इतिहास और राजपूतों के शौर्य के बारे में बताया जा रहा है। अतः आप इस लेख को अंत तक पढ़े।

राजपूतों का इतिहास | History of Rajput in Hindi

राजपूतों की उत्पत्ति के सिद्धान्त  

राजपूतों की उत्पत्ति के कई सिद्धान्त इतिहासकारों ने बनाए हैं। कई इतिहासकार तो राजपूतों की उत्पत्ति आबू पर्वत खंड से अग्निकुंड से मानते हैं। राजपूतों की उत्पत्ति छठी शताब्दी से मानी जाती हैं। इस समय के बाद 12वीं शताब्दी में राजपूतों को विशेष दर्जा मिला। भारतीय इतिहास में राजपूतों को शासकीय जाति 12वी शताब्दी से माना गया। 

वैसे तो राजपूतों की उत्पत्ति के कई सिद्धांत हैं, उनमें से कुछ सिद्धांत के बारे में आगे बताया गया हैं। राजस्थान में इतिहास के जनक माने जाने वाले कर्नल जेम्स टॉड द्वारा दिए गए एक सिद्धांत के अनुसार राजपूतों की उत्पत्ति विदेशी मूल यानी विदेशी जाति से मानी जाती हैं।

कर्नल जेम्स टॉड ने राजपूतों को राजपूत कुषाण, शक और हूणों के वंशज के रूप में माना था। कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार चूंकि राजपूत जाति के लोग अग्नि की पूजा किया करते थे और यह कार्य विदेशी जाति कुषाण और शक भी अग्नि की पूजा करते थे। इसी सिद्धांत के आधार पर कर्नल जेम्स टॉड ने राजपूतों की उत्पत्ति शको और कुषाणों से बताई थी।

दूसरे एक सिद्धांत के अनुसार राजपूतों को विदेशी न मानकर उन्हें क्षत्रिय जाति ही माना जाता हैं। राजपूताने के कई इतिहासकार राजपूतों को देशी जाती मानते थे। राजपूतों की उत्पत्ति मुख्य रूप से अग्निकुंड से मानी जाती थी, अग्निकुंड से वशिष्ठ मुनि ने 4 राजपूत जातियों की उत्पत्ति की थी जिसमें से क्षत्रिय भी एक जाति थी।

वहीं कुछ इतिहासकार राजपूतों को आर्य मानते हैं। चूँकि आर्य भारत के ही मूल निवासी थे और इतिहासकार आर्य से ही राजपूतो की उत्पत्ति मानते हैं। राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में चौथा सिद्धार्थ चंदबरदाई द्वारा रचित ग्रंथ पृथ्वीराज रासो से मिला हुआ माना जाता है। चंदबरदाई ने राजपूतों को भारत की मूल जाति माना है। वे राजपूतों को अग्नि से उत्पन्न जातियों में से मानते हैं। इतिहासकार राजपूतों को भले की अलग-अलग मानते हो पर हम तो राजपूतों को भारतीय ही मानते हैं।

राजपूतों का निवास स्थान

बात करें राजपूतो के निवास स्थान की तो राजपूतों की शुरुआत माउंट आबू से मानी जाती हैं। उसके बाद राजपूत उत्तरी भारत के राज्यों म बसने लगे। राजपूत ने सबसे पहले दिल्ली में अपने शासक की शुरुआत की थी उसके बाद वे राजपूताने में भी अपनी धाक ज़माने लगे।

16वीं शताब्दी के बाद राजपूत तत्कालीन भारत के कई हिस्सों में अपना वर्चस्व जमाने लगे। राजस्थान के अलावा राजपूत उत्तरी भारत के दिल्ली, वर्तमान उत्तर प्रदेश इत्यादि राज्यों के साथ कन्नौज में भी शासन किया था। राजपूतों के मूल स्थान की बात करें तो राजस्थान में ही राजपूतों का मूल स्थान माना जाता है।

राजपूतों का इतिहास

राजपूतों के इतिहास (History of Rajput in Hindi) की बात करें तो राजपूतों को तो मध्यकालीन इतिहास से ही महान माना जाता हैं। राजपूतों का इतिहास वैसे तो काफी पुराना है। राजपूत जाति शौर्य और बलिदान के लिए जानी जाती हैं। आज भी स्कूल और कॉलेज में इनके इतिहास से जुडी उन सभी घटनाओं के बारे में पढाया जाता हैं, जिन्हें पढ़ कर हम भी गर्व महसूस करते हैं।

हम महाराणा प्रताप और राणा कुम्भा को कैसे भूल सकते हैं, जिन्होंने अपनी प्रजा और अपने राज्य के प्रति पूर्ण समर्पण के साथ भाव रख कर इन राज्यों पर राज किया। हम बाप्पा रावल के इतिहास को कैसे नकार सकते हैं, जिन्होंने गुहिल वंश की स्थापना की और उसी गुहिल वंश से शूरवीर महाराणा प्रताप ने जन्म लिया। अजमेर के चौहान वंश में पृथ्वीराज चौहान के इतिहास को हम आज भी पढ़ते हैं और उनके बलिदान को याद करते हैं।

हल्दीघाटी युद्ध में दिखा राजपूतों का शौर्य

16वीं शताब्दी में अकबर का सेनापति मानसिंह जो की स्वयं एक राजपूत राजा था, ने मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप के साथ युद्ध किया जिसमें महारण प्रताप ने अपना शौर्य दिखाया। महाराणा प्रताप ने इस युद्ध में विजय हासिल की, इस बात की जानकारी मेवाड़ के इतिहास में और मेवाड़ राजदरबार में रचित ग्रंथो में मिलती हैं।

राजस्थान के राजसमंद जिले के हल्दीघाटी में लड़े गये इस युद्ध में महाराणा प्रताप ने विजय हासिल की थी इस बात की जानकारी युद्ध के बाद मिले महाराणा प्रताप के सिक्कों से मिलती है। महाराणा प्रताप इतने महान थे कि हल्दीघाटी युद्ध के बाद भी वे जंगलों में रह कर मेवाड़ में मुगलों पर आक्रमण करते रहे और मुगलों की नाक में दम रखा था।

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राजपूतों ने दुश्मनों को दी खुली चुनौती

प्राचीन काल से ही राजपूतों ने अपने शौर्य का जौहर दिखाया हैं। पश्चिमी राज्यों से मुस्लिम राजाओं ने भारत पर जब आक्रमण किया था तब गुहिल वंश के संस्थापक गुहिलादित्य ने उन राजाओ को देश से बहार भागने के लिए अफगान तक उनके पीछे गये थे और उनको खदेड़ कर देश के बाहर निकाल दिया था।

राजपूत चाहे मेवाड़ के हो या आमेर के, अजमेर के हो या बीकानेर के सब से अपने दुश्मनों को खुली चुनोती दी थी और उनके सामने युद्ध किया पर उनके सामने आत्मसमर्पण नही किया। राजपूतों के शौर्य के चर्चे तो विदेशों में भी देखने को मिलते हैं। राजपूतों ने अपने खून के आखिरी कतरे के गिरने तक दुश्मनों से लड़ते रहे। 

राजपूत रानियों ने निभाया जौहर व्रत

रानी पद्मिनी को आज कौन नहीं जानता। मेवाड़ के इतिहास मे रानी पद्मिनी का इतिहास भी काफी शोर्य भरा हैं। मेवाड़ के राजा रावल रतन सिंह की अर्धांगिनी रानी पद्मिनी थी, वह श्रीलंका की राजकुमारी थी। इस समय यानी 1303 में दिल्ली का सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने मेवाड़ पर आक्रमण किया था।

इस युद्ध का उदेश्य मेवाड़ की इस रानी पद्मिनी को पाना ही था। इस युद्ध में रावल रतन सिंह वीरगति को प्राप्त हो गये थे और इस युद्ध में रावल रतन सिंह की पत्नी रानी पद्मिनी ने जौहर व्रत किया था और खुद को कई अन्य रानियों के साथ अग्नि के हवाले कर दिया।

रणथम्भौर का जौहर

चित्तोड़ के इस जोहर से पहले रणथम्भौर के किल्ले का एक प्रसिद्ध साका 1301 ईस्वी में भी हुआ जब रणथम्भोर के पराक्रमी शासक राव हम्मीर देव चौहान ने दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोह सेनापतियों को अपने किले में आश्रय देकर अपने शरणागत वत्सलता के आदर्श और रना हम्मीर ने अपने आन की रक्षा करते हुए उन सभी विश्वस्त योद्धाओं सहित वीरगति प्राप्त की तथा रानियों का दुर्ग की वीर नारियों ने जौहर का अनुष्ठान किया था।

भारत में राजपूत रियासत

भारत में राजपूतों की कुल 23 रियासतें थी। भारत में कुल रियासतों में से 19 रियासतें तो केवल राजस्थान में थी। भारत में राजपूतों के लिए राजपुताना काफी प्रसिद्ध था, जिसे वर्तमान राजस्थान कहा जाता है। राजस्थान में राजपूतों के इतिहास के कई ऐसे प्रमाण मिलते हैं, जिससे यह माना जाता हैं राजपूत एक महान शासक जाति थी।

राजपूतों का साहित्य इतिहास

राजस्थान के अलावा राजपूत कई अलग-अलग राज्यों में अपना शासन जमा चुके थे और जहां वे थे वहाँ उन्होंने कई मंदिर और इमारतों का निर्माण करवाया था, उन मंदिरों में मेवाड़, उदयपुर के साथ पुरे राजस्थान में कई मन्दिर बनवाए हैं। रणकपुर का जैन मंदिर, चित्तोड़ का घोसुण्डी का मंदिर इत्यादि प्रशिद्ध हैं। राजपूतों ने अपने काल में कई मंदिर के साथ कई इमारते भी बनवाई हैं, जिसमे कुम्भलगढ़ का बादल महल भी काफी प्रशिद्ध हैं।

देश की आजादी के समय राजपूत

1947 में जब देश आजाद हुआ था। देश की आजादी के समय सभी राजपूत रियासत के साथ देश की सभी रियासत देश में मिल गई। राजस्थान में जब देश का एकीकरण हुआ था तब यह सभी राजपूत रियासत देश में मिल गई और यह वर्तमान भारत बना। देश की आजादी के समय राजपूतों के साथ देश के अन्य राज्य और उनकी रियासतों भी भारत में मिल गई।

भारत का सबसे पुराना वंश गुहिल वंश हैं। राजपूत का समय क्या बताया गया है? 

राजपूत का समय 10 और 12 वीं शताब्दी से लेकर मध्यकाल ले अंतिम तक माना गया है।

सबसे पुराना राजपूत वंश कौन सा हैं? 

भारत का सबसे पुराना वंश गुहिल वंश हैं।

गुहिल वंश की स्थापना किसने की?

गुहिल वंश की स्थापना गुहिल द्वितीय ने की हैं।

राजपूतों को विदेशी कौन मानते हैं? 

राजपूतों को विदेशी कर्नल जेम्स टॉड मानते हैं।

राजपुताना किसे कहा गया हैं? 

राजपुताना को वर्तमान में राजस्थान के नाम से जाना जाता हैं।

निष्कर्ष

देश की आजादी से पहले राजपूत एक शौर्य और वीर जाति के लिए जानी जाती थी, आज भी उनके बलिदान और उनके शौर्य को याद किया जाता है। हमारे इस लेख “राजपूतों का इतिहास (History of Rajput in Hindi)” में उन्ही राजपूतों के बारे में बताया गया है। उम्मीद करते हैं आपको यह लेख पसंद आया होगा।

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इनका नाम राहुल सिंह तंवर है, इन्होंने स्नातक (रसायन, भौतिक, गणित) की पढ़ाई की है और आगे की भी जारी है। इनकी रूचि नई चीजों के बारे में लिखना और उन्हें आप तक पहुँचाने में अधिक है। इनको 3 वर्ष से भी अधिक SEO का अनुभव होने के साथ ही 3.5 वर्ष का कंटेंट राइटिंग का अनुभव है। इनके द्वारा लिखा गया कंटेंट आपको कैसा लगा, कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। आप इनसे नीचे दिए सोशल मीडिया हैंडल पर जुड़ सकते हैं।

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