सच्चा धन लोक कथा – Sacha Dhan Lok Katha in Hindi

नमस्कार दोस्तों, आज हम एक Lok Katha शेयर कर रहे हैं। इस लोक कथा में एक महिला के बारे में जानेंगे जो आर्थिक रूप से निर्धन होते हुए भी अपने गांव वालों के नजरिये में कितनी धन्नी है और सुखी है। तो आइये जानते इस Lok Katha को विस्तार से:

Lok Katha

सच्चा धन लोक कथा – Sacha Dhan Lok Katha in Hindi

किसी गांव में दो महिलाएं रहती थीं। उनमें से एक आर्थिक रूप से बहुत सम्पन्न थी और दूसरी बहुत निर्धन फिर भी उन दोनों में अच्छी मित्रता थी। धनी महिला का नाम था मारिया रोजा और निर्धन महिला का नाम मारिया ईसाबेल। दोनों के एक-एक लड़का था।

जब कभी मारिया रोजा अपने बाग के फल और खेत की सब्जियां बेचती, वह मारिया ईसाबेल के घर जाती और कहती, ‘मेरी प्यारी सखी, अपने लड़के को मेरे घर भेज देना, जिससे वह फल और सब्जी का हिसाब किताब लगा दे। आज मैंने बहुत से फल और सब्जियां बेची थीं। उन सभी का पूरा हिसाब-किताब करना है।’

मारिया रोजा ने कभी यह प्रयत्न नहीं किया था कि वह गिनती सीख ले, हिसाब जोड़ना-घटाना जान ले ताकि अच्छी तरह से बिक्री और आय का हिसाब-किताब रख सके। उसने अपने लड़के को भी यह सब कुछ नहीं सिखाया था। उसका लड़का बिलकुल भी पढ़ा-लिखा नहीं था।

ईसाबेल अपने लड़के को रोजा के यहां भेज देती। वह रोजा का पूरा हिसाब-किताब समझा देता। ईसाबेल का लड़का बहुत ही समझदार, पढ़ा-लिखा और परिश्रमी था।

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जब कभी रोजा के पास डाकखाने से सूचना आती कि उसके खेत के लिए मंगाया गया खाद बोरियों में डाकखाने पहुंच गया है। अब वह आकर बोरियां ले जाए और आवश्यक भुगतान कर जाए तो रोजा तुरंत ईसाबेल के घर जाती और कहती ‘मेरी प्यारी सखी, कृपा करके अपने लड़के को डाकखाने भेज दो। वह वहां जाकर बोरियां घर ले आएगा।’

Lok Katha in Hindi

रोजा स्वयं डाकखाना जाकर खाद की बोरियां घर लाना अच्छा नहीं मानती थी। उसका लड़का भी यही समझता था कि यह काम धनी लोगों के करने का नहीं है। ईसाबेल अपने लड़के को डाकखाना भेज देती। जहां से वह हिसाब-किताब करके बोरियां रोजा के घर पहुंचा देता था।

जब कभी रोजा कहीं पत्र लिखकर भेजना चाहती। वह ईसाबेल के घर जाती और कहती, ‘मेरी प्यारी सखी, मुझे आज कुछ पत्र बाहर भेजने हैं। क्या कृपा करके अपने लड़के को मेरे यहां भेज दोगी?

इंसाबेल के लड़के को पत्र लिखना और पढ़ना खूब अच्छी तरह से आता था। अत: वह रोजा के यहां भेज देती। लड़का रोजा के पत्र जहां-जहां भेजने होते थे। लिखकर भेज देता था।

एक दिन रोजा ईसाबेल के घर गई और बोली, ‘प्यारी सखी, आज मेरा लड़का बीमार है। कृपा करके अपने लड़के को मेरे यहां भेज दो। वह आकर दवाई के बारे में डॉक्टर की बातों को पढ़कर समझा देगा, कितनी बार दवाई लेनी है और किस प्रकार उसे लेना है।

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जब ईसाबेल ने अपने लड़के को रोजा के यहां भेजने के लिए कहा तो लड़का बोला- ‘मां यह तो ठीक नहीं है। आपकी सखी तो हर दिन ही हमारे यहां किसी न किसी काम से आ जाती है। उन्हें कभी फल-सब्जियों के बेचने का हिसाब करना होता है तो कभी डाकखाने से खाद की बोरियां लानी होती है। कभी पत्र लिखना होता है और आज तो बस हद ही हो गई, मुझे उनकी दवाइयों के बारे में भी समझाना पड़ेगा। यह सब इसलिए है कि हम लोग निर्धन हैं और वे लोग धनी हैं। भला यह कब तक चलेगा?

Lok Katha in Hindi

ईसाबेल मुस्करा दीं। बोली, ‘तुम समझते हो कि रोजा धनी है, सुखी है और मैं निर्धन हूं और दु:खी हूं? यह बात सही नहीं है। सच्ची बात तो यह है कि मुझसे अधिक धनी वह नहीं है। यदि तुम्हें मेरी बात पर विश्वास न हो तो गांव में जाकर तुम किसी से भी यह बात पूछ सकते हो।

ईसाबेल के लड़के ने विचार किया कि उसकी मां को अवश्य ही भ्रम है कि वह धनी है। लेकिन फिर भी उसने गांव में पूछने का विचार कर लिया।

गांव के एक आदमी से उसने पूछा- ‘भैया क्या तुम मारिया रोजा और ईसाबेल को जानते हो?

हाँ जरूर, उन्हें कौन नहीं जानता।’ उसने उत्तर दिया।

लड़के ने आगे पूछा, ‘उन दोनों में कौन अधिक धनवान है?

‘निस्सन्देह मारिया ईसाबेल।’ उस आदमी ने तुरंत उत्तर दे दिया।

इसके बाद लड़के ने गांव के अनेक लोगों से वही प्रश्न किया। सभी का उत्तर था ‘अरे, इसमें पूछने की क्या बात है? निश्चय ही मारिया ईसाबेल अधिक धनी है।

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ईसाबेल के लड़के की समझ में नहीं आ रहा था कि लोग उसकी मां को अधिक धनवान क्यों मानते हैं? उसने अपनी मां से सही बात समझाने के लिए अनुरोध किया।

‘मेरे बेटे, गांव के लोग जैसा कहते हैं, वही सही बात है। ‘मां ने कहा, ‘मैं एक ऐसे लड़के की मां हूं जो पढ़ना-लिखना जानता है, हिसाब लगा लेता है, समझदार है, परिश्रमी है, व्यवहार कुशल है, अपनी मां का कहना मानता है। गांव के लोगों की बात सुनता है।

मारिया रोजा का लड़का अनपढ़ है, वह कोई भी काम ढंग से नहीं कर सकता। सभी को मालूम है कि एक योग्य लड़का ही सबसे बड़ा धन है। तुम्हारे योग्य होने से मैं वास्तव में धनी हूं, सुखी हूं।

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