स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय

Biography of Swami Vivekananda in Hindi: नमस्कार दोस्तों, आज हम अपने इस महत्वपूर्ण लेख के माध्यम से बात करने वाले हैं, 19वीं सदी के महान विद्वान और हिंदी साहित्य को विदेशों तक पहुंचाने वाले महापुरुष के बारे में। हमारे इतना कहने के बाद आप तो समझ ही गए होंगे कि हम बात किसकी कर रहे हैं। जी हां, आपने बिल्कुल सही समझा हम बात कर रहे हैं महा ज्ञाता स्वामी विवेकानंद की। स्वामी विवेकानंद एक ऐसे महान व्यक्ति थे, जिन्होंने हिंदू धर्म को संपूर्ण विश्व में स्थापित करने के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया।

Biography of Swami Vivekananda in Hindi
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आज हम आप सभी लोगों को आपने तो पूर्ण लेख के माध्यम से स्वामी विवेकानंद के जीवन परिचय से संबंधित सभी जानकारियों को बड़े ही विस्तार पूर्वक से बताने वाले हैं। इस लेख के माध्यम से आप सभी लोगों को स्वामी विवेकानंद कौन है? स्वामी विवेकानंद के माता-पिता, स्वामी विवेकानंद का जन्म, स्वामी विवेकानंद की शिक्षा, स्वामी विवेकानंद के गुरु, स्वामी विवेकानंद की यात्राएं इत्यादि विषयों पर विस्तार पूर्वक से जानकारी प्राप्त करने को मिलेगी।

यदि आप स्वामी विवेकानंद के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं तो कृपया इस लेख के साथ अवश्य बने रहें।

स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय | Biography of Swami Vivekananda in Hindi

स्वामी विवेकानंद के विषय में संक्षिप्त जानकारी

वास्तविक नामनरेंद्र दास दत्त
उपनामनरेंद्र
प्रसिद्ध नामस्वामी विवेकानंद
जन्म12 जनवरी 1863 ईस्वी
जन्म स्थानकोलकाता
माता का नामभुवनेश्वरी देवी
पिता का नामविश्वनाथ दत्त
गुरु का नामरामकृष्ण परमहंस
प्रसिद्धि का कारणअमेरिका, इंग्लैंड और यूरोप में हिंदू धर्म की अटूट सिद्धांत का प्रसार
मृत्यु4 जुलाई 1902
मृत्यु स्थानबेलूर मठ, बंगाल
पेशाआध्यात्मिक गुरु

स्वामी विवेकानंद कौन है?

महान चरित्र वाले स्वामी विवेकानंद भारतीय इतिहास के सबसे प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरुओं में से एक थे। स्वामी विवेकानंद हमारे भारत के एक मठ वासी संत थे। स्वामी विवेकानंद ने अपने छोटे से जीवन आयु काल में अपने द्वारा किए गए प्रसिद्ध कार्यों की वजह से प्रसिद्धि प्राप्त किया। आध्यात्मिक गुरु स्वामी विवेकानंद ने न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी उन्होंने हिंदू धर्म और मंतव्य को लौह बना दिया।

स्वामी विवेकानंद भारतीय वैदिक सनातन संस्कृति के माने जाने जीवंत प्रतिमूर्ति है। स्वामी विवेकानंद को भारत में ज्ञान के प्रवर्तक के रूप में पूजा भी जाता है, क्योंकि स्वामी विवेकानंद से पहले हमारे भारतवर्ष को दासो और अज्ञानी लोगों का निवास स्थान माना जाता था। स्वामी विवेकानंद ने संपूर्ण विश्व को हमारे भारतीय धर्म के आध्यात्मिकता और हिंदू धर्म से परिपूर्ण वेदांत के दिव्य दर्शन कराएं।

स्वामी विवेकानंद का जन्म कब और कहां हुआ था?

स्वामी विवेकानंद का जन्म एक उच्च कुलीन परिवार में हुआ था। स्वामी विवेकानंद वर्ष 1863 ईस्वी की 12 जनवरी को जन्मे भारत के सबसे महान आध्यात्मिक गुरु थे। स्वामी विवेकानंद ने भारत को अटूट प्रगति देने वाले गुरुओं के शहर कोलकाता में जन्म लिया था। भारतीय इतिहास में ज्यादातर मठाधीश कोलकाता शहर से ही आए थे।

स्वामी विवेकानंद का पारिवारिक संबंध

जैसा कि आप सभी जानते हैं, स्वामी विवेकानंद एक उच्च कुलीन परिवार से संबंध रखते हैं। स्वामी विवेकानंद का इनके माता-पिता ने काफी प्रेम पूर्वक पालन पोषण किया था। स्वामी विवेकानंद बचपन से ही पढ़ाई लिखाई में काफी निपुण और चतुर थे, जिसके कारण इनके माता-पिता इनसे काफी प्रेम करते थे।

स्वामी विवेकानंद की माता का नाम भुवनेश्वरी देवी साइन के परम पूज्य पिता का नाम विश्वनाथ दत्त था। स्वामी विवेकानंद अपने माता पिता की काफी इज्जत करते थे और सदैव इनकी सेवा भी करते हैं।

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स्वामी विवेकानंद का प्रारंभिक जीवन

स्वामी विवेकानंद जब बहुत ही कम उम्र के थे, उस समय यह बहुत ही शरारती हुआ करते थे। स्वामी विवेकानंद पढ़ाई लिखाई में तो अच्छे थे ही इसके साथ साथ खेलकूद में भी स्वामी विवेकानंद काफी अच्छे थे। स्वामी विवेकानंद ने वाद्य यंत्रों की को बचाने और संगीत में शिक्षा भी प्राप्त की थी।

स्वामी विवेकानंद अपने छोटे ही उम्र में इन सभी कार्यों के उपरांत ध्यान (मेडिटेशन) भी किया करते थे। स्वामी विवेकानंद अपने बाल्यकाल से ही ईश्वर के अस्तित्व (वास्तव में ईश्वर है या नहीं) के संबंध में और अनेकों प्रकार के रीति-रिवाजों जातिवाद इत्यादि के विषय में सदैव किसी ना किसी ज्ञानी व्यक्ति से प्रश्न भी किया करते थे और उनके प्रश्नों का सही उत्तर जानने के लिए जिज्ञासु थे।

स्वामी विवेकानंद अपने बाल्यकाल में सन्यासियों के प्रति काफी श्रद्धा प्रकट करते थे। जब कभी भी स्वामी विवेकानंद के पास कोई ऐसी चीज होती थी, जो कि किसी भी व्यक्ति के लिए जरूरी हो और वह व्यक्ति जब उनसे उस चीज की मांग करता था तो वह बिना किसी प्रश्न के अपनी वह चीज उस व्यक्ति को दे दिया करते थे। स्वामी विवेकानंद ने सन्यासी और फकीरों के द्वारा मांगे जाने पर कई बार अपनी सबसे सबसे अधिक लगाव वाली चीजों को भी दान कर दिया था।

इसके साथ-साथ स्वामी विवेकानंद जितने ज्यादा भोले स्वभाव के थे, उतने ही ज्यादा शरारती स्वभाव के भी थे। एक बार स्वामी विवेकानंद की माता ने उनके बारे में एक बात कही थी कि “हे भगवान शिव मैंने आपसे सदैव एक बालक देने की प्रार्थना करती रहती थी और आपने उसे पूरा भी किया, परंतु उसके जगा एक भूत को ही भेज दिया”, आप इससे यह अंदाजा लगा सकते हैं कि स्वामी विवेकानंद कितने ज्यादा शरारती रहे होंगे।

स्वामी विवेकानंद के गुरु

स्वामी विवेकानंद को ब्रह्म समाज से जुड़ने के बाद ब्रह्म समाज के प्रमुख देवेंद्र नाथ टैगोर से मिलने का मौका भी मिला था। स्वामी विवेकानंद ने अपने प्रश्नों के आदेश के अनुसार देवेंद्र नाथ टैगोर से एक प्रश्न पूछा कि “क्या आपने कभी ईश्वर को देखा है?”।

इस प्रश्न को सुनने के बाद देवेंद्र नाथ जी ने मुस्कुराते हुए स्वामी विवेकानंद के प्रश्नों का उत्तर दिया कि “बेटे तुम्हारी नजर एक योगी की है”। स्वामी विवेकानंद देवेंद्र नाथ टैगोर के इस उत्तर से संतुष्ट नहीं हुए, जिसके कारण उन्होंने इसके बाद भी ईश्वर की खोज को जारी रखा।

स्वामी विवेकानंद ने ब्रह्म समाज से जुड़ने के बाद अपने अध्ययन के दौरान वर्ष 1881 में दक्षिणेश्वर में गए थे। यहां पर स्वामी विवेकानंद की भेंट दक्षिणेश्वर में स्थित रामकृष्ण परमहंस जी से हुई। रामकृष्ण परमहंस जी से स्वामी विवेकानंद ने अपनी जिज्ञासा के अनुसार पुनः वही प्रश्न पूछा कि “क्या आपने कभी ईश्वर को देखा है?”। इस प्रश्न को सुनने के बाद रामकृष्ण परमहंस ने दयालु भाव से उत्तर दिया कि “हां बेटा मैंने ईश्वर को देखा है और बिल्कुल ऐसे ही देखा है, जैसे कि मैं तुमको देख रहा हूं”।

रामकृष्ण परमहंस जी ऐसे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने स्वामी विवेकानंद के इस प्रश्न का उत्तर दिया था। स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण परमहंस के के द्वारा न केवल अपने उत्तर को प्राप्त किए, बल्कि वह उनके इस उत्तर से सच्चाई भी महसूस कर रहे थे।

रामकृष्ण परमहंस उस समय में ऐसे पहले व्यक्ति थे, जिनसे की स्वामी विवेकानंद प्रभावित हुए थे। स्वामी विवेकानंद ने गुरु रामकृष्ण परमहंस के साथ बहुत से मुकाबले की है और अपने प्रश्नों के सही उत्तर जानने के बाद यह काफी शांत महसूस करते थे। स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण परमहंस जी को अपना गुरु बना लिया।

रामकृष्ण परमहंस कौन थे?

रामकृष्ण परमहंस एक विद्वान और देवी देवताओं में विश्वास करने वाले व्यक्ति थे। रामकृष्ण परमहंस दक्षिण उत्तर में स्थित माता काली के मंदिर में पुजारी हुआ करते थे। रामकृष्ण परमहंस बहुत बड़े विद्वान तो नहीं थे, परंतु काली माता के परम भक्त थे। रामकृष्ण परमहंस अपने सटीक उत्तर और दयापूर्ण बातों से सबका मन मोहित कर लेते थे।

स्वामी विवेकानंद को प्राप्त शिक्षा

जिसमें स्वामी विवेकानंद मात्र 8 वर्ष के थे, उसी समय उन्होंने ईश्वर चंद्र विद्यासागर के मेट्रोपॉलिटन इंस्टीट्यूशन में अपना एडमिशन करा लिया। स्वामी विवेकानंद ने अपनी पढ़ाई को 1877 में पूर्ण कर लिया। स्वामी विवेकानंद 1877 ईस्वी से लेकर 1879 ईसवी तक रायपुर में अपने संपूर्ण परिवार के साथ निवास किया। इसके बाद इन्होंने पुनः कोलकाता लौटने की ठानी और 1879 में ही कोलकाता लौट गए।

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स्वामी विवेकानंद कोलकाता प्रेसिडेंसी कॉलेज में प्रवेश ले लिए। मात्र 1 वर्ष बाद उन्होंने कोलकाता के स्कॉटिश चर्च कॉलेज में दाखिला लिया और फिर फिलॉसफी पढ़ने की ठानी। स्कॉटिश चर्च कॉलेज में इन्होंने पश्चिमी फिलॉसफी, यूरोपियन देशों के इतिहास और पश्चिमी तर्क वितर्क के बारे में ज्ञान हासिल किया। इन सभी के अलावा स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस से धर्म ग्रंथ, वेद, उपनिषद, महाभारत, भगवत गीता, पुराण और रामायण जैसे महान ग्रंथों का भी अध्ययन किया।

स्वामी विवेकानंद का मठवाड़ी बनने का निर्णय

जैसा कि हम सभी जानते हैं, स्वामी विवेकानंद उनकी रूचि बचपन से ही मठवाडी और सन्यासियों की तरफ ज्यादा थी। इसके बाद वह गुरु रामकृष्ण परमहंस से मठवाड़ी बनने की शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। गुरु रामकृष्ण परमहंस को गले का कैंसर था, जिसके कारण वर्ष 1886 श्री में रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु हो गई। रामकृष्ण परमहंस मृत्यु को प्राप्त करने से पहले अपने उत्तराधिकारी के रूप में स्वामी विवेकानंद को चुना।

स्वामी विवेकानंद ने एक अच्छे पुत्र की तरह रामकृष्ण परमहंस के शव का अंतिम संस्कार भी किया। संपूर्ण प्रक्रिया के पश्चात रामकृष्ण परमहंस के द्वारा चयनित किए गए उत्तराधिकारी के रूप में स्वामी विवेकानंद को उनके अन्य शिष्यों के द्वारा कुछ त्याग इत्यादि करके पटवारी बनने की शपथ दिलाई गई। स्वामी विवेकानंद को मठाधीश जबरदस्ती नहीं बल्कि उनके मन से बनाया गया। शपथ ग्रहण करने के बाद स्वामी विवेकानंद और उनके शिष्य सभी लोग बरणगौर में निवास करने लगे।

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स्वामी विवेकानंद के द्वारा किया गया विश्व धर्म सम्मेलन

जैसा कि आप सभी जानते हैं, स्वामी विवेकानंद ने कई विश्व सम्मेलनों में हिस्सा लिया और भारतीय संस्कृति को बढ़ावा दिया। इसी तरह सन 18 से 93 ईसवी में स्वामी विवेकानंद अमेरिका में स्थित शिकागो शहर पहुंच गए। अमेरिका के शिकागो शहर में संपूर्ण विश्व के धर्मो का सम्मेलन आयोजित किया गया था। स्वामी विवेकानंद ने इस सम्मेलन में अपने स्थान पर विराजमान हो गए।

इस विश्व धर्म सम्मेलन में सभी धर्मों की पुस्तके रखी गई थी, जहां पर हमारे भारतवर्ष की एक पुस्तक रखी गई थी, यह पुस्तक श्रीमद्भगवद्गीता थी। हमारी भारतीय पुस्तक श्रीमद्भगवद्गीता का कुछ लोग मजाक बना रहे थे। ये लोग काफी समय से हमारी भारतीय संस्कृति का मजाक बना रहे थे, स्वामी विवेकानंद काफी क्रोधित है, परंतु शांत स्वभाव धारण करने के कारण वे चुप थे।

सभी लोगों के पश्चात जब स्वामी विवेकानंद की बारी आई तो इन्होंने अपने भाषण की शुरुआत में एक ऐसा वाक्य कहा, जिससे कि पूरा का पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। आइए जानते हैं कि स्वामी विवेकानंद ने शुरुआत में ऐसा क्या कहा था?

स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषण की शुरुआत में कहा था कि “मेरे सभी अमेरिकी भाइयों एवं बहनों”। हमें एक धर्म लोगों की सम्मान और दूसरे धर्मों का सम्मान करना सिखाती है, ऐसा स्वामी विवेकानंद ने मात्र इन्हीं कुछ शब्दों के माध्यम से व्यक्त कर दिया। स्वामी विवेकानंद ने हमारे धार्मिक पुस्तक श्रीमद्भगवद्गीता को सभी लोगों के मध्य एक लौह बना दिया, जिसे हटाना अब किसी के बस में नहीं है।

विवेकानंद का शिकागो में दिया गया विश्व प्रसिद्ध भाषण

स्वामी विवेकानंद जी के द्वारा कहे गए कुछ अनमोल वचन

  • स्वामी विवेकानंद का सबसे अनमोल वचन यह है कि उठो, जागो और तब तक रुको नहीं जब तक तुम अपने ध्येय की प्राप्ति ना कर लो।
  • स्वामी विवेकानंद ने कवि सम्मेलन में ऐसा कहा था कि खुद को समझाएं, दूसरों को समझाएं सोई हुई आत्मा को जगाए और देखिए यह कैसे जागृत होती हैं। जब सोई हुई आत्मा जागृत हो जाती है, तो देखिए किस प्रकार की ताकत, उन्नति, अच्छाई का बोध आता है।
  • यदि किसी भी व्यक्ति को हिंदू धर्म के 33 करोड़ देवी देवताओं पर विश्वास है, परंतु खुद पर विश्वास है ही नहीं तो आप मुक्ति नहीं प्राप्त कर सकते हैं। मुक्ति प्राप्त करने के लिए खुद पर भरोसा रखें, हमें खुद के भरोसे की ही आवश्यकता है।
  • सफलता के तीन आवश्यक अंग होते हैं शुद्धता, दृढ़ता और धैर्य परंतु इन सभी धर्मों से बढ़कर जो सबसे बड़ा सत्य है वह प्रेम है।
  • हम अपने बल के कारण अपने संपूर्ण जीवन काल में ज्यादा से ज्यादा प्राप्त करने की चेष्टा करते हैं, परंतु यही हमारा सबसे बड़ा पाप होता है और हमेशा करके स्वयं के दुख को आमंत्रित कर लेते हैं।

स्वामी विवेकानंद ने इन सभी वाक्यों के अलावा भी हजारों लाखों वाक्य कहे थे, परंतु उन सभी में से ऊपर कुछ महत्वपूर्ण और प्रेरणादाई वाक्यों को हमने प्रस्तुत किया है। यदि आप इन बातों पर अमल करते हैं तो आप भी प्रसिद्धि का मार्ग बड़ी ही आसानी से खोज सकते हैं।

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स्वामी विवेकानंद की मृत्यु

स्वामी विवेकानंद वर्ष 1920 में 4 जुलाई को वह प्रातः जल्दी ही उठ कर बेलूर मत चले गए। बेलूर मठ में स्वामी विवेकानंद ने लगभग 3 घंटों तक ध्यान किया और ध्यान करने के पश्चात स्वामी विवेकानंद ने अपने शिष्यों को शुक्ल – यजुर्वेद, संस्कृत व्याकरण और योग का ज्ञान दिया।

अपने शिष्यों को ज्ञान की बातें बताने के बाद स्वामी विवेकानंद तक गंगा जी में स्नान किए और शाम को 7:00 बजे अपने कक्ष में विश्राम करने के लिए चले गए और किसी को भी परेशान करने (डिस्टर्ब) से मना किया। स्वामी विवेकानंद उस दिन ध्यान करने के लिए बैठ गए और लगभग 9:10 पर स्वामी विवेकानंद ने अपने प्राणों को त्याग दिया।

स्वामी विवेकानंद के शिष्यों के कथन अनुसार उन्होंने महासमाधि धारण की थी। महासमाधि एक ऐसी समाधि होती है, जिसमें आत्मा अपने शरीर को त्याग कर ध्यान में लिप्त रहती है। स्वामी विवेकानंद का अंतिम संस्कार गंगा नदी के तट पर कर दिया गया।

स्वामी विवेकानंद कौन थे?

परम ज्ञान और आध्यात्मिक गुरु।

स्वामी विवेकानंद के माता पिता का नाम क्या है?

भुवनेश्वरी देवी और विश्वनाथ दत्त।

स्वामी विवेकानंद के गुरु कौन थे?

रामकृष्ण परमहंस।

स्वामी विवेकानंद की मृत्यु कब हुई थी?

4 जुलाई 1902

स्वामी विवेकानंद का अंतिम संस्कार कहां किया गया था?

गंगा नदी के तट पर।

निष्कर्ष

हमें उम्मीद है कि आपको स्वामी विवेकानंद कि यह प्रेरणा दाई और ज्ञानवर्धक बायोग्राफी आपको अवश्य पसंद आई होगी। यदि आपको यह “स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय (Biography of Swami Vivekananda in Hindi)” पसंद आया हो तो कृपया इसे अपने मित्रों और सहपाठियों के साथ अवश्य साझा करें। यदि आपके मन में किसी भी प्रकार का सवाल या फिर सुझाव हो तो कमेंट बॉक्स में अवश्य बताएं।

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इनका नाम राहुल सिंह तंवर है, इन्होंने स्नातक (रसायन, भौतिक, गणित) की पढ़ाई की है और आगे की भी जारी है। इनकी रूचि नई चीजों के बारे में लिखना और उन्हें आप तक पहुँचाने में अधिक है। इनको 3 वर्ष से भी अधिक SEO का अनुभव होने के साथ ही 3.5 वर्ष का कंटेंट राइटिंग का अनुभव है। इनके द्वारा लिखा गया कंटेंट आपको कैसा लगा, कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। आप इनसे नीचे दिए सोशल मीडिया हैंडल पर जुड़ सकते हैं।

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