नदी की आत्मकथा पर निबंध

Nadi ki Atmakatha Essay in Hindi: हमारे भारत देश में बहुत तरह की नदियां बहती है, जो कि हमारे लिए बहुत ही पूजनीय होती हैं। नदी का पानी देश के लाखों लोगों की प्यास बुझाता है और सिंचाई का साधन है।

नदी की शुरुआत हिमालय से होती है और नदी का अंत अरब सागर और पश्चिम बंगाल में जाकर होता है। नदी की आत्मकथा जिससे व्यक्ति को एक अच्छी सीख मिलती है।

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Nadi ki Atmakatha Nibandh

हम यहां पर नदी की आत्मकथा पर निबंध (Nadi ki Aatmkatha Nibandh) शेयर कर रहे है। इस निबंध में नदी की आत्मकथा के संदर्भित सभी माहिति को आपके साथ शेयर किया गया है। यह निबंध सभी कक्षाओं के विद्यार्थियों के लिए मददगार है।

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नदी की आत्मकथा पर निबंध | Nadi ki Atmakatha Essay in Hindi

नदी की आत्मकथा हिंदी निबंध 250 शब्द में (Nadi ki Atmakatha Hindi Nibandh)

मैं नदी हूं, मैं आप सभी को अपनी आत्मकथा के बारे में बताने जा रही हूं। किस तरीके से मेरा जन्म हुआ और मैं कहां कहां बहती हुई जाती हूं और अंत में किस में समा जाती हूं।

हिमालय पर्वत से बर्फ पिघलने के कारण मैं इस दुनिया में आई हूं, जब मैं हिमालय से चलती हूं तो बहुत ही कम पानी मुझ में होता है। लेकिन जैसे-जैसे मैं आगे की तरफ बढ़ती हूं और मैदानी क्षेत्र की तरफ आती हूं तो मेरा जलस्तर बढ़ जाता है और मैं बहुत चौड़ी भी हो जाती हूं, जब हिमालय से निकलती हूं तो बहुत पतली धारा के रूप में आती हूं।

इस भारत की भूमि पर मेरे बहुत से नाम है, कभी गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी आदि। बहुत नामों से मुझे इस भारत की भूमि पर सभी लोग जानते हैं।

मैं इस भारत की भूमि पर बहुत सालों से निरंतर बहती आ रही हूं। कभी-कभी इस भूमि पर भूकंप आने की वजह से कुछ जगह ऊंची, तो कुछ जगह नीची हो जाती हैं। इसके लिए मैं अपना रास्ता स्वतः ही बदल लेती हूं। ऐसा हमेशा नहीं होता पर हां बहुत सालों में एक बार ऐसा अवश्य होता है। जहां-जहां से मैं बहती हूं, वहां पर मेरे किनारे पर बहुत से लोग कुछ कच्ची बस्तियां बना लेते है। इसके अलावा जंगली जानवर भी अपना घर बना लेते हैं क्योंकि कहीं ना कहीं उनका जीवन मेरे से ही चलता है।

जब बारिश के दिन होते हैं, उन दिनों में मेरे अंदर जल बहुत अधिक हो जाता है, जिसके कारण में बहुत तेजी से बहती हूं अंत में बहती हुई मैं समुद्र में समा जाती हूं।

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Image: नदी की आत्मकथा निबंध (nadi ki atmakatha in hindi)

नदी की आत्मकथा हिंदी निबंध 500 words (Nadi ki Atmakatha in Hindi Essay)

प्रस्तावना

मैं नदी हूं। मेरा जन्म हिमालय से होता है। मुझे यहां अलग-अलग नाम जैसे गंगा, यमुना, सरस्वती से पुकारा जाता है। मैं हिमालय से जब शुरू होती हूं तो मेरी धारा कम होती है। लेकिन आगे जाकर मैदानों में मैं फैल जाती हूं और मेरा जलस्तर भी बढ़ जाता है।

मैं नदी हूं मैंने कभी रुकना नहीं सीखा है। मैं हमेशा ही आगे चलने का उत्साह रखती हूं। मैं एक मिनट के लिए भी नहीं रुकती हुं। मैं जब पहाड़ों से निकलती हूं तो मेरा प्रवाह तेज होता है और समतल जगहों पर मेरा प्रवाह थोड़ा धीमा हो जाता है। मैं अपने जल से लाखों लोगों को जीवन देती हूं। मेरे ही जल्द से किसान सिंचाई कर के अनाज उगाते हैं। मैं ही मनुष्य और पेड़-पौधों का जीवन हुं।

मैं कौन हूं?

मेरा उद्गम हिमालय से होता है। हिमालय को ही मेरा पिता माना जाता है। मेरा प्रवाह शुरुआत में कम होता है लेकिन आगे जाकर बढ जाता है और फैल भी जाता है। मेरे रास्ते में कोई बाधा उत्पन्न नहीं कर सकता। मैं अपने रास्ते खुद बनाती हूं।

मेरे रास्ते में आने वाले पत्थर जिन्हें में अपने साथ ले जाती हूं और धीरे-धीरे तोड़कर छोटा कर देती हूं। मैंने कभी रुकना नहीं सीखा हर परिस्थिति में आगे चलना ही सिखा है। मेरी शुरुआत हिमालय से होती है और अंत समुंद्र में होता है।

मेरे जल का मनुष्य जीवन में उपयोग

मेरा पानी मनुष्य पीने के लिए काम में लेते हैं। मेरे पानी से ही लोग स्नान करते हैं और मेरे पानी से ही लोग कपड़े धोते हैं। मेरा पानी हर जगह काम आता है। उद्योगों में भी मेरा पानी काम आता है। मैं सभी के जीवन की रक्षा करती हूं और सभी को जीवन देती हूं।

मनुष्य के जीवन में मेरा जल बहुत ही महत्व रखता है। मेरे जल के बिना मनुष्य जीवित नहीं रह सकता है। मेरे जल्द से ही बिजली का उत्पादन होता है। यह बिजली मनुष्य को हजारों सुख सुविधाएं दे रही है।

किसानों के लिए उपयोगी है मेरा जल

किसान भी खेती-बाड़ी करने के लिए मेरे जल का ही उपयोग करते हैं। सिंचाई के सभी साधन मेरे पानी से चलते हैं। किसान मेरे जल्द से सिंचाई करके फसल पकड़ते हैं और अनाज उगाते हैं। मनुष्य के जीवन के हर मोड़ मेरा जल बहुत ही उपयोगी है। मनुष्य चाह कर भी मेरे बिना जीवित नहीं रह सकता हैं।

मनुष्य मेरी मुश्किलें बढ़ा रहा है

मैं मनुष्य के हर मोड़ में काम आती हूं। मैं अपने जल से मनुष्य को जीवन दान देती हूं। लेकिन मनुष्य ही मेरी मुश्किलें बढ़ा रहा है। मनुष्य कूड़ा कचरा मेरे अंदर फेंक देते हैं और फैक्ट्रियों का गंदा पानी भी मुझ में छोड़ देते हैं, जिससे मैं दूषित हो जाती हूं और दूसरे जानवरों की मौत का कारण बन जाती हूं।

लेकिन इसकी वजह मनुष्य ही है मनुष्य ही मेरी मुश्किलें बढ़ाते हैं। इसलिए मैं मन ही मन बहुत दुखी हूं कि जिसको मैं जीवनदान दे रही हूं, वही मेरी मुश्किलें बढ़ा रहे हैं।

उपसंहार

जल के बिना जीवन संभव नहीं है और यह जल हमारे देश में नदियों के जरिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचता है। नदियों से हमें जो जल मिलता है, जो पूरी तरह से शुद्ध और मीठा है, जिसे हम पीने के लिए उपयोग में लेते हैं। इसके अलावा सिंचाई कार्यों में भी नदी के जल का प्रयोग होता है।

नदी की आत्मकथा पर निबंध 1000 शब्द में (Nadi ki Atmakatha Nibandh in Hindi)

प्रस्तावना

मैं हिमालय से एक धारा के रूप में निकलने वाली नदी हूं। मैं आज आप सबको अपनी आत्मकथा के माध्यम से अपनी भावनाओं को सुनाने जा रही हूं। जैसा आप सब लोग बहुत अच्छे से जानते हैं कि यहां भारत की भूमि पर लोगों ने मुझे बहुत के नाम दिए हैं जैसे गंगा यमुना सरस्वती गोदावरी आदि।

मैं बिना किसी की रोक टोक के आजादी के साथ बहती रहती हूं। कहीं पर भी नहीं रुकती। मेरे रास्ते के अंदर बहुत सी रुकावट आती हैं। पर मैं उन मुश्किलों को पार करके भी आसानी से निकल जाती हूं।

मेरे जल के द्वारा खेतों की सिंचाई

किसान लोग मेरे पानी से ही अपने खेतों में हो रही फसलों की सिंचाई करते हैं। आज मनुष्य अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके खुद का ही नुकसान कर रहा है, इसीलिए प्राकृतिक आपदाओं के कारण ही हर जगह पर जो नदी हैं, उनका फायदा मनुष्य को नहीं मिल पाता।

भारत की भूमि पर कई स्थान ऐसे भी हैं, जहां पर गर्मियों के दौरान नदियों का जल सूख जाता है और मनुष्य एक एक बूंद पानी के लिए तरस जाता है। इसीलिए किसानों को मेरे जल से बहुत फायदा प्राप्त होता है।

जन कल्याण के लिए मेरे गुणों का महत्व

मैं जब हिमालय से निकलती हूं तो मैं कई चट्टानों से होकर निकल कर आती हूं। इसीलिए मेरे जल के द्वारा लोगों का बहुत फायदा होता है। मेरे जल से छोटी-छोटी नहरे भी निकलती है, जिसको लोग अपने खेतों की सिंचाई में भी काम ले लेते हैं और मैं किसी बंजर भूमि से निकलती हूं तो वह बंजर मिट्टी फसल करने योग्य हो जाती है।

क्योंकि जब मैं हिमालय से निकलती हूँ तो वहाँ से निकलने के बाद में अनेक रास्तों से गुजरते हुए आती हूं तो मेरे जल के अंदर इतने गुण विद्यमान हो जाते हैं कि बंजर भूमि भी उपजाऊ हो जाती है। मेरे इन्हीं गुणों की वजह से लोगों ने मुझे अलग-अलग नाम भी दे दिए हैं।

मेरे जल के द्वारा बिजली का निर्माण

जैसा आप सभी लोगों को पता है कि आज के समय में बिजली के बिना मनुष्य का हर काम असंभव है। इसीलिए मेरे जल से बिजली का निर्माण भी होता है क्योंकि मनुष्य के घर दफ्तर सभी कार्यों में बिजली की आवश्यकता होती ही है। बिजली का उत्पादन मेरे जल के बिना तो बिल्कुल संभव नहीं है, बिजली से चलने वाली जो भी मशीनें हैं, उनसे बहुत सारे काम किए जाते हैं।

यदि मेरे दिल के अंदर बिजली उत्पन्न करने की क्षमता ना होती तो आज मनुष्य टीवी, रेडियो और भी मनोरंजन के साधन उनको देख और सुन नहीं पाते। मेरे जल के द्वारा बड़े-बड़े बांध बनाकर उनमें बिजली बनाने वाले यंत्र लगाकर ही बिजली को बनाया जाता है।

विभिन्न त्योहारों में मेरे जल का महत्व

मेरे जल का धार्मिक महत्व भी होता है। मेरे मेरे जल को लोग धार्मिक पूजा पाठ में भी काम लेते हैं और कई बड़े त्योहारों में तो मेरे दर्शन करने के लिए आते हैं और स्नान आदि भी करते हैं। अमावस्या, पूर्णिमा, दीपावली, दशहरा, होली आदि त्योहारों के मौके पर लोग जरूर मेरे पास आते हैं।क्योंकि मेरे जल के अंदर स्नान करके सभी प्राणी सुख और शांति का अनुभव करते हैं।

मेरे जल की सुंदरता, कोमलता की वजह से सभी लोगों को मैं अपनी और आकर्षित कर लेती हूं। लोग अपने घरों में भी भगवान को प्रथम स्थान मेरे जल के द्वारा ही करवाते हैं। क्योंकि मेरे जल को शुद्ध भी माना जाता है और उसको पूजा के योग भी माना जाता है।

मेरे जल स्तर के बढ़ जाने से बाढ़ का आना

जिस प्रकार से मनुष्य हमारी प्रकृति का संतुलन बिगड़ता जा रहा है, वैसे ही कई बार अधिक बारिश के होने पर मेरे जल का स्तर बहुत बढ़ जाता है, जिसकी वजह से बाढ़ की स्थिति आ जाती है। इसके कारण मैं अपना बहुत ही विकराल रूप धारण कर लेती हूं और बहुत सारे गांव तटीय इलाके सभी को मैं दुगा देती हूं।

अर्थात मेरे जल के अंदर समा जाते हैं। मेरे कारण बहुत लोगों का घर भी उजड़ जाता है। उस उसके बाद जब मैं शांत होकर वापस आ जाती हूं तो मुझे अपने मन में बहुत पछतावा होता है कि मेरे कारण कितना विनाश हो गया।

मेरे जीवन के लिए भी मुश्किलों का सामना

मैं नदी हूं तो क्या मुझे भी मेरे जीवन में बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। वह मुश्किलें मुझे मनुष्य के द्वारा ही देनी पड़ती है क्योंकि मेरे जल को जिस प्रकार से मानव दूषित करते जा रहे हैं।

उसमें कूड़ा कचरा और भी अन्य गंदगी या फैक्ट्रियों के गंदे जल सभी से मेरा दिल इतना दूषित होता जा रहा है कि उससे बहुत से लोग, जानवर पीकर मर रहे हैं। इसीलिए मुझे भी मेरे जीवन में यह मुश्किल बहुत सताती हैं।

निष्कर्ष

मुझे जहां पर भारत में बहुत से स्थानों पर देवी की तरह पूजा जाता है और अक्सर देखा जाता है कि वहीं से लोग मुझे बहुत गंदा भी कर देते है। यह सब देख कर मुझे बहुत दुख होता है कि किस प्रकार से लोग मेरे जल को गंदा कर रहे हैं।

लेकिन अब हमारी सरकार इसके लिए बहुत अच्छे कदम उठा रही है और मनुष्य भी पहले से अधिक सचेत हो गए हैं, वह नदियों को साफ सुथरा रखने की पूरी कोशिश करते हैं। मगर यह सब इतना काफी नहीं है मैं सिर्फ इतना चाहती हूं कि लोग मेरे महत्व को समझे जाने और जागरूक हो जाए और मुझे जानबूझकर इतना गंदा ना करें।

अंतिम शब्द

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