संतान सप्तमी व्रत कथा

संतान सप्तमी व्रत कथा | Santan Saptami Vrat Katha

एक बार भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया कि एक बार मथुरा में लोमश ऋषि आए थे। मेरी माता देवकी और मेरे पिता वासुदेव जी ने उनकी बहुत सेवा की थी। जिसके बाद लोमश ऋषि ने मेरी माता देवकी जी से कहा कि कंस द्वारा तुम्हारे सारे पुत्रों को मारने के बाद तुमको शोक में रखा है। तुम अपने पुत्रों की मृत्यु के शोक से बाहर आओ कंस ने तुम्हारे कई पुत्रों को मारकर कर तुमको पुत्र शोक पर विवश किया है।

लेकिन तुम अब इस पुत्र सुख के दुख से मुक्त हो सकती हो। इसके लिए तुमको संतान सप्तमी का व्रत रखना होगा, जिससे अब तुम्हारी कोई भी संतान को हानि नहीं पहुंचेगी और तभी लोमश ऋषि ने कहानी बताना शुरू किया।

अयोध्या में एक बहुत ही प्रतापी और बलवान राजा रहा करता था जिसका नाम नहुस था। राजा बहुत ही बलवान और सुंदर था। राजा अपनी प्रजा को बहुत प्रेम किया करता था। प्रजा अपनी राजा से बहुत खुश थी और उनके राज्य में खुशी-खुशी अपना जीवन व्यतीत कर रही थी।

राजा के राज्य में सभी लोग मिल जुल कर रहा करते थे। राजा नहूस का विवाह एक बहुत ही सुंदर कन्या से हुआ था जिसका नाम चंद्रमुखी था। उसी राज्य में एक बहुत बड़ा ब्राह्मण रहा करता था जिसका नाम विष्णु दत्त था। विष्णु दत्त की पत्नी का नाम रूपवती था। रूपवती और चंद्रमुखी दोनों बचपन के मित्र थे और एक दूसरे को बहुत प्रेम भी किया करते थे। कहीं भी जाती थी तो साथ जाती थी।

Santan Saptami Vrat Katha
Image: Santan Saptami Vrat Katha

एक दिन नदी में स्नान करने के लिए चंद्रमुखी और रूपवती गई। तब वहां पर नदी में कई और स्त्रियां भी स्नान करने के लिए आई थी। स्नान करने के बाद स्त्रियों ने माता पार्वती और भगवान शिव की प्रतिमा बनाकर पूरे विधि विधान से पूजन करना शुरू कर दिया। तब रानी चंद्रमुखी और रूपवती दोनों उन स्त्रियों के पास गई और उनसे पूछा कि तुम यह कौन सी पूजा कर रही हो? हमें इसके बारे में बताओ।

तब स्त्रियों ने चंद्रमुखी और रूपवती को पूजा की विधि और पूजा करने के तरीके के बारे में बताया। हम लोग मुक्ताभरण व्रत कर रहे हैं। हम लोगों ने माता पार्वती सहित भगवान शिव की प्रतिमा बनाई है और उन पर एक दौरा बांधा है और यह प्रतिज्ञा ली है, जब तक हम लोग जीवित रहेंगे तब तक यह पूजा करते रहेंगे।

इस व्रत को करने से संतान की प्राप्ति होती है जिसके बाद राजकुमारी चंद्रमुखी और उनकी मित्र रूपवती ने भी यह पूजा करने का संकल्प लिया और भगवान शिव का डोरा बांध लिया। जिसके बाद जैसे ही वह दोनों अपने घर गई तो संकल्प को भूल गई और कुछ ही समय में दोनों लोगों का निधन हो गया।

राजकुमारी चंद्रमुखी अगले जन्म में बंदरिया तथा रूपवती ने मुर्गी के रूप में जन्म लिया और इस जन्म में भी इन दोनों का अंत हो गया। जिसके बाद एक अगला जन्म और हुआ। फिर दोनों का जन्म मनुष्य योनि में हुआ। रानी चंद्रमुखी इस जन्म में पृथ्वीराज की रानी बनी जो मथुरा के राजा थे। चंद्रमुखी का इस जन्म में नाम ईश्वरी था। 

तथा रूपमती का जन्म एक बार फिर से ब्राह्मण के घर पर हुआ और जो रूपमती का नाम इस बार भुसना था। भुसना का विवाह एक बहुत बड़े राजपुरोहित अग्नि मुखी से हुआ। इस जन्म में भी दोनों मित्रों में फिर से दोस्ती हो गई और एक दूसरे से प्रेम करने लगी।

रानी ईश्वरी अपने पिछले जन्म में व्रत को भूलने के कारण संतान सुख से वंचित रह गई और प्रौढ़ावस्था में उनको एक गूंगा तथा एक बहरे पुत्र की प्राप्ति हुई जिनका नौ साल के बाद निधन हो गया। भूसना ने इस व्रत को याद रखा था और उसको आठ पुत्र की प्राप्ति हुई जो देखने में बहुत सुंदर थे और बहुत स्वस्थ भी थे।

रानी ईश्वरी अपनी मित्र भुसना से नफरत करने लगी थी क्योंकि उसको आठ आठ पुत्रों की प्राप्ति हुई थी। जिसके बाद एक दिन रानी ईश्वरी अपनी मित्र भुसना के घर गई और उसके पुत्रों को अपने घर खाने पर बुलाया। जिसके बाद रानी की मित्र भुसना अपने पुत्रों के साथ रानी के घर खाने पर आई। रानी ईश्वरी ने अपने मित्र भुसना के पुत्रो को मारने का पूरा प्रबंध किया हुआ था।

रानी ईश्वरी ने खाने में जहर मिलाया था और जहर वाला खाना अपने मित्र के आठों पुत्रों को खिला दिया। जहर वाला खाना खाने के बाद भी उन आठों बच्चों को कुछ नहीं हुआ और वह जीवित रहे। ऐसा इसलिए हुआ था क्योंकि भुसना ने व्रत को संपन्न किया था और उसको याद रखा था खुशी व्रत के प्रभाव के कारण उन बच्चों को कोई हानि नहीं हुई।

यह देखकर रानी ईश्वरी को बहुत क्रोध आया और रानी ने अपने नौकरों से कहा कि मेरे मित्र के आठों बच्चों को पूजा के बहाने यमुना नदी में ले जाओ और उनको उसी नदी में धकेल देना।नौकर ने अपनी महारानी की आज्ञा का पालन करते हुए उनके मित्र भुसना के सभी पुत्रों को पूजा के बहाने यमुना नदी में ले गया और वहां जाकर उनको यमुना नदी में ढकेल दिया।

लेकिन माता पार्वती और भगवान शिव की कृपा होने के कारण उन बच्चों को कुछ नहीं हुआ। इस बार भी रानी ईश्वरी बहुत क्रोधित कोई और बहुत आश्चर्यचकित भी हुई।अब इस बार रानी ने उन बच्चों को मारने के लिए जल्लाद को बुलाया और उससे कहा जाओ तुम मेरे मित्र के आठों पुत्रों को मार दो जाकर।

जल्लाद ने भी बहुत कोशिश की लेकिन वह उन आठों बच्चों को मार नही सका। इस बार भी रानी बहुत आश्चर्यचकित हुई जिसके बाद रानी ने खुद भुसना को अपने राज्य में बुलवाया और उससे कहा कि मैंने तुम्हारे आठों पुत्र को मारने का प्रयास किया लेकिन मैं सफल ना हो पाई।

रानी ने तुरंत अपने मित्र के पैरों में गिर कर माफी मांगी और अपनी मित्र से पूछा कि ऐसा क्यों हो रहा है? भुसना  ने बताया कि तुमको अपने पिछले जन्म की कोई बात याद नहीं है। रानी ने कहा कि नहीं मुझे कोई बात नहीं याद है। तब भुसना ने बताया कि तुम अपने पिछले जन्म में राजा नहुस की पत्नी बनी थी और मैं एक ब्राह्मण विष्णु दत्त की पत्नी थी।

हम दोनों पिछले जन्म में भी दोस्त थे। हम लोग एक बार नदी में नहाने के लिए गए थे। तब हम लोगों ने वहां पर माता पार्वती और भगवान शिव के व्रत का संकल्प लिया था और भगवान शिव का डोरा भी बांधा था लेकिन घर जाकर हम लोग उस संकल्प को भूल गए थे और हम लोगों ने उस जन्म में पूजा नहीं की थी।

जिसके बाद हम लोगों से विभिन्न विभिन्न योनियों में जन्म लिया हैं और आप लोगों ने एक बार फिर से मनुष्य योनि में जन्म लिया है। जिसके बाद मुझे तो उस व्रत का याद था तुम्हारी उस व्रत को विधिवत पूरा किया। जिसके कारण मेरे सभी पुत्रों को कुछ नही हो रहा है और तुम इतनी बार भी कोशिशों के बाद भी मेरे पुत्रों को नहीं मार पा रही हो।

उसी व्रत के प्रभाव के कारण हो रहा है।रानी रानी ने भी मुक्ताभरण व्रत को संपन्न किया। व्रत के प्रभाव के कारण रानी को एक पुत्र की प्राप्ति हुई और तभी से यह संतान सप्तमी का व्रत प्रचलित है।

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