संविधान संशोधन क्या है और इसकी प्रक्रिया क्या है?

Samvidhan Sanshodhan Kya Hai: किसी भी देश को सुचारू ढंग से चलाने के लिए संविधान की आवश्यकता पड़ती है। भारत का संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। देश में जो नियम कानून बनते हैं यह संविधान में उल्लेखित प्रक्रियाओं के आधार पर ही बनते हैं।

भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था। वर्तमान में भारत के संविधान में कुल 25 भाग, 12 अनुसूचियां एवं 448 अनुच्छेद हैं। लेकिन जब भारतीय संविधान बनकर तैयार हुआ था, उस समय कुल 22 भाग 395 अनुच्छेद एवं 8 अनुसूचियां थी। संविधान में यह परिवर्तन संशोधन के अंतर्गत हुआ है।

समय-समय पर जरूरत के अनुसार संविधान में कई बार संशोधन किए गए हैं। अब तक संविधान में कुल 126 संविधान संशोधन विधेयक लाए गए हैं लेकिन अब तक 104 संविधान संशोधन पारित हुए हैं।

Samvidhan Sanshodhan Kya Hai
Image: Samvidhan Sanshodhan Kya Hai

आखिर संविधान संशोधन क्या है? (Samvidhan Sanshodhan Kya Hai), संविधान में संशोधन किस तरह किए जाते हैं और संशोधन की जरूरत क्यों पड़ती है, कौन संशोधन कर सकता है यदि यह सभी प्रश्न आपके भी मन में है तो बिल्कुल सही लेख पर आए हैं। इन तमाम प्रश्नों का उत्तर आज के इस लेख में हम जानने वाले हैं।

संविधान संशोधन क्या है?

संविधान के अंदर जो नियम कानून अनुच्छेद के अंदर शामिल है यदि वे कानून तत्कालीन समय के अनुसार अनुकूल ना हो तो उन में किए जाने वाले बदलाव को ही संशोधन कहा जाता है। संशोधन का अर्थ होता है सुधारना।

इसके अंतर्गत सविधान के अंदर कुछ और अनुच्छेद जोड़े जा सकते हैं। वहीं कुछ अनुच्छेदों के प्रावधानों को निसप्रभाव किया जा सकता है तो कुछ अन्य प्रावधान शामिल किए जा सकते हैं। लेकिन यह प्रक्रिया बहुत आसान नहीं होती है।

संविधान निर्माताओं को पहले से ही पता था कि आने वाले समय में संविधान में जरूर कुछ कमियां निकलेगी। इसीलिए उन्होंने शुरुआत से ही संविधान में संशोधन करने का प्रावधान शामिल किया था ताकि भविष्य में भी संविधान के नियम अनुकूल रहे।

यदि भविष्य में उस समय के परिस्थितियों के हिसाब से संविधान के कुछ अनुच्छेद को बदलने की जरूरत पड़ती है या उसमें कुछ नया शामिल करने की जरूरत पड़ती है तो इसमें बदलाव किए जा सकते हैं।

हालांकि संविधान संशोधन की प्रक्रिया को ज्यादा लचीला नहीं बनाया गया है। वरना संविधान सत्ताधारी दलों के हाथ की कठपुतली बन सकती है और वे अपने स्वार्थ के लिए बिना उपयोगी संशोधन करते रहेंगे, इसीलिए संविधान संशोधन की प्रक्रिया को ना ही ब्रिटेन की तरह बहुत सरल और अमेरिका की तरह बहुत जटिल नहीं किया गया है, बल्कि इन दोनों का मिश्रण बना दिया गया। भारतीय संविधान संशोधन की प्रक्रिया साउथ अफ्रीका के संविधान संशोधन की प्रक्रिया से मेल खाता है।

संविधान संशोधन की प्रक्रिया

संविधान के अनुच्छेद 368 में संविधान संशोधन की प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है, जिसमें तीन प्रक्रिया के बारे में बताया गया है:

  1. साधारण विधि द्वारा
  2. विशेष बहुमत द्वारा
  3. संसद के विशेष बहुमत एवं राज्य विधान मंडलों के स्वीकृति से

साधारण विधि द्वारा

संशोधन के इस प्रक्रिया को काम चलाओ प्रक्रिया कहते हैं। इसमें संसद के साधारण बहुमत द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति को भेजे जाते हैं और राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल जाती है तो फिर वह कानून बन जाता है।

साधारण बहुमत में यदि संसद के लोकसभा के सदस्य की संख्या 500 है तो 251 या उससे अधिक सदस्यों का बहुमत मिल जाए तो विधायक को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जा सकता है।

साधारण विधि के द्वारा नए राज्यों का निर्माण, संविधान की नागरिकता संबंधी अनुसूचित क्षेत्र एवं जनजातियों की प्रशासन संबंधी तथा केंद्र द्वारा प्रशासित क्षेत्रों की प्रशासन संबंधी व्यवस्था, राज्य, क्षेत्र और नाम में परिवर्तन जैसे कुछ संशोधन साधारण बहुमत के द्वारा हो सकते हैं।

विशेष बहुमत के द्वारा

न्यायपालिका तथा राज्यों के अधिकार तथा शक्तियों जैसे कुछ विशिष्ट बातों को छोड़कर संविधान की अन्य सभी व्यवस्थाओं में यदि संशोधन करना हो तो उसके लिए विशेष बहुमत के द्वारा ही संशोधन किया जाता है।

विशेष बहुमत इस प्रक्रिया में संसद के प्रत्येक सदन के द्वारा कुल सदस्यों का बहुमत, उनकी उपस्थिति और मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के ⅔ मतों से विधायक यदि पारित हो जाए तो राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने पर वह संशोधन संविधान का अंग बन जाता है।

संसद के विशेष बहुमत एवं राज्य विधानमंडल की स्वीकृति के द्वारा

संविधान के कुछ अनुच्छेदों में संशोधन करने के लिए संसद के विशेष बहुमत के अतिरिक्त राज्य विधानमंडल में से आधे के द्वारा स्वीकृति मिलना जरूरी हो जाता है तभी संशोधन हो सकता है। विशेष बहुमत एवं राज्य विधानमंडल की स्वीकृति के द्वारा होने वाले संशोधन के प्रमुख विषय निम्नलिखित है:

  • संघ एवं राज्यों में विधायी संबंध
  • राष्ट्रपति का निर्वाचन
  • राष्ट्रपति निर्वाचन की कार्य पद्धति
  • संघीय न्यायपालिका
  • राज्यों के उच्च न्यायालय संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार
  • राज्यों की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार
  • संविधान संशोधन की प्रक्रिया से संबंधित उपबंध
  • केंद्र शासित क्षेत्रों के लिए उच्च न्यायालय

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भारतीय संविधान संशोधन प्रक्रिया अन्य देशों से किस तरह अलग है?

भारतीय संविधान संशोधन की प्रक्रिया इंग्लैंड के संविधान संशोधन की प्रक्रिया से काफी भिन्न है। इंग्लैंड में संसद प्रभुत्वसंपन्न है, जिसके कारण वहां पर पूरी सावधानी की व्यवस्था को साधारण बहुमत की प्रक्रिया से बदला जा सकता है।

लेकिन भारत में कुछ विषयों को संसद के साधारण बहुमत से संशोधित किया जा सकता है। लेकिन शेष संविधान के संशोधन विषयों में विशेष बहुमत यहां तक कि कुछ विषयों में तो राज्य विधान मंडल की स्वीकृति की जरूरत पड़ती है।

अमेरिका में संविधान के संशोधन के लिए प्रस्ताव जारी करने का अधिकार राज्यों को भी होता है। लेकिन भारत में संविधान संशोधन के मामले में राज्यों को पहल करने का कोई अधिकार नहीं दिया गया है। यहां पर संसद के किसी भी सदन में संशोधन संबंधित प्रस्ताव पेश किए जाते हैं लेकिन संविधान संशोधन संबंधित प्रस्ताव को राज्य विधान मंडलों की तरफ से नहीं भेजा जा सकता।

अमेरिका में बिना राज्यों के अनुमोदन के संविधान का संशोधन नहीं किया जा सकता। लेकिन भारत में ऐसा नहीं है भारत में संविधान के ज्यादातर विषयों से संबंधित संशोधन संसद के विशेष बहुमत से ही हो जाते हैं।

अमेरिका में यदि संविधान का संशोधन करना होता है तो राज्यों के 3/4 अनुमोदन जरूरी होता है। लेकिन भारत में कुछ प्रमुख विषय जिसमें संसद के विशेष बहुमत के अतिरिक्त राज्य विधान मंडलों की भी जरूरत होती है। ऐसे विषयों में केवल आधे राज्य के विधान मंडलों की सहमति से भी संशोधन किया जा सकता है।

अमेरिका जैसे देशों में संविधान के संशोधन करने के लिए राष्ट्रपति की स्वीकृति की जरूरत नहीं पड़ती है, वहां के संसद के बहुमत ही काफी होते हैं। लेकिन भारत में बिना राष्ट्रपति की स्वीकृति के संशोधन पारित नहीं हो सकता। यहां सामान्य विधायक की तरह संशोधन विधेयक को भी राष्ट्रपति के स्वीकृति के लिए भेजा जाता है।

हालांकि संशोधन विधेयक में राष्ट्रपति स्वीकृति देने के लिए बाध्य होता है। ऐसे में एक तरफ संशोधन की पूरी शक्ति संसद के पास ही होती है लेकिन औपचारिकता के रूप में राष्ट्रपति की स्वीकृति जरूरी होती है।

भारत में संविधान संशोधन की प्रक्रिया का आधे से ज्यादा शक्ति संसद के पास होती है। कुछ विषय जिसका संबंध राज्य सरकारों के गठन और शक्तियों से है, उनके प्रावधानों के संशोधन के लिए राज्य के विधान मंडलों के अनुमोदन की जरूरत पड़ती है।

लेकिन नए राज्यों का निर्माण करना, उसके नाम और सीमाओं में परिवर्तन करना जैसे संशोधन में केवल संसद के साधारण बहुमत की जरूरत पड़ती हैं। इसका अर्थ है कि संसद के पास पूरी सकती है कि वह राज्य के स्वरूप को बदल दे लेकिन अमेरिका में ऐसा कोई भी अधिकार संसद के पास नहीं है।

FAQ

संविधान के संशोधन करने की प्रक्रिया का जिक्र कौन से अनुच्छेद में है?

संविधान के किसी भी अनुच्छेद में संशोधन करने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 368 में उपलब्ध है, जो संविधान के भाग 20 के अंतर्गत आता है।

साधारण बहुमत और विशेष बहुमत में क्या अंतर होता है?

साधारण बहुमत में संसद के किसी एक सदन के कुल सदस्यों की आधे से एक या दो सदस्य के बहुमत मिल जाने पर साधारण बहुमत कहलाता है। लेकिन विशेष बहुमत में कुल सदस्यों के 2/3 मतों की जरूरत पड़ती है।

भारत के संविधान में संशोधन करने की जरूरत क्यों पड़ती है?

संविधान को वर्तमान परिस्थिति एवं माहौल के अनुसार लागू करने में कठिनाई ना हो तथा समय के अनुसार लोगों के आदर्श, प्राथमिकताएं और लोगों की दृष्टि दर पीढ़ी बदलते रहती है। ऐसे में संविधान को अनुकूल बनाया जा सके, इसके लिए संविधान में संशोधन करने की जरूरत पड़ती हैं।

निष्कर्ष

आज के इस लेख में आपने संविधान संशोधन क्या होता है (Samvidhan Sanshodhan Kya Hai), संविधान संशोधन की प्रक्रिया क्या होती है, भारतीय संविधान संशोधन अन्य देशों के संविधान संशोधन की प्रक्रिया से किस तरीके से भिन्न है के बारे में जाना। हमें उम्मीद है कि आज का यह लेख आपके लिए जानकारी पूर्ण रहा होगा।

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