भारत के चार धाम का इतिहास, सम्पूर्ण जानकारी

Bharat Ke Char Dham: भारत एक सांस्कृतिक देश है। यहां पर सबसे ज्यादा सनातन धर्म मानने वाले लोग रहते हैं। हिंदू धर्म में कई पौराणिक ग्रंथ है और पौराणिक ग्रंथों में इस धरती पर देवी-देवताओं ने अवतार लेकर राक्षसों का वध करने की कई घटनाएं वर्णित है।

भारत की पावन धरती पर ईश्वर ने कई रूप में अवतार लिया है और आज वे सभी पावन जगह धार्मिक स्थल बन चुके हैं। वैसे तो भारत में कई धार्मिक स्थल एवं मंदिर है लेकिन भारत के 4 मंदिर को चार धाम के नाम से जाना जाता है। चारों धाम भारत के चारों दिशाओं में स्थित है।

उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में तमिलनाडु राज्य में रामेश्वरम, पूर्व में उड़ीसा राज्य में जगन्नाथ पुरी एवं पश्चिम में गुजरात में द्वारकाधीश मंदिर स्थित है। इन चारों मंदिरों को चार धाम के नाम से जाना जाता है।

Bharat Ke Char Dham

हिंदू धर्म में चार धाम की यात्रा को बहुत ही पावन बताया गया है। माना जाता है जीवन में एक बार यदि व्यक्ति इन चारों धाम की यात्रा कर ले तो वह पाप मुक्त हो जाता है। हालांकि इसके अतिरिक्त चारों धाम की यात्रा करने से व्यक्ति अपने प्राचीन संस्कृति से अवगत होता है। भारतीय संस्कृति के रीति रिवाज के बारे में जानने को मिलता है।

इसके अतिरिक्त विभिन्न भाषा, इतिहास, धर्म और परंपरा आदि से परिचित होते हैं और आत्मज्ञान के रास्ते खुल जाते हैं। इन चारों धामों पर एक दिव्य शक्ति का अनुभव होता है, जिससे व्यक्ति बहुत ही शांती का अनुभव करता है और वह जीवन के सभी दुख सुख को भूलकर भगवान का गुणगान करने लगता है तो चलिए इस लेख के माध्यम से भारत के चारों धाम के इतिहास (Bharat Ke Char Dham) और उससे जुड़े पौराणिक कथाओं के बारे में जानते हैं।

भारत के चार धाम (Bharat Ke Char Dham)

भारत के चार धाम के नाम और उनसे जुड़ी सामान्य जानकारी निम्न है:

धाममठदिशावेदकुंभराज्य
जगन्नाथ धामगोवर्धनपूर्वऋग्वेदप्रयागराजपुरी, ओडिशा
द्वारका धामशारदापश्चिमसामवेदउज्जैनद्वारका, गुजरात
बद्रीनाथ धामज्योतिर्मठउत्तरअथर्ववेदहरिद्वारउत्तराखण्ड
रामेश्वरम धामवेदान्त ज्ञानमठदक्षिणयजुर्वेदनाशिकरामेश्वरम, तमिलनाडु

अब हम भारत के चार धाम, इनसे जुड़ी मान्यता, इनका इतिहास और यहाँ पर कैसे पहुंचे आदि के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त करेंगे।

जगन्नाथ पुरी

भारत के दक्षिण पूर्वी राज्य उड़ीसा की राजधानी भुनेश्वर से थोड़ी दूरी पर स्थित जगन्नाथ मंदिर भारत के प्रमुख चार धामों में से एक है, जो भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है। यह मंदिर उड़ीसा राज्य के समुद्री तट पर बसा हुआ है। इस मंदिर में भगवान श्री कृष्ण उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की प्रतिमा भी विराजमान है।

कहा जाता है कि उड़ीसा प्राचीन काल में उत्कल प्रदेश के नाम से जाना जाता था, जो देश के समृद्ध बंदरगाहों में से एक थी। पुराणों में तो इसे धरती का वैकुंठ भी कहा गया है, जो भगवान विष्णु के चार धामों में से एक है। जगन्नाथ पुरी को जगन्नाथ पुरी के अतिरिक्त नीलगिरी, श्री पुरुषोत्तम क्षेत्र, नीलांचल और शाक क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है।

इतिहास

जगन्नाथ पुरी मंदिर के इतिहास की बात करें तो बताया जाता है इस मंदिर का निर्माण 1078 से 1148 के बीच गंग वंश के शासक अनंतवर्मन जो कलिंग पर राज करते थे, उन्होंने इस मंदिर के जगमोहन और विमान भाग का निर्माण करवाया था।

1197 में ओडिशा के शासक भीमदेव ने इस मंदिर के वर्तमान रूप का निर्माण करवाया। लेकिन 1448 में एक अफगान शासक ने ओडिशा पर आक्रमण किया और भगवान जगन्नाथ की मूर्ति और मंदिर को ध्वस्त कर दिया।

लेकिन कुछ सालों के बाद राजा रामचंद्र ने खुर्दा में अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित करने के बाद जगत नाथ मंदिर और इसकी मूर्तियों को दोबारा प्रस्थापित किया, उसके बाद फिर से इस मंदिर में पूजा पाठ एवं दर्शन की सुविधा शुरू हो गई।

जगन्नाथ पुरी के बारे में कुछ तथ्य

  • ब्रह्म और स्कंद पुराण के अनुसार कहा जाता है कि पूरी में भगवान विष्णु ने पुरुषोत्तम नीलमाधव के रूप में अवतार लिया था और सबर जनजाति के परम पूज्य देवता बन गए थे। जिस कारण जगन्नाथपुरी में भगवान श्रीकृष्ण कबीलाई देवता के रूप में विराजमान है, वे लोग लकड़ियों से मूर्तियों का निर्माण किया करते थे।
  • जगन्नाथ पुरी मंदिर में ब्राह्मण पुजारी के अतिरिक्त सबर जनजाति के भी पुजारी है। यहां पर ज्येष्ठ पूर्णिमा से लेकर आषाढ़ पूर्णिमा तक सबर जाति के ही रीति रिवाज के साथ पूजा पाठ होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार द्वापर युग के बाद भगवान श्री कृष्ण जगन्नाथपुरी में ही निवास करने लगे थे।
  • जगन्नाथ पुरी मंदिर को लेकर एक रहस्य है कि इस मंदिर के शिल्प पर एक ध्वजा लहराता है, जो हमेशा हवा के विपरीत दिशा में लहराता है और आज तक इसका रहस्य कोई ढूंढ नहीं पाया।
  • कहा जाता है कि जगन्नाथपुरी मंदिर में भक्तजनों के लिए बनने वाले प्रसाद कभी कम नहीं पड़ता चाहे 20 हजार श्रद्धालु हो या लाखों श्रद्धालु प्रसाद कभी नहीं कम पड़ता। इतना ही नहीं कहा जाता है कि इस मंदिर की रसोई में जहां पर भक्तजनों के लिए प्रसाद बनता हैं, वहां पर 7 बर्तन एक दूसरे के ऊपर लदाकर प्रसाद बनाया जाता है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि सबसे नीचे वाले बर्तन का भोजन जल्दी पकना चाहिए लेकिन इसके विपरीत सबसे पहले ऊपर रखे बर्तन में भोजन पकता है। उसके बाद उसके नीचे और फिर उसके नीचे वाला भोजन पकता है, जिसका रहस्य आज तक पता नहीं चल पाया।
  • इस मंदिर को लेकर एक रोचक तथ्य यह भी है कि इस धरती पर हर एक चीजों की परछाई का निर्माण होता है लेकिन इस मंदिर के शिखर की परछाई कभी भी धरती पर नहीं दिखाई देती, हमेशा अदृश्य रहती है।
  • बताया जाता है कि इस मंदिर के शिखर पर एक सुदर्शन चक्र स्थापित है और वह सुदर्शन चक्र हर दिशा से देखने पर एक जैसा प्रतीत होता है।
  • जगन्नाथ पुरी मंदिर बिल्कुल समुद्र तट के निकट स्थापित है। ऐसे में बाहर लहरों की आवाज खूब सुनाई देती है लेकिन इस मंदिर में प्रवेश करते ही सागर की लहरों की आवाज बिल्कुल सुनाई नहीं देती, वातावरण बिल्कुल शांत और दिव्य शक्ति से भर जाता है।
  • कुछ लोग इस मंदिर के बारे में बताते हैं कि इस मंदिर के नीचे खजाना छुपा हुआ है। हालांकि अब तक इसकी कोई भी पुख्ता जानकारी नहीं मिली है।

जगन्नाथ पुरी कैसे पहुंचे?

जगन्नाथ पुरी पहुंचने के लिए सबसे नजदीकी हवाई अड्डा बीजू पटनायक हवाई अड्डा है, जो जगन्नाथपुरी से 60 किलोमीटर की दूरी पर भुनेश्वर में स्थित हैं। यह हवाई अड्डा भारत के विभिन्न बड़े शहरों के हवाई अड्डे से जुड़ा हुआ है। भुनेश्वर पहुंचने के बाद यहां से जगन्नाथपुरी के लिए बस, टैक्सी या अन्य वाहन आसानी से मिल जाते हैं।

जगन्नाथ पुरी रेलवे मार्ग से पहुंचने के लिए पूरी रेलवे स्टेशन है। पूरी रेलवे स्टेशन के लिए भारत के लगभग सभी प्रमुख शहरों से ट्रेनें चलती है। इसके अतिरिक्त भुवनेश्वर रेलवे स्टेशन भी है।

जगन्नाथ पुरी पहुंचने के लिए सड़क मार्ग की भी अच्छी सुविधा है। उड़ीसा राज्य नेशनल हाइवे नंबर 5, 6, 23, 42 और 43 रेल मार्ग से पूरे देश से जुड़ा हुआ है। जगन्नाथ पुरी भारत का एक प्रमुख धार्मिक स्थल है, जिस कारण भारत के विभिन्न शहरों से टूरिज्म बसे हर दिन आती है।

कोणार्क सूर्य मंदिर का इतिहास और इसका रहस्य विस्तार से जानने के लिए यहाँ क्लिक करें।

द्वारकाधीश मंदिर

भारत के प्रमुख चार धामों में से दूसरा धाम द्वारिकाधीश आता है, जो भारत के पश्चिमी राज्य गुजरात में स्थित है। गुजरात में द्वारिका धाम मंदिर गोमती नदी और अरब सागर के किनारे ओखामंडल प्रायद्वीप के पश्चिमी तट पर स्थित है। द्वारिका को गुजरात का सर्वप्रथम राजधानी माना जाता है।

द्वारिका मंदिर भगवान श्री कृष्ण के साथ सुभद्रा, बलराम, वासुदेव, रेवती और अन्य कई देवी-देवताओं को समर्पित है। साल भर यहां पर श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है लेकिन जन्माष्टमी के समय लोगों की भीड़ काफी ज्यादा बढ़ जाती है।

जन्माष्टमी के समय में द्वारिकाधीश मंदिर को दुल्हन की तरह सजा दिया जाता है और कई तरह के कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। इस मंदिर में प्रवेश करने से पहले श्रद्धालु गोमती नदी में स्नान करते हैं।

इतिहास

द्वारिका मंदिर के निर्माण का इतिहास लगभग 22 सौ साल पुराना है। कहा जाता है कि द्वारिकाधीश मंदिर का निर्माण भगवान श्री कृष्ण के पुत्र व्रज नाथद्वारा ने हरि गृह के रूप में करवाया गया था। लेकिन 1472 ईसवी में मोहम्मद बेगड़ा के द्वारा इस मंजिल के मूल संरचना को नष्ट कर दिया गया था।

बाद में 15 से 16 शताब्दी में इस मंदिर का पुनः निर्माण किया गया था। कहा जाता है आठवीं शताब्दी के अंदर हिंदू धर्म शास्त्री आदि शंकराचार्य ने इस स्थान पर एक शारदा पीठ की भी स्थापना की थी।

पौराणिक मान्यता

वास्तविक द्वारिका जो समुद्र के अंदर विलीन हो चुका है। माना जाता है कि इस द्वारिका का निर्माण भगवान श्री कृष्ण ने देवों के इंजीनियर कहे जाने वाले भगवान विश्वकर्मा के द्वारा करवाया था और इसके निर्माण के पीछे यह पौराणिक मान्यता मानी जाती है कि एक बार महर्षि दुर्वासा भगवान श्री कृष्ण से मिलने के लिए आते हैं।

वहां पर वे भगवान श्री कृष्ण एवं रुक्मणी के दर्शन करते हैं, उसके पश्चात वे उन दोनों को अपने निवास स्थान जाने का अनुरोध करते हैं। तब भगवान श्री कृष्ण महर्षि दुर्वासा की अनुरोध पर उनके साथ उनके निवास स्थान पर चलने के लिए प्रस्थान करते हैं।

लेकिन बीच राह में रुक्मणी को प्यास लग जाती है और वह भगवान श्री कृष्ण को पानी पीने का अनुरोध करती है। लेकिन वंहा कहीं भी पानी का कोई स्त्रोत नहीं था, जिसके कारण भगवान श्री कृष्ण एक पौराणिक‌ छिद्र से गंगा की पावन धारा को ले आते हैं।

यह सभी घटना महर्षि दुर्वासा देख रहे थे, जिसके बाद उन्हें ऐसा आभास हुआ कि शायद देवी रुक्मणी भगवान श्री कृष्ण को उनके निवास स्थान जाने से रोकने का प्रयास कर रही है, जिस कारण महर्षि दुर्वासा को रुकमणी पर गुस्सा आ जाता है।

वे क्रोध वश रुक्मणी को उसी स्थान पर हमेशा रह जाने का श्राप दे देते हैं, जिसके बाद इसी स्थान पर भगवान श्री कृष्ण द्वारिका स्थापित करते हैं। कहा जाता है कि भगवान श्री कृष्ण ने द्वारिका को एक भूमि के एक टुकड़े पर निर्माण कराया था। इस जगह पर बहुत सारे द्वार खुले होने के कारण इसका नाम द्वारिका पड़ा।

भगवान श्री कृष्ण के द्वारा निर्माण की गई वास्तविक द्वारिका के समुद्र में डूब जाने का एक पौराणिक कारण बताया जाता है कि द्वारिका नगरी स्थापित करने के बाद भगवान श्री कृष्ण अपने 18 कुल बंधुओं के साथ द्वारिका में बस गए थे और यहां पर इन्होंने लगभग 36 वर्षों तक राज्य किया था।

लेकिन कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध के समय जब कौरव कुल का नाश हो गया था तब कौरव कुल की माता गांधारी ने भगवान श्रीकृष्ण को पांडवो पक्ष का समर्थन करने के कारण उन्हें श्राप दिया था कि जिस तरीके से मेरे कुल वंश का नाश हुआ है, ठीक उसी प्रकार तुम्हारे कुल वंश का विनाश हो जाएगा।

जिसके कारण भगवान श्री कृष्ण की मृत्यु के पश्चात उनके सभी यदुवंशी कुल समाप्त हो जाते हैं और उसी के पश्चात द्वारिका नगरी भी समुद्र में डूब कर समाप्त हो जाती हैं। हालांकि अभी तक इस बात पर पूरी तरीके से शोध नहीं हो पाया है। अभी भी समुद्र के अंदर कई विभिन्न अवशेष मिले हैं, जिन पर लगातार शोध हो रहा है।

द्वारिकाधीश के बारे में रोचक तथ्य

  • द्वारिकाधीश मंदिर का निर्माण चालुक्य शैली में किया गया है, जो 5 मंजिले मंजिल की सरंचना है। जिसका निर्माण चूना पत्थर और रेत से किया गया है।
  • द्वारिकाधीश का 5 मंजिला मंदिर 72 स्तंभ एवं 78.3 मिटर ऊंचे और जटिल नकाशी दार शिखर पर बनाए गए हैं।
  • द्वारिकाधीश मंदिर के शीर्ष पर 75 फीट ऊंचा ध्वज विराजमान है, जिसे भक्त सूर्य और चंद्रमा का प्रतीक मानते हैं। कहा जाता है सूर्य और चंद्रमा भगवान श्री कृष्ण के मंदिर प्रशासन करते हैं, इस ध्वज को दिन भर में कम से कम 5 बार बदला जाता है।
  • द्वारकाधीश मंदिर के गर्भ गृह में भगवान श्रीकृष्ण की श्याम वर्ण चतुर्भुज प्रतिमा चांदी के सिंहासन पर विराजमान है।

द्वारिकाधीश कैसे पहुंचे?

द्वारिकाधीश पहुंचने के लिए सड़क मार्ग रेलवे मार्ग एवं हवाई मार्ग तीनों ही उपलब्ध है। द्वारिका में रेलवे जंक्शन मौजूद है, जो लगभग भारत के विभिन्न शहरों से जुड़ा हुआ है। यहां तक के लिए आपको आसानी से ट्रेन मिल जाती है, वहीं द्वारिका का सबसे नजदीकी हवाई अड्डा जामनगर में मौजूद है, जो लगभग द्वारिका से 145 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

जामनगर से द्वारिका पहुंचने के लिए बस या टैक्सी किराए पर ले सकते हैं। इसके अतिरिक्त अहमदाबाद का हवाई अड्डा भी मौजूद है, जो लगभग भारत के विभिन्न बड़े शहरों के हवाई अड्डे से जुड़ा हुआ है। यह द्वारिकाधीश मंदिर से 463 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

अमदाबाद से द्वारिकाधीश के लिए बस या टैक्सी मौजूद रहती हैं। वहीं द्वारिका विभिन्न शहरों से सड़क मार्ग से भी जुड़ा हुआ है। गुजरात की सड़क की यात्रा बहुत ही आरामदायक और सुगम है। सूरत, राजकोटिया, अहमदाबाद से द्वारिका के लिए बस मिल जाते हैं। अन्य राज्यों से भी द्वारिका धाम के लिए बस चलते हैं।

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बद्रीनाथ धाम

भारत के उत्तरी राज्य उत्तराखंड में अलकनंदा नदी के किनारे स्थित बद्रीनाथ धाम को भारत के प्रमुख चार धामों में से एक माना गया है। यह मंदिर उत्तराखंड में स्थित होने के कारण यहां पर साल भर ठंड रहती है, जिस कारण यहां पर ठंडी के मौसम में बर्फ जम जाते हैं।

यही कारण है कि साल में केवल 6 महीने तक ही यह मंदिर खुले रहते हैं। अप्रैल से नवंबर तक यह मंदिर यात्रियों के लिए खुला रहता है। भारत के लगभग सबसे व्यस्त और प्राचीन मंदिर में से एक होने के कारण हर साल यहां पर हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है।

कहा जाता है कि बिना बद्रीनाथ के दर्शन के केदारनाथ की यात्रा अधूरी है। इसीलिए केदारनाथ की यात्रा करने वाले तीर्थयात्री सबसे पहले बद्रीनाथ की यात्रा करते हैं। यह मंदिर गढ़वाल क्षेत्र के बीच 3133 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

पौराणिक मान्यता

बद्रीनाथ मंदिर को लेकर एक पौराणिक मानयता है कि एक समय इस स्थान पर घने बद्री यानी कि बेर के वृक्ष हुआ करते थे, जिस कारण इस जगह का नाम बद्रीनाथ पड़ा था। लेकिन एक अन्य पौराणिक कथा यह भी है कि एक बार नारद मुनि ने माता लक्ष्मी को भगवान विष्णु के पैर दबाते हुए देख लिया था।

जब नारद मुनि ने भगवान विष्णु से इस संदर्भ में बात किया तो भगवान विष्णु को बहुत ही अपराध जनक महसूस हुआ, जिसके कारण वे हिमालय पर्वत पर तपस्या करने के लिए चले जाते हैं। लेकिन वहां पर हिमपात होने के कारण भगवान विष्णु पूरी तरीके से बर्फ से ढक जाते हैं।

तब उन्हें बचाने के लिए मां लक्ष्मी बद्री के पेड़ का रूप धारण कर लेती है, जिससे पूरा हिमपात उन पर गिरना शुरू हो जाता है। तपस्या पूर्ण होने के बाद जब भगवान विष्णु देखते हैं कि मां लक्ष्मी इतने सालों तक हिमपात से उनकी रक्षा कर रही थी और स्वयं बद्री वृक्ष के रूप में हिमपात से ढक चुकी हैं।

तब भगवान विष्णु ने कहा कि हे देवी आपने भी मेरे बराबर घोर तपस्या की है, इसीलिए आज से मुझे बद्री के नाथ यानी बद्रीनाथ के नाम से जाना जाएगा। मान्यता है कि तभी से इस स्थान को बद्रीनाथ कहा जाने लगा। जिसके बाद देवताओं ने यहां पर बदरीनाथ की मूर्ति स्थापित कर दी।

लेकिन आठवीं सदी तक यह स्थान बौद्ध मठ था, जिसके कारण जब बौद्ध लोगों को इसके बारे में पता चला तो उन्होंने उस मूर्ति को अलकनंदा नदी में बहा दिया। लेकिन बाद में आदि शंकराचार्य ने उस मूर्ति को खोज कर तप्त कुंड के पास स्थित गुफा में स्थापित किया।

19वीं शताब्दी ईस्वी में आदि शंकराचार्य ने बद्रीनाथ मंदिर का निर्माण करवाया। कहा जाता है आदि शंकराचार्य स्वयं 6 सालों तक 6 महीने बद्रीनाथ एवं छह महीने केदारनाथ में रहते थे।

बद्रीनाथ के बारे में कुछ तथ्य

कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य ने दक्षिण भारत के केरल पुजारियों को इस मंदिर में पूजा के लिए नियुक्त किया था, इसलिए आज भी इस मंदिर की देखरेख और कार्यभार केरल के ब्राह्मणों के अंतर्गत ही होता है।

बद्रीनाथ मंदिर के नीचे एक कुंड स्थित है, जिसे गर्म चश्मा के नाम से जाना जाता है। इस कुंड का पानी का तापमान साल भर 55 डिग्री सेल्सियस रहता है। लेकिन बाहरी तापमान 17 डिग्री सेल्सियस के नीचे होता है। हालांकि पानी खोलते हुए नजर आता है लेकिन यह उतना गर्म नहीं रहता।

माना जाता है कि इस पानी में औषधिय गुण है। यह पानी सल्फर युक्त है, जिस कारण जो भी इस पानी में स्नान करता है, वह रोगमुक्त हो जाता है। इसीलिए बद्रीनाथ मंदिर की पूजा करने से पहले लोग इस कुंड में पहले स्नान करते हैं।

बद्रीनाथ मंदिर उत्तराखंड में स्थित है और उत्तराखंड में साल भर ठंड रहता है और बर्फबारी होती है, जिस कारण साल में केवल 6 महीने तक ही यह मंदिर खुला रहता है। ऐसे में 6 महीने जब यह मंदिर बंद रहता है तो मंदिर में एक अखंड ज्योति जलाई जाती है, जो लगभग 6 महीनों तक जलते ही रहती हैं।

बद्रीनाथ को लेकर एक बहुत ही रोचक तथ्य है कि इस मंदिर में शंख नहीं बजाए जाते हैं, जिसके कई कारण है। इसके पीछे धार्मिक मान्यता यह है कि एक बार मां लक्ष्मी बद्रीनाथ में बने तुलसी भवन में ध्यान लगा रही थी और उसी दौरान भगवान विष्णु शंख चूर्ण नाम के एक राक्षस का वध किए थे, जिस के पश्चात शंखनाद किया जाता है।

लेकिन भगवान विष्णु मां लक्ष्मी के ध्यान को विघ्ने नहीं करना चाहते थे, इसीलिए उन्होंने शंख नहीं बजाया। जिस कारण आज भी बद्रीनाथ में पूजा के दौरान शंख नहीं बनाए जाते हैं। हालांकि दूसरी पौराणिक कथा यह भी है कि अगस्त्यमुनि केदारनाथ में राक्षसों का वध कर रहे थे कि तभी वातापी और अतापी नामक दो राक्षस वहां से भाग निकले।

जिसमें आतापी मंदाकिनी नदी में छुप गया और वातापी राक्षस अपने आपको छुपाने के लिए शंख के अंदर घुस गया। माना जाता है कि शंख बजाने से असुर उसमें से निकल कर भाग जाते, जिस कारण बद्रीनाथ में आज भी शंख नहीं बजाया जाता।

हालांकि इसका वैज्ञानिक कारण यह बताया जाता है कि बद्रीनाथ पहाड़ी इलाकों में स्थित है और वहां पर साल भर ठंड रहती है। ऐसे में शंखनाद करने से ध्वनि पहाड़ों से टकराकर प्रतिध्वनि पैदा कर सकती है और खास आवृत्ति वाली ध्वनि पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचाती है। पहाड़ी इलाका होने के कारण इस ध्वनि से लैंडस्लाइड भी हो सकता है, इसलिए यहां पर शंख नहीं बजाए जाते हैं।

बद्रीनाथ कैसे पहुंचे?

बद्रीनाथ पहुंचने के लिए सबसे पहले ऋषिकेश पहुंचना पड़ता है। ऋषिकेश से बद्रीनाथ 294 किलोमीटर की दूरी पर है। ऋषिकेश से बद्रीनाथ की पूरी यात्रा पहाड़ी यात्रा है, चारों तरफ पहाड़ घिरे हुए हैं। यहां तक बस के जरिए पहुंच सकते हैं।

बद्रीनाथ पहुंचने के लिए यहां से 311 किलोमीटर की दूरी पर जॉली ग्रांट एयरपोर्ट स्थित है। यहां से बद्रीनाथ धाम पहुंचने के लिए आसानी से टैक्सी मिल जाती हैं। वही बद्रीनाथ ट्रेन मार्ग से पहुंचने के लिए यहां से 154 किलोमीटर की दूरी पर हरिद्वार स्टेशन है।

लगभग दूसरी जगह से हरिद्वार स्टेशन के लिए ट्रेन मिल जाती है। यहां से आप टैक्सी के जरिए बद्रीनाथ पहुंच सकते हैं। बद्रीनाथ जाने के लिए परमिट लेना पड़ता है। यहाँ बिना पहचान पत्र के प्रवेश नहीं मिलता।

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रामेश्वरम मंदिर

रामेश्वरम मंदिर भारत के चार प्रमुख स्थानों में से एक है। इसे अंतिम धाम माना जाता है, जो भारत के दक्षिणी राज्य तमिलनाडु में स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है एवं भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है।

मान्यता

रामेश्वरम मंदिर के बारे में पौराणिक मान्यता है कि रावण वध करने के पश्चात भगवान श्री राम एक ब्राह्मण के वध करने का दोष मिटाना चाहते थे। रावण एक ब्राह्मण था, इसीलिए भगवान श्रीराम चाहते थे कि वे इस दोष को खत्म करने के बाद ही अयोध्या जाए।

श्री लंका से लौटने के बाद तमिलनाडु में पहुंचने पर उन्होंने भगवान शिव की पूजा करनी चाही लेकिन, इस द्विप पर कोई भी मंदिर नहीं था। इसलिए इन्होंने भगवान हनुमान को कैलाश से भगवान शिव की प्रतिमा लाने के लिए कहा।

जिसके बाद हनुमान जी प्रतिमा लाने के लिए कैलाश चले जाते हैं। लेकिन हनुमान जी को वापस लौटने में बहुत ज्यादा वक्त लग जाता है और इधर शुभ मुहूर्त का समय भी जा रहा था, जिसके बाद मां सीता स्वयं समुद्र के रेत को मुट्ठी में लेकर शिवलिंग का निर्माण करती है।

फिर भगवान राम उसी शिवलिंग की पूजा करते हैं। बाद में जब हनुमान जी कैलाश से शिव की प्रतिमा लाते हैं तो उन्हें इस बात का बहुत दुख होता है कि भगवान राम ने उनका इंतजार नहीं किया।

उनके इस दुःख भाव को देख भगवान श्री राम हनुमान के द्वारा लाए गए शिवलिंग को माता सीता के द्वारा बनाए गए शिवलिंग के बगल में ही स्थापित कर देते हैं और घोषणा करते हैं कि भविष्य में रामेश्वर की पूजा करने से पहले लोग हनुमान के द्वारा लाए गए शिवलिंग की पूजा करें। इस तरीके से माना जाता है कि तभी से इस स्थान को रामेश्वरम एवं रामेश्वर द्वीप के नाम से जाना जाने लगा।

बताया जाता है कि लगभग 15वीं शताब्दी में राजा उडैयान सेतुपति एवं नागूर निवासी वैश्य ने यहां पर 78 फीट ऊंचा गोपुरम का निर्माण करवाया। उसके बाद सोलवीं सदी में तिरुमलाई सेतुपति नाम के राजा ने मंदिर के दक्षिण में दूसरे हिस्से की दीवार का निर्माण पूरा करवाया था।

बताया जाता है कि वर्तमान रामेश्वरम मंदिर का निर्माण 17वीं शताब्दी में राजा किजहावन सेठुपति या रघुनाथ किलावन ने करवाया था। रामेश्वरम मंदिर के निर्माण में द्रविड़ स्थापत्य शैली का प्रयोग किया गया है। मंदिर में सैकड़ों विशाल खंबे हैं और प्रत्येक खंभे पर विभिन्न तरह के बारीकी कलाकृतियां बनाई गई है।

इस मंदिर का मुख्य आकर्षण इस मंदिर का 40 फीट ऊंचा प्रवेश द्वार है। मंदिर के गर्भ में दो शिवलिंग है। प्रथम माता सीता के द्वारा रेत से बनाया गया शिवलिंग, जिन्हें मुख्य देवता माना जाता है।

उसी के बगल में भगवान हनुमान के द्वारा लाया गया शिवलिंग स्थापित है। इस शिवलिंग को विश्व लिंगम के नाम से जाना जाता है। वहीँ माता सीता के द्वारा बनाए गए शिवलिंग को रामलिंगम के नाम से जाना जाता है।

रामेश्वरम मंदिर के तथ्य

  • रामेश्वरम मंदिर का निर्माण 40 फुट ऊंचे 2 पत्थरो पर बराबरी के एक लंबे पत्थर को लगाकर किया गया है। यह मंदिर लगभग हजार फुट लंबा और 650 फुट चौड़ा है।
  • रामेश्वरम का गलियारा विश्व का सबसे लंबा गलियारा माना जाता है, जो उत्तर दक्षिण में 197 मीटर एवं पूर्व पश्चिम में 133 मीटर फैला हुआ है एवं इसके परकोटो की चौड़ाई 6 मीटर और ऊंचाई 9 मीटर है।
  • कहा जाता है कि रामेश्वरम मंदिर के निर्माण में उपयोग किए गए पत्थरों को श्रीलंका से नावों के द्वारा लाया गया था।
  • इस मंदिर के अंदर 22 तीर्थ है और प्रत्येक तीर्थ अपने आप में प्रसिद्ध है। मंदिर के पहले और सबसे मुख्य अतिंम को अग्नि तीर्थ कहा जाता है।
  • रामेश्वरम मंदिर के अंदर कई सारे कुंवे बने हैं और कहा जाता है कि इन कुओं का निर्माण भगवान राम ने अपने अमोघ बाणो से किया था और उसमें कई तीर्थ स्थलों का जल छोड़ा था। आश्चर्य की बात है कि पूरे रामेश्वरम में खारा पानी मिलता है लेकिन इन 22 कुओं का पानी मीठा है।
  • भगवान राम ने ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति पाने के लिए रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना की थी। जिसके कारण माना जाता है कि यदि कोई भी व्यक्ति बहुत श्रद्धा भाव से भगवान शिव की पूजा इस मंदिर में करता है, वह ब्रह्म हत्या जैसे पापों से मुक्त हो जाता है।

रामेश्वरम मंदिर कैसे पहुंचे?

रामेश्वरम मंदिर पहुंचने के लिए हवाई मार्ग, रेलवे मार्ग और सड़क मार्ग तीनों ही मार्ग बहुत ही सुलभ है। रामेश्वरम पहुंचने के लिए सबसे नजदीकी हवाई अड्डा मदुरे हवाई अड्डा है। मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई जैसे भारत के विभिन्न शहरों से यहां के लिए फ्लाइट मिल जाती है।

इतना ही नहीं मदुरै शहर चेन्नई, कोयम्बटूर, त्रिचि, तंजावुर और अन्य महत्वपूर्ण शहरों से रेल मार्ग से अच्छे तरीके से जुड़ा हुआ है। कन्याकुमारी, चेन्नई और त्रिचि से यह सड़क मार्ग से भी अच्छे तरीके से जुड़ा हुआ है।

इस तरह आप तीनों में से किसी भी मार्ग से रामेश्वरम पहुंच सकते हैं। रामेश्वरम शहर पहुंचने के बाद मंदिर तक पहुंचने के लिए ऑटो रिक्शा, साइकिल रिक्शा जैसे कई तरह के वाहन उपलब्ध है।

FAQ

चार धाम में पहला धाम कौन सा है?

भारत के प्रमुख चार धामों में से प्रथम धाम की शुरुआत हरिद्वार में गंगा स्नान के साथ होती हैं। हालांकि बात करें बड़े नाम की तो सबसे पहले उत्तर में स्थित बद्रीनाथ आता है।

भारत में कौन-कौन से चार धाम स्थित है?

भारत में 4 बड़े धाम है, जो चारों दिशाओं में फैले हुए हैं। उत्तर में बद्रीनाथ जो उत्तराखंड राज्य में स्थित है, पश्चिम में द्वारिका जो गुजरात राज्य में स्थित है, पूर्व में जगन्नाथ पुरी स्थित है, जो उड़ीसा राज्य में है। वहीँ दक्षिण में तमिलनाडु राज्य में रामेश्वरम धाम स्थित है।

चार धाम की स्थापना कब हुई?

भारत के प्रमुख चार बड़े तीर्थ धामों को आदि शंकराचार्य के द्वारा बारह सौ साल पहले परिभाषित किया गया था।

चारों तीर्थ धाम की यात्रा करने से क्या लाभ मिलते हैं?

कहा जाता है कि जो व्यक्ति जीवन में एक बार चारों तीर्थ धाम की यात्रा कर लेता है, वह सभी तरह के पाप से मुक्त हो जाता है। बद्रीनाथ धाम को लेकर एक बहुत ही प्रसिद्ध पंक्ति है कि जो जाए बद्री वह ना आए ओदरी जिसका अर्थ है कि जो एक बार बद्रीनाथ का दर्शन कर लेता है, उसे गर्भ में नहीं जाना पड़ता। भारत के चारों धामों का अपना अलग-अलग महत्व है।

भारत के चारों धाम कौन कौन से भगवान को समर्पित है?

भारत के चारों धाम में बद्रीनाथ एवं रामेश्वरम भगवान शिव को समर्पित है। दोनों ही मंदिरों में भगवान शिव के शिवलिंग स्थापित है, वहीँ गुजरात राज्य में स्थित द्वारिका और उड़ीसा में स्थित जगन्नाथ पुरी भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है।

निष्कर्ष

आज के इस लेख में आपने भारत की पावन धरती पर स्थित चार धाम (Bharat Ke Char Dham) के बारे में जाना। इस लेख में हमने भारत के चारों धाम के इतिहास, उससे जुड़े पौराणिक कथा एवं कुछ रोचक तथ्यों के बारे में बताया।

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