बाल गंगाधर तिलक पर निबंध

Bal Gangadhar Tilak Essay in Hindi: आज हम आप सभी को एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्होंने हमारे देश के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया है। इन स्वतंत्रता सेनानी का नाम बाल गंगाधर तिलक है। आज हम बाल गंगाधर तिलक पर निबंध के बारे में जानकारी आपके सामने पेश करने वाले हैं। इस निबंध में बाल गंगाधर तिलक पर निबंध के संदर्भित सभी माहिति को आपके साथ शेअर किया गया है। यह निबंध सभी कक्षाओं के विद्यार्थियों के लिए मददगार है। 

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बाल गंगाधर तिलक पर निबंध | Bal Gangadhar Tilak Essay in Hindi

बाल गंगाधर तिलक पर निबंध (250 शब्द)

हमारे भारत देश के विभिन्न स्वतंत्रता सेनानियों में बाल गंगाधर तिलक का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। बाल गंगाधर तिलक ने ब्रिटिश राज से मुक्ति दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में हुआ था। उनका पैत्रिक गांव सांगमेश्वर तालुका के चिखली में स्थित था।

जब वो 16 साल के थे, तो उनके पिता गंगाधर तिलक का निधन हो गया था। उनके पिता पेशे से एक अध्यापक थे। किशोरावस्था से ही बाल गंगाधर तिलक ने उत्साही राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेना शुरू कर दिया था और उनका समर्थन करना शुरू कर दिया था।

बाल गंगाधर तिलक का दृष्टिकोण कट्टरपंथी हुआ करता था। तिलक ने ब्रिटिश विरोधी आंदोलन और उनके विरुद्ध क्रांतिकारी गतिविधियों का खुलकर समर्थन किया, जिसके कारण तिलक को इसके लिए कई बार जेल भी जाना पड़ा।

सन 1916 में लखनऊ संधि के बाद तिलक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस मे शामिल हो गए। बाल गंगाधर तिलक का यह मानना था कि स्वतंत्रता की मांग के लिए कांग्रेस को और अधिक कट्टरपंथी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। कांग्रेस पार्टी में रहकर तिलक ने महात्मा गांधी के साथ काम किया।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लोकप्रिय नेताओं में से एक हुए तिलक ने 1916-1918 मे एनी बेसेंट और जी.सी. खापर्डे के साथ मिलकर अखिल भारतीय होम रुल लीग की स्थापना की थी। 64 वर्ष की आयु में 1 अगस्त 1920 को हमारे देश के इस स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक जी का निधन ब्रिटिश भारत के बाम्बे मे हुआ था ।

बाल गंगाधर तिलक पर निबंध (800 शब्द)

प्रस्तावना

भारत के वीर स्वतंत्रता सेनानियों में से एक बाल गंगाधर तिलक जी का नाम उनके साहस और बलिदानों स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक के रूप में लिया जाता है। बाल गंगाधर तिलक ने अपने विद्यालय की पढ़ाई और स्नातक की पढ़ाई को पूरा करने के बाद अपना सारा समय सामाजिक सेवा और राजनीतिक समस्याओं को दूर करने में लगा दिया। वह अंग्रेजों के द्वारा शुरू की गई शिक्षा प्रणाली मैं सुधार लाना चाहते थे।

इसके लिए उन्होंने महाराष्ट्र मैं शिक्षा प्रसार के लिए एक समाज की स्थापना की लेकिन उनका मन इस क्षेत्र में भी नहीं लगा। उन्होंने फिर पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना कदम रखा और उन्होंने केसरी नामक मराठी अखबार शुरू किया। उन्होंने उस अखबार में भारत के समाज के सुधार के लिए लिखना शुरू किया।

क्रांतिकारी बनने का सफर

आपको बताते चले कि छुआछूत जैसी समस्याओं के लिए तिलक ने लिखा कि मैं भगवान को भी नहीं पहचान पाऊंगा यदि उन्होंने कहा कि छुआछूत उनके द्वारा बनाया गया कोई नियम है। सामाजिक सुधारों की वकालत करते हुए बाल गंगाधर तिलक ने लोगों का ध्यान राजनीतिक समस्या ब्रिटिश शासन से भारत की मुक्ति की ओर किया। तिलक ने केसरी में लेख लिखना शुरू किया, जिसमें प्रत्येक भारतीय के स्वतंत्र होने के जन्म के अधिकार पर जोर दिया गया ।

यह उन दिनों प्रचारित किया जाने वाला एक क्रांतिकारी सिद्धांत था। इसने उन्हें साम्राज्य के साथ संघर्ष में ला दिया और उन्हें सन 1897 में राजद्रोह के आरोप में दोषी ठहराया गया हालांकि उनका दृढ़ विश्वास उनके लिए एक आशीर्वाद साबित हुआ।

बाद में बाल गंगाधर तिलक एक प्रांतीय नेता से राष्ट्रीय नेता बन गए। जब सन 1889 में जब जवाहरलाल नेहरू का जन्म हुआ था, तब बाल गंगाधर तिलक जी ने सर विलियम वेडरबर्न की अध्यक्षता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बॉम्बे सत्र में भाग लिया। तिलक तब 33 वर्ष के थे तथा तिलक के अलावा दो अन्य युवा कांग्रेसी जो उनके समकालीन बनने वाले थे।

लाल, बाल और पाल का संगम

पहली बार कांग्रेस के मंच पर दिखाई दिए लाला लाजपत राय जिनकी उम्र 34 वर्ष और गोपाल कृष्ण गोखले जिनकी उम्र 33 वर्ष के थे। साल 1885 में कांग्रेस में नरमपंथियों का वर्चस्व हुआ करता था, जो न्याय और निष्पक्षता की ब्रिटिश भावना में विश्वास रखते थे और आंदोलन के संवैधानिक और वैध तरीकों में विश्वास करते थे। हालांकि बाद में लॉर्ड कर्जन के बंगाल राज्य के विभाजन के निर्णय के साथ यह बदल गया।

भारत के युवा उग्रवादी राजनीति और सीधी कार्रवाई की ओर बढ़े। बिपिन चंद्र पाल और लाला लाजपत राय के साथ तिलक ने अंग्रेजों के खिलाफ मोहभंग के अवसर को जब्त कर लिया और नरमपंथियों की राजनीतिक भिक्षावृत्ति की निंदा की। अरबिंदो घोष के साथ बाल पाल लाल की तिकड़ी चरमपंथी के रूप में लोकप्रिय हो गई हालांकि वे खुद को राष्ट्रवादी कहना पसंद किया करते थे।

शिक्षा और प्रभाव

बाल गंगाधर तिलक के पिता गंगाधर तिलक एक स्कूल शिक्षक थे। जब तिलक के पिता जी की मृत्यु हुई थी, तब तिलक सिर्फ 16 साल के थे। पिता की मृत्यु के कुछ महीने पहले ही तिलक की सत्यभामबाई से अपना विवाह कर लिया था।

तिलक ने साल 1877 में पुणे के डेक्कन कालेज से बी.ए. गणित की डिग्री हासिल की। उसके बाद तिलक ने 1879 में गवर्नमेंट लॉ कालेज मुम्बई से लॉ की डिग्री प्राप्त की। तिलक ने शीघ्र ही पत्रकारिता की ओर आगे बढ़ने से पहले एक शिक्षक के रुप मे भी काम किया।

विष्णुशास्त्री चिपलूनकर नाम के एक मराठी लेखक से तिलक काफी प्रभावित थे। चिपलुनकर से प्रेरित होकर तिलक ने 1880 में एक स्कूल की स्थापना की। आगे बढ़ते हुए तिलक और उनके कुछ करीबी साथियों ने 1884 में एक डेक्कन सोसाइटी की स्थापना की।

एक साहसी और राष्ट्रवादी

बाल गंगाधर तिलक की देशभक्ति और साहस उन्हें अन्य नेताओं से अलग पहचान बनाती है। बाल गंगाधर तिलक ने खुलकर ब्रिटिशों की गंदी नीतियों का विरोध किया। बाल गंगाधर तिलक महाराष्ट्र में एक शिक्षक के रूप में विद्यालयों में पढ़ाते थे। बाल गंगाधर तिलक को लिखने के प्रति बहुत रुचि थी ।

उन्होनें केसरी नामक एक समाचार पत्रिका की शुरुआत की, जो खुले तौर पर ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों का समर्थन करती थी। वह ब्रिटिश शासन के गतिविधियों के खिलाफ और क्रांतिकारियों का खुल कर समर्थन करने के लिए कई बार उन्हे जेल भी जाना पड़ा था।

ब्रिटीश सरकार ने बाल गंगाधर तिलक के खिलाफ तीन अवसरों पर सन 1897, 1909 और 1916 में उनके आरोंपो के लिए उन्हे दंड़ित किया था। उन्हे प्रफुल्ल चाकी और खुद्दीराम बोष का साथ देने के लिए उन्हे बर्मा के मांडले मे कैदी बनाकर रखा गया था।

बाल गंगाधर तिलक का देहांत

उन दोनों को मुजफ्फरपुर के मुख्य प्रेसीडेंसी मेजिस्ट्रेट डगलस किंग्फोर्ड पर बम्ब हमले का दोषी ठहराया गया था। जिसमें दो ब्रिटिश महिलाओं की मौत हो गयी थी। उन्होंने छह साल 1908 से 1914 तक मांडले जेल की कैद में बिताए थे। बाल गंगाधर तिलक अपने क्रांतिकारी स्वभाव के लिए लोगों के बीच जाने जाते थे। बाल गंगाधर तिलक जैसे महान स्वतंत्रता सेनानी का निधन 1 अगस्त 1920 को मुंबई में हुआ था।

निष्क्रिय

उनके निधन के साथ ही एक युग की समाप्ति हो गई। उनकी इस लड़ाई से कई युवा नेताओं को प्रेरणा मिली, जिसके चलते वह आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो गए।

अंतिम शब्द

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