रथ यात्रा क्यों मनाई जाती हैं? इतिहास और प्रचलित कथा

हमारा भारत देश अनेकों प्रकार की धार्मिक मान्यताओं से घिरा पड़ा है। हमारे देश के प्रत्येक हिंदू धर्म के लोग पूजा पाठ एवं सभी धर्मों में अपनी आस्था रखते हैं। हमारे देश में माना जाता है कि पूजा पाठ एवं धार्मिक अनुष्ठानों में अपना महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान करके आप सीधे प्रभु की सेवा जैसे कार्यों को संपन्न करते हैं।

हमारे देश में न जाने कितने राज्य हैं और न जाने कितने राज्यों में अनेकों प्रकार के धर्मों को माना जाता है और उनके प्रति आस्था भी रखी जाती है। आज हम आपको भगवान श्री कृष्ण की रथयात्रा के बारे में जानकारी देने वाले हैं।

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इस लेख में आपको बहुत सारे सवाल जैसे रथ यात्रा क्यों मनाई जाती हैं? और रथ यात्रा कहाँ का महोत्सव हैं आदि के जवाब मिल जायेंगे। तो रथ यात्रा कि सम्पूर्ण जानकारी के लिए इसे अंत तक जरुर पढ़ें।

रथ यात्रा क्या हैं?

उड़ीसा राज्य के जगन्नाथ पुरी नामक स्थान पर भगवान श्री कृष्ण उनकी बहन सुभद्रा और उनके भाई बलराम जी की विशाल रथयात्रा निकाली जाती है। रथ यात्रा के पावन उत्सव के दिन हमारे देश के आलावा अन्य देशों से भी लोग बड़ी संख्या में जगन्नाथ पुरी धाम में उपस्थित होते हैं और भगवान श्री कृष्ण की रथ यात्रा को अपना सहयोग प्रदान करके भगवान श्री कृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

हमारे देश में ऐसे बहुत से लोग हैं, जो जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा के बारे में जानना बहुत पसंद करते हैं और यह रथ यात्रा क्यों की जाती है, कब से इसका शुभारंभ किया गया है और रथ यात्रा का इतिहास क्या हैं व पौराणिक कथाएं इत्यादि महत्वपूर्ण बिंदुओं पर लोग जानकारियां हासिल करना चाहते हैं।

रथ यात्रा का इतिहास

भगवान श्री कृष्ण के रथ यात्रा के पीछे बहुत ही पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई है। पौराणिक कथाओं में से एक कथा का वर्णन हम करने जा रहे है। एक बार गोपियों ने माता रोहिणी से भगवान श्री कृष्ण जी के रासलीला के बारे में विस्तारपूर्वक सुनना चाहती थी, वहीं पर श्री कृष्ण जी की बहन सुभद्रा भी मौजूद थी।

माता रोहिणी सुभद्रा के सामने श्री कृष्णा जी के रासलीला नहीं बताना चाहती थी, इसीलिए माता रोहिणी ने सुभद्रा जी को बाहर भेज दिया और उनसे कहा कि तुम ध्यान रखना कि कोई भी अंदर ना आ सके। सुभद्रा जी बाहर जाकर खड़ी हो गई।

कुछ ही समय बाद श्री कृष्ण और बलराम दोनों आकर सुभद्रा जी के दाई ओर और बाई ओर खड़े हो गए। तभी वहां पर देव ऋषि नारद जी आए और उन तीनों को देखकर उनके इसी प्रकार खड़े रहने पर उनके असली रूप का दर्शन करने की इच्छा प्रकट की।

इन तीनों ने (श्री कृष्ण, बलराम और सुभद्रा जी) देव ऋषि नारद जी के इस इच्छा को पूर्ण किया। तभी से इन लोगों की इसी रूप में रथ यात्रा निकाली जाती है।

रथ यात्रा की जानकारी का विडियो देखे

रथ यात्रा के दौरान कौन-कौन सी परंपराएं मनाई जाती हैं?

पहांडी

पहांडी परंपरा में भगवान श्री कृष्ण बलराम और सुभद्रा जी के प्रतिमाओं को उड़ीसा के जगन्नाथ पुरी के जगन्नाथ मंदिर से गुडीचा देवी के मंदिर तक की यात्रा कराई जाती है। यह माना जाता है कि देवी गुडीचा भगवान श्री कृष्ण की बहुत बड़ी भक्त थी। यह रथयात्रा देवी गुडीचा और सम्मान देने के लिए किया जाता है।

छेरा पहरा

उड़ीसा के जगन्नाथ पुरी मंदिर से जब रथ यात्रा निकाली जाती है तो इसके सबसे पहले दिन ही छेरा पहरा नाम की परंपरा निभाई जाती है।

इस परंपरा के अंतर्गत जगन्नाथ पुरी के गजपति महाराज के द्वारा रथ मार्ग और सोने की झाड़ू को पवित्र किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान के लिए प्रत्येक व्यक्ति समान होता है, इसीलिए राजा भी वहां के मार्ग की सफाई करता है।

रथ के मार्ग को साफ करने की परंपरा दो बार निभाई जाती है। पहली बार तब जब जगन्नाथ पुरी से रथ यात्रा गुडीचा मंदिर के लिए निकाली जाती है और दूसरी बार तब जब इस यात्रा को पूर्ण करके गुडीचा मंदिर से जगन्नाथ पुरी मंदिर की ओर वापस ले आया जाता है।

रथ यात्रा पूर्ण होने के बाद भगवान श्री कृष्ण बलराम और सुभद्रा जी को स्नान कराया जाता है और इसके बाद उन्हें पवित्र वस्त्र बनाए जाते हैं। इसके बाद हेरा पंचमी की परंपरा निभाई जाती है। इस दिन माता लक्ष्मी श्री कृष्ण को ढूंढती है और उन्हें ढूंढने के बाद मंदिर को छोड़कर अपनी यात्रा में निकल जाते हैं।

ऐसा माना जाता है कि जो इस रथ को खींचता है, उसको सीधा मोक्ष प्राप्त हो जाता है। यही कारण है कि लोग उस रथ को खींचने के लिए उत्सुक रहते हैं। गुडीचा मंदिर भगवान श्री कृष्ण जी के मौसी का घर माना जाता है। यदि कोई रथ रात तक गुडीचा मंदिर नहीं पहुंच पाता तो वह अगले दिन इस यात्रा को पूरी करता है।

ऐसा माना जाता है कि स्वयं भगवान विश्वकर्मा जी ने इन तीनों देव की प्रतिमा को बनाया था। पौराणिक पंचांग के द्वारा यात्रा आषाढ़ शुक्ल दशमी को भगवान जगन्नाथ की वापसी रथ यात्रा शुरू होती है। इस रथयात्रा को बहुदाया यात्रा के नाम से भी जाना जाता है।

जगन्नाथ पुरी में होने वाली रथ यात्रा का इतिहास क्या है?

जगन्नाथपुरी में होने वाली रथयात्रा के विषय में ज्यादा जानकारी प्राप्त नहीं है। इस रथयात्रा का इतिहास बहुत ही प्राचीन है, परंतु कुछ ऐसी जानकारियां हैं, जिनके बारे में हमने आपको नीचे बताया है।

उड़ीसा में होने वाले इस यात्रा को 15वीं ईसवी में सबसे पहले गंगा राजवंश के द्वारा किया गया था। यह रथ यात्रा भारत की ऐसी पहली यात्रा है, जिसके बारे में विदेशी लोगों को भी इसका ज्ञान है। इस यात्रा के विषय में मार्कोपोलो जैसे विदेशी यात्रियों ने भी अपने कथाओं में इसका विस्तार पूर्वक वर्णन किया है।

जगन्नाथ पुरी के रथ यात्रा का क्या महत्व है?

इस यात्रा का पूरा श्री भगवान जगन्नाथ को समर्पित किया जाता है। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि भगवान जगन्नाथ श्री हरि विष्णु जी के अवतार हैं। हिंदू धर्म की आस्था का मुख्य केंद्र होने के कारण इस यात्रा का महत्व बढ़ जाता है। ऐसा कहा जाता है कि जो भी श्रद्धालु इस यात्रा में भाग लेता है, उसकी मृत्यु के पश्चात वह मोक्ष को प्राप्त हो जाता है।

इस रथयात्रा में भारत के हर राज्य से बहुत ही अधिक संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं। भारत से ही नहीं विदेशों से भी लोग इस रथयात्रा में भाग लेते हैं। इसलिए इस रथ यात्रा के स्थान को आकर्षण का केंद्र माना जाता है।

जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा के दिन सभी भक्तगण भगवान श्री कृष्ण के विशाल रथ को अपने हाथों से तमाम तकलीफों को झेलते हुए खींचने का प्रयास करते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जो भक्त भगवान श्री कृष्ण के इस विशालकाय रथ को खींचने में अपना योगदान देता है, उसके सारे कष्टों और सारे दुखों को ईश्वर दूर करते हैं।

जो व्यक्ति भगवान श्री कृष्ण के विशालकाय रथ को खींचते हैं, उसे स्वयं भगवान श्री कृष्ण अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं और उसे इस मृत्यु लोक से हमेशा-हमेशा के लिए मुक्त कर देते हैं। ऐसे भक्तगण को पौराणिक कथाओं के अनुसार सीधे ईश्वर की प्राप्ति होती है। वास्तव में यह रथ यात्रा धार्मिक मान्यताओं को वास्तविक रूप प्रदान करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करने का कार्य करती है।

रथ यात्रा कहाँ-कहाँ मनाई जाती हैं?

हमारे देश में भगवान श्री कृष्ण की रथयात्रा को कई स्थानों पर मनाया जाता है। परंतु इनमें से कुछ ऐसे स्थान है, जो पूरे विश्व में प्रसिद्ध है, वे इस प्रकार से हैं।

  • उड़ीसा राज्य के जगन्नाथ पुरी स्थान पर रथ यात्रा को आयोजित किया जाता है।
  • पश्चिम बंगाल राज्य में इस यात्रा को दो स्थलों पर आयोजित किया जाता है।
  • हुगली में यह रथ यात्रा महेश रथ यात्रा के नाम से की जाती है।
  • राजबलहट में भी इस रथ यात्रा का आयोजन किया जाता हैं।
  • इसके अलावा यह रथ यात्रा भारत के साथ-साथ अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में भी आयोजित की जाती हैं।

जगन्नाथ रथ यात्रा के बारे में रोचक तथ्य

भगवान जगन्नाथ की यात्रा शुरू होने के 15 दिन पहले भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा को 108 घड़े के पानी से नहलाया जाता है। इस तरह सहस्त्रधारा स्नान करने के बाद जिस कुएं के पानी से इन्हें नहलाया जाता है, उसको 1 साल के लिए बंद कर दिया जाता है।

भगवान जगन्नाथ की यात्रा में तीन अलग-अलग रथ निकाले जाते हैं, जिनमें पहला रथ सबसे बड़ा और आगे होता है, वह रथ भगवान जगन्नाथ की होती है। वहीं उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा का भी रथ निकाला जाता है और इन प्रत्येक रथों को हर साल अलग-अलग आकार और रूप दिया जाता है और इस रथ को नारियल की लकड़ी से निर्मित किया जाता है। इन प्रत्येक राथो के आगे चार घोड़े बंधे होते हैं।

भगवान जगन्नाथ के रथ में पीले और लाल रंग के रंगों का प्रयोग किया गया होता है, जिसमें कुल 16 पहिए होते हैं, जिसे 332 टुकड़ों से बनाया गया होता है।

इन रथों पर नीम की लकड़ियों से तैयार प्रतिमा को स्थापित किया जाता है। इन प्रतिमाओं को बनाने के लिए भगवान के रंग के अनुसार नीम की लकड़ी का चयन किया जाता है जैसे कि भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा बनाने के लिए सांवले रंग की नीम की लकड़ी का चयन किया जाता है क्योंकि भगवान जगन्नाथ का रंग सांवला है। वहीँ इनकी बहन और भाई बलराम का रंग गोरा होने के कारण हल्के रंग की नीम की लकड़ी का चयन किया जाता है।

जगन्नाथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ उनके भाई बलभद्र और उनकी बहन सुभद्रा के लिए जो रथ निकाले जाते हैं, इन तीनों रथों का नाम अलग-अलग होता है। भगवान जगन्नाथ के रथ को ‘नंदीघोष’ कहां जाता है, वहीँ इनके भाई के रथ को ‘तालध्वज’ कहा जाता है और उनकी बहन सुभद्रा के रथ को दर्पदलन या पद्म रथ कहा जाता है।

कहा जाता है कि भगवान जगन्नाथ यात्रा के तीसरे दिन पुजारियों द्वारा इनकी मंदिर के दरवाजे को बंद कर दिया जाता है और इसी दिन माता लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ जी को ढूंढने के लिए यहां पर आती है। लेकिन दरवाजा बंद देख वह नाराज हो जाती है और फिर वापस चली जाती है और बाद में भगवान जगन्नाथ स्वयं इन्हे मनाने के लिए जाते हैं।

रथ यात्रा कब मनाई जाती हैं?

रथ यात्रा प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को जगन्नाथ पूरी ओड़िसा में आरंभ होती हैं। द्वितीया से लेकर दशमी तक 10 दिनों तक चलने वाली इस यात्रा को लेकर आमजन कि मान्यता हैं कि भगवान इन दिनों के दौरान लोगों के बीच रहते हैं। यह रथ यात्रा सैकड़ों लोगों कि मौजूदगी में मनाई जाती है।

FAQ

रथ यात्रा का क्या महत्व है?

हिंदू धर्म में रथयात्रा का बहुत ही महत्व है। माना जाता है रथयात्रा में जो भी हिस्सा लेता है, वह चारों तीर्थ धाम यात्रा करने के बराबर होता है। यही कारण है कि हर साल जगन्नाथ पुरी की यात्रा के दौरान देशभर से हजारों भक्त आते हैं। इस तरीके से यह रथयात्रा एकता, भाईचारा और शांति का प्रतीक है।

भगवान जगन्नाथ जी की मौसी कौन थी?

रानी गुंडिचा को भगवान जगन्नाथ की मौसी कहा जाता है। पुरानी कथाओं के अनुसार माना जाता है रानी गुडीचा राजा इंद्रद्युम्न की पत्नी थी, इसीलिए भगवान कृष्ण भगवान रानी को मौसी कहते थे। जनकपुर में भगवान जगन्नाथ मौसी का घर है। कहा जाता है एक बार इनकी मौसी ने भगवान जगन्नाथ को इनके घर बुलाया था, जहां पर ये अच्छे-अच्छे पकवान खा कर बीमार पड़ गए थे। तब इनकी मौसी ने इन्हे पथ्य का भोग लगाया जाता है, जिससे भगवान शीघ्र ठीक हो पाए थे।

रथ यात्रा क्यों निकाली जाती है?

भगवान जगन्नाथ की यात्रा की कथा पद्मपुराण के अनुसार बताई जाती है कि एक बार भगवान जगन्नाथ की बहन जिनका नाम सुभद्रा था, उन्होंने नगर घूमने की इच्छा जताई थी। तब भगवान जगन्नाथ और उनके भाई बलभद्र दोनों ने अपनी लाडली बहन को रथ पर बैठा कर नगर का शैर करवाया था। इस यात्रा के दौरान वे अपनी मौसी के घर गुडीचा में भी 7 दिन रूके थे। इसीलिए तभी से हर साल जगन्नाथ की यात्रा निकाली जाती है।

जगन्नाथ यात्रा कितने दिन के लिए निकाली जाती है?

भगवान जगन्नाथ की यात्रा 9 दिनों के लिए हर साल निकाली जाती है। यात्रा की शुरूआत भगवान जगन्नाथ पुरी मंदिर से शुरू होती है और उनकी मौसी का मंदिर गुंडिचा मंदिर जाकर खत्म होती है। इस रथ यात्रा में पहले दिन 5 किलोमीटर तक रथयात्रा होती है।

भगवान जगन्नाथ मंदिर के ऊपर से कोई भी विमान या पंछी क्यों नहीं गुजर पाता?

भगवान जगन्नाथ पुरी मंदिर के ऊपर से कोई भी पंक्षी या विमान नहीं उड़ पाता क्योंकि इस मंदिर के सिर्ष पर एक चक्र लगा हुआ है, जिसे निलचक्र कहा जाता है। यह चक्र आठ धातुओं से बनाया गया है। माना जाता है कि जब भी कोई पंछी या विमान इस मंदिर के ऊपर से गुजरते हैं तो उनके गति में रुकावट पैदा हो जाती है। यही कारण है कि कोई भी विमान या पक्षी इस मंदिर के ऊपर से नहीं गुजरता।

पुरी रथ यात्रा में कितने रथ भाग लेते हैं?

इस यात्रा में तीन रथ रहते हैं, इन रथों के बीच वाले रथ में बहन सुभद्रा और बगल वाले रथ में श्री कृष्णा और बलराम की प्रतिमाएं होती है।

निष्कर्ष

यह यात्रा भगवान श्री कृष्ण के नाम से की जाती है। इस यात्रा में उनके साथ उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा की भी प्रतिमा को यात्रा में शामिल किया जाता है।

इस यात्रा में तीन रथ रहते हैं, इन रथों के बीच वाले रथ में बहन सुभद्रा और बगल वाले रथ में श्री कृष्णा और बलराम की प्रतिमाएं होती है। इस यात्रा में देश-विदेश के श्रद्धालु भाग लेते हैं और उनका ऐसा मानना होता है कि इस यात्रा में हिस्सा लेने से उन्हें मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।

हम उम्मीद करते हैं कि इस लेख में आपको आपके बहुत से प्रश्न जैसे रथ यात्रा क्यों मनाया जाता है, रथ यात्रा कहाँ का महोत्सव हैं, रथ यात्रा क्यों निकाला जाता है, साथ ही यह रथ यात्रा कहाँ प्रसिद्ध हैं के जवाब मिल गये होंगे। अगर आपको यह लेख पसंद आया हैं तो इसे अपने मित्रों और प्रियजनों के साथ अवश्य शेयर करें और साथ ही अपने विचार कमेन्ट बॉक्स में जरूर लिखें।

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मेरा नाम सवाई सिंह हैं, मैंने दर्शनशास्त्र में एम.ए किया हैं। 2 वर्षों तक डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी में काम करने के बाद अब फुल टाइम फ्रीलांसिंग कर रहा हूँ। मुझे घुमने फिरने के अलावा हिंदी कंटेंट लिखने का शौक है।

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