जैन धर्म क्या है? इसका इतिहास तथा नियम

Jain Dharm History in Hindi: जैन धर्म अहिंसा के लिए जाना जाता है। भारत में जैन धर्म का इतिहास अत्यंत प्राचीन काल से बताया जा रहा है। बता दें कि आज के समय में भी जैन धर्म सबसे समृद्धि धर्म है। अक्सर जैन धर्म के खान-पान, रहन-सहन, भाषा विचार, जीवन यापन, व्यापार, सभ्यता संस्कृति तथा धर्म को लेकर बातें की जाती है।

जैन धर्म को सभी लोग अहिंसा के तौर पर जानते है क्योंकि जैन धर्म के अनुसार हिंसा करना गंभीर अपराध है, यह पाप की श्रेणी में आता है तथा इस प्रकार का पाप किसी भी मनुष्य को नहीं करना चाहिए। जैन धर्म ना केवल मनुष्य बल्कि पशु हिंसा के भी खिलाफ है। आपकी जानकारी के लिए बता देते हैं कि भारत में 24% टैक्स केवल जैन धर्म के लोगों द्वारा दिया जाता है, जबकि जैन धर्म की आबादी भारत के कुल आबादी का 0. 3% है।

इस स्थिति में जानकारों का मानना है कि अगर भारत में जैन समाज की आबादी केवल 3% ही हो गई, तो भारत सभी पश्चिमी देशों से आगे निकल जाएगा। भारत दुनिया का सबसे समृद्ध तथा अमीर देश बन जाएगा। आपकी जानकारी के लिए बता देते हैं कि जैन धर्म में कोई भी गरीब नहीं है।

Jain Dharm History in Hindi
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इसका मुख्य कारण है जैन धर्म की शिक्षा पद्धति, रहन सहन, सभ्यता संस्कृति, पालन पोषण इत्यादि सब कुछ निर्भर करता है। वर्तमान समय में भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर के बड़े-बड़े भारतीय कारोबारी जैन धर्म के हैं। इसके अलावा भारत में अधिकांश बड़े कारोबारी तथा करोड़पति लोग जैन समुदाय से है।

जैन समुदाय सदियों से ही व्यापार करता आ रहा है। इसीलिए जैन धर्म में व्यापार की कला अथवा गुण पाए जाते हैं। जैन धर्म का बच्चा कम आयु से ही बिजनेस में रुचि रखता है और कम उम्र से ही बिजनेस करना शुरू कर देता है।

जैन धर्म के प्रत्येक परिवार के सदस्य केवल एक ही बिजनेस नहीं बल्कि विभिन्न प्रकार के अलग-अलग बिजनेस पर कार्य करते हैं और अलग-अलग बिजनेस पर निर्भर रहते हैं। यही वजह है कि आज के समय में भारत में इतनी कम मात्रा में जैन धर्म के लोग बड़े पैमाने पर देश में विकास के तौर पर बड़ा सहयोग करें।

जैन धर्म क्या है? इसका इतिहास तथा नियम | Jain Dharm History in Hindi

जैन धर्म क्या है?

जैन धर्म मुख्य तौर पर भारत में निवास करता है तथा इसका उद्गम स्थल भी भारत ही है। जैन धर्म बौद्ध धर्म की तरह अहिंसा का पालन करता है। इसके अलावा जैन धर्म के अंतर्गत बौद्ध धर्म से संबंधित कई प्रकार की विशेषता सम्मान है। जैन धर्म के धर्म ग्रंथों के अनुसार चयन शब्द का अर्थ ‘जिन’ शब्द से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ होता है “जीतना”।

लेकिन जीतना किसी व्यक्ति देश या धर्म से नहीं, बल्कि खुद के मन से, खुद की भावनाओं से, खुद की इच्छाओं से, खुद की कामनाओं से, खुद की मनोवृति से, अपने आप से जीतना होता है। कहा जाता है कि जो भी व्यक्ति खुद की इच्छा, भावनाएं, मन इत्यादि पर अपना नियंत्रण पा लेता है। वह व्यक्ति जीत जाता है।

एक मनुष्य के तरीके जीवन में तथा मन में विभिन्न प्रकार के विचार उत्पन्न होते हैं। विभिन्न प्रकार की समस्याएं आती है, विभिन्न प्रकार से वह मन बनाता है। विभिन्न प्रकार का कार्य करता है। विभिन्न प्रकार की सोच रखता है। विभिन्न प्रकार के गलत काम करता है। मनुष्य के मस्तिष्क में तरह-तरह के ख्याल आते हैं। उसके मन में तरह-तरह की भावना उत्पन्न होती है। इसीलिए वह मनुष्य कुछ भी कर सकता है।

जैन धर्म के अंतर्गत बताया गया है कि मनुष्य को अपने आप पर जीत हासिल करनी होगी। अपनी भावनाओं को काबू में रखना होगा। अपनी वासनाओं को काबू में रखना होगा। अपनी ज्ञानेंद्रियों को काबू में रखना होगा। अगर कोई ऐसा करता है तो वह अपने आप को जीत लेता है।

जैन धर्म के अंतर्गत अब तक कई प्रकार के धर्मगुरु हुए हैं। उनके द्वारा तरह तरह से धर्म का प्रचार और प्रसार किया गया है। जैन धर्म के लोग शिक्षा उपदेश तथा ज्ञान के आधार पर धर्म का प्रचार करते हैं। यह एक शांत धर्म है, जो हमेशा हिंसा का विरोध करता आ रहा है। सदियों से ही जैन ने धर्म मानव तथा पशु हिंसा के खिलाफ आवाज उठाई है।

जैन धर्म के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के उपदेश दिए गए हैं। विभिन्न प्रकार का ज्ञान दिया गया है, जिनके आधार पर कोई भी व्यक्ति अपने आपको जीत सकता है। अपनी भावनाओं और अपनी ज्ञान इंद्रियों पर नियंत्रण पा सकता है। अगर कोई व्यक्ति ऐसा कर सकता है तो उसका जीवन सफल माना जाता है, तो आइए जानते हैं कि जैन धर्म का इतिहास क्या है?

जैन धर्म का इतिहास (Jain Dharm History in Hindi)

जैन धर्म प्राचीनतम धर्म में से एक है। इसका उद्गम अनंत काल से माना जा रहा है। जैन धर्म के प्राचीन और बड़े स्तर पर धर्म का प्रचार प्रसार करने वाले महावीर स्वामी के समय जैन धर्म की प्रसिद्धि देखी गई है। जैन धर्म की परंपराओं का निर्वाह तीर्थंकरों के माध्यम से होता है। अब तक जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर रह चुके हैं।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जैन धर्म का पहला तीर्थंकर ऋषभदेव थे तथा भगवान महावीर स्वामी को आखिरी तीर्थंकर कहा जाता है। जैन धर्म के धर्म शास्त्रों के अनुसार पहले तीर्थंकर ऋषभदेव को राजा भरत का पिता कहा गया है। इस बात से जैन धर्म के प्राचीनता का पता चलता है।

वर्तमान समय में जैन धर्म का उद्गम 3000 ईसा पूर्व सिंधु घाटी सभ्यता से होना बताया जा रहा है। जानकारों के मुताबिक जैन धर्म अपने उद्गम के समय से ही समर्थ रहा है, जो वर्तमान समय तक समृद्ध है। इसके अलावा जैन धर्म के उद्गम से संबंधित विभिन्न प्रकार के अलग-अलग जानकारियां उपलब्ध है। परंतु इसके अतिरिक्त कोई और ठोस सबूत भी नहीं है।

अलग-अलग लोगों और अलग-अलग किताब द्वारा जैन धर्म के उद्गम को लेकर भिन्न-भिन्न बातें कही जा रही है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जैन धर्म के लोग अहिंसा के सिद्धांत को बहुत ही शक्ति से मानते हैं। जैन धर्म के अंतर्गत दो संप्रदाय हैं पहला “दिगंबर” और दूसरा “श्वेतांबर”।

जैन धर्म ग्रंथों में बताया गया है कि जैन धर्म के उद्गम के विभिन्न कारण है। इन कारणों के आधार पर जैन धर्म की स्थापना की गई मुख्य कारण अहिंसा को बताया जाता है। कहा जाता है कि उस दौर में अहिंसा बड़े पैमाने पर बढ़ गई थी तथा राजनीतिक और सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति अत्यंत कमजोर हो चुकी थी।

धार्मिक परिवर्तन भी बड़े पैमाने पर देखने को मिल रहे थे, जिनमें ब्राह्मणों को मुख्य बताया गया है। इन सभी परिस्थितियों की वजह से हालात खराब हो रहे थे। ऐसी स्थिति में जैन धर्म उद्गम में आया, जिसके बाद विभिन्न प्रकार के बदलाव देखने को मिले तथा जैन धर्म में लोगों को उपदेश दिए तथा हिंसा के खिलाफ आवाज उठाई।

कहा जाता है कि छठी सदी ईसा पूर्व ब्राह्मणों ने विभिन्न प्रकार के धार्मिक भ्रांतियां फैलाई, जिसका दुष्परिणाम देखने को मिला, उसे समय क्षत्रिय और ब्राह्मणों में मतभेद होने लगे। कहा जाता है कि मतभेद के चलते कुछ सदस्यों ने ही जैन धर्म की स्थापना की थी। प्राचीन इतिहास देखे तो महावीर स्वामी भी क्षत्रिय थे, ब्राह्मणों ने वर्णों की स्थापना करके लोगों को अलग-अलग बांट दिया था‌।

ऐसी स्थिति में मध्यमवर्ग कहलाने वाले वैश्य तीसरे स्थान पर होते हुए उद्गम हो रहे जैन धर्म को सहयोग करना शुरू किया। उस समय किसान भी काफी परेशान हुआ करते थे क्योंकि उस जमाने में पशुओं की बलि देना प्रचलित हो गया था।

पशुओं की बलि देने से पशुओं की कमी होने लगी, जिसकी वजह से विभिन्न प्रकार की समस्या उत्पन्न हुई। यहां पर भी जैन धर्म ने अहिंसा के पथ पर चलते हुए पशु बलि का विरोध किया। इस तरह से उस समय भारत में विभिन्न प्रकार के रूढ़िवादी परंपरा चल रही थी।

विभिन्न प्रकार की वर्ण व्यवस्था चल रही थी तथा विभिन्न प्रकार की पद्धति चल रही थी। उन सभी का विरोध करते हुए जैन धर्म आगे बढ़ता गया। इस दौरान समय-समय पर लोगों का साथ भी मिलता गया। समय-समय पर जैन धर्म के तीर्थंकर होते हुए, जिन्होंने तरह तरह के उपदेश दिए और जैन धर्म को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया उनका जैन धर्म के इतिहास में बहुत बड़ा योगदान है।

जैन धर्म के तीर्थंकर

जैन धर्म को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाले तथा धर्म का प्रचार प्रसार करना, लोगों को उपदेश देना ज्ञान देना, अहिंसा के पथ पर चलना सिखाना इत्यादि कार्य करने वाले धर्म गुरुओं को तीर्थंकर कहा जाता है, जो अब तक 24 तीर्थंकर जैन धर्म के अंतर्गत हो चुके हैं। ऋषभदेव जैन धर्म का प्रथम तीर्थंकर कहा जाता है।

लोग उन्हें आदिनाथ के नाम से भी जानते हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार 1000 वर्ष तपस्या करने के बाद ऋषभदेव को ज्ञान प्राप्त हुआ था। इसका वर्णन ऋग्वेद और अथर्ववेद में भी किया गया है। आपकी जानकारी के लिए बता देंगे कि शिव पुराण में ऋषभदेव को शिव जी का अवतार बताया गया है।

इसके अलावा – अजितनाथ, सँभवनाथ, अभिनन्दन, पद्मप्रभु, सुपार्श्वनाथ, चंदाप्रभु, सुविधिनाथ, शीतलनाथ, श्रेयांसनाथ, वासुपूज्य, विमलनाथ, अनंतनाथ, धर्मनाथ, शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरनाथ, मल्लिनाथ, मुनिसुव्रत, नेमिनाथ, अरिष्टनेमि, पार्श्वनाथ और महावीर स्वामी इत्यादि फुल 24 तीर्थंकर हुए, जिन्होंने जैन धर्म का प्रचार प्रसार किया।

जैन धर्म ग्रंथों तथा नियम

प्रत्येक धर्म को चलाने के लिए तथा उसका पालन करने के लिए धर्म ग्रंथ होता है, जिसके अंतर्गत कुछ नियम और कानून कायदे निर्धारित किए जाते हैं। ठीक उसी प्रकार जैन धर्म के भी धर्म ग्रंथ हैं, जिनमें विभिन्न प्रकार के ग्रंथ लिखे गए हैं। उपदेश दिए गए हैं ज्ञान दिया गया है, अहिंसा का पाठ पढ़ाया गया है।

इसके अलावा धर्म का पालन करने के लिए नियम भी बताए गए हैं, जिनके आधार पर चलकर प्रत्येक जैन धर्म के लोग स्वयं को जीतते हैं। अपने मन को जीतते हैं। अपनी भावनाओं तथा अपनी ज्ञान इंद्रियों पर काबू रखते हैं और अपने धर्म का पालन करते हैं।

जैन धर्म के ग्रंथ का नाम “आगम ग्रंथ” है। इस ग्रंथ को संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं में लिखा गया है। इसके अंतर्गत आने वाले कुल 45 आगम ग्रंथों को चार अलग-अलग भागों में विभाजित किया गया है, जिनके नाम इस प्रकार है: प्रथमानुयोग, करनानुयोग, चरणानुयोग, द्रव्यानुयोग।

श्वेतांबर जैन धर्म के लोगों का प्रमुख धर्म ग्रंथ “कल्पसूत्र” माना जाता है। इसके अलावा “तत्वार्थ सूत्र” सभी जैन धर्म के लोगों का धर्म ग्रंथ है। इन ग्रंथों के अलावा जैन धर्म के अंतर्गत भगवान श्रीराम पर आधारित राम कथा का वर्णन किया गया है तथा विभिन्न प्रकार के हिंदू कथाओं पर आधारित काव्य लिखे गए हैं। जैसे पुराण काव्य, कथा काव्य, रास काव्य, चरित काव्य इत्यादि।

जैन धर्म के नियम

  • जैन धर्म के अनुयायियों को 5 उपवास धारण करने होते हैं, जिन्हें महाव्रत किया जाता है।
  • जैन धर्म के लोगों को अहिंसा के पथ पर चलना होता है, जिसके तहत किसी भी जीव के प्राण नहीं लेने होते हैं।
  • जैन धर्म के अनुसार हमेशा सत्य बोलना होता है तथा प्रत्येक व्यक्ति से प्रिय वचन करना होता है।
  • जैन धर्म के लोग किसी भी व्यक्ति की किसी भी वस्तु को उसकी आज्ञा के बिना ग्रहण नहीं करते हैं।
  • जैन धर्म के लोग ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं।
  • जैन धर्म के लोग अपने मन पर, अपने वचन पर, अपनी वासना पर, अपने ज्ञान एवं इंद्रियों पर काबू रखते हैं।

निष्कर्ष

जैन धर्म भारत के प्राचीनतम धर्मा में से एक है, जो वर्तमान समय में काफी समय लगता है। जैन धर्म के धर्म ग्रंथ जैन धर्म के नियम जैन धर्म के तीर्थंकर तथा जैन धर्म का उद्गम इत्यादि सभी जानकारी इस आर्टिकल में आप ध्यान पूर्वक पढ़ सकते हैं।

इस आर्टिकल में हमने जैन धर्म से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी विस्तार से बताई, जिनमें मुख्य रुप से जैन धर्म का इतिहास (Jain Dharm History in Hindi) बताया गया है। हमें उम्मीद है यह जानकारी आपको जरूर पसंद आई होगी। अगर आपका इस आर्टिकल से संबंधित कोई भी प्रश्न है तो आप नीचे कमेंट करके पूछ सकते हैं। हम आपके द्वारा पूछे गए प्रश्न का उत्तर अवश्य देंगे।

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