सर्दी पर कविता

Poem on Winter Season in Hindi: नमस्कार दोस्तों, यहां पर हमने कुछ सर्दी का मौसम पर कविताओं का संग्रह लेकर आये है। उम्मीद करते हैं आपको यह पसंद आएगा। इसे आगे शेयर जरूर करें और आपको यह कैसा लगा, हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

Poem on Winter Season in Hindi

सर्दी पर कविता – Poem on Winter Season in Hindi

ठंड पर कविता

किट किट दांत बजाने वाली,
आई सर्दी आई।

भाग गये सब पतले चादर,
निकली लाल रजाई।

दादा, दादी, नाना, नानी,
सब सर्दी से डरते।

धूप सेंकते, आग तापते,
फिर भी रोज ठिठुरते।

कोट पहन कर मोटे वाला,
पापा दफ्तर जाते।

पहने टोपा, बांधे मफ्लर,
सर्दी से घबराते।

मम्मी जी की हालत पतली,
उल्टी चक्की चलती।

हाथ पैर सब ठन्डे ठन्डे,
मुँह से भाप निकलती।

लेकिन हमसब छोटे बच्चे,
कभी नहीं घबराते।

मस्ती करते हैं सर्दी में,
दिन भर मौज मनाते।

Poem on Winter in Hindi

ठंडी ठंडी चली हवा,
लगे बर्फ की डली हवा,
चुभती है तीरों जैसी,
कल की वो मखमली हवा,
बाहर मत आना भैया,
लिए खड़ी दोनाली हवा,

दादी कहती मफलर लो,
चल रही मुंह -जली हवा,
स्वेटर, कम्बल , कोट मिले,
नहीं किसी से टली हवा,
गर्मी में सब को भाये,
अब सर्दी में खली हवा।

सर्दी के रंग (Winter Poem in Hindi)

सर्दी लगी रंग जमाने
दांत लगे किटकिटाने
नई-नई स्वेटरों को
लोग गए बाजार से लाने।

बच्चे लगे कंपकंपाने
ठंडी से खुद को बचाने
ढूंढकर लकड़ी लाए
बैठे सब आग जलाने।

दिन लगा अब जल्दी जाने,
रात लगी अब पैर फैलाने
सुबह-शाम को कोहरा छाए
हाथ-पैर सब लगे ठंडाने।

सांसें लगीं धुआं उड़ाने
धूप लगी अब सबको भाने
गर्म-गर्म चाय को पीकर
सभी लगे स्वयं को गरमाने।

Winter Season Poem in Hindi

गर्मी भागी सर्दी आई
घर घर में निकली रज़ाई
लस्सी रोए जार बेज़ार
शरबत रोए बारंबार

कीट कीट कीट कीट दाँत बजाते
गिट पिट गिट पिट तोते बोलतें
पंखा कूलर छुप गये भाई
एसी ने अपनी दूम दबाई

चाय बजाने लगी शहनाई
कौफी ने उत्सव मनाई
उनी स्वेटर उनी मॅफ्लर
उनी शॉल उनी कंबल

सबने मिलके गुहार लगाई
जल्दी बाहर निकालो भाई
सूट बूट में सूरज चमका
जन जन में खुशियाँ दमका।

सर्दी की ऋतु आयी (Hindi Poem On Winter Season)

ठिठुर रहे बच्चे बूढ़े सब,
सर्दी की ऋतु आई।

तन पर बोझ बढ़ा कपड़ों का,
कैसी आफ़त आई।

रूई समान घने कुहरों से,
टप-टप टपके बूँदें।

पेड़ों पर दूबके पक्षीगण,
पल-पल आँखें मूंदे।

सूरज आँख मिचौली खेले,
व्यथित हुए जन सारे।

बड़ी-बड़ी रातें, दिन छोटे,
गायब चाँद-सितारे।

ठंढ की चुभन (Winter Season Hindi Poem)

सफेद चादर में लिपटी कोहरे की धुंध
ले आई ठंड की कैसी चुभन,

कोहराम करती वो सर्द हवाएं
छोड़ जाती बर्फ से ठंडी सिहरने,

कोहरे का साया भी ऐसा गहराया
सूरज की लाली भी ना बच पाया,

अंधेरा घना जब धुंधलालाया
रात के सन्नाटों ने ओस बरसाया,

कैसी कहर ये ठंड की पड़ी
जहां देखो दुबकी पड़ी है जिंदगी,

अमीरों के अफसानों के ठाठ हजार
गरीबी कम्बलों से निहारती दांत कटकटाती,

ठिठुरती कपकपाती सर्द रातों में
आग की दरस की प्यासी निगाहें,

याद आती है अंगूठी के इर्द-गिर्द
चाय की चुस्कियां लेती हो मजलिसे,

तन को बेचैन करती कोहरे ओढ़ें
आती सुबह शुष्क हवाओं संग,

कैसी कहर ये ठंड की पड़ी
जहां देखो दुबकी पड़ी है जिंदगी।

Sardi Ki Ritu Par Kavita

सर्दी फिर से लौट आई है
मौसम कितना सरमाई है
मंज़र मंज़र बर्फानी है
गर्मी ने छुट्टी पाई है
थर थर सारे काँप रहे है
जैसे अन्दर से घबराई है
बिस्तर से है नौ दो ग्यारह
गर्मी कैसी हरजाई है
छत पर बर्फ जमी है जैसे
नम आलूदा अंगनाई है
मफलर स्वेटर दस्तानो की
शाम ही से मुंह दिखलाई है
पंखे कूलर बंद पड़े है
ए सी ने फुरसत पाई है
लस्सी शरबत गुम सुम गुम सुम
चाय की फिर बन आई है
एक बस्ता दीवार व दर है
ठंडक फर्श पे उग आई है
रात होते ही घर लौट आओ
हैदर इस में दानाई है

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