सावित्रीबाई फुले पर निबंध

Essay on Savitri Bai Phule in Hindi: नमस्कार दोस्तों, यहाँ पर हम सावित्रीबाई फुले पर निबंध शेयर करने जा रहे है। यह निबन्ध सभी कक्षाओं के लिए मददगार साबित होगा। इस निबन्ध को लिखने में बहुत ही सरल भाषा का प्रयोग किया गया है, जिसे आसानी से समझा जा सकता है।

Essay on Savitri Bai Phule in Hindi
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सावित्रीबाई फुले पर निबंध | Essay on Savitri Bai Phule in Hindi

सावित्रीबाई फुले पर निबंध (250 शब्द)

सावित्रीबाई फुले भारत की सबसे पहली महिला शिक्षिका थी। सावित्री बाई का जन्म 3 जनवरी 18 से 31 को हुआ था। इसी के साथ साथ वह एक कवयित्री और एक समाज सुधारक भी थी। सावित्रीबाई की माता का नाम सत्यवती और पिताजी का नाम खंडोजी नेवैसे पाटिल था।

सावित्रीबाई ने 1846 में शादी की थी। शादी के दौरान सास के द्वारा शादी से पहले ईसाई मिशनरियों द्वारा सावित्रीबाई को एक किताब लाकर दी गई थी, उन्होंने उस में नया रास्ता खोजा था। सावित्री बाई की सास के द्वारा सावित्रीबाई को पढ़ाया गया। 1 जनवरी 1848 में भिड़े वाड़ा में लड़कियों के लिए एक स्कूल को शुरू किया गया था।

इसके बाद सावित्रीबाई ने सत्यशोधक समाज के कार्य में वहां पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जब महात्मा फुले का निधन हुआ, इसके पश्चात सत्यशोधक समाज के कार्य की सारी जिम्मेदारी सावित्रीबाई पर आ गई थी। उन्होंने अपने विचारों को फैलाने के लिए काव्या फुले और भावनाक्षी सुबोध रत्नाकर नामक कविताओं का एक संग्रह भी लिखा था।

इसी के साथ उन्होंने कई क्रूर प्रथाओं जैसे बाल विवाह, सती, हज्जाम की दुकान, इत्यादि का विरोध भी किया था। इसके बाद उन्होंने महात्मा ज्योतिबा फुले द्वारा स्थापित सत्यशोधक समाज के काम में भी अपना योगदान दिया था।

सावित्रीबाई के द्वारा कई जगहों पर समाज की भलाई के लिए भाषण भी दिए गए और उनका मिशन था कि वह अनाथों को अनाथालय प्रदान करें। 1897 को जब भयानक प्लेग फैला था तब सावित्रीबाई के द्वारा मरीजों की सेवा की गई। इसी दौरान वह खुद भी प्लेग की शिकार हो गई थी। इसके पश्चात 10 मार्च 1897 को उनका भी निधन हो गया था।

सावित्रीबाई फुले पर निबंध (850 शब्द)

प्रस्तावना

सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 में हुआ था। उनका जन्म महाराष्ट्र के एक किसान परिवार में हुआ था। सावित्री बाई के पिता का नाम खंडोजी नेवसे था और माता का नाम लक्ष्मी बाई था। इसी के साथ सावित्रीबाई भारत की सबसे पहली महिला शिक्षिका भी रही और कवित्री और समाज सेविका भी रही थी।

सावित्रीबाई की जिंदगी का सिर्फ एक ही लक्ष्य था कि लड़कियों को शिक्षित किया जाए। 9 वर्ष की आयु में सावित्रीबाई फुले का विवाह हो गया था। सावित्रीबाई एक बुद्धिमान व्यक्ति थी, इन्हें मराठी भाषा का भी ज्ञान था।

सावित्रीबाई की शिक्षा

सावित्रीबाई एक किसान परिवार की थी, इसके बावजूद भी वह भारत की पहली शिक्षिका बनी। इसी के साथ वह एक समाज सेविका भी बने और कवियत्री के रूप में भी उभरी सावित्रीबाई के द्वारा दो काव्य पुस्तकें भी लिखी गई थी, पहला काव्य उनका फुले और दूसरा बावनकशी सुबोधरत्नाकर था।

सावित्री बाई का जीवन

सावित्रीबाई अपने जीवन में कुछ अच्छा करना चाहती थी। इसके लिए उनका बस एक ही लक्ष्य था कि किसी भी तरह से महिलाओं को शिक्षित किया जाए और उन्होंने इसके लिए कई कदम भी उठाए। 1848 में उन्होंने जब सावित्रीबाई फुले जी को बच्चे पढ़ाने जाती थी, सब लोग उन पर गोबर की बरसात करते थे। अर्थात उनको गोबर फेक कर मारते थे, और उन लोगों का कहना था कि शूद्र से अति शूद्र लोगों को पढ़ाने का अधिकार नहीं होता है, इसीलिए लोगों के द्वारा सावित्रीबाई को रोका जाता था।

इतना सब होने के पश्चात भी सावित्रीबाई नहीं रुकी और वह हमेशा अपना झोला लेकर चलती रही। उस झोले में हमेशा वह एक जोड़ी कपड़े रखा करती थी और जब लोग उन्हें गोबर से मारते थे तब उनके कपड़े गंदे हो जाते थे, इसीलिए वह स्कूल में पहुंचकर अपने कपड़ों को बदल लिया करती थी, इसके पश्चात बच्चों को पढ़ाया करती थी।

सावित्री बाई का लक्ष्य

सावित्री बाई का सिर्फ एक ही लक्ष्य था कि किसी भी तरह बच्चियों को पढ़ाया जाए। इसी के साथ उन्होंने कई प्रथाओं पर रोक हटाई और उन्हें उन पर कामयाबी में मिली जैसे की विधवा विवाह करना, छुआछूत को मिटाना, महिलाओं को समाज में उनका अधिकार दिलवाना और महिलाओं को शिक्षित करना, इन सब के दौरान सावित्रीबाई ने खुद के 18 स्कूल भी खोलें सबसे पहले उनका स्कूल पुणे में खुला था।

उनके द्वारा जब पहला स्कूल खोला गया था तब केवल 9 बच्चे ही उस स्कूल में आते थे और उन्हें भी वह पढ़ाती थी। परंतु 1 वर्ष के अंदर बहुत सारे बच्चे आने लग गए थे।

सावित्रीबाई के द्वारा 3 जनवरी 1848 को अपने जन्मदिन पर उन्होंने अपना सबसे पहला स्कूल खोला था, जिसमें 9 अलग-अलग जातियों के बच्चों को लेकर उन्होंने पढ़ाना शुरू किया था। इसके पश्चात उन्होंने धीरे-धीरे यह मुहिम चलाई की महिलाओं को शिक्षित करना अनिवार्य है और उन्होंने इस मुहिम में सफलता भी पाई इसके पश्चात सावित्रीबाई फुले और उनके पति ज्योतिबा फुले दोनों ने मिलकर 5 स्कूलों का निर्माण करवाया।

उस समय लोगों की बहुत ही गलत विचारधारा थी कि लड़कियों को नहीं पढ़ाना चाहिए। इसी के साथ सावित्रीबाई ने इस विचारधारा को भी बदल कर रख दिया और लोगों को यह भी समझा दिया कि पढ़ने का अधिकार जिस प्रकार लड़कों को है, उतना ही लड़कियों को भी मिलना चाहिए।

इसके लिए सावित्रीबाई ने बहुत संघर्ष किया। इसके बाद उन्होंने एक केंद्र की भी स्थापना की, जहां पर उन्होंने विधवा महिलाओं को पुनर्विवाह के लिए भी प्रेरित किया। इसी के साथ अछूतों के अधिकारों के लिए भी संघर्ष किया गया।

सावित्रीबाई और उनके पति ज्योतिबा फुले दोनों ही एक समाज सुधारक थे। उन दोनों ने मिलकर समाज की बहुत अच्छे प्रकार से सेवा की थी। परंतु उनकी कोई संतान नहीं थी, इसीलिए उन्होंने एक ब्राह्मण विधवा के पुत्र यशवंतराव को गोद ले लिया था। इस बात का विरोध पूरे परिवार के सभी सदस्यों ने किया इसीलिए, उन्होंने अपने परिवार से अपना संबंध समाप्त कर दिया।

सावित्री बाई का सम्मान

1852 मैं तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने पूरे दंपत्ति को महिला शिक्षा के क्षेत्र में योगदान देने के लिए भली प्रकार सम्मानित किया। इसी के साथ केंद्र और महाराष्ट्र सरकार ने सावित्रीबाई फुले की स्मृति के रूप में भी कई पुरस्कारों की स्थापना की थी।

इन सब के साथ ही सावित्री जी के सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया गया था। क्योंकि यह आधुनिक शिक्षा में सबसे पहली महिला शिक्षिका है। इन्हें मराठी भाषा का भी अच्छा ज्ञान था, इसीलिए इन्हें मराठी भाषा का अगुवा माना जाता है।

सावित्रीबाई के द्वारा एक कविता भी लिखी गई थी, जो मराठी भाषा में थी, जो मराठी भाषा में आज के समय में एकदम सटीक काम कर रही है और इसकी जरूरत आधुनिक लोगों को सबसे ज्यादा पड़ रही है।

सावित्री बाई का निधन

1897 में जब लोग प्लेग से ग्रसित हो रहे थे तब सावित्रीबाई और उनके पुत्र के द्वारा एक अस्पताल खोला गया और उस अस्पताल में अछूतों का इलाज भी किया गया। परंतु इस बीमारी के दौरान सावित्रीबाई खुद भी इस बीमारी का शिकार हो गई और उनका निधन हो गया।

निष्कर्ष

हमारे भारत में कई ऐसे लोग हुए हैं, जो आज भी सम्मान के काबिल हैं। उन्होंने हमारे भारत के लिए और भारत के लोगों के लिए बहुत से ऐसे काम किए हैं, जिसकी वजह से आज लोगों को अपने हक मिल रहे हैं। इसीलिए हमें ऐसे लोगों का सम्मान करना चाहिए।

सावित्रीबाई के द्वारा आज लड़कियों को पढ़ाई में इतना महत्व दिया जाता है और उन्हें पढ़ने के लिए भेजा जाता है, इसीलिए सावित्रीबाई को हम शत शत नमन करते हैं।

अंतिम शब्द

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इनका नाम राहुल सिंह तंवर है, इन्होंने स्नातक (रसायन, भौतिक, गणित) की पढ़ाई की है और आगे की भी जारी है। इनकी रूचि नई चीजों के बारे में लिखना और उन्हें आप तक पहुँचाने में अधिक है। इनको 3 वर्ष से भी अधिक SEO का अनुभव होने के साथ ही 3.5 वर्ष का कंटेंट राइटिंग का अनुभव है। इनके द्वारा लिखा गया कंटेंट आपको कैसा लगा, कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। आप इनसे नीचे दिए सोशल मीडिया हैंडल पर जुड़ सकते हैं।

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