सोमवार की व्रत कथा

सोमवार की व्रत कथा | Somvar Ki Vrat Katha

दोस्तों हमारा भारत देश प्राचीन परंपराओं से परिपूर्ण है। यहां पर तरह तरह के लोग निवास करतें हैं। पर बात जब आस्था की आती है तो सभी अपने धर्म के अनुसार पूरे विधि बिधान से अपने ईश्वर का पूजन करते हैं। आज हम आपके समक्ष लेकर आएं हैं सोमवार की व्रत कथा के बारे में। आप इसे अंत तक पढ़िएगा।

एक नगर में एक बहुत ही इमानदार व्यापारी रहा करता था। व्यापारी के पास बहुत सारा धन था। उसको किसी भी चीज की कमी नहीं थी। व्यापारी अपने कार्य को बहुत ईमानदारी से करता था और व्यापारी भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था। व्यापारी को बस एक ही चीज की कमी थी। व्यापारी की कोई संतान नहीं थी।

जिसके कारण वह बहुत दुखी रहा करता था और संतान प्राप्ति के लिए हर उपाय किया करता था। एक दिन व्यापारी को उसके मित्र ने बताया कि तुम सोमवार का व्रत रखना शुरू कर दो। हो सकता है भगवान शिव प्रसन्न होकर तुमको पुत्र प्राप्ति का वरदान दे दे। जिसके बाद से व्यापारी और उसकी पत्नी ने भगवान शिव की पूजा करना शुरू कर दी और सोमवार का व्रत रखना शुरू कर दिया।

व्यापारी पूरे सच्चे मन से भगवान शिव की पूजा किया करता था और अपने व्रत को पूर्ण किया करता था। वह रोज भगवान शिव के मंदिर जाता था। सच्चे मन से उनकी भक्ति करता था। भगवान शिव और माता पार्वती व्यापारी की भक्ति देखकर बहुत प्रसन्न हो गए थे। लेकिन माता पार्वती ने भगवान शिव से उस व्यापारी की मनोकामना को पूरी करने के लिए कहा। जिसके बाद भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा कि जिसके भाग्य में जितने कर्म किए होते हैं, उन कर्मों का फल सबको मिलता है।

Somvar Ki Vrat Katha
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और उन्हीं कर्मों के अनुसार सब निर्धारित होता है की भाग्य में क्या है? क्या नहीं? जिसके भाग्य में जो होता है, उसको वही भोगना पड़ता है लेकिन माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि व्यापारी की भक्ति आपके लिए प्रति बहुत अच्छी है। आप उसकी मनोकामना पूर्ण कर दीजिए जिसके बाद भगवान शिव ने माता पार्वती की बात सुनकर उस व्यापारी को पुत्र प्राप्ति का वरदान दे दिया।

लेकिन भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा कि मैंने वरदान तो दे दिया है, पर व्यापारी का बेटा सिर्फ बारह वर्ष की आयु तक जीवित रहेगा। बारह वर्ष के बाद उसका निधन हो जाएगा। व्यापारी माता पार्वती और भगवान शिव की बातों को सुन रहा था। लेकिन व्यापारी को कोई दुख नहीं था बल्कि वह अपने पुत्र प्राप्ति के वरदान से बहुत खुश था और व्यापारी खुशी खुशी भगवान शिव की पूजा करता रहता था।

धीरे-धीरे समय बीता गया कुछ समय के पश्चात व्यापारी की पत्नी को एक लड़के की प्राप्ति हुई। व्यापारी की पत्नी और व्यापारी लड़के की प्राप्ति से बहुत प्रसन्न थे। व्यापारी और उसकी पत्नी अपने पुत्र के लालन-पालन में लग गए। जैसे ही व्यापारी का पुत्र ग्यारह वर्ष का हो गया तो व्यापारी ने अपने पुत्र के मामा को अपने घर बुलाया और व्यापारी ने पुत्र के मामा से कहा कि तुम इसको काशी ले जाओ।

काशी ले जाकर तुम इसकी शिक्षा पूरी करवाओ और व्यापारी पुत्र के मामा से कहा कि तुम जाते समय रास्ते में यज्ञ करवाना और बहुत सारे ब्राह्मणों को भोज करवाते हुए जाना। जिसके लिए व्यापारी ने पुत्र के मामा को बहुत सारा धन भी दे दिया।

मामा और भांजा काशी के लिए निकल पड़े और रास्ते में बहुत सारे यज्ञ और ब्राह्मणों को भोज करवाते हुए जाने लगे। कई दिनों की यात्रा करने के बाद दोनों एक नगर पहुंचे, जहां का राजा बहुत ही धनी और बलवान था। राजा की एक पुत्री थी। राजा अपनी पुत्री का विवाह एक आंख के अंधे राजकुमार से करने जा रहा था।

यह बात राजा अपनी पुत्री से छुपाए हुए था और इस बात से चिंतित था कि कहीं उसकी पुत्री को राजकुमार का सच पता ना चल जाए। राजा ने व्यापारी के लड़के को देखा तब राजा ने एक योजना बनाई की वह अपनी पुत्री का विवाह व्यापारी के लड़की के साथ कर देगा और शादी होने के बाद व्यापारी के लड़के को बहुत सारे पैसे देकर राजकुमार से बदल देगा।

जिसके बाद राजा ने अपनी पुत्री का विवाह व्यापारी के लड़के से बहुत धूमधाम से करवा दिया और विवाह के बाद व्यापारी के लड़के को धन देकर वहां से जाने के लिए कह दिया। लेकिन व्यापारी का लड़का बहुत ही ईमानदार था। उसने व्यापारी की पुत्री की एक कपड़े में सारी सच्चाई लिख दी थी कि तुम्हारा विवाह मेरे साथ हुआ है। तुम्हारे पिताजी तुम्हारी शादी एक आंख के अंधे व्यक्ति से करने जा रहे थे और जिसके कारण वह डर रहे थे कि अगर तुम्हें कहीं सच्चाई पता लग जाएगी।

तो तुम उनके बताए हुए लड़के से शादी नहीं करोगी और तुम्हारे पिताजी ने तुम्हारी शादी मेरे साथ करवा दी है और मुझे बहुत सारा पैसा देकर वहां से विदा कर दिया है। जब राजा की लड़की ने उस कपड़े को पढ़ा तो, वह बहुत आश्चर्यचकित रह गई और उसको अपने पिताजी पर बहुत क्रोध आने लगा।

जब राजा ने अपनी पुत्री को राजकुमार के साथ जाने के लिए कहा तो, राजा की पुत्री ने मना कर दिया और अपने पिताजी से कहा कि मैं इस राजकुमार के साथ नहीं जाऊंगी क्योंकि मेरा विवाह इसके साथ नहीं हुआ है।

राजा ने अपनी पुत्री की बात मान कर राजकुमार और उसके सभी लोगों को वापस भेज दिया और उधर व्यापारी का पुत्र और उसके मामा दोनों काशी पहुंच गए। काशी पहुंचकर व्यापारी का पुत्र अपनी शिक्षा पूरी करने लगा। एक वर्ष के पश्चात जब व्यापारी का पुत्र बारह वर्ष का हो गया तो, उसके जन्मदिन पर उसके मामा ने यज्ञ करवाने का निर्णय लिया था। अपने निर्णय के अनुसार वह यज्ञ करवाने के लिए सभी तैयारी कर रहा था तभी व्यापारी के लड़के ने अपने मामा से कहा कि मामा मेरी तबीयत कुछ खराब लग रही है।

उसके मामा ने कहा जाओ, तुम थोड़ा आराम कर लो। जैसे ही व्यापारी का लड़का आराम करने के लिए कमरे में गया तब भगवान शिव के दिए हुए वरदान के अनुसार व्यापारी के लड़के के बारह वर्ष पूरे हो चुके थे और उसके अंत का भी समय आ गया था। थोड़ी ही देर में व्यापारी के पुत्र का निधन हो गया। जैसे ही यह बात उसके मामा को पता लगी थोड़ा जोर जोर से रोने लगा। अचानक से वहां से माता पार्वती और भगवान शिव जा रहे थे।

उनकी आवाज सुनकर माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि किसी के रोने का स्वर आ रहा है। जिसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती ने जाकर देखा तो भगवान शिव ने देखा कि यह तो वही व्यापारी का बच्चा है जिसको हम ने वरदान दिया था। आज का समय पूरा हो गया है। जिसकी वजह से इसका निधन हो गया। माता पार्वती जी ने भगवान शिव से कहा कि आप इसे जीवित कर दीजिए। नहीं तो इसके माता-पिता ने यही संकल्प लिया है कि वह अपने पुत्र की मृत्यु के बाद अपने प्राण त्याग देंगे ।

जिसके बाद भगवान शिव ने माता पार्वती की बात मानकर व्यापारी के पुत्र को जीवित कर दिया और लंबी आयु का वरदान दे दिया। व्यापारी का लड़का और उसके मामा व्यापारी के लड़के की शिक्षा पूरी करा कर वापस उसको काशी से ले जाने लगा और व्यापारी के द्वारा बताए हुए सभी नियमों का पालन करते हुए व्यापारी के पास जाने लगे। व्यापारी का पुत्र और उसके मामा रास्ते में यज्ञ करवाते हुए और ब्राह्मणों को भोजन करवाते हुए जाने लगे। कुछ समय के पश्चात जब वह दोनों उसी नगर में पहुंचे, जहां पर व्यापारी के लड़की का विवाह हुआ था।

राजा ने तुरंत व्यापारी के लड़के को पहचान लिया और उसने अपनी पुत्री को व्यापारी के लड़की के साथ विदा कर दिया और जिसके बाद व्यापारी का पुत्र अपनी पत्नी और उसके मामा अपने घर की ओर जाने लगे और उधर व्यापारी और व्यापारी की पत्नी अपने बेटे का इंतजार कर रही थी। व्यापारी और उसकी पत्नी ने यह संकल्प लिया था कि अगर उसके बेटे की खबर आई कि वह मर चुका है तो वह भी अपने प्राण त्याग देंगे।

लेकिन जब व्यापारी ने अपने पुत्र को जीवित देखा तो, व्यापारी बहुत प्रसन्न हो गया और उसने अपने पुत्र को गले से लगा लिया। एक दिन जब व्यापारी रात में सो रहा था तब व्यापारी के सपने में भगवान शिव आए और भगवान शिव ने व्यापारी से कहा कि तुमने सोमवार का व्रत रखा था, जिससे मैं बहुत प्रसन्न हुआ। तुम्हारी भक्ति देखकर मैंने तुम्हारे पुत्र को जीवित होने का वरदान दिया है और ठीक उसी प्रकार कोई भी व्यक्ति है सोमवार का व्रत रहेगा या इस कथा को सुनेगा तो, उसकी भी मनोकामना है पूर्ण होगी ।

दोस्तों उम्मीद करते हैं आपको यह कहानी रोचक लगी होगी। ऐसे बहुत ही कहानियां है जो हमारी वेबसाइट में उपलब्ध हैं। आप इन्हें पढ़ सकते हैं और अपने बच्चों आदि को पढ़ा कर उनका मनोरंजन करवा सकते हैं और इस कहानी को साझा कर हमारा हौसला अफजाई कर सकते हैं और कहानी से संबंधित यदि कोई भी प्रश्न है, तो आप कमेंट बॉक्स के माध्यम से पूछ सकते हैं।

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