अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर भाषण

International Women’s Day Speech in Hindi: नमस्कार दोस्तों, अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर महिलाओं के विभिन्न क्षेत्रों में योगदान और उनकी उपलब्धियों की पहचान को बढ़ावा देने के लिए हर वर्ष मनाया जाता है। इस दिन कई बड़े कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

International Women's Day Speech in Hindi
Speech on Women’s Day in Hindi

यहां पर हमने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर स्पीच (Women’s Day Speech in Hindi) लिखे हैं। आप इन भाषण का प्रयोग विभिन्न जगहों पर आयोजित कार्यक्रमों में कर सकते हैं। यहां पर लिखे भाषण बहुत ही सरल शब्दों में लिखे गये है जो आसानी से समझे जा सकते हैं। ये आसान से निबंध बहुत ही प्रेरक और प्रभावशाली है।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर भाषण – International Women’s Day Speech in Hindi

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर भाषण (500 शब्द)

नमस्कार साथियों,

आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है। यह देश व दुनिया में महिलाओं के अधिकारों की समानता को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर मनाया जाता है। इस मौके पर जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित कविता सुना रहा हूँ, जरा गौर फरमाइएगा-

नारी तुम केवल श्रद्धा हो,
विश्वास-रजत-नग-पगतल में,
पियूष-स्त्रोत सी बहा करो,
जीवन के समुन्दर समतल में।

नारी को भगवान ने एक ऐसी शक्ति देकर भेजा है कि कोई भी परिस्थिति हो जब तक वो चुप है तब तक शांति है अगर रौद्र रूप धारण कर लिया तो किसी भी खैर नहीं है।

नारी उत्थान का युग

वर्तमान युग को नारी उत्थान युग कहे तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। आज हमारे देश की महिलाएँ हर क्षेत्र में अपनी विजय पताका फहरा रही है, मौजूदा सरकारें भी महिलाओं को हर क्षेत्र में अपना भविष्य निर्माण करने का अवसर प्रदान कर रही है जो उनके विकास के लिए बहुत बड़ा कदम हैं। अब हर क्षेत्र में महिलाएँ पुरुषों से कंधे से कंधे मिला कर चलती है, किसी के ऊपर बोझ नहीं बनती है, अपितु उसके उलट महिलाएँ दूसरों को सहारा देकर प्रसन्न होती है।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को ख़ास कैसे बनाया जाता है

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस घोषित करने का उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों तथा विश्व शांति को बढ़ावा देना है, सबसे पहले साल 1911 में ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विट्जरलैंड में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया था। हालांकि अब लगभग सारे देशों में महिला दिवस को मनाया जाता है। कई जगहों पर महिलाओं को उनकी उपलब्धियों के सम्मानित करने के साथ-साथ गिफ्ट्स दिये जाते है और संस्थानों से लेकर स्कूल, कॉलेजों में कई तरह के कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाता है।

महिलाएँ और अत्याचार

महिलाओं के साथ अत्याचार का शब्द मानो जैसे जुड़ा ही हो। क्योंकि विगत समय से देखा आया है कि उनके साथ किसी ना किसी प्रारूप में अत्याचार होते आए है। अब जब महिलाएँ अपने पैरो पर खड़ी हो रही है तो उन अत्याचारों में बढ़ोतरी ही हुई है। आमतौर पर महिलाओं को दहेज-हत्या, यौन उत्पीड़न, लूटपाट, नाबालिग लड़कियों को राह चलते छेड़कानी करना है। आमजन हिंसा का मतलब शारीरिक रूप से चोट या क्षति पहुंचाना समझते है, लेकिन मौखिक रूप से अपशब्द कह कर मानसिक परेशानी देना भी एक प्रकार से हिंसा ही है। मानसिक हिंसा किसी को दिखती नहीं है, लेकिन यह हिंसा शारीरिक हिंसा से कहीं गुना खतरनाक होती है।

भारत में महिलाओं का स्वर्णिम इतिहास

भारत की महिलाओं ने दुनिया में जो डंका बजाया है वो अभी तक कानों में गूँज रहा है। वो महिलाएँ ये है – देवी अहिल्याबाई होल्कर, मदर टेरेसा, डला भट्ट, महदेवी वर्मा, राजकुमारी अमृत कौर, अरुणा आसफ अली, सुचेता कृपलानी, कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स और कस्तूरबा गांधी आदि जैसी कुछ प्रसिद्ध महिलाएँ है। कस्तूरबा गांधी ने महात्मा गांधी का बायाँ हाथ बन कर उनके कंधे से कंधा मिलाकर देश को आज़ाद करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

अब जाते जाते आपको वो संस्कृत का एक श्लोक याद दिलवा देता हूँ जिसको व्बोलने अत्र से रूह काँप जाती थी, लेकिन आज के युग उसका कुछ असर दिखाई नहीं देता है। वो श्लोक है यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, तत्र रमन्ते देवता जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवताओं का निवास होता है। इसी के साथ वाणी को विराम देता हूँ।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर भाषण (700 शब्द)

आज के हमारे आदरणीय मुख्य अतिथि, आयोजक और अतिथि गण को मेरा सादर प्रणाम!

आज हम सभी इस कार्यक्रम यानि इंटरनेशनल वुमेन डे के लिए एकत्रित हुये है। 8 मार्च को मनाए जाने वाले महिला दिवस का महत्व हर साल बढ़ता जा रहा है। आज का दिन एक अवसर है कि हम महिलाओं के प्रति प्रेम, प्रशंसा, सम्मान और अपनापन व्यक्त करें, मैं आज इस मौके पर अपने जीवन की उन सभी महिलाओं का धन्यवाद अदा करना चाहता हूँ जिनका मेरे जीवन में अहम स्थान रहा है। मैं अपने दिल की गहराइयों से इन महिलाओं का आभार प्रकट करता हूँ, उन्होने मेरे जीवन में आई मुसीबतों में साथ दिया। मेरी माँ ने मुझे एक बेहतर मनुष्य बनाया है। मैं आप सब से यही आग्रह करना चाहूँगा कि आप भी नारी शक्ति को पहचानें, उनके महत्व को जाने और भविष्य में उन्हें सहयोग करते रहे।

8 मार्च को क्यों अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है

दुनिया में पहली बार इस तरह का आयोजन 1900 में मनाया गया था, यानि कि आज हम इसके 121वें वर्ष के आयोजन में शामिल हो रहे है। भूतपूर्व इसकी तारीख कुछ और थी लेकिन 8 मार्च की महिला दिवस की अलग पहचान है। महिला दिवस के आयोजन का मुख्य उद्देश्य महिलाओं की सुरक्षा एवं उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, करियर और अधिकारों के लिए अवसरों की तलाश है। इस दिन शहरों में महिलाओं के सामाजिक योगदान को रेखांकित करने वाली रैलियों, पैदल मार्च, पेंटिंग, रंगोली, ड्राइंग, आर्ट गैलेरी आदि जैसे आयोजन होते है।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को पहली बार वर्ष 1911 में आधिकारिक रूप से पहचान मिली थी, इसके बाद वर्ष 1975 में संयुक्त राष्ट्र ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को 8 मार्च से मनाना शुरू किया, जिसके बाद पूरे विश्व में इसी तारीख को हर साल यह मनाया जाने लगा। 1908 में न्यूयोर्क में कपड़ा श्रमिकों ने हड़ताल कर दी थी, उनके समर्थन में महिलाएँ खुलकर सामने आई थी। उन्हीं के सम्मान में 28 फरवरी 1909 के दिन अमरीका में पहली बार सोशलिस्ट पार्टी के आग्रह पर महिला दिवस मनाया गया था। 1910 में महिलाओं के ऑफिस की नेता कालरा जेटकिन ने जर्मनी में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की माँग उठाई थी, इस महिला का सुझाव था कि दुनिया के हर देश को एक दिन महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए मनाना चाहिए।

महिलाओं की राह में चुनौतियाँ

सेहत – कैंसर, मोटापा, डायबिटीज, किडनी रोग, हार्ट डिजीज, एनीमिया, आयरन की कमी होना जैसे रोग देश, दुनिया के कई सारे देशों के साथ ही विश्व हेल्थ आर्गेनाइजेशन (WHO) में चिंता का विषय बन हुआ है। यही नहीं, बच्चों के जन्म के साथ मृत्यु होना महिलाओं की गिरती सेहत। महिलाओं को आगे बढ़ने और उनकी प्रगति होने से रोक रही है। लेकिन अगर साफ-सफाई (हायजीन) का ख्याल रखा जाए, संतुलित खान-पान, व्यायाम वाली एक हेल्दी लाइफस्टाइल को अपनाया जाए और समय रहते बीमारियों का पता लगाया जाए, तो इन परेशानियों से मुक्ति पाई जा सकती है।

शिक्षा – आजादी के 74 साल बाद भी देश में एक बड़ी संख्या में लड़कियां और बच्चियां अपनी शिक्षा को पूरा नहीं कर पाती हैं और गरीबी या पारिवारिक समस्या की वजह से छोटी उम्र में ही स्कूल छोड़ने को मजबूर होती है। अशिक्षित होने की वजह अधिकांश महिलाएं अपने जीवन स्तर में सुधार करने में खुद को असमर्थ महसूस करती हैं। वैसे तो सरकारों ने महिला शिक्षा और छोटी बच्चियों की पढ़ाई पूरी करवाने के लिए कई सारी योजनाओं को शुरू किया है। लेकिन फिर भी अभी भी ये प्रयास ऊंट के मुंह में जीरे के समान ही प्रतीत होते हैं।

लैंगिक असमानता – इसे भेदभाव या समान अवसर न मिलना भी कह सकते है। वैसे तो हमारे संविधान में पुरूषों और महिलाओं को समान अधिकार दिए हैं, लेकिन आज भी जीवन के हर क्षेत्र में लड़कियों और महिलाओं को घर से लेकर कार्यक्षेत्र में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। जहां घर में लड़कियों की तुलना हमेशा भाईयों से की जाती है, तो वहीं कार्यक्षेत्र में कई बार महिला कर्मचारी के टेलेंटड होने के बाद भी पुरूषों की पदोन्नति होना, भेदभाव और लैंगिक असमानता को दर्शाता है।

रूढ़िवादी सोच – भारत को आजाद हुये 74 साल होने को आ रहा है लेकिन देश के कई हिस्सों में आज भी महिलाओं के लिए रूढ़िवादी सोच कायम है। वैसे तो महिलाओं ने पुरुषों से संबंधी खेलों , कार्यक्षेत्र में अपने कदम रखें और सफलता भी पाई है। लेकिन फिर भी आज भी महिलाओं को इन कार्यों को करने से पहले परिवार और समाज की नाराजगी का सामना करना पड़ता है।

अंतिम में बस इतना ही कहना चाहूँगा कि नारी को समान भाव से देखे, अगर वो शिक्षित होंगे तो दो परिवार शिक्षित होंगे।

धन्यवाद

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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर भाषण (900 शब्द)

नमस्कार,

महिला दिवस की शुभकामनाएं। आज सबसे ज्यादा महिला सशक्तिकरण की बातें होंगी। लेकिन महिला सशक्तीकरण क्या है यह कोई नहीं जानता। महिला सशक्तीकरण एक विवेकपूर्ण प्रक्रिया है। हमने अति महत्वाकांक्षा को सशक्तिकरण मान लिया है।

मुझे लगता है महिला दिवस का औचित्य तब तक प्रमाणित नहीं होता जब तक कि सच्चे अर्थों में महिलाओं की दशा नहीं सुधरती। महिला नीति है लेकिन क्या उसका क्रियान्वयन गंभीरता से हो रहा है। यह देखा जाना चाहिए कि क्या उन्हें उनके अधिकार प्राप्त हो रहे हैं। वास्तविक सशक्तीकरण तो तभी होगा जब महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होंगी। और उनमें कुछ करने का आत्मविश्वास जागेगा।

वर्तमान में जो हालात दिखाई देते है, उसमें नारी का हर जगह अपमान होता चला जा रहा है। उसे भोग की वस्तु समझकर आदमी अपने तरीके से इस्तेमाल कर रहा है। यह बेहद चिंताजनक बात है। लेकिन हमारी संस्कृति को बनाए रखते हुये नारी का सम्मान कैसे किया जाये इस पर विचार करना आवश्यक है।

यह महत्वपूर्ण है कि महिला दिवस का आयोजन सिर्फ रस्म अदायगी भर नहीं रह जाए। वैसे यह शुभ संकेत है कि महिलाओं में अधिकारों के प्रति समझ विकसित हुई है। अपनी शक्ति को स्वयं समझकर, जागृति आने से ही महिला घरेलू अत्याचारों से निजात पा सकती है। कामकाजी महिलाएं अपने उत्पीड़न से छुटकारा पा सकती हैं तभी महिला दिवस की सार्थकता सिद्ध होगी।

मनु स्मृति में स्पष्ट उल्लेख है कि जहां स्त्रियों का सम्मान होता है वहां देवता रमण करते हैं, वैसे तो नारी को विश्वभर में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है किंतु भारतीय संस्कृति एवं परंपरा में देखें तो स्त्री का विशेष स्थान सदियों से रहा है। फिर भी अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर वर्तमान में यदि खुले मन से आकलन करें तो पाते हैं कि महिलाओं को मिले सम्मान के उपरांत भी ये दो भागों में विभक्त हैं। एक तरफ एकदम से दबी, कुचली, अशिक्षित और पिछड़ी महिलाएं हैं तो दूसरी तरफ प्रगति पथ पर अग्रसर महिलाएं। कई मामलों में तो पुरुषों से भी आगे नई ऊंचाइयां छूती महिलाएं हैं।

नारी का सारा जीवन पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने में ही बीत जाता है। पहले पिता की छत्रछाया में उसका बचपन बीतता है। पिता के घर में भी उसे घर का कामकाज करना होता है तथा साथ ही अपनी पढ़ाई भी जारी रखनी होती है। उसका यह क्रम विवाह तक जारी रहता है।

उसे इस दौरान घर के कामकाज के साथ पढ़ाई-लिखाई की दोहरी जिम्मेदारी निभानी होती है, जबकि इस दौरान लड़कों को पढ़ाई-लिखाई के अलावा और कोई काम नहीं रहता है। कुछ नवुयवक तो ठीक से पढ़ाई भी नहीं करते हैं, जबकि उन्हें इसके अलावा और कोई काम ही नहीं रहता है। इस नजरिए से देखा जाए, तो नारी सदैव पुरुष के साथ कंधेसे कंधा मिलाकर तो चलती ही है, बल्कि उनसे भी अधि‍क जिम्मेदारियों का निर्वहन भी करती हैं। नारी इस तरह से भी सम्माननीय है।

जहां एक तरफ महिलाओं के शोषण, कुपोषण और कष्टप्रद जीवन के लिए पुरुष प्रधान समाज को जिम्मेदार ठहराया जाता है, वहीं यह भी कटु सत्य है कि महिलाएं भी महिलाओं के पिछड़ने के लिए जिम्मेदार हैं। यह भी सच है कि महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों ने ही स्त्री शक्ति को अधिक सहज होकर स्वीकार किया है, न सिर्फ स्वीकार किया अपितु उचित सम्मान भी दिया, उसे देवी माना और देवी तुल्य मान रहा है, जिसकी कि वह वास्तविक हकदार भी है।

इस बहस को महिला विरुद्ध पुरुष (जैसा की कुछ लोग अनावश्यक रूप से करते हैं) नहीं करते हुए सकारात्मक दृष्टि से देखें तो हर क्षेत्र में महिलाएं आगे बढ़ी हैं फिर भी अभी महिला उत्थान के लिए काफी कुछ किया जाना शेष है।

घर के चौके-चूल्हे से बाहर, व्यवसाय हो, साहित्य जगत हो, प्रशासनिक सेवा हो, विदेश सेवा हो, पुलिस विभाग हो या हवाई सेवा हो या फिर खेल का मैदान हो, महिलाओं ने सफलता का परचम हर जगह लहराया है। यहां तक कि महिलाएँ कई राष्ट्रों की राष्ट्राध्यक्ष भी रही हैं और कुछ तो वर्तमान में भी हैं।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर महिलाओं की यह सफलता निश्चित ही संतोष प्रदान करती है। ऐसे में यह भी आवश्यक है कि सुदृढ़ समाज और राष्ट्र के हित में महिला, पुरुष के मध्य प्रतिद्वंद्विता स्थापित नहीं की जाए वरन सहयोगात्मक संबंध बढ़ाए जाएं। शिक्षित एवं संपन्न महिलाओं को चाहिए कि वे पिछड़ी महिलाओं के लिए जो भी कर सकती हैं करें। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की दशा सुधारने पर विशेष ध्यान दिया जाना आवश्यक है क्योंकि महिलाओं की समस्याएं महिलाएं ही भलीभांति समझती हैं इसलिए शिक्षित एवं संपन्न महिलाएं इस दिशा में विशेष योगदान दे सकती हैं। निश्चित ही इस संदर्भ में पुरुषों को भी अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहना होगा।

देखा जाए तो पुरुष स्वयं भी कई समस्याओं से ग्रस्त हैं, खासकर बेरोजगारी की समस्या से। और इसीलिए महिला-पुरुष एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं होते हुए परस्पर सहयोग की भावना से बराबरी से आगे बढ़ सकते हैं। तभी सामाजिक ढांचा और राष्ट्र भी सुदृढ़ बनेगा।

अत्याचार करने वाले किसी भी पुरुष के कारण संपूर्ण पुरुष जमात को दोष देने की होड़ से भी बचना हितकर रहेगा क्योंकि अत्याचार, व्यभिचार, दुराचार करने वाला सिर्फ अत्याचारी है, अपराधी है और उसे उसकी सजा मिलना चाहिए। महिलाओं को समान अधिकार। समान अवसर और ससम्मान स्वतंत्रता का पूर्ण अधिकार है। इसमें किसी संदेह की गुंजाइश भी नहीं है।

हमें अपने लिए सिर्फ इतनी सी बात समझनी है कि अपनी प्रतिभा, दक्षता, क्षमता, अभिरूचि और रूझान को पहचानना है, ईश्वर ने हमें जिन गुणों से नवाजा है उन्हें निखारना है। यंत्रवत कार्य करने के बजाय स्वयं को प्रसन्न रखने के लिए काम करना है आपको अपना परिवेश अपने आप प्रसन्न मिलेगा… दूसरे शब्दों में हर काम को प्रसन्नता से करें अपनी क्षमता का पूरा उपयोग करें।

अपने आप से कहें कि

मैं कर सकती हूं,
मैं करूंगी,
मैं कुछ बन कर ही रहूंगी,
मैं प्रण लेती हूं….

मैं फिर से सभी को इस दिन की शुभकामनाएँ देता हूँ।

धन्यवाद

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इनका नाम राहुल सिंह तंवर है, इन्होंने स्नातक (रसायन, भौतिक, गणित) की पढ़ाई की है और आगे की भी जारी है। इनकी रूचि नई चीजों के बारे में लिखना और उन्हें आप तक पहुँचाने में अधिक है। इनको 3 वर्ष से भी अधिक SEO का अनुभव होने के साथ ही 3.5 वर्ष का कंटेंट राइटिंग का अनुभव है। इनके द्वारा लिखा गया कंटेंट आपको कैसा लगा, कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। आप इनसे नीचे दिए सोशल मीडिया हैंडल पर जुड़ सकते हैं।

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