वीर सावरकर का जीवन परिचय

Veer Savarkar Biography in Hindi: भारत के इतिहास में कई ऐसे नेताओं का नाम स्वर्ण अक्षरों से लिखा गया है, जिन्होंने देश की स्वतंत्रता में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्हीं नामों में से एक वीर विनायक दामोदर सावरकर है, जिन्होंने हिंदुत्व के लिए अपने आप को समर्पित कर दिया।

वह एक स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिज्ञ, वकील, समाज सुधारक और हिंदुत्व दर्शन के सूत्रधार थे। राजनीतिक दल और राष्ट्रवादी संगठन हिंदू महासभा के प्रमुख सदस्य रह कर इन्होंने अपने कर्तव्य को बहुत अच्छे तरीके से निभाया। यह एक लेखक के रूप में भी प्रख्यात हुए। इनकी कविता और नाटक ने देश के युवाओं को हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की ओर जाने के लिए प्रेरित किया।

Veer Savarkar Biography In Hindi
विनायक दामोदर सावरकर

देश की स्वतंत्रता और हिंदुत्व के लिए इन्होंने काले पानी की सजा भी काटी और सजा के दौरान इन्होंने कई किताबें लिखी। इनकी किताबें और लेख आज की पीढ़ी को सामाजिक और राजनीतिक एकता के बारे में समझाते हैं। आज के इस लेख में हम इनके जीवन को करीब से जानेंगे।

वीर सावरकर का जीवन परिचय (Veer Savarkar Biography in Hindi)

नामविनायक दामोदर सावरकर
अन्य नामवीर सावरकर
पेशावकील, राजनीतिज्ञ, लेखक और कार्यकर्ता
जन्म28 मई 1883
जन्मस्थानभागुर ग्राम, नासिक, मुंबई (भारत)
शैक्षणिक योग्यतावकालत
जातिहिंदू, ब्राह्मण
राष्ट्रीयताभारतीय
पुस्तकहिन्दूत्व-हु इज हिंदू, कमला, महारत
वैवाहिक स्थितिविवाहित
प्रेरणा स्त्रोतबाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, विपिन चंद्र पाल
बालों का रंगकाला
आंखों का रंगकाला
माता का नामराधाबाई सावरकर
पिता का नामदामोदर सावरकर
भाई का नामगणेश और नारायण
बहन का नाममैनाबाई
पत्नी का नामयमुनाबाई
पुत्र का नामविश्वास, प्रभाकर
पुत्री का नामप्रभात चिपलनकर
मृत्यु26 फरवरी 1966
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वीर सावरकर का प्रारंभिक जीवन

विनायक दामोदर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को नासिक जिले के भागुर ग्राम में एक साधारण से हिंदू ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनकी माता का नाम राधाबाई सावरकर और पिता का नाम दामोदर सावरकर था। बहुत कम उम्र में ही इनके माता-पिता की मृत्यु हो गई, जिसके बाद घर की सारी जिम्मेदारी इनके बड़े भाई गणेश पर आ गई।

हालांकि इनके एक और भाई थे, जिनका नाम नारायण सावरकर था और इनकी एक बहन भी थी, जिनका नाम मैना सावरकर था। विनायक दामोदर सावरकर में बचपन से ही कट्टर हिंदुत्व की भावना थी। इनके बड़े भाई गणेश सावरकर हमेशा से ही इनके लिए प्रेरणा के स्त्रोत रहे थे और इनके जीवन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। बचपन से ही यह बहादुर थे।

जब यह 12 साल के थे, उस समय उनके शहर में हिंदू-मुस्लिम का दंगा शुरू हो गया था। उस समय इतनी छोटी उम्र में ही इन्होंने एक छात्रों के समूह को मुसलमानों की भीड़ से भगा दिया था। इस तरह इन्होंने इतनी छोटी उम्र में ही अपनी बहादुरी का परिचय दिया था।

उस समय उनके इस साहस और बहादुरी के लिए बहुत प्रशंसा हुई, जिसके बाद इन्हें वीर दामोदर सावरकर के नाम से जाना जाने लगा और फिर लोगों ने इन्हें क्रांतिकारी युवा बना दिया।

अंग्रेजों के खिलाफ विरोध की भावना तब से ही जाग उठी जब 1897 में देश में अकाल और प्लेग जैसी बीमारी फैल चुकी थी और देश के बहुत से लोग इस भयंकर बीमारी से पीड़ित थे। जब प्लेग बीमारी से कई लोग मारे गए तब पूना के चापेकर भाइयों द्वारा प्लेग आयुक्त तानाशाह रैंड की हत्या कर दी गई थी, जिसके बाद ब्रिटिश सरकार ने उन चापेकर बंधुओं को फांसी पर लटका दिया।

उसी समय से विनायक दामोदर सावरकर ने अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने का संकल्प मन में ठान लिया था। युवा अवस्था में ही क्रांतिकारी कार्यों के प्रति विनायक दामोदर सावरकर सक्रिय हो चुके थे। धीरे-धीरे इन्होंने युवा समूह का आयोजन किया, जो बाद में मित्र मेला के रूप में संगठित हुआ।

बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल और लाला लाजपत राय युवावस्था में इनके आदर्श थे और उस समय इन नेताओं के द्वारा अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह करने के लिए स्वदेशी आंदोलन की तैयारी की गई थी।

1905 में जब इस आंदोलन को शुरू किया गया तब विदेशी भोजन और कपड़ों की होली जलाई गई थी, जिसमें विनायक सावरकर ने भी भाग लिया था। आगे चलकर विनायक दामोदर सावरकर ने “अभिनव भारत” करके एक राजनीतिक दल का निर्माण भी किया था।

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वीर सावरकर की शिक्षा

विनायक दामोदर सावरकर ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा तो अपने ही गांव के सरकारी विद्यालय से प्राप्त की लेकिन बाद में इन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों को चालू रखते हुए  फर्ग्यूसन कॉलेज में दाखिला लिया। कॉलेज में इन्होंने अपनी डिग्री पूरी की, अच्छे अंको से पास होकर इन्होंने छात्रवृत्ति भी प्राप्त की।

उसके बाद इन्हें आगे की पढ़ाई के लिए लंदन जाने का मौका मिला। जिसके बाद आगे वह कानून की पढ़ाई पूरी करने के लिए लंदन गए। इसमें सामाजिक कृष्ण वर्मा ने उनकी काफी मदद की। इन्हें इंग्लैंड भेजा गया, इंग्लैंड में इंडिया हाउस में रहना शुरू किया। उस समय इंडिया हाउस राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था, जिसका संचालन पंडित श्यामजी करते थे।

लंदन में रहते हुए विनायक दामोदर सावरकर मन लगाकर पढ़ाई करते थे लेकिन इसके साथ ही वे वहां के भारतीय छात्रों को अपने देश के प्रति राष्ट्रवादी भावना जागृत करने के लिए प्रेरित भी करते थे। इसके लिए इन्होंने वहां पर फ्री इंडिया सोसाइटी का भी निर्माण किया था। इसके जरिए वे भारतीय छात्रों को देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ने को प्रेरित किया करते थे।

वीर सावरकर का वैवाहिक जीवन

विनायक दामोदर सावरकर का विवाह वर्ष 1901 में महाराष्ट्र के नासिक जिले की रहने वाली यमुनाबाई सावरकर से हुआ था। इनका वास्तविक नाम यशोदा था। यमुनाबाई के पिता का नाम भाऊराव था, जिन्होंने पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज में विनायक दामोदर को प्रवेश दिलाने के लिए आर्थिक मदद भी की थी। यहां तक कि इनके शैक्षणिक खर्चों का भी वहन करते थे।

विनायक दामोदर सावरकर का जब विवाह हुआ था, उस समय इनकी आयु 18 वर्ष की थी। इनके बड़े भाई की पत्नी यानी कि इनकी भाभी यमुनाबाई की अच्छी दोस्त थी। इनके विवाह के पश्चात यमुनाबाई आत्मनिष्ठा युवा समाज में शामिल हो गई।

यह संगठन विनायक दामोदर सावरकर की भाभी ने शुरू किया था ताकि वह भारतीय महिलाओं में देशभक्ति की भावना जगा सके। इस संगठन में शामिल महिलाएं बैठक करती थी और बैठक के दौरान वे आबा दरेकर एवं विनायक सावरकर की कविताएं एवं गीत गाया करती थी।

यमुनाबाई के साथ शादी के पश्चात विनायक दामोदर सावरकर को एक पुत्र हुआ, जिसका नाम प्रभाकर था। लेकिन चेचक के कारण बहुत कम उम्र में ही इनके इस पुत्र की मृत्यु हो गई थी। जिसके बाद इन्हें दो और संतान हुई, जिसमें एक पुत्र और पुत्री थी। पुत्र का नाम विश्वास सावरकर एवं पुत्री का नाम प्रभात चिपलुणकर था।

वीर सावरकर की गिरफ्तारी

विनायक सावरकर ने अपने मित्रों को गोरिल्ला पद्धति के युद्ध करने की कला और बम्म बनाने की कला सिखाई थी। 1909 में इनके मित्र और अनुयायी मदन लाल ढींगरा ने एक सार्वजनिक बैठक में अंग्रेज अफसर कर्जन की हत्या कर दी। इस गतिविधियों से भारत और ब्रिटेन में क्रांतिकारी गतिविधियां बढ़ गई।

विनायक सावरकर ने ढींगरा को राजनीतिक और कानूनी सहयोग भी दिया। लेकिन बाद में अंग्रेज सरकार ने एक गुप्त और प्रतिबंधित परीक्षण करके उन्हें मौत की सजा सुना दी, जिसके बाद लंदन में रहने वाले भारतीय छात्र भड़क उठे।

विनायक सावरकर ने ढींगरा को एक देशभक्त बताकर क्रांतिकारी विद्रोह को और भी ज्यादा उग्र कर दिया। यहां तक कि इन्होंने अपने भाई गणेश के साथ मिलकर इंडियन काउंसिल एक्ट 1909 के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करना भी शुरू कर दिया था।

विनायक सावरकर की क्रांतिकारी गतिविधियों को देखते हुए अंग्रेज सरकार ने उनके खिलाफ हत्या की योजना में शामिल होने एवं पिस्तौल भारत भेजने के जुर्म में फंसा दिया और विनायक सावरकर को गिरफ्तार कर लिया।

भाग जाने की योजना बनाई

सावरकर को जब क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होने के खिलाफ गिरफ्तार किया गया तो अंग्रेज सरकार ने आगे के अभियोग के लिए उन्हें भारत ले जाने का विचार किया। जब विनायक दामोदर सावरकर को पता चला कि अंग्रेज सरकार उन्हें भारत ले जाने वाली है।

तब इन्होंने अपने एक मित्र को पत्र के जरिए जहाज के फ्रांस में रुकते वक्त भाग जाने की योजना लिखी। जैसे ही जहाज फ्रांस में जाकर रुका, वीर सावरकर समुद्र में कूद कर भाग गए। लेकिन, उनके मित्र को आने में देरी हो गई, जिसके कारण उन्हें दोबारा पकड़कर गिरफ्तार कर लिया गया।

काले पानी की सजा

जब विनायक दामोदर सावरकर को मुंबई लाया गया तब अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन के आरोप में इन्हें भारत सरकार को सौंप दिया गया और फिर यहां इन पर अंग्रेज अफसर की हत्या की साजिश और भारत में क्रांति की पुस्तक भेजने के दो अभियोग में 25-25 वर्ष कर की कुल 50 वर्ष की सजा सुनाई गई।

फिर उन्हें 4 जुलाई 1911 को अंडमान निकोबार द्वीप समूह पर स्थित सेल्यूलर जेल में भेज दिया गया। उस समय इस जेल को काले पानी की सजा कहा जाता था। क्योंकि यह जेल चारों तरफ महासागर के बीचोंबीच स्थित है, जिस कारण वहां से किसी भी कैदी का भाग पाना असंभव था।

Veer Savarkar Cell at Cellular Jail
अंडमान में सेलुलर जेल में वीर सावरकर सेल

वीर सावरकर के द्वारा दी गई याचिकाएं

सेल्यूलर जेल में बंद होने के दौरान विनायक दामोदर सावरकर ने अपनी सजा में रियायत पाने के लिए बॉम्बे सरकार को कई याचिकाएं दायर की। हालांकि उनकी सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया गया और सरकार के द्वारा यह भी सूचित कर दिया गया कि पहली सजा समाप्त होने के बाद दूसरी सजा पर भी विचार किया जाएगा। लेकिन दामोदर सावरकर लगातार याचिकाएं देते रहे।

सबसे पहले 30 अगस्त 1911 को विनायक दामोदर ने अपनी पहली याचिका दायर की थी। लेकिन 3 सितंबर को याचिका खारिज कर दिया गया। उसके बाद उन्होंने 14 नवंबर 1913 को गवर्नर जनरल की परिषद के गृह सदस्य सर रेजीनाल्ड क्रैड्डॉक के समक्ष दूसरी याचिका दायर की। जिसमें उन्होंने लिखा था कि यदि उन्हें रिहा कर दिया जाता है तो ब्रिटिश सरकार में कई भारतीयों का विश्वास भी मजबूत होगा।

हालांकि बाद में इस याचिका को भी खारिज कर दिया गया। 1917 में भी इन्होंने एक और याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने सभी राजनीतिक बंदियों के लिए एक सामान्य माफी का अनुरोध किया था।

1918 में सूचित किया गया कि उनकी याचिका ब्रिटिश सरकार के समक्ष प्रस्तुत की गई। दिसंबर 1919 में एक शाही उद्घोषणा की गई, जिसमें राजनीतिक अपराधियों की शाही क्षमा शामिल थी। 30 मार्च 1920 को विनायक सावरकर ने उद्घोषणा का उल्लेख करते हुए ब्रिटिश सरकार को चौथी याचिका भी दायर की। लेकिन 12 जुलाई 1920 को इनकी याचिका भी खारिज कर दिया गया।

लेकिन, बाद में उनकी याचिका पर विचार किया गया, जिसके पश्चात उन्हें और उनके भाई गणेश सावरकर को भी रिहा किया गया। उनके भाई गणेश सावरकर भी सेल्यूलर जेल में कैद थे, लेकिन वहां पर किसी से भी मिलने की अनुमति नहीं थी, जिस कारण वे इन सालों तक अपने भाई से मिल नहीं पाए थे। उसके बाद 2 मई 1921 को विनायक दामोदर सावरकर को रत्नागिरी के जेल में लाया गया, जहां पर निगरानी के तौर पर इन्हें रखा गया था।

हिन्दू सभा का निर्माण

रत्नागिरी के जेल से 6 जनवरी 1924 को वीर सावरकर को रिहा कर दिया गया, लेकिन उन्हें इस जिले से बाहर जाने की अनुमति नहीं दी गई थी। इस दौरान इन्होंने एक हिंदू समाज संगठन को शुरू किया। यहां पर विनायक सावरकर को ब्रिटिश सरकार के द्वारा एक बंगला भी दिया गया था, जहां उन्हें बाहरी लोगों से मिलने की अनुमति दी गई थी।

इस दौरान इन्होंने नाथूराम गोडसे, डॉक्टर अंबेडकर, महात्मा गांधी जैसे कई प्रभावशाली भारतीय लोगों से मुलाकात की। 1947 तक वे रत्नागिरी जिले में ही रहे, जिसके बाद बॉम्बे प्रेसीडेंसी के नए निर्वाचित सरकार ने उन्हें रिहा कर दिया। उसी साल उनकी प्रति भावना छवि को देखते हुए हिंदू सभा के सदस्यों ने उन्हें हिंदू सभा का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया।

उसी समय मोहम्मद अली जिन्ना ने कांग्रेस के शासन को हिंदू राज्य के रूप में घोषित किया। लेकिन पहले से हिंदू और मुसलमान के बीच झगड़े चल रहे थे और इस घोषणा ने उनके तनाव को और भी ज्यादा बढ़ा दिया।

लेकिन वीर सावरकर हमेशा से एक हिंदू राष्ट्र का निर्माण करना चाहते थे, इसीलिए इन्होंने इस प्रस्ताव पर ध्यान दिया। इतना ही नहीं उनके साथ अन्य कई भारतीय राष्ट्रवादी लोग भी जुड़ गए, जिससे धीरे-धीरे सावरकर की लोकप्रियता और भी ज्यादा बढ़ गई।

Veer Savarkar with nathuram godse
नाथूराम गोडसे के साथ वीर सावरकर (काली टोपी पहने हुए)

नाथूराम गोडसे के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

वीर सावरकर के द्वारा लिखी गई किताब

विनायक दामोदर सावरकर ने सबसे पहले “द हिस्ट्री ऑफ द वर्ड ऑफ द इंडियन इंडिपेंडेंस” नाम की एक किताब लिखी थी। इस किताब को उन्होंने 1857 के विद्रोह के गोरिल्ला युद्ध के बारे में गहन विचार करके लिखा था। इस किताब ने ब्रिटिश शासन में खलबली मचा रखी थी, जिस कारण ब्रिटिश सरकार ने इस किताब पर प्रतिबंध लगा दिया।

लेकिन बाद में मैडम भीकाजी कामा ने इस किताब को फ्रांस, जर्मनी और नीदरलैंड में प्रकाशित किया और फिर वहां से होते हुए यह किताब कई भारतीयों के पास भी पहुंची और यह किताब बहुत ज्यादा लोकप्रिय भी हुई।

बताया जाता है कि जब विनायक दामोदर सावरकर को अंडमान निकोबार के सेल्यूलर जेल में काले पानी की सजा के तौर पर कैद किया गया था, उस समय उनके पास लिखने के लिए कलम और कागज पहुंचने का कोई प्रावधान नहीं था।

लेकिन विनायक सावरकर को हमेशा से ही लिखने का शौक था। ऐसे में इन्होंने जेल की मिट्टी की दीवारों पर कील ठोक कर लिखना शुरू किया था और इसी से इन्होंने हजारों पंक्तियों की एक महाकाव्य “कमला” की रचना की।

सावरकर के द्वारा लिखी गई है कविता उनकी पत्नी यमुनाबाई के प्रति समर्पण के रूप में लिखी गई थी। हालांकि बाद में उन्हें जेल के उस सेल से हटाकर दूसरे कक्ष में लाया गया और जिस कक्ष में लाया गया था, उसमें एक हिंदी पत्रकार भी कैदी के रूप में था, जो इस जेल से रिहा होने के बाद विनायक दामोदर सावरकर के द्वारा लिखे गये इस महाकाव्य “कमला” को कागज पर लिखकर सावरकर के परिवार वालों को भेजा था।

Veer Savarkar with his friends
वीर सावरकर अपने दोस्तों के साथ

सेल्यूलर जेल से रिहा होने के बाद विनायक सावरकर को रत्नागिरी के जेल में नजरबंदी के तौर पर रखा गया था। उस दौरान उन्होंने हिंदुत्व: हू इज ए हिंदू? नामक पुस्तक लिखी थी। जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने “महारत” नामक एक और पुस्तक का विमोचन किया था। इनके द्वारा लिखी गई ज्यादातर पुस्तकों में मुख्य रूप से बिंदु हिंदू सामाजिक और राजनीतिक चेतना पर ध्यान केंद्रित किया था।

वीर सावरकर ने किया गांधीजी का विरोध

वीर दामोदर सावरकर देश को हिंदुत्व की ओर ले जाना चाहते थे। वे भारत की जनता को हिंदुत्व के लिए प्रेरित करते थे। वह गांधी जी की सोच और उनकी गतिविधियों से बिल्कुल भी सहमत नहीं थे। इसीलिए वे महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्र कांग्रेस की हमेशा ही आलोचना करते थे।

उन्होंने गांधी जी के द्वारा शुरू की गई भारत छोड़ो आंदोलन जैसी मुख्य गतिविधियों की भी आलोचना की। वे गांधीजी की नीतियों की आलोचना करते थे। वीर सावरकर कभी नहीं चाहते थे कि भारत देश का बंटवारा हो। वे नहीं चाहते थे कि एक राष्ट्र में दो राज्य का अस्तित्व का प्रस्ताव रखा जाए।

इसीलिए वह गांधीजी की किसी भी बात से सहमत नहीं हुआ करते थे। वीर सावरकर महात्मा गांधी को कायर मानते थे क्योंकि उनका मानना था कि महात्मा गांधी भगत सिंह की फांसी को रुकवा सकते थे लेकिन उन्होंने भगत सिंह की फांसी का विरोध नहीं किया। यहां तक की खिलाफत आंदोलन के दौरान उन्होंने मुस्लिमों को ज्यादा तवज्जो दिया।

वे यह भी कहते थे कि देश का बंटवारा गांधीजी के कारण ही हुआ है क्योंकि उन्होंने पाकिस्तान का समर्थन किया। वीर सावरकर ने अपने कई लेखों में गांधीजी के बारे में आलोचनात्मक शब्दों का प्रयोग किया है। उनके लेख में गांधीजी को पाखंडी बताया गया है। गांधी जी को एक अपरिपक्व मुखिया कहा हैं, जिन्होंने छोटी सोच रखते हुए देश का विनाश कर दिया।

गांधीजी के प्रति निरोधात्मक भावना रखने के कारण 30 जनवरी 1948 को जब गांधीजी की हत्या की गई थी तब पुलिस ने नाथूराम गोडसे के साथ वीर सावरकर को भी गिरफ्तार किया था। क्योंकि वे भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता थे।

हत्या की साजिश में वीर सावरकर के शामिल होने का इल्जाम लगाया गया। हालांकि बाद में वीर सावरकर के खिलाफ कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला, जिसके कारण इन्हें रिहा कर दिया गया था।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहाँ क्लिक करें।

वीर सावरकर के जीवन के कुछ रोचक तथ्य

  • विनायक दामोदर सावरकर जब लंदन में थे तब वहां के भारतीय छात्रों के बीच जागरूकता पैदा करने के लिए भारतीय छात्रों को रक्षाबंधन, गुरु गोविंद सिंह जयंती जैसे कई हिंदू त्योहारों के आयोजन में मदद करते थे और इन त्योहारों के दौरान “एक देश, एक ईश्वर, एक जाति, एक मन, बिना किसी संदेह के हम सभी के भाई” का नारा लगाते थे।
  • वीर सावरकर हिंदुत्व को बढ़ावा देते थे। हालांकि वे अपने आपको नास्तिक मानते थे। लेकिन, उसके बावजूद वे पूरे दिल के साथ हिंदू धर्म को निभाते थे। वे राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान के रूप में खुद को हिंदू मानते थे और जब कोई उन्हें हिंदू बुलाता था, उन्हें बहुत गर्व महसूस होता था।
  • वीर सावरकर भले ही अपने आपको एक हिंदू की पहचान बताते हो लेकिन वह हमेशा से ही हजारों हिंदू रूढ़िवादी मान्यताओं का विरोध करते थे। वे कभी भी हिंदू को धर्म के रूप में नहीं मानते थे, उनका मानना था कि रूढ़िवादी मान्यताओ का जीवन में कोई आधार नहीं है।
  • सेल्यूलर जेल में बंद होने के दौरान विनायक दामोदर सावरकर ने अपनी सजा में रियायत के लिए मुंबई सरकार को कई बार याचिकाएं दायर की। लेकिन उनकी सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया गया। 30 अगस्त 1911 को इन्होंने पहली याचिका की थी, जिसे 3 सितंबर को खारिज कर दिया गया। उसके बाद इन्होंने 14 नवंबर 1913 को भी गवर्नर जनरल की परिषद केंद्रीय सदस्य सर रेजीनाल्ड क्रेडोक के समक्ष याचिका दायर की थी लेकिन उसे भी खारिज कर दिया गया।
  • वीर सावरकर ने अपने राजनीतिक रूप में मूल रूप से तर्कवाद, प्रत्यक्षवाद, मानवतावाद, उपयोगितावाद, सार्वभौमिक और यथार्थवाद के मुख्य मिश्रण को अपनाया था।
  • विनायक दामोदर सावरकर ने जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता जैसे देश की कुछ सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई।
  • वीर सावरकर कहते थे कि उनके जीवन के लिए सबसे अच्छा और प्रेरित भरा समय सेल्यूलर जेल की सजा के दौरान जेल में बिताया गया समय था। इस दौरान इन्होंने काले पानी नामक एक किताब भी लिखी थी, जिसमें उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता कार्यकर्ताओं के संघर्षपूर्ण जीवन के बारे में पूरा वर्णन किया है।
  • जब विनायक दामोदर सावरकर को अंडमान निकोबार के सेल्यूलर जेल में काले पानी की सजा के रूप में रखा गया था, उस समय उनकी पत्नी यमुनाबाई इनसे मिलने के लिए आई थी, जो अपने भाई के साथ त्रिंबकेश्वर से नासिक जाना चाहती थी। लेकिन ब्रिटिश सरकार के डर से इनके किसी भी मित्र ने उनकी मदद नहीं की। जिसके कारण उन्हें पूरी रात नाशिक एक मंदिर में रुकना पड़ा था।
  • विनायक दामोदर सावरकर ने 1965 में एक मीडिया हाउस के साथ बातचीत के दौरान खुलासा किया था कि वे महात्मा गांधी की अहिंसा विचारधारा में विश्वास नहीं करते।
  • कहा जाता है कि विनायक दामोदर सावरकर जब 12 वर्ष के थे तब महाराष्ट्र में हिंदू मुस्लिम का दंगा हुआ था। इस दंगे के बाद उन्होंने अपने साथी छात्रों को उनके गांव में मौजूद एक मस्जिद पर हमला करने के लिए उकसाया था।
  • सेल्यूलर जेल में रहते हुए वीर सावरकर ने वहां के कैदियों को पढ़ाना लिखाना शुरू कर दिया। इस तरीके से इन्होंने समय का पूरा सदुपयोग किया। इस दौरान उन्होंने जेल के अंदर ही बुनियादी पुस्तकालय शुरू करने के लिए सरकार से अर्जी की और सरकार ने उनकी अर्जी को मान भी लिया और जेल में पुस्तकालय भी शुरू कर दिया।
  • वीर सावरकर की मृत्यु के पश्चात शिवसेना पार्टी ने विनायक दामोदर सावरकर को भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित करने के लिए भारत सरकार से अनुरोध किया था। हालांकि उस समय भारत सरकार ने कोई कदम नहीं लिया, जिसके बाद साल 2017 में शिवसेना के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने दोबारा वीर सावरकर को भारत रत्न से सम्मानित करने के लिए भारत सरकार को याद दिलाया। साथ ही भारत की युवा विधायक दामोदर सावरकर के बलिदान से परिचित हो सके, इसीलिए इनके जेल की प्रतिकृति मुंबई में स्थापित करने की सलाह भी सरकार को दी।

भारत सरकार के द्वारा वीर सावरकर के सम्मान में किए गए कार्य

  • विनायक दामोदर सावरकर ने भारत की स्वतंत्रता के कई आंदोलनों में महत्वपूर्ण योगदान दिया था और उनके योगदान के कारण 1970 ईस्वी में भारत सरकार ने उनके नाम पर एक डाक टिकट जारी किया था।
Veer Savarkar India Post
भारत सरकार द्वारा जारी किया गया डाक टिकट
  • साल 2003 में भारत के संसद भवन में भारत सरकार के द्वारा वीर सावरकर के चित्र को स्थापित किया गया था।

वीर सावरकर की मृत्यु का कारण

वीर सावरकर किसी गंभीर बीमारियां या गोली से नहीं मरे थे बल्कि इन्होंने अपनी मृत्यु की घोषणा स्वयं की थी। उन्होंने कहा था कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन के उद्देश्य को प्राप्त करने की पूरी अनुमति होनी चाहिए। वह अपना जीवन किस तरह वहन करना चाहता है और किस तरह समाप्त करना चाहता है, उसकी पूरी अनुमति उस व्यक्ति को मिलनी चाहिए।

वीर सावरकर ने अपने जीवन में इच्छा मृत्यु का प्रण पहले ही ले लिया था और उन्होंने घोषणा कर दी थी कि जब तक इन्हें मृत्यु नहीं आएगी तब तक अन्न का एक दाना भी मुंह में नहीं रखेंगे।

1 फरवरी 1966 को वीर सावरकर ने घोषणा की कि आज से वे उपवास रखेंगे और भोजन का एक दाना भी नहीं लेंगे। उपवास के आरंभ करने के दौरान ही मृत्यु से पहले इन्होंने एक लेख भी लिखा था, जिसका नाम था “यह आत्महत्या नहीं आत्मसमर्पण है”।

लंबे समय तक उपवास रखने के कारण उनका स्वास्थ्य भी दिन प्रतिदिन खराब होते जा रहा था। जिसके बाद अंत में आखिरकार इनके मुंबई निवास पर 26 फरवरी 1966 को 82 वर्ष में इन्होंने अंतिम सांस ली और दुनिया को अलविदा कह गए। इनके रिश्तेदार और परिवार वालों ने इनका अंतिम संस्कार किया।

Veer Savarkar
जीवन के अंतिम दिनों में वीर सावरकर

इनके अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में लोग शामिल होने के लिए आए थे। इनके मृत्यु के बाद हिंदू धर्म के दसवें और 13 दिन के अनुष्ठानों को त्याग दिया गया था। क्योंकि विनायक दामोदर सावरकर ने पहले ही लोगों से अनुरोध किया था कि उनकी मृत्यु के पश्चात ये अनुष्ठान ना हो। इनके मृत्यु के पश्चात इनके घर और इनकी कीमती संपत्ति एवं व्यक्तिगत अवशेषों को सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए भारत सरकार द्वारा संरक्षित कर लिया गया।

वीर सावरकर के जीवन पर बनी फिल्म

राजनीति के साथ-साथ संस्कृती को अपने जीवन में महत्वपूर्ण स्थान देने वाले भारत के एक जाने-माने नेता वीर सावरकर जिन्होंने हिंदुत्व की रक्षा के लिए स्वयं ही आत्मसमर्पण कर दिया और भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया। इस नेता के जीवन पर कई सारी फिल्में अब तक बन चुकी है।

वीर सावरकर के जीवन के ऊपर पहली फिल्म 1996 में “काला पानी” आई थी, जिसमें मुख्य भूमिका में अन्नू कपूर थे। 1996 में आई यह फिल्म तमिल और मलयालम दो भाषाओं में रिलीज हुई थी।

साल 2001 में इन पर वीर सावरकर नामक एक और फिल्म बनी, जो रिलीज भी हुई और दर्शकों के द्वारा बेहद पसंद भी की गई।

साल 2015 में वीर सावरकर के जीवन से ही जुड़ी फिल्म आई थी, जिसका शीर्षक “सावरकर के बारे में क्या था?” है। यह फिल्म मराठी भाषा में रिलीज हुई थी, जिसे नितिन गावड़े और रूपेश कटारे ने निर्देशित किया था। इस फिल्म में एक ऐसे व्यक्ति की कहानी को बताई गई थी, जिसने विनायक सावरकर के नाम का अपमान करने वालों से बदला लिया था।

प्रसिद्ध भारतीय पार्श्व गायिका लता मंगेशकर के पिता वीर सावरकर के अच्छे दोस्त थे और बाद में इस महान गायिका ने वीर सावरकर के द्वारा लिखे गये कई सारे गीत और कविताओं को आवाज दी थी जैसे कि जयस्तुत जयोस्तुते, श्री महानमंगली, नी मजासी ने, परात मातृभूमि, सागर प्राण तलमला आदि।

वीर सावरकर के जीवन पर लिखी गई किताब

वीर सावरकर के जीवन पर बहुत सी किताबें लिखी गई है। जब वीर सावरकर जेल से रिहा हुए थे, उसके 2 साल के बाद “लाइफ ऑफ बैरिस्टर सावरकर” शीर्षक से चित्रगुप्त नामक लेखक ने इनकी जीवनी लिखी थी। इस पुस्तक का बाद में 1940 में हिंदू महासभा के सदस्य इंद्र प्रकाश ने कुछ परिवर्तन के साथ संशोधित संस्करण जारी किया था।

इसका दूसरा संस्करण 1987 में वीर सावरकर प्रकाशन के तहत जारी किया गया था। जब रत्नागिरी के जेल में वीर सावरकर गिरफ्तार थे, उस दौरान मराठी लेखक सदाशिव राजाराम रानाडे ने “स्वातंत्र्यवीर विनायक राव सावरकर ह्यंचे” शीर्षक से वीर सावरकर की जीवनी लिखी थी। बाद में इसी पुस्तक को “ए शॉर्ट बायोग्राफी ऑफ स्वतंत्रवीर विनकराव सावरकर” नाम से अंग्रेजी में अनुवाद किया गया था।

FAQ

विनायक दामोदर सावरकर ने कौन सी पुस्तक लिखी थी?

अंडमान वापस आने के बाद विनायक दामोदर सावरकर ने “हिन्दूत्व – हू इज हिंदू” शीर्षक की किताब लिखी थी। उन्होंने हिंदुत्व को एक राजनीतिक विचार धारा के तौर पर इस्तेमाल किया था।

विनायक दामोदर सावरकर की पत्नी का क्या नाम था?

विनायक दामोदर सावरकर की पत्नी का नाम यमुनाबाई था, जिनसे उन्होंने 18 वर्ष के आयु में विवाह किया था और इससे उन्हें दो संतान प्राप्ति हुई थी।

वीर सावरकर को जेल क्यों हुआ था?

वीर सावरकर को स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ने के कारण अंग्रेजों के द्वारा दोहरे आजीवन कारावास की सजा दी गई और इन्हें अंडमान निकोबार की सेल्यूलर जेल में रखा गया।

विनायक दामोदर सावरकर को वीर सावरकर क्यों कहा जाता है?

विनायक दामोदर सावरकर बचपन से ही बहादुर थे। ये बहादुरी के लिए जाने जाते थे, इसीलिए इन्हें वीर सावरकर बुलाया जाता था।

वीर सावरकर किनसे बेहद प्रभावित थे?

वीर सावरकर अपने बड़े भाई गणेश से बेहद प्रभावित थे। इनके जीवन में इनकी भाई की भूमिका बहुत ही प्रभावशाली थी। भारत के लोगों को पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए लड़ने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से इन्होंने अपने भाई के साथ मिलकर “मित्र मेला” नाम के संगठन की स्थापना की थी।

वीर सावरकर की कितनी संतान थी?

वैसे तो वीर सावरकर की तीन संतान थी, जिसमें इनके प्रथम पुत्र की मृत्यु बचपन में ही चेचक के कारण हो गई थी। बाकी इनके दूसरे पुत्र का नाम विश्वास सावरकर और पुत्री का नाम प्रभात चिपलूनकर था।

वीर सावरकर की मृत्यु कैसे हुई?

वीर सावरकर किसी गंभीर बीमारियां या गोली से नहीं मरे थे बल्कि इन्होंने अपनी मृत्यु की घोषणा स्वयं की थी। उन्होंने कहा था कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन के उद्देश्य को प्राप्त करने की पूरी अनुमति होनी चाहिए। वह अपना जीवन किस तरह वहन करना चाहता है और किस तरह समाप्त करना चाहता है, उसकी पूरी अनुमति उस व्यक्ति को मिलनी चाहिए।

निष्कर्ष

आज के इस लेख में आपने भारत के इतिहास के एक ऐसे क्रांतिकारी नेता के बारे में जाना, जिन्होंने हिंदुत्व के लिए अपने आपको समर्पण कर दिया। आज के इस लेख में आपने वीर सावरकर के प्रारंभिक जीवन, इनकी क्रांतिकारी गतिविधियां, इनके द्वारा लिखी गई पुस्तक एवं इन से जुड़े कुछ रोचक तथ्य तथा अन्य जानकारी जानी।

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