शिक्षाप्रद और ज्ञानवर्धक प्रेरक प्रसंग

Prerak Prasang in Hindi: कई बार छोटी-छोटी घटनाएं हमें ऐसी सीख से जाती है जो कोई नहीं दे पाता। इस पोस्ट में हम शिक्षाप्रद प्रेरक प्रसंग शेयर कर रहे है जो हमें अपने जीवन में एक नई ऊर्जा का संचार करेगी। हम उम्मीद करते हैं कि आपको यह ज्ञानवर्धक प्रेरक प्रसंग पसंद आयेंगे।

Prerak Prasang in Hindi
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शिक्षाप्रद और ज्ञानवर्धक प्रेरक प्रसंग – Prerak Prasang in Hindi

प्रेरक प्रसंग-1. आजादी की कीमत

किशोर भगतसिंह कक्षा में बैठे विचारों में तल्लीन थे। इसी बीच कक्षा में इंस्पेक्टर ने प्रवेश किया। सभी विद्यार्थी उनके सम्मान में खड़े हो गए लेकिन भगतसिंह उसी विचार मुद्रा में अपने स्थान पर बैठे रहे। उन्हें देखकर इंस्पेक्टर ने पूछा- ‘बेटे! तुम किस विचार में खोए हुए थे?’

‘आजादी के बारे में, भगतसिंह ने कहा।

‘लेकिन बेटे, आजादी उतनी आसानी से नहीं मिल सकती-जितनी आसान तुम समझते हो, ‘ इंस्पेक्टर बोले।

आसान होता नहीं जनाब, बल्कि बनाया जाता है। मैं एक ना एक दिन देश को आजाद करवाकर ही दम लूंगा, ‘ भगतसिंह ने विश्वासपूर्वक उत्तर दिया।

‘शाबास बेटे! तुम धन्य हो। तुम्हें आजादी की कीमत मालूम है।’ यह कहकर इंस्पेक्टर आगे बढ़ गए।

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प्रेरक प्रसंग-2. ऐसे थे जाकिर हुसैन

घटना उन दिनों की है, जब जाकिर साहब विशेष अध्ययन हेतु जर्मनी में थे। वहां ऐसा रिवाज है कि किसी अजनबी व्यक्ति से दोस्ती करने के लिए अपना नाम बताकर हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़ा दिया जाता है।

उस दिन महाविद्यालय में वार्षिकोत्सव था। कार्यक्रम का समय हो चुका था, इसलिए वह जल्दी-जल्दी कदम बढ़ा रहे थे।

जैसे ही जाकिर साहब ने महाविद्यालय में प्रवेश किया, कॉलेज के एक प्राध्यापक महोदय ने भी प्रवेश किया। जल्दबाजी और अनजाने में जाकिर हुसैन और प्राध्यापक महोदय एक-दूसरे से टकरा गए।

इस पर प्रोफेसर साहब ने गर्म होते हुए जाकिर साहब से कहा – गधा। ‘जाकिर हुसैन, ‘जाकिर साहब तपाक से बोल पड़े और अपना हाथ प्रोफेसर साहब के आगे बढ़ा दिया।

प्राध्यापक महोदय जाकिर हुसैन की इस हाजिर जवाबी से अत्यंत प्रभावित हुए और उन्होंने मुस्कराते हुए जाकिर हुसैन से हाथ मिला लिया। बाद में उनकी हाजिर जवाबी की उन्होंने मुक्त कंठ से प्रशंसा की।

प्रेरक प्रसंग-3. ऐसे थे राजेन्द्र बाबू

यह घटना भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से सम्बन्धित है। जितना सादा उनका जीवन था उतने ही वे सहृदय थे। एक बार विदेश यात्रा के दौरान उपहार में हाथी दांत की एक कलम-दवात उन्हें मिली। राजेन्द्रबाबू को शीघ्र ही कलम-दवात बहुत प्रिय हो गए। लिखते समय वे उसी कलम-दवात का अधिक प्रयोग करते थे।

जिस कमरे में उन्होंने कलम-दवात रखी थी उसकी सफाई का काम उनका प्रिय सेवक तुलसी करता था। तुलसी – राजेन्द्र बाबू की सेवा और उनका कार्य बड़ी तत्परता, अनुराग और मन लगाकर करता था। एक दिन मेज साफ करते समय कपड़े की फटकार से कलम-दवात नीचे गिर कर टूट गए। कलम-दवात तो टूटा ही उसकी स्याही से भारी कीमत का कालीन भी खराब हो गया।

राजेंद्र बाबू जब अपने कार्यालय में आए तो कलम दवात को टूटा हुआ देखकर समझ गए कि तुलसी से ही वह दवात टूटा होगा। उन्होंने अपनी नाराजगी प्रकट करते हुए सचिव से कहा, ऐसे आदमी को तुरन्त बदल दो। सचिव ने आदेश के अनुसार तत्काल तुलसी को वहां से हटा दिया तथा राष्ट्रपति भवन में दूसरा काम दे दिया।

उस दिन राजेन्द्र बाबू काम तो करते रहे, आने जाने वाले अतिथियों से भी मिलते रहे, किन्तु उनके मन में खलबली मची रही कि आखिर एक मामूली-सी गलती के लिए उन्होंने तुलसी को इतना बड़ा दण्ड क्यों दिया।

उनको बार-बार लग रहा था कि इस तरह की घटना तो कितनी भी सावधानी बरतने पर हो सकती है।

शाम को राजेन्द्र बाबू को जब फुर्सत मिली तो उन्होंने अपने सचिव से कहा कि तुलसी को बुलाओ।

तुलसी को बुलाया गया। उसे डर लगा कि कहीं कोई और विपदा तो नहीं आने वाली। बेचारा सकपकाया-सा आकर खड़ा हो गया। उसके हाथ-पांव कांप रहे थे। उसके आते ही राजेंद्र बाबू कुर्सी से खड़े हो गए और बोले तुलसी मुझे माफ कर दो, बेचारे तुलसी की समझ में नहीं आया कि वह क्या जवाब दे? उसे तो जैसे पाला मार गया। उसके मुंह से कुछ न निकल सका।

वह असमंजस की स्थिति में राजेन्द्र बाबू के पैरों पर गिर पड़ा और रुंधे स्वर में बोला “बाबू! आप यह क्या कह रहे हैं? आप तो दयालु हैं, हमारे अन्नदाता हैं। आपके सहारे ही तो मैं यहां हूं।” डॉ. राजेन्द्र बाबू बोले कि पहले तुम अपनी पहली वाली ड्यूटी पर आओ तब मुझे संतोष होगा।

यह सुनते ही तुलसी की आंखों से अश्रुधारा बहने लगी। उसने राजेंद्र बाबू के चरण पकड़ लिए। तुलसी फिर से वहीं काम करने लगा। राष्ट्रपति भवन के सभी कर्मचारियों पर इस घटना से काफी प्रभाव पड़ा।

प्रेरक प्रसंग-4. गुरु की महानता

प्रसंग उस समय का है, जब एक गुरु तथा शिष्य कहीं तीर्थाटन को जा रहे थे। चलते-चलते संध्या हो गई तब रात्रि विश्राम के लिए दोनों एक वृक्ष के नीचे रुक गए। गुरुजी रात्रि में मात्र तीन-चार घंटे नींद लेते थे। ज्योंही उनकी नींद पूरी हुई, वे दैनिककार्यों से निवृत्त होकर पूजा-पाठ में लग गए। इसी बीच उन्होंने एक विषधर सर्प को अपने शिष्य की ओर जाते देखा।

शिष्य गहरी नींद में था। गुरु पशु-पक्षियों की भाषा समझते थे। गुरुजी ने सर्प से प्रश्न किया- ‘सोए हुए शिष्य की ओर जाने का उसका क्या प्रयोजन है? ‘सर्प रुक गया और बोला, ‘महात्मन्! आपके शिष्य से मुझे बदला लेना है। पूर्व जन्म में इसने मेरी हत्या कर दी थी। अकाल मृत्यु होने से मुझे यह सर्प योनि मिली है, अतः मैं आपके शिष्य को डसना चाहता हूं।’

एक क्षण विचार कर गुरुजी ने कहा, ‘भाई! मेरा शिष्य बहुत ही सदाचारी एवं होनहार है। वह एक अच्छा साधक है। उसे काट लेने पर भी तुम्हें मुक्ति नहीं मिलेगी। अब तुम उसे यमलोक पहुंचा कर, क्यों संसार को उसके ज्ञान एवं प्रतिभा से वंचित कर रहे हो?’

गुरुजी के समझाने पर भी सर्प ने अपना निश्चय नहीं बदला। तब गुरुजी ने एक प्रस्ताव सर्प के सामने रखा और कहा- ‘देखो भाई! मेरे शिष्य की साधना अभी पूरी नहीं हुई है। अभी वह अपनी साधना में अपरिपक्व है। उसे अभी इस क्षेत्र में बहुत कुछ करना है। इसके विपरीत मुझे अब कुछ करना नहीं है। मेरा जीवन भी अब अधिक नहीं है। मेरे नाश से कुछ फर्क नहीं पड़ेगा। इसलिए हे सर्पराज! आपसे प्रार्थना है कि आप मेरे शिष्य के स्थान पर मुझे डस लो। इसके लिए मैं सहर्ष तैयार हूं’

कहते हैं गुरुजी के इस प्रकार के परोपकारी वचन सुनकर सर्प का हृदय परिवर्तन हो गया और उसने शिष्य को काटने का विचार छोड़ दिया और गुरुदेव को प्रणाम कर वहां से चला गया।

प्रेरक प्रसंग-5. डॉ. राजेन्द्र बाबू और अंग्रेज

एक बार डॉ. राजेन्द्र प्रसाद नौका में बैठकर अपने गांव जा रहे थे, उनके पास ही एक अंग्रेज अधिकारी बैठा हुआ था, जो सिगरेट पी रहा था। काफी देर तक राजेन्द्र बाबू सिगरेट के धुएं की गंध सहते रहे। थोड़ी देर बाद वे अंग्रेज अधिकारी से बोले- ‘ये सिगरेट जो आप पी रहे हैं, क्या आपकी है?’अंग्रेज अधिकारी ने घूरते हुए कहा- ‘मेरी नहीं तो क्या तुम्हारी है?’

‘तो फिर यह धुआं भी आपका ही है, इसे आप अपने पास संभालकर रखो। इसे क्यों दूसरे पर फेंकते हो?’ डॉ. राजेन्द्र बाबू बोले।

राजेन्द्र बाबू का करारा जवाब सुनकर उस अंग्रेज अधिकारी को आखिर सिगरेट फेंकनी पड़ी और साथ ही लज्जित भी होना पड़ा।

प्रेरक प्रसंग-6. देश-प्रेम – Prerak Prasang in Hindi

स्वामी रामतीर्थ एक जहाज में अमरीका के लिए यात्रा कर रहे थे। उसी जहाज में लगभग डेढ़ सौ जापानी छात्र अमरीका में विशेष अध्ययन के लिए जा रहे थे। जापानी छात्रों में कई धनी और सभ्य घराने के युवक भी थे।

स्वामीजी ने उनसे पूछा, आप विद्या अध्ययन के लिए अमरीका जा रहे हैं। वहां धन की व्यवस्था क्या होगी?’ उन्होंने उत्तर दिया, ‘स्वामीजी। हम तो जहाज का किराया भी घर से लेकर नहीं चले हैं। जहाज में कार्य करके उसका किराया दे देंगे। अपने राष्ट्र का धन व्यर्थ विदेशों में क्यों खर्च करें?’

वे सारे छात्र जहाज में सफाई आदि और छोटे-बड़े कार्य करके जहाज के किराए के पैसे दे रहे थे। स्वामी रामतीर्थ उन छात्रों का देशप्रेम देखकर अत्यधिक प्रसन्न हुए। उन्होंने मन ही मन सोचा, काश विदेशों में पढ़ने वाले भारतीय छात्र भी अपने देश का इतना ध्यान रखते तो देश में धन का इतना अभाव न होता।

प्रेरक प्रसंग-7. बापू की उदारता

गांधीजी नेपाल से स्वदेश लौट रहे थे। वहां के सैकड़ों लोगों ने उन्हें विदाई में रजत और स्वर्ण आभूषण, मूल्यवान् घड़ियां और हीरे की अंगूठियां उपहार में दी। गांधीजी सोच रहे थे कि इन मूल्यवान् उपहारों का क्या किया जाए? बा ने कहा- “आपने हमारे तो सारे आभूषण ले लिए हैं। अब ये उपहार यहां के निवासियों ने श्रद्धा से हमें दिए हैं, पर आप नहीं चाहते कि ये आभूषण मेरे पुत्रों की शादी में काम आएं और उनकी बहुएं पहनें। फिर ये उपहार मुझे मिले हैं, इन पर आपका क्या अधिकार है?”

गांधीजी ने निर्विकार भाव से समझाया, “बा! क्या तुम इतना भी नहीं जानतीं यह हमारे जन सेवा के बदले मिले उपहार हैं। अत: इनका उपयोग जनहित के लिए ही किया जाना चाहिए। “सन् 1986 तथा 1901 में गांधीजी को जो उपहार मिले उन्हें सार्वजनिक उपयोग के उद्देश्य से बैंक में जमा करवा दिया गया। वह अपने को सदैव सार्वजनिक वस्तु का प्रहरी मानते थे।

प्रेरक प्रसंग-8. हिंदी प्रेम – Prerak Prasang in Hindi

सन् 1962 की घटना है। प्रत्येक भारतीय चीनी आक्रमण के कारण भयाक्रांत था। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का आकाशवाणी से राष्ट्र के नाम संदेश प्रसारित होना था, इसलिए प्रभारी अधिकारी मोहनसिंह सेंगर प्रधानमंत्री के आवास पर ध्वन्यांकन के लिए गए। विचारानुसार प्रधानमंत्री को पहले मूल अंग्रेजी में राष्ट्र को सम्बोधित करने के पश्चात् उसका हिन्दी अनुवाद पढ़ना था। सेंगर साहब को यह नहीं जंचा कि अंग्रेजी को अहमियत देकर उसे मूल पाठ के रूप में पढ़ा जाए और राष्ट्रभाषा हिन्दी को अनुवाद की भाषा बनाकर उसके साथ सौतेला व्यवहार किया जाए। नेहरूजी प्रधानमंत्री थे जबकि सेंगर साहब एक सरकारी अधिकारी। बोले- ‘सर! आपातकाल के इस समय में भारत का प्रधानमंत्री हिन्दी अनुवादक हो, यह ठीक नहीं लगता। ऐसे समय में आप यदि मूल हिन्दी में ही बोलें तो प्रभावी रहेगा।’

एक क्षण को नेहरूजी सेंगर साहब को देखते ही रह गए। कुछ सोचकर बोले- ‘हां, तुम ठीक कहते हो। मूल हिन्दी में संबोधित करना ज्यादा ठीक रहेगा।’ नेहरूजी का जवाब सुनकर सेंगरजी गदगद हो उठे।

स्वामी विवेकानंद प्रेरक प्रसंग

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