बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर निबंध

Essay on Beti Bachao Beti Padhao in Hindi: नमस्कार दोस्तों, यहां पर हमने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर निबंध लिखे हैं। यह निबंध अलग-अलग शब्द सीमा को देखते हुए लिखे गये है जिससे कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12 और इससे उच्च कक्षा के विद्यार्थियों को मदद मिलेगी।

Essay on Beti Bachao Beti Padhao in Hindi
Essay on Beti Bachao Beti Padhao in Hindi

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर निबंध – Essay on Beti Bachao Beti Padhao in Hindi

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर निबंध (150 शब्द)

जैसा कि हम जानते और समझते है कि भारत देश एक कृषि प्रधान देश होने के साथ-साथ पुरुष प्रधान देश भी है। शुरुआत से ही लड़कियों को दबाने की सोच ही विकसित हुई है, जो समय के साथ धीरे-धीरे कम भी हुई है। अब हर जगह महिलाओं को समान अधिकार दिये गए है। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ एक अभियान नहीं अपितु लोगों के दिल में बसी इस ओछी सोच को मिटाना भी है।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान की शुरुआत देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 22 जनवरी 2015 को पानीपत, हरियाणा में हुयी थी। इस अभियान की शुरुआत करने से पहले नरेंद्र मोदी ने कहा था कि बेटियों के जन्म होने पर उसे वैसे ही धूमधाम से मनाएँ जिस तरह बेटों के जन्मोत्सव को मनाया जाता है। इसके साथ ही जिनके घर बेटी पैदा होती है वो परिवार पाँच पेड़ लगाने का संकल्प लें। बेटों के बराबर बेटियों को अधिकार मिले इसलिए इस अभियान की शुरुआत हुई।

Beti Bachao Beti Padhao Essay in Hindi
Beti Bachao Beti Padhao Essay in Hindi

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर निबंध (300 शब्द)

प्रस्तावना

कहते है माँ जैसा कोई नहीं होता है, वो अपना निवाला त्याग कर अपने बच्चों को खिला देती है, और उसी माँ को इस देश में समान अधिकार नहीं मिलता है। यह भारत जैसे देश की सबसे बड़ी विडम्बना है। कहने का मतलब यह है कि जहाँ इस देश में देशवासी देश को माँ का दर्ज़ा देते है वही यहाँ के निवासी बेटियों को अधिकार देने में चूक जाते है।

देशवासियों को यह याद दिलाना पड़ता है कि बेटे और बेटी में फर्क नहीं करना होता है, दोनों को समान अधिकार और सम्मान के साथ जीने की आजादी है। इसी सोच को हटाने और कन्याओं का भविष्य बनाने के लिए बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान की शुरुआत हुई।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान क्या है?

देश में लगातार कन्या शिशु दर में गिरावट को संतुलित करने और उनका भविष्य सुरक्षित करने के लिए बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना की शुरुआत की गयी थी। स्त्री और पुरुष जीवन के दो पहलू है, दोनों को एक साथ चलना होगा तभी जीवन का मार्ग सरलतापूर्वक निकलेगा।

देश का प्रत्येक दंपति केवल लड़का पाने की इच्छा रखता है और इसी इच्छा के कारण देश में लिंगानुपात में भारी गिरावट आई। उसी गिरावट को एक सही दिशा में उछाल लाने के लिए ऐसी योजना या अभियान की शुरुआत करनी पड़ी, जो देश के लिए शर्मनाक बात है।

वैसे देखा जाएं तो भारत के अलावा पूरे विश्व में स्त्रियों के साथ भेदभाव किया जाता है, पुरुषों से अधिक काबिल स्त्रियों को समान काम में पुरुषों के मुक़ाबले कम वेतन दिया जाता है।

निष्कर्ष

आदिकाल से जो लड़कियों के ऊपर अत्याचार हुये उनके पीछे का कारण अशिक्षा थी। अगर हमारे पूर्वज पढ़े-लिखे होते तो आज हमारी स्थिति कई गुना सुधरी हुयी होती। जब बेटियाँ पढ़ेगी-लिखेगी तो वो अपने अधिकारों के लिए खड़ी होगी, इसी आशा के साथ बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान की शुरुआत नरेंद्र मोदी ने 22 जनवरी 2015 को पानीपत में की।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर निबंध (500 शब्द)

भूमिका

पृथ्वी पर हर जीव जन्तु का अस्तित्व नर और मादा दोनों के समान भागीदारी के बिना संभव नहीं है। मानव जाति के लिए पुरुष और महिला का योगदान होता है। किसी भी देश के विकास के लिए पुरुष और महिला का समान रूप से योगदान रहना जरूरी है अन्यथा देश का विकास रुक जाता है। मानव जाति का सबसे बड़ा दोष या अपराध कन्या भ्रूण हत्या है।

देश के अधिकतर रहवासी अल्ट्रासाउंड के माध्यम से बच्चा होने से पहले ही लिंग परीक्षण करवा देते है, अगर लड़की निकलती है तो उसे पैदा होने से पहले ही गर्भ में मरवा देते है। इन सब को रोकने के लिए ही देश के प्रधानमंत्री को बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का जागरूकता अभियान शुरू करना पड़ा।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान क्या है?

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ एक ऐसा जागरूकता वाला अभियान है, जिसका मुख्य उद्देश्य कन्या शिशु को बचाना और उनको शिक्षित करना है। इस अभियान का शुभारम्भ भारतीय सरकार के द्वारा 22 जनवरी 2015 को हरियाणा राज्य के पानीपत शहर में किया गया। इसके अंतर्गत कन्या शिशु के लिए जागरूकता का निर्माण करना और महिला कल्याण में सुधार लाना अभियान के प्रमुख बिन्दुओं में से एक है।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान की आवश्यकता क्यों पड़ी?

भारत में 2001 की जनगणना में 0-6 वर्ष के बच्चों का लिंगानुपात का आँकड़ा 1000 लड़कों के अनुपात में लड़कियों की संख्या 927 थी, जो कि 2010 कि जनगणना में घटकर 1000 लड़कों के अनुपात में 918 लड़कियाँ हो गई। सरकार के लिए यह एक गंभीर चिंता का विषय बन गया, इसलिए सरकार को बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना शुरू करने की आवश्यकता महसूस हुई।

यूनिसेफ़ (UNICEF) ने भारत को बाल लिंगानुपात में 195 देशों में से 41वां स्थान दिया, यानि की हमारा देश लिंगानुपात में 40 देशों से पीछे है। अपनी रैंक में सुधार करने और कन्या शिशु को बचाने के लिए सरकार द्वारा सख्ती से योजना का शुभारम्भ किया गया।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान का उद्देश्य

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ कार्यक्रम का उद्देश्य बेटियों के अस्तित्व को सुरक्षा प्रदान करना है और बेटियों के जन्म दर में बढ़ोतरी करना है। कन्या भ्रूण हत्या को रोकना है, इसलिए हर चिकित्सालय में बाहर कन्या भ्रूण हत्या कानूनन अपराध है यह वाक्य देखने को मिलता है। लड़कियों के प्रति शोषण का खत्मा करके उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है।

उपसंहार

इस अभियान को जितना फैलाया जा सकता है उतना फैलाना होगा, जिससे हर गाँव, ढाणी और शहर में लड़कियों को हीन भावना से देखना बंद हो जाए। उन्हें पूरा सम्मान और पूरे अधिकार मिल सके।

एक बच्ची दुनिया में आकर सबसे पहले बेटी बनती है। वे अपने माता पिता के लिए विपत्ति के समय में ढाल बनकर खड़ी रहती है। बालिका बन कर भाई की मदद करती है। बाद में धर्मपत्नी बनकर अपने पति और ससुराल वालों का हर अच्छी बुरी परिस्थिति में साथ निभाती है।

स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था कि “नारी का उत्थान स्वयं नारी ही कर सकती है। कोई और उन्हें उठा नहीं सकता है। वह स्वयं उठेगी। बस, उठने में उसे सहयोग की आवश्यकता है और जब वह उठ खड़ी होगी तो दुनिया की कोई ताकत उसे रोक नहीं सकती, वह उठेगी और समस्त विश्व को अपनी जादुई कुशलता से आश्चर्यचकित कर देगी।“

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बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर निबंध (1000 शब्द)

भूमिका

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता”

इस श्लोक का अर्थ है, जहाँ नारी का सम्मान होता है वहाँ देवताओं का निवास होता है। वैदिक काल में जो भारत था आज वो भारत नहीं रहा, वैदिक काल में लिखा गया यह श्लोक आज के युग में कहीं भी फिट नहीं बैठता।

आधुनिक भारत इतना आधुनिक हो गया है कि लड़कियों से उनके जीने का हक तक छिन लिया है। जन्म और मृत्यु तो उस ऊपरवाले की देन है, किन्तु कुछ डेढ़ होशियार लोगों ने खुद को भगवान समझ कर उन मासूम बच्चियों को मार दिया जो अभी पैदा भी नहीं हुई थी। कन्या भ्रूण हत्या के अगर आंकड़ें देख ले तो आँखों में से आँसू आ जाते है।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान की आवश्यकता

1991 की जनगणना से यह बात सामने आई थी, कि देश में लड़कियो की संख्या में भारी कमी देखी गई। तब इस ओर ध्यान दिया जाने लगा। बाद के वर्षो में, सन् 2001 की राष्ट्रीय जनगणना में यह स्थिति और भी भयावह होती गयी। महिलाओं की संख्या में गिरावट सन् 2011 तक लगातार जारी रहा।

सन् 2001 में भारत में लड़कियों और लड़कों का अनुपात 932/1000 था और 2011 तक आते-आते यह अनुपात 918/1000 तक घट गया था। इसका अर्थ यह है कि अगर समय रहते नहीं चेता गया तो, यह आंकड़ा घटते-घटते एक दिन शून्यता की स्थिति में आ जायेगा।

‘बिल्डिंग डाइवर्सिटी इन एशिया पैसिफिक बोर्ड’ नामक संस्था की ताजा रिपोर्ट के अनुसार विगत चार वर्षों में भारतीय कम्पनियों के बोर्ड में महिलाओं की संख्या में लगभग 10% की बढ़ोत्तरी हुई है। यह बढ़ोत्तरी सबसे ज्यादा बिजनस और कॉरपोरेट वर्ल्ड में अंकित की गई है। रिप्रेजेन्टेशन में महिलाओं की संख्या 2012 में 2.5% से बढ़कर 2015 में 12% तक हो गई। बोर्ड की सूचना को आधार माना जाय तो, महिलाओं की बोर्ड में लगभग 18%, टेलीकॉम क्षेत्र में 12%, आई.टी. क्षेत्र में 9% वित्तीय जैसे क्षेत्रों में भागीदारी है।

देश में महिलाओं और पुरुषों की संख्या में पर्याप्त अंतर है। इसी अंतर को पाटने के लिए इस योजना की जरुरत पड़ी। केवल उनकी संख्या में वृद्धि करना ही नहीं, बल्कि उनके खिलाफ हो रहे अपराधों को रोकना भी इस अभियान का प्रमुख उद्देश्य है। बड़ी अजीब बात है न, जितना देश और समाज विकसित होता जा रहा, उतना ही महिलाओं के खिलाफ क्राइम और हिंसा भी बढ़ती जा रही है। यह बात कुछ हज़म होने योग्य नहीं है।

जितना विज्ञान हमारे लिए वरदान है, कुछ मामलों में अभिशाप भी। मेडिकल और मेडिसीन मानव जाति के भलाई के लिए बनाये गये हैं। इसका सजीव उदाहरण सोनोग्राफी और अल्ट्रासाउण्ड मशीन है, जिससे गर्भ में पल रहे बच्चे का जेंडर पता कर सकते हैं। गलती विज्ञान या वैज्ञानिक अविष्कारों की नहीं, बल्कि उसके उपयोग की है।

इन्हीं सभी बातों को ध्यान में रख कर बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ कार्यक्रम की शुरुआत 22 जनवरी 2015 को पानीपत, हरियाणा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा की गई। इस कार्यक्रम की शुरुआत हरियाणा में करने के पीछे एक कारण भी है – हरियाणा में स्त्री-पुरुष लिंगानुपात में सर्वाधिक अंतर है। इस अभियान की ज़िम्मेदारी तीन मंत्रालय को सौंपी गयी और वो तीन मंत्रालय – महिला और बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य परिवार कल्याण मंत्रालय तथा मानव संसाधन मंत्रालय है।

इस अभियान के तहत देश में पूर्व गर्भाधान और प्रसव पौरव निदान तकनीक अधिनियम, 1994 को लागू किया गया। जिसके तहत यह भी कहा गया कि यदि कोई चिकित्सक भ्रूण लिंग परीक्षण करते हुये या भ्रूण हत्या का दोषी पाया गया तो उसका लाइसेंस रद्द कर दिया जाएगा और उस चिकित्सक को अधिनियम के तहत दंडित भी किया जाएगा। इसी वजह से हर क्लीनिक-हॉस्पिटल में ये साफ-साफ लिखा होता है कि, भ्रूण लिंग परीक्षण कानूनन अपराध है।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान का उद्देश्य

महिलाओं को सशक्त करने के बजाय अशक्त किया जा रहा है। महिलाओं को सशक्त बनाने और जन्म से ही अधिकार देने के लिये सरकार ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना की शुरुआत की। महिलाओं के सशक्तिकरण से सभी जगह प्रगति होगी खासतौर से परिवार और समाज में। लड़कियों के लिये मानव की नकारात्मक पूर्वाग्रह को सकारात्मक बदलाव में परिवर्तित करने के लिये ये योजना एक रास्ता है।

ये संभव है कि इस योजना से लड़कों और लड़कियों के प्रति भेदभाव खत्म हो जाये तथा कन्या भ्रूण हत्या का अन्त करने में ये मुख्य कड़ी साबित हो। इस योजना की शुरुआत करते हुए पीएम मोदी ने चिकित्सक बिरादरी को ये याद दिलाया कि चिकित्सा पेशा लोगों को जीवन देने के लिये बना है ना कि उन्हें खत्म करने के लिये।

इस मिशन का मूल उद्देश्य समाज में पनपते लिंग असंतुलन को नियंत्रित करना है। इस अभियान के द्वारा कन्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध आवाज उठाई गयी है। यह अभियान हमारे घर की बहु-बेटियों पर होने वाले अत्याचार के विरुद्ध एक संघर्ष है। इस अभियान के द्वारा समाज में लडकियों को समान अधिकार दिलाए जा सकते हैं।

लड़कियों के साथ शोषण होने के पीछे मुख्य कारण अशिक्षा भी है। अगर हम पढ़े-लिखे शिक्षित होते हैं तो हमें सही-गलत का ज्ञान होता है। जब बेटियां अपने पैर पर खड़ी होंगी तो कोई भी उन्हें बोझ नहीं समझेगा।

इसीलिए ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ कार्यक्रम’ के माध्यम से बेटियों को अधिक से अधिक शिक्षित बनाने पर जोर दिया जा रहा है। शिक्षित लोगों के साथ कुछ भी गलत करना आसान नहीं होता। लड़की पढ़ी-लिखी होगी तो न अपने साथ कुछ गलत होने देगी और न ही किसी और के साथ होते देखेगी। इसीलिए लड़की का शिक्षित होना अत्यंत आवश्यक है।

अब लोग अपनी लड़कियों के जन्म से खुश भी हो रहे हैं और उन्हें अच्छे से पढ़ा-लिखा कर काबिल भी बना रहे हैं।

उपसंहार

हर लडाई जीतकर दिखाऊंगी, मैं अग्नि में जल कर भी जी जाऊंगी।
चंद लोगों की पुकार सुन ली, मेरी पुकार न सुनी।
मैं बोझ नहीं भविष्य हूं, बेटा नहीं पर बेटी हूं।

भारत के प्रत्येक नागरिक को कन्या शिशु बचाओ के साथ-साथ इनका समाज में स्तर सुधारने के लिए प्रयास करना चाहिए। लडकियों को उनके माता-पिता द्वारा लडकों के समान समझा जाना चाहिए और उन्हें सभी कार्यक्षेत्रों में समान अवसर प्रदान करने चाहिए।

जब एक बालक को पढ़ाया जाता है तो केवल एक इंसान ही शिक्षित होता है जबकि एक बालिका को पढ़ाने से दो-दो परिवार साक्षर होता है। साक्षर माँ ही अपने बच्चे का चरित्र-निर्माण करती है। अतः वह जन्म-दाता ही नहीं, चरित्र निर्माता भी है, क्योंकि उसके अनेकों किरदार हैं।

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इनका नाम राहुल सिंह तंवर है, इन्होंने स्नातक (रसायन, भौतिक, गणित) की पढ़ाई की है और आगे की भी जारी है। इनकी रूचि नई चीजों के बारे में लिखना और उन्हें आप तक पहुँचाने में अधिक है। इनको 3 वर्ष से भी अधिक SEO का अनुभव होने के साथ ही 3.5 वर्ष का कंटेंट राइटिंग का अनुभव है। इनके द्वारा लिखा गया कंटेंट आपको कैसा लगा, कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। आप इनसे नीचे दिए सोशल मीडिया हैंडल पर जुड़ सकते हैं।

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