राणा पूंजा भील का इतिहास और जीवन परिचय

जब भी हल्दीघाटी के युद्ध की बात आती है तब राणा पूंजा भील को भी जरूर याद किया जाता है। क्योंकि हल्दीघाटी के युद्ध को जीतने में महाराणा प्रताप का साथ “राणा पूंजा भील” ने बखूबी निभाया था। इसलिए महाराणा प्रताप ने ही पूंजा भील को “राणा” की उपाधि दी थी, जिसके बाद वे “राणा पूंजा भील” कहलाए। आज के इस आर्टिकल में हम आपको राणा पूंजा भील का संपूर्ण इतिहास बताएंगे।

History of Rana Punja Bhil in Hindi

राणा पूंजा भील का इतिहास और जीवन परिचय

राणा पूंजा भील कौन थे?

राणा पूंजा भील का जन्म 16वीं शताब्दी के दौरान राजस्थान के “मीरपुर” स्थान पर हुआ था। राणा पूंजा भील के पिता का नाम दुदा जी सोलंकी तथा माता का नाम केहरी बाई है। कहते हैं कि बहुत ही कम उम्र में राणा पूंजा भील को गांव का मुखिया बना दिया था, क्योंकि वह बचपन से ही बहादुर व पराक्रमी थे।

राणा पूंजा भील को जब कम उम्र की आयु में गांव का मुखिया बना दिया गया तब उन्होंने अपनी कुशलता से गांव का ऐसा विकास किया कि बहुत ही जल्द उन्हें “भोमट” का राजा बना दिया गया। राजा बनाने के बाद राणा पूंजा भील अरावली की संपूर्ण पहाड़ियों में राज करने लगे।

अरावली की पहाड़ियों में राज करने वाले राणा पूंजा भील तथा उनकी संपूर्ण भील सेना कितनी ताकतवर और छापामार युद्ध प्रणाली में निपुण थी कि उनसे मदद मांगने के लिए कई बार मुगल भी आए थे। लेकिन उन्होंने अपनी मातृभूमि के लिए मुगलों की सभी शर्तों को ठुकरा कर महाराणा प्रताप का साथ चुना और अंतिम क्षण तक वे मेवाड़ के सहयोगी रहे।

राणा पूंजा भील का शासनकाल

राणा पूंजा भील “भोमट” क्षेत्र के राजा थे, जो अरावली पर्वतों के जंगलों में निवास किया करते थे। इनका सामना कोई नहीं कर सकता था क्योंकि यह छापामार युद्ध प्रणाली में निपुण थे। इस युद्ध प्रणाली से महाराणा प्रताप का साथ देकर राणा पूंजा भील ने मुगलों की सेना के नाक में दम कर के रखा था।

बता दें कि राणा पूंजा भील की सेना इतनी खतरनाक थी कि उनके जंगली इलाकों में कोई दुश्मन पैर नहीं रख सकता था। अरावली पर्वतओं के जंगलों में अनेक सारे भील क्रांतिकारी पैदा हुए, जो आगे चलकर मेवाड़ के रक्षक बने तथा इतिहास में अपना नाम अमर कर गए।

बता दें कि महाराणा प्रताप ने इन्हीं भीलों के साथ इन्हीं अरावली पर्वतों के जंगलों में निवास किया तथा घास की रोटी खाकर जीवन यापन किया था। परंतु अपने अंतिम क्षण तक मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं की और धीरे-धीरे फिर से संपूर्ण मेवाड़ अपने अधीन कर लिया। इन सब में राणा पूंजा भील तथा संपूर्ण भील समुदाय (जो वहां पर निवास करते थे) का बहुत बड़ा योगदान रहा।

जिस राणा पूंजा भील को मेवाड़ की स्वतंत्रता दिलाने के लिए जाना चाहता है, उसके जीवन परिचय के बारे में भी जानना अत्यंत आवश्यक है। राणा पूंजा भील को लेकर अनेक प्रकार की भ्रांतियां भी फैली हुई है। जैसे राणा पूंजा भील थे या राजपूत। तो इस आर्टिकल में हम आपको उनका जीवन परिचय और उनके इतिहास से संबंधित सभी जानकारी विस्तार से बताते हैं।

महाराणा प्रताप और मेवाड़

मेवाड़ के तत्कालीन राणा उदयसिंह की मृत्यु के पश्चात महाराणा प्रताप के भाई शक्ति सिंह मेवाड़ की गद्दी पर बैठ गए थे। परंतु यह मेवाड़ को मंजूर नहीं था।‌ कुछ ही समय बाद सभी सरदारों और सेनापतियों के साथ महाराणा प्रताप ने मेवाड़ की तरफ आगाज किया, जिससे घबराकर शक्ति सिंह मेवाड़ छोड़कर भाग गए तथा मुगलों से संधि कर ली। उसके बाद महाराणा प्रताप का राजतिलक हुआ।

महाराणा प्रताप ने मेवाड़ की राज गद्दी संभालते ही अकबर की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया। उसके बाद अकबर संपूर्ण मेवाड़ के आसपास के सभी राजाओं-महाराजाओं को अपने अधीन कर दिया, जिससे महाराणा प्रताप अकेले पड़ गए। फिर भी महाराणा प्रताप ने अकबर की स्वाधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया तथा स्वतंत्र ही अपनी मातृभूमि की रक्षा करने का फैसला किया।

अकबर द्वारा भेजे गए संधी प्रस्ताव को महाराणा प्रताप ने बार-बार ठुकराया। फिर भी अकबर ने एक से बढ़कर एक संधि प्रस्ताव महाराणा प्रताप के लिए भेजे, जिनमें अकबर ने महाराणा प्रताप को केवल उनकी अधीनता स्वीकार करने के लिए कहा।

अकबर ने कहा है कि संपूर्ण मेवाड़ पर आप ही राज कीजिए। इतना ही नहीं मैं आपको पूरा राजस्थान दे दूंगा, आधा भारत दे दूंगा, लेकिन सर्त बस यह है कि नाम सिर्फ मेरा यह रहेगा, बाकी पूरा राज आप करेंगे। फिर भी महाराणा प्रताप ने यह स्वीकार नहीं किया और अपनी मातृभूमि को हमेशा स्वतंत्र रखने तथा‌ स्वाधीनता के साथ जीवित रहने के लिए अकबर कि किसी भी संधि को नहीं माना।

उसके बाद अकबर ने महाराणा प्रताप तथा मेवाड़ को अपने कब्जे में लेने के लिए अनेक सारे युद्ध किये, कई हिंदू राजाओं को भेजा परंतु यह सब महाराणा प्रताप को झुकाने में असफल रहे। हमेशा असफल होने के बाद अकबर ने एक विशाल सेना मेवाड़ की तरफ भेजी।‌

उस समय महाराणा प्रताप ने आसपास के सभी राजा-महाराजाओं से सहयोग मांगा। लेकिन उन्होंने सहयोग नहीं दिया। वे सभी अकबर की अधीनता स्वीकार कर चुके थे। महाराणा प्रताप ने अरावली की पहाड़ियों में राज करने वाले भील समुदाय तथा राणा पूंजा से समर्थन मांगा, जिस पर उन्होंने समर्थन दे दिया तथा महाराणा प्रताप के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने का वादा किया।

राणा पूंजा भील का हल्दीघाटी के युद्ध में योगदान

अकबर ने मेवाड़ और महाराणा प्रताप को अपने कब्जे में लेने के लिए दिल्ली से मुगलों की एक विशाल सेना भेजी, जिसका नेतृत्व आमेर के राजा मानसिंह प्रथम कर रहे थे। इधर महाप्रताप के पास कुल 3400 सैनिक थे। इसके अलावा राणा पूंजा भील सहित 400 भील सैनिक भी शामिल हो गए, जो छापामार युद्ध प्रणाली में माहिर थे।

हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून 1756 ईस्वी को हल्दीघाटी मैदान में लड़ा गया था। इस युद्ध में जहां एक तरफ मुगलों की सेना में अनेक सारे सेनापति हिंदू राजा तथा अनगिनत मुगलों की फौज थी। वहीं दूसरी तरफ महाराणा प्रताप के साथ राणा पूंजा, हकीम खान सूरी, रामदास राठौड़, ताराचंद जैसे प्रमुख सेनापति तथा मेवाड़ के लिए मर मिटने वाले योद्धाओं की एक फौज थी।

हल्दीघाटी के मैदान में मेवाड़ और मुगलों के बीच घमासान युद्ध हुआ। इस युद्ध में राजपूत योद्धाओं वह भील समुदाय के सैनिकों ने पूंजा भील के नेतृत्व में ऐसा पराक्रम दिखाया कि मुगलों की सेना में भगदड़ मच गई।

बता दें कि राणा पूंजा की सेना ने तीर की नोक पर “जहर” लगाकर तीर छोड़ते थे, जिससे मुगल सैनिकों के ढेर लगने शुरू हो गए। देखते ही देखते वीर सैनिकों के साथ महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी के युद्ध में विजय प्राप्त कर ली।

राणा पूंजा भील को राणा की उपाधि

मुगलों और मेवाड़ के बीच लड़े गए हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप का मेवाड़ की तरफ से साथ देने वाले पूंजा भील का योगदान अद्भुत था। महाराणा प्रताप, पूंजा भील तथा उनके साथियों से काफी खुश हुए। इसलिए उन्होंने पूंजा भील को राणा की उपाधि दे दी।

हल्दीघाटी का युद्ध समाप्त होने के बाद महाराणा प्रताप ने मेवाड़ के राज्य चिन्ह पर एक तरफ राजपूत सैनिक तो दूसरी तरफ भील सैनिक की आकृति चिन्हित करवाई थी। यह आज भी इस बात का प्रतीक है कि मेवाड़ के स्वतंत्र और स्वाधीनता के लिए जितना बलिदान और योगदान राजपूतों ने दिया, उतना ही भील समुदाय ने भी दिया था।

महाराणा प्रताप द्वारा पूंजा भील को राणा की उपाधि दिए जाने के बाद उनके वंशज तथा भील समुदाय राणा भील नाम से जाना जाने लगा। हल्दीघाटी के युद्ध तथा मेवाड़ का सहयोग करने वाले भील समुदाय को वर्तमान समय में राणा भील नाम से जाना जाता है, जो आज भी मेवाड़ के आसपास तथा अरावली की पहाड़ियों में निवास करते हैं।

राणा पूंजा भील थे या राजपूत?

वर्तमान समय में कुछ इतिहास के पन्नों में राणा पूंजा को भील बताया गया है। वहीं कुछ जगहों पर राणा पूंजा को राजपूत सरदार के तौर पर भी बताया गया है। इसलिए आज के समय में कुछ लोगों द्वारा भील तो कुछ लोगों द्वारा राणा पूंजा को राजपूत कहकर संबोधित किया जाता है।

परंतु ऐसा कहा जाता है कि राणा पूंजा राजपूत थे तथा उनके पिता का नाम भी दुदा जी सोलंकी था। सोलंकी गोत्र जोकि राजपूत समाज में आता है, इसलिए भी लोग राणा पूंजा को राजपूत कहते हैं। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि राणा पूंजा राजपूती थे, लेकिन महाराणा प्रताप ने उन्हें भील समुदाय का नेतृत्व करने के लिए भीलो का सेनापति बनाया था। इसीलिए लोग उन्हें भी भील कहने लग गए।

कुछ लोग यह भी कहते हैं कि राणा पूंजा भील ही थे, इसलिए वे शुरुआत से ही भीलों के बीच में रहते थे और अरावली की पहाड़ियों पर राज करते थे। इस तरह की लोगों की अलग-अलग धारणाएं हैं तथा इतिहास के पन्नों में भी कुछ स्पष्ट रूप से राणा पूंजा का जाति से लेकर इतिहास नहीं मिलता है।

वीर योद्धा राणा पूंजा भील हो या राजपूत यह बात तो इतिहास में हमें स्पष्ट रूप से नहीं मिल रही है। लेकिन इतना तो जरूर स्पष्ट है कि वह अत्यंत कुशल और शूरवीर थे, जिन्होंने अपनी कुशलता और बौद्धिकता से महाराणा प्रताप के साथ मिलकर मुगलों के छक्के छुड़ा दिए, जिसके बाद अकबर ने कभी भी मुड़ कर मेवाड़ की तरफ नहीं देखा‌।

निष्कर्ष

आज के इस आर्टिकल में हमने आपको “राणा पूंजा भील का इतिहास और जीवन परिचय” विस्तार से बताया है, जिसमें आपको राणा पूंजा भील के इतिहास तथा जीवन के बारे में जानने को मिला है।

उम्मीद करते हैं कि आपको यह आर्टिकल जरूर पसंद आया होगा। इस आर्टिकल से संबंधित यदि आपका कोई सवाल या सुझाव है तो कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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