भारतीय गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह की जीवनी – Vashishtha Narayan Singh Biography

Vashishtha Narayan Singh Biography: पटना का एक लड़का जो पटना के साइंस कॉलेज में पढ़ते समय गणित के टीचर्स की गलती पर उन्हें टोक देता था। 1969 में जब वह अमेरिका पहुंचा तो गरीबी भी उसे Phd करने से नहीं रोक पाई। जब वो नासा में काम करता था तो कंप्यूटर के बंद होने पर भी नासा के काम नहीं रूकते थे।

भारत लौटने के बाद उसे ऐसी बीमारी ने घेर लिया, जिसमें इन्सान को वो आवाजें सुनाई देने लगती है जो वास्तव में होती ही नहीं है।

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यह वही सख्स था जिसने आइन्स्टाइन की थ्योरी को चैलेंज किया था। हम बात कर रहे है बिहार के गणितज्ञ वशिष्ट नारायण सिंह (Vashishtha Narayan Singh) की।

भारतीय गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह की जीवनी – Vashishtha Narayan Singh Biography in Hindi

वशिष्ठ नारायण सिंह का जीवन – Vashishtha Narayan Singh Biography

वशिष्ट नारायण सिंह का जन्म 2 अप्रैल 1942 को बिहार के भोजपुर जिले के बसंतपुर में हुआ था। उस समय बिहार के आसपास के राज्य जैसे झारखण्ड आदि भी बिहार में आते थे। इनके पिताजी पुलिस विभाग में कार्य करते थे।

इनकी शुरूआत की पढ़ाई नेत्राहट रेसीडेंसीयल स्कूल में हुई। यह स्कूल बिहार के सभी टोपेर्स स्टूडेंट्स के लिए एक प्रसिद्ध स्कूल था। इस स्कूल से इन्होने मैट्रिक्स की परीक्षा में पूरे बिहार में टॉप किया था। आज के समय में यह स्कूल भी झारखण्ड में आता है।

देश के आजाद होने के साथ ही नारायण जी भी अपने भविष्य को बेहतर बनाने के लिए आजाद हो चुके थे। कॉलेज की पढाई के लिए पटना के साइंस कॉलेज पहुंचे। इस कॉलेज से इन्होने इन्टरमीडिएट के एग्जाम को भी पूरे बिहार को टॉप किया था।

अब तक के उनका यह कंफोर्म हो गया था कि उनका मन गणित के लगता है और वह आगे की पढ़ाई भी गणित में ही करेंगे।

गणित में कितना मन लगता था इसे यूं समझिये कि जब गणित के शिक्षक पढ़ा रहे होते थे तो उनकी गलती पर नारायण सिंह जी उन्हें टोक देते थे। सामान्य सी बात है कि हर टीचर को उनकी यह आदत पसंद नहीं आती। एक दिन किसी टीचर ने उनकी शिकायत प्रिंसिपल से कर दी कि ये लड़का हमें बार-बार टोकता है।

प्रिंसिपल ने सोचा कि ये लड़का इतना ही होशियार है तो उसका अलग से एग्जाम कराना चाहिए। उनका अलग से एग्जाम हुआ। लेकिन नारायण जी ने अपने प्रिंसिपल को निराश नहीं किया।

पटना में पढ़ाई के दौरान उन पर निगाह पड़ी अमेरिका के दिग्ज Mathematician प्रो. जॉन केली की। प्रो. केली कैलीफोर्निया यूनीवर्सिटी में पढ़ाते थे और उस समय के दौरान वो आईआईटी कानपुर में पढ़ाने लिए भारत आये हुए थे।

प्रो. केली ने नारायण सिंह जी के टेलेंट को पहचाना और उनकी Monitaring की। फिर 1965 में नारायण जी अमेरिका चले गये। कैलीफोर्निया यूनीवर्सिटी से उन्होंने साल 1969 में पीएचडी पूरी की और वाशिंगटन यूनीवर्सिटी Associate Professor बन गये। PhD के दौरान प्रो. केली ही उनके Doctoral Advisor थे। उनका वाशिंगटन यूनीवर्सिटी से सफ़र शुरू हुआ, उनका ये सफ़र नासा तक पहुंच गया।

उस समय नासा में Apollo 14 और Apollo 15 पर तेजी से काम हो रहा था। ये दोनों स्पेस मिशन 1971 में लौंच किये गये थे।

जब नारायण जी नासा में काम कर रहे थे तब का एक किस्सा बहुत ही प्रसिद्ध है “अपोलो प्रोजेक्ट के समय एक बार नासा के 31 कंप्यूटर एक साथ बंद हो गये तब नारायण जी Manually गणनाएं करते रहे। कुछ समय बाद जब कंप्यूटर वापस शुरू हुए तब पाता चला कि उनके द्वारा की गई गणना और कंप्यूटर के द्वारा की गई गणना एक समान ही थी।”

1971 तक वह अमेरिका में रहे। फिर वह भारत लौट आये। भारत में आने के बाद उन्होंने भारत के IIT Kanpur, भारतीय सांख्यिकी संस्थान कोलकाता, TATA Institute of Fundamental Research Mumbai के काई छात्रों से अपना ज्ञान सांझा किया।

इतने समय के बाद 1973 में उनकी शादी हुई। नारायण सिंह की पत्नी का नाम वंदना रानी सिंह है। 1974 में Schizophrenia नाम की बीमारी उन पर अपना प्रभाव कायम करने लगी। 1974 में उनको Schizophrenia बीमारी का पहला दौरा पड़ा। 1976 में उनको रांची के एक होस्पिटल में एडमिट करवाया गया। इस होस्पिटल में उनका इलाज बहुत लम्बे समय तक चला।

Schizophrenia नाम की बीमारी जिसे लगती है इसमें इससे पीड़ित व्यक्ति का व्यवहार बदल जाता है। मेंटल जैसे बर्ताव करने लग जाता है, अजीबोगरीब हरकतें करने लगता है और असलीयत को पहचानने में समस्या आने लगती है।

इस बीमारी के दौरान पीड़ित को कई बार ऐसी-ऐसी आवाजे भी सुनाई देने लगती है जो असलीयत में होती ही नहीं है। सामान्य सी बात है ऐसे में सोचने और समझने की ताकत कम होने लग जाती है। उनकी ऐसी हालत में देखकर उनकी पत्नी वंदना सिंह उनका अधिक साथ नहीं दे पाई और उनसे तलाक ले लिया।

नारायण जी 5 भाई-बहिन थे। उनके परिवार वालों बताते है कि वह छोटी-छोटी बातों पर पूरा घर सिर पर उठा लेते थे, पेंसिल से वे कई बार घर की दीवारों पर लिख दिया करते थे, उन्हें हर 3 से 4 दिन में एक नई पेंसिल और कॉपी लाकर देनी पड़ती थी।

इस दौरान वहां की सरकार ने उनकी कोई खास तरह से मदद या सहायता नहीं की। बैंगलोर में उनका ईलाज चला था। उनके भाई अयोध्या सिंह जो आर्मी में थे, उनके साथ बैंगलोर में रहना चाहते थे। इसलिए वह अपनी ट्रांसफर बैंगलोर में करवाना चाहते थे। अपने ट्रांसफर को लेकर उनको रक्षा मंत्रालय तक भी बात करनी पड़ी थी।

कुछ समय बाद उनका ईलाज बंद हो गया। अपने आखिर के समय में वह पटना के कुल्हरिया इलाके में रहते थे। कई नेता मंत्री उनके हाल जाने आते थे। लेकिन इतना किसी ने कुछ नहीं किया कि नारायण जी का कुछ भला हो सके।

नारायण जी भारत के स्टीफन हॉकिंग कहे जाते थे। उन्होंने आइन्स्टाइन जो कि दुनिया के महान वैज्ञानिक हुए, उनके सापेक्षता के सिध्दांत और गौस की थ्योरी को चुनौती दी थी। चक्रीय सदिश समष्टि सिद्धांत पर भी नारायण जी ने शोध किये थे, जिससे इनको पूरे भारत में पहचान मिली थी।

लेकिन भारत में उनके इस दावे को इतना नहीं माना गया कि इसे पूरी दुनिया के सामने रखा जाएं। उनके परिवार को यह डर रहता है कि उनके द्वारा लिखी दीवार पर बातें, उनके किताबों के बक्से, उनकी लिखी कोपियां कहीं रद्दी में नहीं बदल जायें।

वशिष्ट जी की स्थिति ऐसी हो गई थी कि 1989 में वह अपने गांव से अचानक ही लापता हो गये थे और 1993 में बहुत ही बेहद दयनीय हालत में सारण, डोरीगंज में मिले थे।

वशिष्ठ नारायण सिंह का निधन – Vashishtha Narayan Singh Death

77 वर्ष की आयु में 14 नवम्बर 2019 को उनका निधन हो गया। उनकी तबियत बिगड़ने पर उनके परिवार वाले उनको पटना के पटना मेडिकल कॉलेज और होस्पिटल ले गये, जहां उनका निधन हो गया।

नारायण जी के अंतिम समय में उनकी भाभी प्रभावती कहना है कि ये खुद पागल नहीं हुए, समाज ने इनको पागल बना दिया।

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