केदारनाथ मंदिर का इतिहास और रोचक तथ्य

History of Kedarnath Temple in Hindi: नमस्कार दोस्तों, आज हम आप सभी लोगों के सामने प्रस्तुत हुए हैं, देवों के देव महादेव के प्रमुख स्थान केदारनाथ मंदिर का इतिहास लेकर। महादेव के सभी भक्तों केदारनाथ मंदिर से जुड़े सभी रहस्य को जानते होंगे और यदि आप महादेव के भक्त हैं, परंतु आपको केदारनाथ मंदिर के विषय में कोई विशेष जानकारी प्राप्त नहीं है तो आपके लिए हमारा यह लेख बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण है। क्योंकि इस लेख में आप सभी लोगों को महादेव के प्रमुख स्थान केदारनाथ मंदिर के विषय में सभी जानकारियां बताने वाले हैं।

Image: History of Kedarnath Temple in Hindi

केदारनाथ मंदिर में लगभग सभी भक्तों की जाने की इच्छा अवश्य होती है। वह अपने जीवन में ऐसी इच्छा तो अवश्य ही करते हैं कि वह काश एक बार केदारनाथ मंदिर जा पाते और महादेव के दर्शन कर पाते। आज हम आप सभी लोगों के सामने इसी मकसद से आए हैं ताकि आप लोगों को महादेव के प्रमुख स्थान केदारनाथ मंदिर जाने का समय एवं सफल यात्रा के साथ-साथ केदारनाथ मंदिर के इतिहास एवं कुछ तथ्यों के विषय में भी जानकारी प्राप्त हो सके, चलिए शुरू करते हैं।

केदारनाथ मंदिर का इतिहास और रोचक तथ्य | History of Kedarnath Temple in Hindi

केदारनाथ मंदिर का इतिहास

यदि बात करें केदारनाथ शब्द की, तो यह शब्द संस्कृत भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना हुआ है, केदारा और नाथ। केदारा का अर्थ होता है क्षेत्र, एवं नाथ का अर्थ होता है स्वामी। अतः केदारनाथ का शाब्दिक अर्थ होता है क्षेत्र के स्वामी। देवों के देव महादेव का यह मंदिर लगभग समुद्र तल से 3580 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

देवों के देव महादेव का यह मंदिर हिमालय के गोंद उत्तराखंड में बसा हुआ है। महादेव का केदारनाथ मंदिर ऋषिकेश से लगभग 220 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। केदारनाथ मंदिर गंगा की सहायक नदी मंदाकिनी के किनारे हिमालय की गोद में स्थित है।

केदारनाथ मंदिर को लेकर बहुत से कथा को लिखा जा चुका है अतः ऐसे में ही पांच केदार की लोक कथा के अनुसार वर्णित किया गया है कि जब पांडा कुरुक्षेत्र में अपने कौरव भाइयों को पराजित कर युद्ध में विजय प्राप्त कर लिए थे, तब युद्ध के दौरान ही यह अपने गोत्र भाइयों और ब्रह्म हत्या के अपराध से प्रायश्चित करना चाहते थे। इन पांच पांडवों ने अपनी ब्रह्महत्या और गोत्र भाई की हत्या के प्रायश्चित को पूरा करने के लिए अपने संपूर्ण साम्राज्य को अपने परिजनों को सौंपने के पश्चात वह पांचों भाई भगवान शिव की खोज में चले गए।

यह पांचों भाई भगवान शिव की खोज करते हुए सर्वप्रथम वाराणसी पहुंचे, परंतु महादेव इन पांचों भाइयों से बचना चाहते थे, क्योंकि भगवान शिव पांचों भाइयों के द्वारा युद्ध में की गई हत्या से काफी ज्यादा नाराज हैं। अतः पांडवों से बचने के लिए भगवान शिव ने बैल का रूप धारण कर लिया और गढ़वाल के क्षेत्रों में जाकर छुप गए। महादेव को पांचो पांडव मिलकर वाराणसी में ढूंढते रह गए परंतु वहां पर इनकी भेंट भगवान शिव से नहीं हुई।

भगवान शिव से भेंट ना होने के बाद भी इन्होंने अपनी इस प्रबल इच्छा को नहीं त्यागा और भगवान शिव को ढूंढते हुए हिमालय के गढ़वाल की ओर बढ़ गए। भगवान शिव जिस बैल का आधार रूप धारण किए थे उसी बैल को गुप्तकाशी में पांडवों के दूसरे भाई भीम ने नदी के किनारे चरते हुए देख लिया और भीम ने भगवान शिव के नदी में छिपे होने का एहसास भी किया।

तभी भीम के द्वारा नदी में छिपे हुए हैं, भगवान शिव को पकड़ लेते हैं और इसके बाद भगवान शिव अवतरित नदी के पृथ्वी से कहीं गायब हो जाते हैं। इसके बाद आगे चलकर पांडव के द्वारा महादेव के 5 अंगों को इन स्थल में महादेव के उपस्थिति के कारण अवतरित कर दिया गया और यहां पर इनका मंदिर बना दिया।

  1. केदारनाथ में कुंवर
  2. तुला नाथ में हाथ
  3. मध्यमहेश्वर महादेव में नाभि और पेट
  4. कल्पेश्वर महादेव में बाल
  5. रुद्रनाथ में चेहरा

केदारनाथ मंदिर का निर्माण कब और किसने किया?

केदारनाथ मंदिर स्वयं में अपनी एक प्रतिभा रखता है, केदारनाथ मंदिर की नीव लगभग हजारों साल पहले बनाया गया था। अब तक इस बात का कोई विशेष एवं सटीक उत्तर नहीं प्राप्त हुआ है, कि केदारनाथ मंदिर का स्थापना कब हुआ था और केदारनाथ मंदिर की स्थापना किसने की थी।

केदारनाथ मंदिर भारत के प्रसिद्ध महादेव के मंदिर में से एक है और यह सबसे प्रथम स्थान पर आता है। महादेव के सभी भक्तों केदारनाथ मंदिर प्रतिवर्ष अवश्य ही जाते हैं, क्योंकि इनका यह मानना है कि यहां पर महादेव से मांगी गई सभी मनोकामनाएं पूरी होती है।

केदारनाथ मंदिर में दर्शन करने का समय

केदारनाथ मंदिर आम दर्शनार्थियों के लिए सुबह के 6:00 बजे खुल जाता है और इसके बाद शाम के 7:30 से 8:30 तक भगवान शिव के पांच मुख वाली प्रतिमा का विभिन्न प्रकार से सिंगार करके प्रतिदिन आरती की जाती है। मंदिर में दोपहर के 3:00 से 5:00 तक एक विशेष पूजा की जाती है और 5:00 बजे के बाद से मंदिर को बंद कर दिया जाता है।

मंदिर में होने वाली शाम की आरती केवल वहां के महा पंडितों के द्वारा ही किया जाता है। सर्दियों के समय में केदारनाथ घाटी पूरी तरह से बर्फ से ढक जाती है, ऐसे समय में केदारनाथ मंदिर को खोलने एवं बंद करने के लिए कुछ विशेष मुहूर्त निकाला जाता है, परंतु 15 तारीख से पहले बंद हो जाता है और ठीक 6 महीने बाद 15 अप्रैल के बाद से शुरू कर दिया जाता है।

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केदारनाथ मंदिर के विषय में रोचक तथ्य

  • केदारनाथ मंदिर की स्थापना होने के बाद से हिमालय की चोटी का नाम केदारनाथ रख दिया।
  • भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से सबसे ऊंचा मंदिर केदारनाथ मंदिर ही है।
  • केदारनाथ मंदिर लगभग 50 फीट ऊंचा 187 फीट लंबा और 80 फीट चौड़ा है, जोकि अपने आप में एक विशेषता रखता है।
  • इसे केदारनाथ मंदिर में पहले हाल में ही पांचो पांडव भाई, भगवान श्री कृष्ण, शिव, नदी, एवं वीरभद्र के वाहन की प्रतिमा स्थित है।
  • इतना ही नहीं मंदिर के सामने एक छोटा स्तंभ भी है, जिस पर माता पार्वती और पांचो पांडव राजकुमारों के चित्र का वर्णन किया गया है।
  • यह केदारनाथ मंदिर तीन तरफ से ऊंचे-ऊंचे पर्वतों से घिरा हुआ है।
  • केदारनाथ मंदिर के एक तरफ केदारनाथ पर्वत जिसकी ऊंचाई लगभग 22000 फीट है, इसके दूसरी तरफ भरतकुंड है जिसकी ऊंचाई लगभग 22700 फीट है और इसके तीसरी तरफ खर्च कुंड पर्वत है जिसकी ऊंचाई लगभग 21600 फीट है।
  • जैसा कि हम सभी जानते हैं, वर्ष 2013 में केदारनाथ में बहुत ही भयंकर बाढ़ आई थी, जिसके कारण वहां पर गए सभी श्रद्धालुओं की मौत हो गई।
  • वर्ष 2013 के इस बार के दौरान मंदिर के आसपास के अन्य सभी क्षेत्रों को काफी ज्यादा क्षति हुई, परंतु मंदिर के संरचना में किसी भी प्रकार का कोई छती देखने को नहीं मिला। अतः इस घटना के बाद मंदिर को लगभग 1 वर्ष तक के लिए बंद कर दिया गया था।

केदारनाथ मंदिर की यात्रा कैसे करें?

जैसा कि हम सभी लोग जानते हैं, केदारनाथ मंदिर भारत के उत्तरी हिमालय में बैठा हुआ है, अतः वहां तक जाने के लिए हमें सबसे पहले कैंप गौरीकुंड पहुंचना होगा। आता इसके बाद गौरीकुंड से आपको पैदल या अन्य किसी साधन का उपयोग करके लगभग 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित केदारनाथ मंदिर जाना होगा।

आप चाहे तो गौरीकुंड से घोड़े बग्गी इत्यादि का उपयोग कर सकते हैं। आप केदारनाथ मंदिर जाने के लिए निम्नलिखित मार्गों का भी उपयोग कर सकते हैं:

  1. हवाई मार्ग: केदारनाथ मंदिर तक पहुंचने के लिए आप हवाई मार्ग का भी उपयोग कर सकते हैं, जिसके लिए आपको गौरीकुंड से नजदीक में ही 1 घरेलू एयरपोर्ट मिल जाएगा, जो कि देहरादून में स्थित जौली ग्रांट एयरपोर्ट है। आप यहां से हवाई जहाज का हेलीकॉप्टर लेकर केदारनाथ मंदिर तक पहुंच सकते हैं।
  2. सड़क मार्ग: गौरीकुंड से आपको लगभग 22 किलोमीटर दूरी तक पैदल ही जाना पड़ सकता है और यदि आप सड़क मार्ग का उपयोग करते हैं, तो आपको घोड़े या बग्गी मिल जाएंगे, जिस के उपयोग से आप केदारनाथ मंदिर तक आसानी से पहुंच सकते हैं। केदारनाथ मंदिर तक पहुंचने का सड़क मार्ग काफी कठिन एवं उबड़ खाबड़ है, जिसके कारण यहां पर गाड़ियां नहीं जाती।
  3. रेल मार्ग: केदारनाथ मंदिर तक पहुंचने का सबसे अच्छा साधन रेल मार्ग को ही माना जाता है, आप ऋषिकेश जंक्शन से केदारनाथ मंदिर तक रेल मार्ग से भी पहुंच सकते हैं। हालांकि आपको रेल से जाने के बाद भी लगभग 2 से 3 किलोमीटर पैदल ही तय करना होगा, जो कि ठंडी एवं बर्फ से घिरी हुई पहाड़ियों से होकर गुजरना होगा।

निष्कर्ष

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इनका नाम राहुल सिंह तंवर है, इन्होंने स्नातक (रसायन, भौतिक, गणित) की पढ़ाई की है और आगे की भी जारी है। इनकी रूचि नई चीजों के बारे में लिखना और उन्हें आप तक पहुँचाने में अधिक है। इनको 3 वर्ष से भी अधिक SEO का अनुभव होने के साथ ही 3.5 वर्ष का कंटेंट राइटिंग का अनुभव है। इनके द्वारा लिखा गया कंटेंट आपको कैसा लगा, कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। आप इनसे नीचे दिए सोशल मीडिया हैंडल पर जुड़ सकते हैं।

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