गोस्वामी तुलसीदास का जीवन परिचय

नमस्कार दोस्तों, आज हम इस पोस्ट में महान हिन्दू कवि और संत दर्जा प्राप्त, रामचरितमानस जैसे ग्रन्थ के रचियता गोस्वामी तुलसीदास का जीवन परिचय विस्तार से बताने जा रहे हैं। यदि आप संत तुलसीदास के बारे में पूरी जानकारी पाना चाहते है तो हमारे इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें।

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तुलसीदास का मानना है कि उन्हें श्री राम ने दिव्य दर्शन दिए है और उनको हनुमान जी का आशीर्वाद प्राप्त है। हनुमान जी के आशीर्वाद से ही उन्होंने रामचरितमानस की रचना की है और हनुमान जी ने भगवान राम के बारे में बताया था।

तुलसीदास का जीवन परिचय (बचपन, माता-पिता, गुरू, विवाह, रचनाएँ, मृत्यु)

तुलसी दास का जीवनी एक नजर में

नामगोस्वामी तुलसी दास
उपनामरामबोला
जन्म1511 ई. (संवत् 1589), राजापुर, चित्रकूट जिला
मृत्यु1623 ई. (संवत् 1680),112 वर्ष में, अस्सी घाट
शिक्षावेद, पुराण एवं उपनिषदों की शिक्षा
माता-पितामाता-हुलसी
पिता-आत्मा राम दुबे
पत्नीरत्नावली
पुत्रज्ञात नहीं
धर्महिन्दू
गुरूनर हरिदास
पेशासंत और कवि
प्रसिद्ध रचनाएंरामचरितमानस, हनुमान चालीसा, हनुमान अष्टक आदि

तुलसीदास का बचपन और माता-पिता

गोस्वामी तुलसी दास के जन्म के बारे अभी मतभेद है। लेकिन कई विद्वानों का मानना है कि तुलसीदास का जन्म 1511 ई. (संवत् 1589) को उतरप्रदेश के चित्रकूट जिले के राजापुर में हुआ था। इनके पिता का नाम आत्मा राम दुबे और माता का नाम हुलसी था। तुलसीदास के बचपन का नाम रामबोला था।

जब तुलसीदास का जन्म हुआ तब रोने की बजाय इनके मुख से सबसे पहले राम का नाम ही निकला था, इसलिए इनका बचपन से ही नाम रामबोला रख लिया गया। इनका जन्म 32 दांतों के साथ ही हुआ था। हर नवजात शिशु अपनी की कोख में 9 महीने तक रहता है, लेकिन तुलसीदास 12 महीने तक अपनी मां की कोख में रहे।

तुलसी दास जी के जीवन को लेकर एक दोहा प्रसिद्ध है, जो यहां दे रहे हैं:

पन्द्रह सौ चौवन विसे कालिन्दी के तीर।
श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी धरयो शरीर।।

कई विद्वान यह दावा करते हैं कि वो पराशर गोत्र के एक सारूपरेण ब्राहमण थे और कुछ का मानना है कि ये कन्याकुब्जा या संध्याय ब्राहमण थे।

तुलसीदास के जन्म ज्योतिषियों ने बताया कि उनके जन्म का समय अशुभ है। जन्म के दूसरे ही दिन उनकी माता इस दुनिया से चली गई और इनके पिता ने सन्यास ग्रहण कर लिया। लेकिन उनके पिता ने सन्यास धारण करने से पहले उन्होंने तुलसी दास को चुनिया दासी को संभाल दिया था।

5 वर्षों तक लालन-पोषण करने के बाद दासी चुनिया भी इस दुनिया से चल बसी। चुनिया के निधन के बाद तुलसीदास अनाथ हो गये।

तुलसीदास के गुरू

जन्म के दूसरे दिन माता का छोड़ जाना, पिता का सन्यास ले लेना और फिर 5 वर्ष बाद लालन-पोषण करने वाली दासी चुनिया का भी चले जाने से तुलसीदास अकेल पड़ गये थे। तब वहां के रामानंद के मठवासी आदेश पर करने वाले नर हरिदास ने इनको अपना लिया और रामबोला को अपने अयोध्या आश्रम में रहने दे दिया।

तुलसीदास ने संस्कार के समय बिना कंठस्थ किए गायत्री मंत्र का स्पष्ट उच्चारण किया। ऐसा देखकर वहां के सभी लोग अचंभित हो गये। तुलसीदास बचपन से तेज बुद्धि वाले थे, जो भी एक बार पढ़ लेते थे, वो उनका कंठस्थ हो जाता था।

वेदों और साहित्य का ज्ञान

तुलसीदास जन्म से ही तेज बुद्धि और कुशाग्र थे। वो जो भी पढ़ लेते थे, उनको पूरी तरह से याद हो जाता था। वाराणसी में संत तुलसीदास ने संस्कृत व्याकरण सहित 4 वेदों का ज्ञान लिया और 6 वेदांग का भी अध्ययन किया।

इन्होंने साहित्य और शास्त्रों के विद्वान और प्रसिद्ध गुरू शेषा सनातन से हिंदी साहित्य और दर्शन शास्त्र का अध्ययन किया। इन्होने अपनी पढ़ाई 16 से 17 वर्ष तक जारी के बाद वापस राजापुर लौट आये।

तुलसीदास का विवाह

जो भी ज्ञान तुलसीदास के पास था, वो हमेशा अपने दोहों और अपनी कथाओं के माध्यम से सुनाते थे और लोगों को भक्ति करने के लिए प्रेरित किया करते थे। एक बार की बात जब तुलसीदास हमेशा की तरह लोगों को अपनी कथा और दोहे सुना रहे थे। तभी वहां पर मौजूद पंडित दीन बंधु पाठक उनसे इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी पुत्री रत्नावली का विवाह तुलसीदास से करवा दिया।

रत्नावली से उनका विवाह 29 वर्ष की आयु में राजापुर के निकट स्थित युमना नदी के किनारे हुआ था। उनका विवाह तो हो गया था, परन्तु गौना नहीं हुआ था (गौना एक विवाह के बाद की रस्म है, जिसमें वर अपने ससुराल जाता है और कुछ रीती रिवाज को पूरा करके अपनी वधु को साथ लेकर आता है)।

गौना नहीं होने के कारण तुलसीदास काशी जाकर वेद वेदांग के अध्ययन में लग गये। वेद वेदांग का अध्ययन करते समय एक दिन अचानक उनको अपनी वधु रत्नावली याद आने लगी तभी उन्होंने अपनी गुरू से आज्ञा से लेकर वे राजापुर आ गये।

रत्नावली अपने मायके में थी, क्योंकि उनका गौना नहीं किया हुआ था। तुलसीदास काली अंधेरी रात में रत्नावली से मिलने के लिए निकल गये और उस समय बहुत तेज बारिश भी हो रही थी। तेज बारिश के कारण यमुना नदी पूरे उफान पर थी, जिसमें तुलसी दास को एक लड़की का लट्ठा दिखाई दिया। उसके सहारे उन्होंने उफनती नदी को पार किया और रत्नावली के घर तक पहुँच गये।

रत्नावली के घर के पास एक बड़े से पेड़ पर एक रस्सी लटक रही थी, उसके सहारे वो रत्नावली के कक्ष तक पहुँच गये। तुलसीदास रत्नावली से मिलने के लिए इतने उत्सुक थे कि उनको यमुना नदी में एक लाश लड़की का लट्ठे के रूप में और पेड़ पर लटक रहा सांप एक रस्सी के रूप में दिखाई दिए।

जब रत्नावली ने उनको देखा तो वह भयभीत गई और उनको कहा कि वापस चले जाए। क्योंकि गौना नहीं होने के कारण वह नहीं मिल सकती, इसके कारण उनकी लोक-लज्जा पर सवाल उठेंगे।

रत्नावली ने तुलसीदास को एक दोहे के माध्यम से शिक्षा दी यह दोहा इस प्रकार है:

अस्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति।
नेकु जो होती राम से, तो काहे भव-भीत।।

इस दोहे के माध्यम से रत्नावली ने तुलसीदास को समझाया कि आप हाड़ मांस के शरीर से जितना प्रेम करते हैं, यदि उसका आधा भी यदि भगवान से कर लें तो वह भवसागर से पार हो जायेंगे।

इस दोहे का तुलसीदास जी पर इतना प्रभाव पड़ा कि उन्होंने अपना पारिवारिक जीवन त्याग दिया और गाँव आ गये। वहां पर साधू बनकर लोगों को श्री राम की कथा सुनाने लगे और श्री राम की भक्ति में लीन हो गये।

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तुलसीदास की तीर्थयात्रा

तुलसीदास ने सम्पूर्ण भारत में तीर्थ यात्रा की थी। तुलसीदास द्वारका, पुरी, बद्रीनाथ, हिमालय और रामेश्वर में लोगों के बीच में जाते और वहां के लोगों के बीच में श्री राम का गुणगान करते।

अपना अधिकतर समय उन्होंने काशी, अयोध्या और चित्रकूट में ही व्यतीत किया। परन्तु अपने आखिरी समय में वो काशी आ गये।

हनुमानजी का आशिर्वाद

वो अब श्री राम की भक्ति में लीन हो गये थे। हर समय उठते बैठते श्री राम का नाम ही लिया करते थे। चित्रकूट के अस्सी घाट पर उन्होंने 1580ई. अपने में महाकाव्य रामचरितमानस लिखना प्रारम्भ किया। तुलसीदास जी ने इस ग्रंथ को 2 वर्ष 7 महीने और 26 दिन में पूर्ण किया।

कहा जाता है कि रामचरितमानस महाग्रंथ लिखने में उनको हनुमान जी का मार्गदर्शन मिला था। तुलसीदास अपनी कई रचनाओं में यह उल्लेख किया है कि उनको हनुमान जी की मुलाकात कई बार हुई है।

वाराणसी में तुलसीदास ने हनुमान जी के लिए संकटमोचन मंदिर भी स्थापित किया था। तुलसीदास के अनुसार उन्हें हनुमान जी आशीर्वाद दिया, जिसके कारण ही श्री राम के दर्शन प्राप्त हुए है। तुलसीदास ने अपनी रचनाओं में हनुमान जी के दर्शन के अलावा पार्वती और शिव के दर्शन का उल्लेख किया है।

श्री राम के दर्शन

तुलसीदास को श्री राम की प्रबल और अटूट भक्ति व हनुमान जी आशीर्वाद से श्री राम के दर्शन चित्रकूट के अस्सी घाट पर हुए।

एक बार तुलसीदास कदमगिरी पर्वत की परिक्रमा करने के लिए निकले तो उन्होंने एक घोड़े की पीठ पर दो राजकुमार बैठे देखा। लेकिन उस समय वो उनकी पहचान नहीं कर सके, लेकिन थोड़े ही समय के बाद उनको पता लगा कि वो हनुमान जी की पीठ राम-लक्ष्मण थे और वो दुखी हो गये। इन सभी घटनाओं का उल्लेख उन्होंने अपनी रचना गीतावली में किया है।

फिर अगली सुबह जब तुलसी दास चंदन घिस रहे थे तो श्री राम और लक्ष्मण ने उनको फिर दर्शन दिए उनको कहा कि वे तिलक करें। लेकिन तुलसीदास उनके दिव्य दर्शन में अभिभूत हो चुके थे, इस कारण वो तिलक करना भूल गये। फिर भगवान राम ने खुद अपने हाथों से तुलसीदास के माथे पर तिलक लगाया।

तुलसीदास के जीवन का ये सुखद पल था, इस घटना के लिए ये दोहा बहुत प्रसिद्ध है:

चित्रकूट के घाट पै, भई संतन के भीर।
तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रघुबीर।।

चित्रकूट में हुए इस चमत्कार के बारे में विनयपत्रिका में बताया है और वहां पर श्री राम का धन्यवाद भी किया।

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तुलसीदास की मृत्यु

कहा जाता है कि तुलसीदास का निधन किसी बीमारी के चलते हुआ था और इनके जीवन के अंतिम क्षण अस्सी घाट पर गुजारे थे। ये भी कहा जाता है कि उन्होंने अपनी अंतिम समय में अपनी रचना विनय-पत्रिका लिखी थी और इसी रचना पर भगवान श्री राम ने अपने हस्ताक्षर किये थे।

विनय पत्रिका को पूरा लिखने के बाद 1623 ई. (संवत् 1680) में तुलसीदास का देवलोक गमन हो गया। तुलसीदास ने अपनी जीवन की यात्रा के 112 वर्ष लिए।

तुलसीदास जी की कुछ रोचक जानकारियां

  • तुलसीदास जी अपने 32 दांतों के साथ ही जन्मे थे।
  • उनके मुंह से सबसे पहला और आखिरी शब्द राम था।
  • उन्होंने रामनवमी (यानि त्रेतायुग के आधार पर राम-जन्म) के दिन प्रातःकाल रामचरितमानस की रचना प्रारम्भ की।
  • 1 अक्टूबर 1952 को भारत सरकार द्वारा गोस्वामी तुलसीदास को महान कवि के रूप में सम्मानित करते हुए, एक डाक टिकट जारी की गई।

साहित्यिक कार्य

हिंदी साहित्य में स्थान

हिंदी साहित्य में गोस्वामी तुलसीदास का स्थान सर्वश्रेष्ठ है। तुलसीदास राम भक्ति शाखा के प्रमुख कवि थे। गोस्वामी तुलसीदास को मानव जीवन का सफल पारखी कहा जाता है, क्योंकि इन्होंने मानव प्रकृति के जितने रूपों का सजीव वर्णन किया है, उतना शायद ही किसी अन्य ने किया होगा।

इन्हें समाज का पथ प्रदर्शन कभी भी कहा जाता है, क्योंकि इनकी रचना पढ़कर पाठक का प्रेरित होता है और सही राह पर चलने की प्रेरणा देता है। तुलसीदास का दृष्टिकोण अत्यंत व्यापक एवं समन्वयवादी माना जाता है। इन्होंने रामचरितमानस, विनय पत्रिका कवितावली जैसी धार्मिक ग्रंथों की रचना करके पूरे विश्व में भारत के हिंदी साहित्य का डंका बजाया है।

इन्होंने अपनी रचना के माध्यम से तत्कालीन समाज में समाज सुधारक के तौर पर कार्य किया। इन्होंने मुगल काल में भी हिंदू साहित्य की रचना करके हिंदू धर्म का संरक्षण किया, उसका प्रचार प्रसार किया।

तुलसीदास ने काव्यशास्त्र को माध्यम बनाकर हिंदी साहित्य को श्रेष्ठ रचनाएं प्रदान की। गोस्वामी तुलसीदास हिंदी के अमर कवि हैं, जो युगों-युगों तक लोगों के बीच जीवंत रहेंगे और इनकी रचना हमेशा ही सर्वश्रेष्ठ बनी रहेगी।

गोस्वामी तुलसीदास की प्रमुख रचना

  • गोस्वामी तुलसीदास ने अपने जीवन काल में कुल 39 ग्रंथों की रचना की है, जिसमें राम चरित्र मानस प्रबंध काव्य की दृष्टि से और विनय पत्रिका मुक्त काव्य की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
  • इन्होंने लगभग 1569 ईसवी में वैराग्य संदीपनी नामक ग्रंथ की रचना की।
  • 1570-71 के लगभग गोस्वामी तुलसीदास ने ब्रज भाषा का प्रयोग करते हुए रामाज्ञाप्रश्न की रचना की, जिसमें उन्होंने सात सर्गो में राम की कथा का उल्लेख किया है। इसमें इन्होंने सीता निर्वासन का प्रसंग भी शामिल किया है।
  • वहीँ लगभग 1571-72 ईसवी के बीच में गोस्वामी तुलसीदास ने सोहर शैली में 20 चतुष्पदियों की छोटी सी रचना रामलला नहछू को रचा। इसमें गोस्वामी तुलसीदास ने मांगलिक अवसर पर नख काटने के रिवाज का भी उल्लेख किया है।
  • 1572-73 ईसवी के लगभग गोस्वामी तुलसीदास ने राम एवं सीता के विवाह के प्रसंग को चित्रित करते हुए अवधी भाषा में जानकी मंगल की रचना की।
  • उसके बाद तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की जो संपूर्ण हिंदी वाड़्मय की सर्वश्रेष्ठ कृतियों में से एक मानी जाती है। इसमें तुलसीदास ने रामचरितमानस के लिखने के प्रारंभ समय का भी जिक्र किया है, इसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास ने 1574 ईसवी में की है। इसमें गोस्वामी तुलसीदास ने रामायण के सात कांड बालकांड, अयोध्याकांड, अरण्यकांड, किष्किंधाकांड, सुंदरकांड, लंकाकांड तथा उत्तरकांड में  राम कथा का वर्णन किया है। इस राम चरित्र मानस ग्रंथ की रचना में गोस्वामी तुलसीदास को 2 वर्ष 7 महीने और 26 दिन का वक्त लगा।
  • इसके बाद 1586 ईस्वी में गोस्वामी तुलसीदास ने भगवान शिव और पार्वती के विवाह की कथा को वर्णित करते हुए अवधी भाषा में पार्वती मंगल की रचना की।
  • 1586 से 1603 ईसवी के बीच में गीतावली की रचना की, जिसे पदावली रामायण के रूप में भी जाना जाता है। लगभग इसी कालखंड में गोस्वामी तुलसीदास ने भगवान श्रीकृष्ण के जीवन संबंधित गीतों का संग्रह कृष्ण गीतावली की रचना की।
  • उसके बाद गोस्वामी तुलसीदास ने 573 दोहे का संग्रह दोहावली की रचना की, जिसमें कुछ दोहे “रामचरितमानस” से लिए गए हैं। वहीं 35 दोहे “रामाज्ञाप्रश्न” से लिए गए हैं और कुछ दोहे “वैराग्य संदीपनी” से लिए गए हैं।
  • 1573 से 1623 ईसवी के बीच गोस्वामी तुलसीदास ने राम की कथा का वर्णन करते हुए ‘बरवैरामायण’ की रचना की, जिसमे तुलसीदास ने भगवान राम की कथा को सात कांड में विभाजित किया है।
  • उसके बाद 1574 से 1622 ई. में गोस्वामी तुलसीदास ने “विनय पत्रिका” की रचना की इसे “राम गीतावली” के नाम से भी जाना जाता है। विनय पत्रिका गोस्वामी तुलसीदास के प्रमुख रचनाओं में से एक है। यह मुक्तको का संग्रह है और इसके माध्यम से तुलसीदास ने अपना आत्म निवेदन भगवान श्रीराम को अर्पित किया है।
  • लगभग इसी कालखंड में तुलसीदास ने ब्रज भाषा में मुक्ताको का संग्रह कवितावली की रचना की, जो 7 खंडों में विभाजित किया गया है। इसके कुछ संस्करणों में ‘हनुमानबाहुक’ भी शामिल है।

गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित 12 रचनाएँ (6 छोटी और 6 मुख्य) बहुत प्रसिद्ध है। भाषाओं के आधार पर 2 समूहों में विभाजित है।

अवधी

  1. रामचरितमानस
  2. रामलला नहछू
  3. बरवाई रामयण
  4. पार्वती मंगल
  5. जानकी मंगल
  6. रामाज्ञा प्रशन

ब्रज

  1. कृष्णा गीतावली
  2. गीतावली
  3. साहित्य रत्न
  4. दोहावली
  5. वैराग्य संदीपनी
  6. विनय पत्रिका

ये 12 रचनाएँ तो मशहूर है ही, इसके साथ ही 4 रचनाएँ भी बहुत मशहूर है, जिनमें हनुमान चालीसा, हनुमान अष्टक, हनुमान बहुक और तुलसी सतसाई है।

तुलसीदास की रचनाएँ

रामचरितमानसरामललानहछूवैराग्य-संदीपनीबरवै रामायण
कलिधर्माधर्म निरुपणकवित्त रामायणछप्पय रामायणकुंडलिया रामायण
छंदावली रामायणसतसईजानकी-मंगलपार्वती-मंगल
श्रीकृष्ण-गीतावलीझूलनारोला रामायणराम शलाका
कवितावलीदोहावलीरामाज्ञाप्रश्नगीतावली
विनयपत्रिकासंकट मोचनहनुमान चालीसाकरखा रामायण

तुलसीदास की भाषा

तुलसीदास ने अपनी रचना में अवधी और ब्रज दोनों ही भाषा का प्रयोग किया है। इन्होंने रामचरितमानस, पार्वती मंगल, जानकी मंगल, रामलला नहछू, बरवै रामायण इत्यादि की रचना अवधी भाषा में की है। वहीँ कवितावली, विनय पत्रिका, गीतावली जैसी रचनाओं को ब्रज भाषा में लिखा है।

तुलसीदास की भाषा शैली बहुत ही सरल रही है। इन्होंने विनय पत्रिका में मुक्तक शैली, रामचरितमानस में प्रबंध शैली और दोहावली में साखी शैली का प्रयोग किया है। इन्होंने तत्कालीन सभी काव्य शैलियों का प्रयोग अपने काव्य रचना में किया है। दोहा, चौपाई, सवैया, पद, कवित आदि काव्य शैलियों में कवि ने काव्य रचना की है।

भाव पक्ष तथा कला पक्ष दोनों की दृष्टि से ही तुलसीदास का काव्य अद्वितीय माना जाता है। इन्होंने अपनी रचना में सभी रसों का प्रयोग किया है और अवधी और ब्रज भाषा दोनों को ही समान अधिकार देते हुए दोनों का ही प्रयोग समान तरीके से अपनी रचना में किया है।

इनकी भावना बहुत ही सीधी, सरल एवं सत्य है और इनकी रचना में भावों की विविधता ही उनकी सबसे बड़ी विशेषता है। इन्होंने अपनी रचनाओं में अलंकार का प्रयोग करके इसे और भी ज्यादा सुंदर और प्रभावोत्पादक बना दिया है।

गोस्वामी तुलसीदास का केन्द्रीय भाव

गोस्वामी तुलसीदास की रचनाओं का केंद्रीय भाव हमेशा ही समाज का हित रहा है। इन्होंने रामचरितमानस जैसे धार्मिक ग्रंथों की रचना करके समाज के लोगों को धर्म और फर्ज की परिभाषा दी।

इन्होंने अपने रचना के माध्यम से समाज का पथ प्रदर्शित किया है। समाज के लोगों को सही राह पर चलने के उपदेश दिए हैं, जीवन में सफल होने के तरीके बताए हैं। अपनी रचना के माध्यम से तुलसीदास जी ने क्रोध, लोभ, मोह के वशीभूत व्यक्ति का क्या नुकसान होता है, उसके बारे में बताया है।

तुलसीदास जी से जुड़े कुछ प्रशन

तुलसीदास के गुरु कौन थे?

तुलसीदास के गुरु नर हरिदास थे।

तुलसीदास ने ज्ञान अर्जन किस तरह की?

तुलसीदास के जब माता-पिता दोनों ही संसार से चल बसे, घर की स्थिति बहुत खराब हो गई थी। इन्हें भीख मांग कर अपना पेट पढ़ना पड़ता था, इसी बीच इनका परिचय राम भक्त साधुओं शिव भजन के साथ रहते हुए तुलसीदास को ज्ञान अर्जुन का अनुपम अवसर मिला।

तुलसीदास का जन्म कहाँ हुआ था?

तुलसीदास का जन्म राजापुर, चित्रकूट जिला, उतरप्रदेश में हुआ था।

तुलसीदास जी का जन्म कब हुआ था?

गोस्वामी तुलसी दास के जन्म के बारे अभी मतभेद है। लेकिन कई विद्वानों का मानना है कि तुलसीदास का जन्म 1511 ई. (संवत् 1589) को उतरप्रदेश के चित्रकूट जिले के राजापुर में हुआ था।

तुलसीदास के बचपन का नाम क्या था?

तुलसीदास के बचपन का नाम रामबोला था।

तुलसीदास ने अपने जीवन काल में कुल कितने ग्रंथ की रचना की?

बताया जाता है तुलसीदास द्वारा उनके जीवनकाल में कुल 39 ग्रंथ लिखे गए, जिनमें से विनय पत्रिका, कवितावली, रामचरितमानस, दोहावली, हनुमान चालीसा, जानकी मंगल आदि विशेष उल्लेखनीय है।

तुलसीदास के पिता का नाम क्या था?

तुलसीदास के पिता नाम आत्मा राम दुबे था।

तुलसीदास की मृत्यु कब हुई थी?

तुलसीदास की मृत्यु 1623 ई. (संवत् 1680) में 112 वर्ष में हुई थी।

गोस्वामी तुलसीदास की मृत्यु कहां हुई?

कहा जाता है कि तुलसीदास का निधन किसी बीमारी के चलते हुआ था और इनके जीवन के अंतिम क्षण अस्सी घाट पर गुजारे थे।

तुलसीदास का का नाम किसने रखा था?

तुलसीदास का नाम रामशैल पर रहने वाले नरहरि बाबा ने इस रामबोला के नाम से बहुत चर्चित हो चुके इस बालक को ढूंढकर इनका विधिवत नाम तुलसीराम रखा।

तुलसीदास की जाति क्या थी?

कई विद्वान यह दावा करते हैं कि वो पराशर गोत्र के एक सारूपरेण ब्राहमण थे और कुछ का मानना है कि ये कन्याकुब्जा या संध्याय ब्राहमण थे।

तुलसीदास कैसे कवि थे?

गोस्वामी तुलसीदास हिंदी साहित्य के महान कवि थे।

तुलसीदास की पत्नी कौन थी?

तुलसीदास की पत्नी रत्नावली थी।

तुलसीदास की भाषा शैली क्या थी?

तुलसीदास ने अवधी एवं ब्रजभाषा दोनों में काव्य रचना की।

निष्कर्ष

हमने यहाँ पर तुलसीदास का जीवन परिचय विस्तारपूर्वक बताया हैं। आपको यह लेख कैसा लगा, हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। यदि आपका इस लेख से जुड़ा कोई सवाल या सुझाव है तो कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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