बचपन पर कविता

Hindi Poems on Bachpan: नमस्कार दोस्तों, हमारे जीवन में कुछ चीजे ऐसी होती है जिसे हम पूरे जीवन में कभी नहीं भूल पाते हैं। बचपन! चाहे वो मेरा हो या आपका सबको याद तो जरूर आता ही है। हर किसी के मन में यही बात आती है कि काश! हम अपने बचपन को एक बार फिर से जी सके और वहीं आनंद और शरारते एक बार फिर से कर पाएं। ऐसा वापस होना संभव तो नहीं हैं लेकिन हम अपने बचपन को छोटे बच्चों को खेलते हुए देखकर याद जरूर कर सकते हैं।

Hindi Poems on Bachpan

आज हमने यहां पर बचपन की यादों को ताजा करने वाली और दिल को छू जाने वाली बचपन पर कविताएं (Bachpan Par Hindi Kavita) शेयर की है। इन्हें पढ़कर आपको जरूर अपने बचपन के वो पल याद आ जायेंगे जो अपके लिए खास रहे हैं। आप इन कविताओं को जरूर पढ़े।

बचपन पर कविता | Hindi Poems on Bachpan

वो बचपन की बस्ती (Bachpan Par Kavita)

Hindi Poems on Childhood

वो बचपन की बस्ती, मासूमियत भरी मस्ती!!
जब खुशियाँ थी सस्ती, अपनो का प्यार
अनोखा सा वो संसार, सपनों की बहती थी जहाँ कश्ती
अपनी खुशबू से अनजान, कस्तूरी-हिरण सी वो हस्ती
वो बचपन की बस्ती, मासूमियत भरी मस्ती!!

आँखों में चमक, अंदाज में धमक
खिलखिलाहट से गुंज उठती थी खनक
बातों में होती थी चहक, अपनेपन की खास महक
वो बचपन की बस्ती, मासूमियत भरी मस्ती!!

सवालों के ढेर, खेलने के फेर
किसी से नहीं होता था कोई बैर
शिकवे-शिकायतों की आती ना थी भाषा
ना था अपने-पराए का भेद जरा सा
वो बचपन की बस्ती, मासूमियत भरी मस्ती!!

छोटी-छोटी चीजों में खुशियाँ थी बड़ी-बड़ी
हर काम में मिलती थी शाबाशियाँ घड़ी-घड़ी
ना था कोई परेशानीयों का मेला;
ना जिम्मेदारियों का था झमेला
वो बचपन की बस्ती, मासूमियत भरी मस्ती!!

लगाई जाती थी जब तरकीबें नई-नई
कारस्तानियों की लग जाती थी झरी
भोली सी शैतानियाँ, अल्हड़ सी नादानियाँ
दादी-नानी से सुनी जाती थी कहानियाँ
सच लगती थी जिनकी सारी जुबानियाँ
वो बचपन की बस्ती, मासूमियत भरी मस्ती!!

कुदरती वो खूबसूरती ढूंढते है आज खुद में सभी
वक्त के बदलते करवटों के साथ बदलता गया एहसास
पर आज भी है वो बचपन बड़ा खास, दिल के पास
वो बचपन की बस्ती, मासूमियत भरी मस्ती!!

बचपन की यादें (Bachpan Par Kavita)

कैसा सूनापन था उस दिन
घर के हर इक कोने में
नानी तू जिस दिन थी लेटी
पतले एक बिछौने में

फूलों-सा नाज़ुक दिल मेरा
सबसे पूछा करता था
कहाँ गया, मेरा वो साथी
जो सुख से झोली भरता था

कैसे तू अपने हाथों से
हर पल मुझे खिलाती थी
माथे की सलवटों में तेरी
बिंदिया तक मुस्काती थी

तू प्यार से मिलती, गले लगाती
जाने क्यूँ रोया करती थी?
तेरे गालों के गड्ढों से मैं
लिपट के सोया करती थी

पर मन मेरा था अनजाना-सा
कुछ भी नहीं समझता था
तुझसे जुदा होने का तब
मतलब तक नहीं अखरता था

अब आँगन की मिट्टी खोदूँ
तेरी रूहें तकती हूँ
संग तेरे जो चली गईं
खुशियाँ तलाश वो करती हूँ

आँसू बनकर गिरती यादें
बस इक पल को तू दिख जाए
पर दुनिया कहती है, मुझसे ये
जो चला गया, फिर न आए

बचपन, यौवन, वृद्धपन.. (Bachpan Kavita in Hindi)

Bachpan Poem in Hindi

बचपन!
तुम औत्सुक्य की अविराम यात्रा हो,
पहचानते हो, ढूढ़ते हो रंग-बिरंगापन
क्योंकि सब कुछ नया लगता है तुम्हें।

यौवन!
तुम प्रयोग की शरण-स्थली हो,
आजमाते हो, ढूँढ़ते हो नयापन
क्योंकि सबमें नया स्वाद मिलता है तुम्हें।

वृद्ध-पन!
तुम चाह से पगे परिपक्व आश्रय हो,
तुम भी उत्कंठित होते हो, ललचाते हो
उन्हीं रंगबिरंगी चीजों में अनुभव आजमाते हो।

बचपन का घर (Poem on Bachpan in Hindi)

Poem On Childhood in Hindi

जब बचपन के घर से,
माता-पिता के घर से, बाहर चला था,
तब खयाल नहीं आया,
कि यह यात्रा एक और घर के लिए है,
जो निलर्ज्जता के साथ छीन लेगा,
मुझसे मेरे बचपन का घर।

यूँ दे जाएगा एक टीस,
जिसे लाखों लोग महसूस करते हैं,
क्योंकि दुनियादारी होते हुए,
रोज़ छूट रहे हैं,
लाखों लोगों के,
लाखों बचपन के घर।

कितना अजीब है,
जो हम खो देते हैं उमर् की ढलान पर,
वह फिर कभी नहीं लौटता,
जैसे देह से प्राण निकल जाने के बाद फिर कुछ नहीं हो पाता,
ठीक वैसे ही गुम जाता है बचपन का घर।

माता-पिता, भाई-बहन,
प्यार, झगड़ा, जि़द, दुलार, सुख
सब चले जाते हैं,
किसी ऐसे देश में,
जहां नहीं जाया जा सकता है,
जीवन की हर संभव कोशिश के बाद भी,
वहां कोई नहीं पहुंच सकता।

ना तो चीज़ों को काटा-छांटा जा सकता है
और ना गुमी चीज़ों को जोड़ा जा सकता है,
पूरा दम लगाकर भी,
फिर से नहीं बन सकता है, बचपन का घर।

हम सब,
माता-पिता, भाई-बहन,
आज भी कई बार इकट्ठा होते हैं,
बचपन के घर में,
पर तब वह घर एक नया घर होता है,
वह बचपन का घर नहीं हो पाता है।

बचपन पर हिंदी कविता (Bachpan Poem in Hindi)

Poem on Bachpan in Hindi

वो बचपन का दौर जो बीता
जिंदगी का सबसे पल था वो मीठा
कितनी प्यारी लगती थीं दादी और नानी
जो हमको सुनाती थीं किस्से और कहानी
छोटी सी खुशीयों में हँसना रो देना चोट जो लगी
घरवाले भी हमसे करते थे दिल्लगी
कहते मीठा फिर खिलाते जो तीखा
वो बचपन का दौर जो बीता
जिंदगी का सबसे पल था वो मीठा
कभी बनना था डॉक्टर कभी बनना था शायर
पल हर पल बदलते थे सपने
कोई थे भैया, कोई थे चाचा
हर कोई जैसे हों अपने
छोटी सी मुश्किल में चेहरा होता जो फीका
वो बचपन का दौर जो बीता
जिंदगी का सबसे पल था वो मीठा
पापा से डरना पर माँ से जो लड़ना
करके गुस्ताखी फिर उलझन में पड़ना
ना कोई गम था ना कोई डर था
बस खेल-खिलौनों का फिक़र था
बचपन का हर पल होता है अनूठा
वो बचपन का दौर जो बीता
जिंदगी का सबसे पल था वो मीठा

बचपन (Bachpan Poem)

Hindi Kavita on Bachpan

मैं डरता हूँ
अपना बचपना खोने से
सहेज कर रखा है उसे
दिल की गहराईयों में

जब भी कभी व्यवस्था
भर देती है आक्रोश मुझमें
जब भी कभी सच्चाई
कड़वी लगती है मुझे
जब भी कभी नहीं उबर पाता
अपने अंतर्द्वंद्वों से
जब भी कभी घेर लेती है उदासी
तो फिर लौट आता हूँ
अपने बचपन की तरफ

और पाता हूँ एक मासूम
एवं निश्छल-सा चेहरा
सरे दुख-दर्दों से परे
अपनी ही धुन में सपने बुनता।

बचपन में (Mera Bachpan Poem in Hindi)

Best Hindi Poem on Bachpan

समुंदर बचपन में बादल था
किताब बचपन में अक्षर
माँ की गोद जितनी ही थी धरती बचपन में

हर पकवान बचपन में दूध था
पेड़ बचपन में बीज
चुम्मियां भर थी प्रार्थनाएं बचपन में

सारे रिश्तेदार बचपन में खिलौने थे
हर वाद्य बचपन में झुनझुना
हंसी की चहचहाहट भर थे गीत बचपन में

ईश्वर बचपन में माँ था
हर एक चीज़ को
मुंह में डालने की जिज्ञासा भर था विज्ञान बचपन में
और हर नृत्य बचपन में
तेरी उछल-कूद से ज्यादा कुछ नहीं था।

बचपन का गाँव (Hindi Poems on Bachpan)

बचपन पर कविता हिंदी में

मेरे सपनों में बसा है
अपने बचपन का गाँव
जहाँ सूरज उठता था
कुँए की मुंडेर से
और सो जाता था
मुँह छिपाकर अरहर के खेतों में
जहाँ दुपहर की छाँह
अलसाई सी
दुबकी रहती थी
नीम तले
जहाँ बारिश में
भींगते थे
गाते थे गीत
मेढकों को मारकर
माँफी माँगते थे बादलों से
‘कान दर्द करे धोबी का
हमारा ना करे
जहाँ बैलों के कंधे पर बैठे
कौओं को उड़ाते थे
ढेले मार-मारकर
कुए में झाँककर
पुकारते थे कोई नाम
और सुनते हे प्रतिध्वनि
कान लगाकर
जहाँ आम के टिकोरे
कुछ कलछौर फालसे
पत्तियों में छिपे करौंदे
हमारी राल टपकाते थे
चोरी को उकसाते थे।

बचपन की यादें कविता

एक बचपन का जमाना था,
जिस में खुशियों का खजाना था।

चाहत चाँद को पाने की थी,
पर दिल तितली का दिवाना था।

खबर ना थी कुछ सुबहा की,
ना शाम का ठिकाना था।

थक कर आना स्कूल से,
पर खेलने भी जाना था।

माँ की कहानी थी,
परीयों का फसाना था।

बारीश में कागज की नाव थी,
हर मौसम सुहाना था।

हर खेल में साथी थे,
हर रिश्ता निभाना था।

गम की जुबान ना होती थी,
ना जख्मों का पैमाना था।

रोने की वजह ना थी,
ना हँसने का बहाना था।

क्युँ हो गऐे हम इतने बडे,
इससे अच्छा तो वो बचपन का जमाना था।

बचपन से पहले

बचपन से पहले
जवानी बीतगे
अब ना पूछ हमसे
दिन कटे है कैसे

पर्दा से छानल अँजोर में
परछाईं के छन्ना में

ओकर याद जियावत।

-राज रामदास

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इनका नाम राहुल सिंह तंवर है, इन्होंने स्नातक (रसायन, भौतिक, गणित) की पढ़ाई की है और आगे की भी जारी है। इनकी रूचि नई चीजों के बारे में लिखना और उन्हें आप तक पहुँचाने में अधिक है। इनको 3 वर्ष से भी अधिक SEO का अनुभव होने के साथ ही 3.5 वर्ष का कंटेंट राइटिंग का अनुभव है। इनके द्वारा लिखा गया कंटेंट आपको कैसा लगा, कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। आप इनसे नीचे दिए सोशल मीडिया हैंडल पर जुड़ सकते हैं।

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