सूरज पर कविता

Poem on Sun in Hindi: नमस्कार दोस्तों, सूर्य सौरमंडल का सबसे बड़ा तारा है। जिसकी रोशनी पृथ्वी पर पड़ने के कारण ही पृथ्वी पर जीवन संभव हो पाया है। अर्थात् पृथ्वी पर जीवन सूर्य की रोशनी के कारण ही है।

Poem on Sun in Hindi

यहां पर हमने सूर्य पर कविताएं (Suraj Par Kavita) शेयर की है। उम्मीद करते हैं आपको यह पसंद आयेंगी।

सूरज पर कविता – Poem on Sun in Hindi

Sun Poem in Hindi

आज मैंने सूर्य से बस ज़रा सा यूँ कहा
“आपके साम्राज्य में इतना अँधेरा क्यूँ रहा?”
तमतमा कर वह दहाड़ा-“मैं अकेला क्या करूँ?
तुम निकम्मों के लिए मैं ही भला कब तक मरूँ?
आकाश की आराधना के चक्करों में मत पड़ो
संग्राम यह घनघोर है, कुछ मैं लड़ूँ कुछ तुम लड़ो।”

सूर्य का स्वागत

आँगन में काई है,
दीवारें चिकनीं हैं, काली हैं,
धूप से चढ़ा नहीं जाता है,
ओ भाई सूरज! मैं क्या करूँ?
मेरा नसीबा ही ऐसा है!

खुली हुई खिड़की देखकर
तुम तो चले आए,
पर मैं अँधेरे का आदी,
अकर्मण्य…निराश…
तुम्हारे आने का खो चुका था विश्वास।

पर तुम आए हो–स्वागत है!
स्वागत!…घर की इन काली दीवारों पर!
और कहाँ?
हाँ, मेरे बच्चे ने
खेल खेल में ही यहाँ काई खुरच दी थी
आओ–यहाँ बैठो,
और मुझे मेरे अभद्र सत्कार के लिए क्षमा करो।
देखो! मेरा बच्चा
तुम्हारा स्वागत करना सीख रहा है।

तुम कभी थे सूर्य

तुम कभी थे सूर्य लेकिन अब दियों तक आ गये।
थे कभी मुख्पृष्ठ पर अब हाशियों तक आ गये।।

यवनिका बदली कि सारा दृष्य बदला मंच का।
थे कभी दुल्हा स्वयं बारातियों तक आ गये।।

वक्त का पहिया किसे कुचले कहाँ कब क्या पता।
थे कभी रथवान अब बैसाखियों तक आ गये।।

देख ली सत्ता किसी वारांगना से कम नहीं।
जो कि अध्यादेश थे खुद अर्जियों तक आ गये।।

देश के संदर्भ में तुम बोल लेते खूब हो।
बात ध्वज की थी चलाई कुर्सियों तक आ गये।।

प्रेम के आख्यान में तुम आत्मा से थे चले।
घूम फिर कर देह की गोलाईयों तक आ गये।।

कुछ बिके आलोचकों की मानकर ही गीत को।
तुम ॠचाएं मानते थे गालियों तक आ गये।।

सभ्यता के पंथ पर यह आदमी की यात्रा।
देवताओं से शुरू की वहशियों तक आ गये।।

सूर्य की अंधी आँख खुली है

देखने को बहुत कुछ दिख रही है
न देखने खाली आँख खुली है
और कुछ नहीं दिख रहा
देखकर देखना गायब है
सूर्य की अंधी आँख खुली है
न देश दिखता है
न विदेश
न पहाड़ जैसा क्लेश
न चीरता आरा
न पेट भरने को चारा।

*****

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