महाशय धर्मपाल गुलाटी जीवन परिचय

Mahashay Dharampal Gulati Biography in Hindi: शिक्षा का हर किसी के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। आमतौर पर लोगों के में यह धारणा बन जाती है कि शिक्षा के बिना तरक्की सम्भव नहीं है। लेकिन कम पढ़ा लिखा होना अभिशाप भी नहीं है। देश हो या विदेश कुछ हस्तियां ऐसी भी हुई है जिनके जीवन में कम पढ़ा लिखा होना अड़चन नहीं बना।

आज हम एक ऐसी ही हस्ती की बात कर रहे है जो कम पढ़े लिखे होने के बावजूद एक सफल व्यवसायी बने। ये व्यवसायी कोई और नहीं एमडीएच मसाले के मालिक महाशय धर्मपाल गुलाटी है, ये सिर्फ 5वीं कक्षा तक पढ़े है। इन्होंने मसाला व्यवसाय में इतना नाम कमाया है कि आज बच्चे से लेकर वृद्ध तक हर कोई इन्हें जानता है।

आपने भी अक्सर टीवी पर प्रसारित होने वाले MDH Masale के विज्ञापन तो जरूर देखें होंगे। उनमें एक वृद्ध व्यक्ति दिखाई देते है जो महाशय धर्मपाल गुलाटी ही है। काफी लोग इन्हें एमडीएच मसाले वाले दादा जी या फिर महाशय के नाम से भी जानते है।

Mahashay Dharampal Gulati Biography in Hindi

इस आर्टिकल में हम महाशय धर्मपाल गुलाटी जी के जीवन के बारे में बात करने वाले है। साथ ही यह भी जानेंगे कि जमीन से इतने ऊँचे सफलता शिखर तक महाशय कैसे पहुंचे और इन्हें किन-किन समस्याओं का सामना करना पड़ा।

महाशय धर्मपाल गुलाटी की जीवनी – Mahashay Dharampal Gulati Biography in Hindi

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जन्म और परिवार 

दुनियाभर में मसालों की दुनिया के बादशाह “मसाला किंग” के नाम से पहचान बनाने वाले महाशय धर्मपाल गुलाटी का जन्म मियानपुरा मोहल्ला, नवसारी, सिओलकोट (पाकिस्तान) में 27 मार्च 1923 को हुआ। इनके पिता जी का नाम महाशय चुन्नीलाल और माता जी का नाम चनन देवी था।

इनके पिताजी जो कि एक सामाजिक संगठन में काम करते थे और इसी संगठन में ही इन्होने एक मसाला कंपनी “महाशय दी हट्टी” का काम भी शुरू किया था। जिसका पूरा नाम Mahashian Di Hatti Pvt. Ltd. (Deggi Mirch Wale) था और यह सियालकोट के बाजार पंसारिया में थी।

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महाशय धर्मपाल गुलाटी अपने माता-पिता और भाई-बहिन के साथ

इनके पिताजी का तीन बेटों और पांच बेटियों का परिवार था। महाशय धर्मपाल गुलाटी का 18 वर्ष की उम्र में 1941 में लीलावन्ती से विवाह हुआ तथा इनके दो बेटे और 6 बेटियां भी है।

महाशय धर्मपाल गुलाटी के जीवन का सफर

इन्होंने अपनी स्कूल की पढ़ाई का सफर सिर्फ पांचवी कक्षा तक ही रहा। इनका मन पढ़ाई में कम, पतंगबाजी और कबूतरबाजी में अधिक लगता था इसलिए 1933 में गुलाटी ने पांचवी कक्षा का इम्तिहान दिए बिना ही स्कूल छोड़कर अपने पिता के नये कारोबार शुरू करने की कोशिश में जुट गये। इन्होंने अपनी आत्मकथा में बताया कि “पौने पांच क्लास तक की” ही पढ़ाई कर रखी है।

1937 में इन्होने अपने कारोबार में पिता की मदद से आइनों की दुकान की शुरुआत की, इसके बाद साबुन का कारोबार और फिर इसके बाद चावल का कारोबार भी किया। इसके साथ ही कई सारी नौकरियां और व्यापार भी किया। इन सभी में इनका मन सही से नहीं लगा और इन्होंने अपने पिता के मसालों के कारोबार में उनकी मदद करने और हाथ बांटने का निर्णय लिया।

जब 1947 में भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ तो सियालकोट के इस संपन्न परिवार ने भारत में आकर रहने का निर्णय लिया और इसके बाद पूरे परिवार ने अपना कुछ समय अमृतसर के शरणार्थी शिविर में बिताया। इसके बाद  इनका पूरा परिवार 27 सितंबर 1947 को काम की लताश में दिल्ली आ गया। ऐसा कहा जाता है कि जब महाशय धर्मपाल गुलाटी का परिवार भारत आया था तब इनके पास सिर्फ 1500 रुपये थे।

1948 में इन्होंने दिल्ली में 650 रुपये में एक तांगा खरीदा और रेलवे स्टेशन, नई दिल्ली से कुतुब रोड तक और करोल बाग़ से बाड़ा हिंदू राव तक तांगा चलने का काम किया। लेकिन उन्हें अक्सर आजीविका की समस्या आती थी इसीलिए कभी-कभी उनका अपमान भी होता था जिसके कारण फिर दो महीने बाद ही इन्होंने यह काम भी बंद कर दिया और दिल्ली के करोलबाग में अजमल खां रोड पर अपनी एक छोटी सी दुकान कर ली।

जैसा कि पहले बताया इनके पिताजी की दुकान सियालकोट में अच्छी पहचान बना चुकी थी लेकिन विभाजन ने सब बदलकर इनके परिवार को एक छोटे से खोखे में लाकर रख दिया था। इसके बाद दिल्ली में इस छोटी सी दुकान को शुरू किया और फिर कुछ समय बाद इन्होंने विज्ञापन देने शुरू किये कि “देगी मिर्च सियालकोट वाले अब दिल्ली में भी”।

MDH Shop

धीरे-धीरे सभी लोगों को इनके बारे में पता लगने लगा और गुलाटी जी कारोबार वही पुराने रास्ते पर आने लगा। मतलब वही पुरानी ठाठ हासिल करने लगा जो सियालकोट में थी। अपनी सफलता के बाद इन्होंने 1953 में चांदनी चौक में एक और दुकान किराये पर ले ली।

जैसे-जैसे कारोबार बढ़ने लगा और 60 का दशक आते आते दुकान अपनी एक अच्छी पहचान बना चुकी थी। इनके मसाले की पहचान मसाले की शुद्धता से ही थी। इसी कारण महाशय ने स्वयं ने ही मसाले पीसने का निर्णय किया और इसी काम में लग गये। अपनी मेहनत से गुलाटी परिवार ने 1959 में कीर्ति नगर, दिल्ली में अपनी पहली मसाले तैयार करने की फैक्ट्री शुरू की और “महाशियां दी हट्टी लिमिटेड कंपनी (MDH)” की शुरूआत की।

देश और दुनिया में MDH मसाला

इनकी मसालों की कंपनी पूरे देश के साथ ही विदेश में भी अपनी खास पहचान बना चुकी है। भारत और दुबई में MDH कंपनी की कुल 18 फैक्ट्रियां है और यहां से ही मसाला तैयार करके पूरी दुनिया में भेजा जाता है। इस कंपनी के 62 प्रोडक्ट्स बाजार में है। इसके साथ ही कंपनी का यह दावा भी है कि उतरी भारत के 80 प्रतिशत बाजार में उनका कब्जा है।

93 वर्ष की यह पुरानी कंपनी आज के समय में भारत के साथ अमेरिका, जापान, स्विट्जरलैंड, कनाडा, सऊदी अरब और यूरोप आदि में भी अपने मसाले बेचती है। इस कंपनी का टार्नआवर 1500 करोड़ रुपये से भी ज्यादा बताया जाता है।

टीवी विज्ञापन में महाशय धर्मपाल गुलाटी

टीवी पर प्रसारित होने वाले एम डी एच मलासों के विज्ञापन महाशय धर्मपाल गुलाटी 69 की उम्र में भी खुद ही करते थे। इसलिए लोग इन्हें MDH वाले दादाजी के नाम से भी जानते है। लोगों के मन हमेशा यही सवाल उठता था कि इनके इतने स्वस्थ होने का राज क्या है। आपको बता दे कि महाशय धर्मपाल गुलाटी जी को इतनी लोकप्रियता में इनके विज्ञापनों का भी अहम योगदान है।

Mahashay Dharampal Gulati

सबसे ज्यादा कमाई वाले CEO के रूप में

आप इनके कारोबार का अंदाजा इस बात से लगा सकते है कि धर्मपाल गुलाटी एफएमसीजी सेक्टर के सबसे ज्यादा कमाई वाले CEO भी रह चुके है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार गुलाटी को 2018 में 25 करोड़ की सैलेरी मिली थी। गुलाटी अपनी सैलेरी का 90% हिस्सा दान में दे देते है।

महाशय धर्मपाल गुलाटी को पुरस्कार एवं सम्मान

2016एबीसीआई वार्षिक पुरस्कारों में ‘इंडियन ऑफ़ द ईयर’
2017लाइफटाइम अचीवमेंट के लिए उत्कृष्टता पुरस्कार
2017एफएमसीजी क्षेत्र में सबसे ज्यादा भुगतान करने वाले सीईओ (₹21 करोड़/वर्ष)
Mahashay Dharampal Gulati Award

सामाजिक कार्य में महाशय धर्मपाल गुलाटी

इन्होंने अपनी माता जी के नाम पर दिल्ली में एक होस्पिटल की स्थापना भी की है। इसके साथ ही इन्होंने महाशय चुन्नी लाल चैरिटेबल ट्रस्ट भी बनाया है। यह ट्रस्ट 250 बेड के होस्पिटल की सुविधा भी देता है और मोबाइल होस्पिटल का भी संचालन करता है। यह मोबाइल होस्पिटल से झुग्गियों में रहने वाले लोगों तक पहुंचता है। इसके साथ ही यह ट्रस्ट स्कूल संचालन, अनाथ आश्रम, गौशाला और लोगों को वितीय सहायता भी प्रदान करता है। सामाजिक कार्यों में भी यह ट्रस्ट हिस्सा लेता है।

महाशय गुलाटी की आत्मकथा

महाशय धर्मपाल गुलाटी से जुड़े अन्य तथ्य

  • महाशय धर्मपाल गुलाटी आर्य समाज के बड़े अनुयायी थे।
  • 90 वर्ष की उम्र के बाद भी गुलाटी स्वयं मडीएच उत्पादों का विज्ञापन करते रहे है।
  • गुलाटी ने अपनी आत्मकथा में अपनी सफलता के काफ़ी रहस्यों से पर्दा उठाया है।

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