भोपाल गैस काण्ड – डरावनी रात और चीखती सुबह की पूरी कहानी

Bhopal Gas Tragedy Hindi: भारत देश में सन 1984 बहुत ही बुरा साल रहा है। इसके पीछे दो कारण है एक कारण से सभी देशवासी अच्छी तरह से वाकिफ़ है, जो है सिख दंगे। इसका दूसरा कारण कम लोगों को ही पता होगा, वो है भोपाल गैस त्रासदी। आज हम भोपाल शहर में हुए सबसे बड़े हादसे के बारे में बात करेंगे।

प्रस्तावना

bhopal gas tragedy hindi

भारत देश का हृदय मध्य प्रदेश राज्य है और उसका दिल भोपाल शहर राज्य की राजधानी है। इस दिल को एक बहुत बड़ा घाव लगा था जो आज तक नहीं भर पाया है, वो घाव ऐसा था कि उसे भूला पाना या घाव का भर जाना बहुत ही मुश्किल है। इस आर्टिकल में हम भोपाल गैस कांड (bhopal gas kand) के बारे जानेंगे कि भोपाल गैस कांड कब हुआ था? इसका मुख्य आरोपी, भोपाल गैस कांड के वकील आदि विषयों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

साल था 1984 और महिना था दिसंबर, तारीख थी 2 और घड़ी में बज रहे थे तकरीबन बारह। इस दिन जो हुया वो भोपाल की जनता अभी तक भूल नहीं पाई। एक फैक्ट्री से निकली विषैली गैस ने भोपाल की आधी जनता को अपने चपेट में लेकर लाशों का अंबार लगा दिया। कोई भी अस्पताल में जगह नहीं बची और डॉक्टरों को समझ में भी कुछ नहीं आ रहा कि मरीजों को किस वजह से आँखों में जलन, साँस लेने में तकलीफ हो रही है। 3 दिसंबर की सुबह होते-होते आधा इलाका जानवरों से लेकर इंसानों के मृत शरीर से अटा पड़ा मिला।

क्या हुया था उस रात

यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन ने 1969 में यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल) के नाम से भारत में एक कीटनाशक फैक्ट्री खोली थी।

इसके 10 सालों बाद 1979 में भोपाल में एक प्रॉडक्शन प्लांट लगाया यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री, जिसे अब डाउ केमिकल्स कहते हैं। उसके प्लांट नंबर सी से गैस रिसने लगी। दो दिसंबर 1984 की रात नाइट शिफ्ट में काम करने आए करीब आधा दर्जन कर्मचारी भूमिगत टैंक के पास पाइपलाइन की सफाई शुरू करने जा रहे थे। उसी वक्त टैंक का तापमान अचानक 200 डिग्री पहुंच गया, जबकि इस टैंक का तापमान चार से पांच डिग्री के बीच रहना चाहिए था।

इसका असर ये हुआ कि प्लांट के E610 नंबर टैंक में प्रेशर बढ़ गया और उससे गैस लीक हो गई। देखते-देखते हालात बेकाबू हो गए। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि टैंक को सुरक्षित रखने के लिए प्रयोग किया जाने वाला फ्रीजर प्लांट बिजली का बिल बचाने के लिए बंद कर दिया गया था। तापमान बढ़ने पर टैंक में बनने वाली जहरीली गैस उससे जुड़ी पाइप लाइन में पहुंचने लगी।

पाइप लाइन का वॉल्व सही से बंद नहीं था, लिहाजा उससे जहरीली गैस का रिसाव शुरू हो गया। प्लांट ठंडा करने के लिए मिथाइल आइसो साइनाइड को पानी के साथ मिलाया जाता था। उस रात इसके कांबीनेशन में गड़बड़ी हो गई। जहरीली गैस हवा के साथ मिलकर आस-पास के इलाकों में फैल गई। और फिर वो हो गया, जो भोपाल शहर का काला इतिहास बन गया। हजारों लोगों की जान चली गई। पीढ़ियां बर्बाद हो गईं।

नवंबर 1984 में प्लांट काफी घटिया स्थिति में था। प्लांट के ऊपर एक खास टैंक था। टैंक का नाम E610 था जिसमें एमआईसी 42 टन थे जबकि सुरक्षा की दृष्टि से एमआईसी का भंडार 40 टन से ज्यादा नहीं होना चाहिए था। टैंक की सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं किया गया था और वह सुरक्षा के मानकों पर खड़ा नहीं उतरता था।

2-3 दिसंबर, 1984 की खौफनाक रात। एक साइड पाइप से टैंक E610 में पानी घुस गया। पानी घुसने के कारण टैंक के अंदर जोरदार रिएक्शन होने लगा जो धीरे-धीरे काबू से बाहर हो गया। स्थिति को भयावह बनाने के लिए पाइपलाइन भी जिम्मेदार थी जिसमें जंग लग गई थी। जंग लगे आइरन के अंदर पहुंचने से टैंक का तापमान बढ़कर 200 डिग्री सेल्सियस हो गया जबकि तापमान 4 से 5 डिग्री के बीच रहना चाहिए था। इससे टैंक के अंदर दबाव बढ़ता गया। इससे टैंक पर इमर्जेंसी प्रेशर पड़ा और 45-60 मिनट के अंदर 40 मीट्रिक टन एमआईसी का रिसाव हो गया।

टैंक से भारी मात्रा में जहरीली गैस बादल की तरह पूरे इलाके में फैल गई। गैस के उस बादल में नाइट्रोजन के ऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, मोनोमेथलमीन, हाइड्रोजन क्लोराइड, कार्बन मोनोक्साइड, हाइड्रोजन सायनाइड और फॉसजीन गैस थी। जहरीले बादल के चपेट में भोपाल का पूरा दक्षिण पूर्वी इलाका आ गया।

गैस के संपर्क में आने पर आसपास में रहने वाले लोगों को घुटन, आंखों में जलनी, उल्टी, पेट फूलने, सांस लेने में दिक्कत जैसी समस्या होने लगी। कम लंबाई वाले आदमी और बच्चे इससे ज्यादा प्रभाति हुए। लोगों ने भागकर जान बचानी चाहिए लेकिन तब भी गैस की बड़ी मात्रा उनके शरीर में प्रवेश कर गई।

अगले दिन हजारों लोगों की मौत हो चुकी थी। लोगों का सामूहिक रूप से दफनाया गया और अंतिम संस्कार किया गया। कुछ ही दिन के अंदर 2,000 के करीब जानवरों के शव को विसर्जित करना पड़ा।

आसपास के इलाके के पेड़ बंजर हो गए। अस्पतालों और अस्थायी औषधालयों में मरीजों की भीड़ लग गई। एक समय में करीब 17,000 लोगों को अस्पतालों में भर्ती कराया गया। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक तुरंत 2,259 लोगों की मौत हो गई थी। मध्य प्रदेश सरकार ने गैस रिसाव से होने वाली मौतों की संख्या 3,787 बताई थी।

2006 में सरकार ने कोर्ट में एक हलफनामा दिया। उसमें उल्लेख किया कि गैस रिसाव के कारण कुल 5,58,125 लोग जख्मी हुए। उनमें से 38,478 आंशिक तौर पर अस्थायी विकलांग हुए और 3,900 ऐसे मामले थे जिसमें स्थायी रूप से लोग विकलांग हो गए।

समस्या दुर्घटना के समय तक ही सीमित नहीं थी बल्कि अब तक उसका असर पड़ रहा है। पैदा होने वाले बच्चों में गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं देखने को मिल रही हैं।

भोपाल गैस कांड का मुख्य आरोपी फैक्ट्री के संचालक वॉरन एंडरसन को बनाया गया था। 29 सितंबर, 2014 को उसकी मौत हो गई। घटना के तुरंत बाद वह भारत छोड़कर अमेरिका भाग गया था। उसे भारत लाकर सजा देने की मांग की गई थी लेकिन भारत सरकार एंडरसन को अमेरिका से लाने में सफल नहीं हुई।

संक्षेप – Bhopal gas case judgement

भोपाल गैस त्रासदी उस समय हुई जब पूरी उस इलाके की पूरी जनता नींद के आगोश में थी। उन्हें क्या पता था कि ये नींद उन्हें अगली सुबह नहीं बता पाएगा।

2 दिसंबर 1984 की रात में हुआ यह भयंकर हादसा 3 दिसंबर 1984 की भोर देखने लायक नहीं बचा पायेगा। जब भोपाल गैस त्रासदी की खबर तत्कालीन मुख्यमंत्री कांग्रेस पार्टी के अर्जुन सिंह के कानों में पड़ी तो अपने राज्य के दिल को बचाने के लिए जो हो सकता था वो काम किया, लेकिन दक्षिण पूर्वी इलाको में रहने वाली जनता के मन में एक टीस हमेशा के लिए रह गई। वो थी यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के मालिक वॉरन एंडरसन को अमरीका से पकड़ कर भारत में सजा दिलवाना।

इस भोपाल गैस त्रासदी में पीड़ित लोगों को न्याय दिलाने के लिए ये केस सीबीआई को सौंपा गया और उनकी तरफ़ से वकील करुणा नंदी ने केस को लड़ा और न्याय दिलाने में पूरी कोशिश की। इसके अलावा मध्यप्रदेश सरकार ने भोपाल विषैली गैस निकासी के लिए एक इनक्वारी कमीशन बैठाया जिसमें एन. के. सिंह को बतौर न्यायाधीश बनाया।

भोपाल गैस त्रासदी के कुछ तथ्य

  1. यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड के पेस्टिसाइड प्‍लांट में गैस रिसने से हादसा हुआ।
  2. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस लापरवाही की वजह से 5 लाख 58 हजार 125 लोग मिथाइल आइसोसाइनेट गैस और दूसरे जहरीले रसायनों के रिसाव की चपेट में आ गए। इस हादसे में तकरीबन 25 हजार लोगों की जान गई।
  3. इस त्रासदी के बाद यूनियन कार्बाइड के मुख्‍य प्रबंध अधिकारी वॉरेन एंडरसन रातोंरात भारत छोड़कर अपने देश अमेरिका रवाना हो गए थे।
  4. त्रासदी के बाद भोपाल में जिन बच्चों ने जन्म लिया उनमें से कई विकलांग पैदा हुए तो कई किसी और बीमारी के साथ इस दुनिया में आए। यह भयावह सिलसिला अभी भी जारी है और बच्‍चे यहां कई असामान्‍यताओं के साथ पैदा हो रहे हैं।
  5. 7 जून, 2010 को आए स्थानीय अदालत के फैसले में आरोपियों को दो-दो साल की सजा सुनाई गई थी, लेकिन सभी आरोपी जमानत पर रिहा भी कर दिए गए।
  6. यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड के तत्कालीन मुखिया और इस त्रासदी के मुख्य आरोपी वॉरेन एंडरसन की भी मौत 29 सिंतबर 2014 को हो चुकी है।
  7. इस हादसे पर 2014 में फिल्‍म ‘भोपाल ए प्रेयर ऑफ रेन’ का निर्माण किया गया।

निष्कर्ष

राजकुमार केसवानी नाम के पत्रकार ने 1982 से 1984 के बीच इस पर चार आर्टिकल लिखे। हर आर्टिकल में यूसीआईएल प्लांट के खतरे से चेताया। लेकिन सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। जिसका खामियाजा भोपाल के दक्षिण पूर्वी इलाके में रहने वाले पशु-पक्षी, पेड़ और इंसानों ने चुकाया और अभी तक चुकाते आ रहे है।

आज भी उस विषैली गैस का असर बना हुया है। वहाँ की जमीन बंजर और इंसान अपंग या किसी ना किसी विसंगति के पैदा हो रहे है। उस फैक्ट्री में अभी भी वेस्ट पड़ा हुया है जिसका निस्तारण अभी तक नहीं हो पाया है क्योंकि भारत में ऐसी तकनीक नहीं विकसित हुई है जिससे उस वेस्ट का निस्तारण बिना किसी जन हानि या पर्यावरण को हानि पहुँचाये बिना हो सके। बहुत जल्द उसका निस्तारण हो यही उम्मीद है अब बस।

भोपाल गैस त्रासदी के बारे में विडियो का लिंक भी हम सलंग्न कर रहे हैं।

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मेरा नाम सवाई सिंह हैं, मैंने दर्शनशास्त्र में एम.ए किया हैं। 2 वर्षों तक डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी में काम करने के बाद अब फुल टाइम फ्रीलांसिंग कर रहा हूँ। मुझे घुमने फिरने के अलावा हिंदी कंटेंट लिखने का शौक है।

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