सिंदबाद जहाजी की छठी यात्रा (अलिफ लैला की कहानी)

पांचवी जहाज यात्रा करने के दो-तीन साल बाद मैंने फिर से एक नई यात्रा करने का निर्णय लिया और बहुत से लोगों ने और मेरे परिवार वालों ने भी मुझे मेरी छठी जहाज यात्रा पर जाने के लिए मना किया। लेकिन मैंने उनकी बात को नकारते हुए एक नई और रोचक यात्रा के लिए आगे की ओर चल पड़ा।

हर बार की तरह इस बार भी मैंने अपना सारा सामान एकत्र किया और जहाज की ओर चल पड़ा। यात्रा शुरू करने से पहले हमारे कप्तान ने हम लोगों को यह बताया था कि वह इस बार बहुत लंबी यात्रा के लिए जा रहा है। अगर किसी को नहीं जाना हो तो वह यहीं रुक सकता है।

लेकिन कप्तान की बात सुनने के बाद भी सभी व्यापारियों ने उसके साथ जाने का निर्णय लिया और एक नई यात्रा के लिए चल पड़े। समुद्र में कुछ दिन चलने के बाद हमारे कप्तान साहब जहां वह जाना चाहते थे, उस जगह का रास्ता ही भूल गए और वह नक्शे के जरिए पता लगाते रहते थे कि वह इस समय कहां पहुंचे हैं और किस ओर जा रहे हैं।

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समुद्र में कुछ दिन यात्रा करने के बाद अचानक से एक दिन हमारे जहाज के कप्तान साहब ने नक्शे में देखा कि समुद्र में पानी का बहाव हम लोगों को एक ऐसे भयानक टापू की ओर ले जा रहा था, जहां पर हम लोगों का बचना नामुमकिन था। देखते ही देखते हैं हमारा जहाज उस टापू की एक चट्टान में जाकर टकरा गया और थोड़ी ही देर में जहाज टूट गया।

जैसे तैसे कर कर हम लोग उस टापू तक पहुंचे। उस भयानक टापू पर पहुंचकर हम लोगों ने देखा कि हम लोगों के आसपास बहुत सारे आदमियों और जानवरों की हड्डियां पड़ी हुई। जिसको देखकर हम लोग बहुत ही डर गए और एक दूसरे को देख देख कर रोने लगे और अपने आप को कोसने लगे कि यहां पर अपनी मौत को दावत देने के लिए क्यों आए हैं।

कुछ देर चलने के बाद हम लोगों ने देखा कि सामने एक बहुत बड़ा पहाड़ है, जिससे कई नदियां होकर जा रही है। लेकिन वह पहाड़ इतना ऊंचाई पर था कि हम लोगों का उस पर चढ़ना नामुमकिन था। कई दिन गुजरने के बाद एक-एक करके हमारे साथी मरते जा रहे थे।

कई दिन गुजर जाने के बाद मेरे साथ आए हुए सभी व्यापारी और कप्तान के मर जाने के कारण मैं वहां पर सिर्फ अकेला ही बचा था। अकेला होने के कारण मैं अपने आप को बहुत ही कोस रहा था कि मै अच्छा खासा घर पर राजा महाराजा की तरह जिंदगी जी रहा था और अब देखो यहां मेरी मृत्यु मुझे दिख रही है।

कई दिन बीत जाने के बाद मैंने देखा कि कई नदियां, पहाड़ पर एक छेद से निकल कर जा रही हैं। इसको देखने के बाद मैंने सोचा कि यह नदियां कहीं ना कहीं तो निकल कर जा रही होंगी। जिसके बाद मैंने अपनी जान बचाने के लिए वहां पर बड़े जहाज के कई टुकड़े और मनुष्य की बहुत सारी हड्डियों से अपनी नाव बना ली और नाव और बैठकर उस छेद से निकल पड़ा।

रास्ते में बहुत अधिक अंधेरा होने के कारण मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। मैं बस पानी के बहाव के करण आगे की ओर बढ़ता जा रहा था। अधिक थकावट होने के कारण मैं अपनी नाव पर ही सो गया और सवेरा होते ही मैंने देखा कई लोगों ने मेरी नाव को एक किनारे पर बांध रखा है।

नदी के एक किनारे पहुंचने के बाद जिन लोगों ने मेरी नाव को बांध रखा था, उनको देखकर मेरे अंदर एक अलग ही उर्जा का आवाहन हो गया। जैसे मुझे नया जीवन मिल गया हो  और मैंने उनसे कहा कि आप लोग कौन हैं, उन्होंने उत्तर दिया पर मैं उनकी भाषा को समझ नहीं पा रहा था।

तभी अचानक से उनमें से एक व्यक्ति बाहर आया, जिसको मेरी भाषा आती थी और बोलने लगा कि तुम हम लोगों को देखकर डरो मत, हम लोग यही पास में रहते हैं, पास में ही हमारा शहर है। हम लोग यहां पर रोज अपने खेतों के लिए नदी से पानी लेने आया करते हैं। तभी आज हम लोगों ने देखा कि नदी से पानी बहुत कम मात्रा में आ रहा था।

जिसके बाद हम लोगों को कुछ शंका हुई और हम में से एक आदमी यह पता करने के लिए नदी में गया कि नदी में पानी इतना धीमा क्यों आ रहा है। तभी उसने वहां देखा कि तुम और तुम्हारी नाव पानी में फंसी हुई है। जिसकी वजह से नदी का पानी रुका हुआ है। वह तुरंत तुमको और तुम्हारी नाव को नदी के किनारे लाए और इस प्रकार तुम्हारी जान बचा ली। लेकिन तुम हो कौन और तुम कहां से आए हो।

उन लोगों के पूछने के बाद मैंने अपने बारे में बताया और अपने साथ हुई सारी दुर्घटना को बताया कि किस प्रकार मैं यहां तक पहुंचा हूं। मेरी सारी बातें सुनने के बाद उन्होंने मुझे खाने के लिए बहुत सारे फल दिए और अपने साथ अपने दीप लंका ले गए। यहां पर उन्होंने मुझे अपने महाराजा धीराज के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया, जिसके बाद वहां के महाराजाधिराज ने मुझसे बोला कि तुम कौन हो और कहां से आए हो।

महाराजा के प्रश्न के अनुसार मैंने उनको बताया कि मैं सिंदबाद जहाजी हूं, मैं एक बगदाद शहर से आया हूं। फिर धीरे-धीरे मैंने अपने साथ हुई दुर्घटना के बारे में बताया और अपनी सारी यात्राओं का वर्णन करना शुरू कर दिया है।

मेरी सारी बातें सुनकर महाराजाधिराज बहुत ही आश्चर्यजनक हो गए और उन्होंने अपनी मंत्रियों से कहा कि सिंदबाद जहाजी की सभी यात्राओं के बारे में एक सुनहरे अक्षरों में लिख लो, जिससे बाद में हम उनको याद कर सके। जिसके बाद महाराजाधिराज ने अपने नौकरों से कहा कि आप इन्हें एक अच्छे महल में ले जाइए और इनका अच्छे से आदर्श सत्कार करिए।

जिसके बाद मैं खुशी-खुशी उस राज्य दरबार में रहने लगा और पूरी लंका घूमने के लिए रोजाना जाया करता था। वहां पर मैंने देखा कि यहां पर बहुत से रत्नों की खदान है और यहां पर समुद्र में बहुत सारे मोती पाए जाते हैं और बहुत सी रोचक चीजें पाई जाती हैं। कई दिन घूमने के बाद मैंने महाराजाधिराज से कहा कि महाराज मुझे अपने घर वापस जाना है।

जिसके बाद बादशाह ने मुझे घर जाने की अनुमति दे दी और उन्होंने अपने दोस्त हारू रसीद के लिए एक पत्र लिखकर दिया और मुझसे कहा कि यह पत्र उस तक पहुंचा देना और उन्होंने हारू रशीद को देने के लिए बहुत सारा उपहार भी मुझे दिया। जिसके बाद मुझे बहुत सारा इनाम भी दिया।

फिर बादशाह ने मेरे जाने के लिए एक बड़े जहाज का प्रबंध किया। जिसके बाद मैंने महाराजाधिराज से अलविदा ली और अपने देश की ओर चल पड़ा। रास्ते में मैंने महाराजाधिराज द्वारा भेजे गए हारु राशिद के पत्र को पढ़ना शुरू कर दिया।

जिसमें लिखा था मैं बादशाह धिराज आपसे मित्रता का हाथ बढ़ाना चाहता हूं, जिससे हम दोनों देशों के संबंध बहुत अच्छे हो जाएं, जिसके लिए मैं उपहार स्वरूप आपको कुछ भेट दे रहा हूं। बहुत सारी मूर्तियों से सुसज्जित एक कलस, चंदन की लकड़ी, बड़े-बड़े कपूर और एक दासी भी आपके लिए भेज रहा हूं, जिसको आप स्वीकार कर लीजिएगा।

कुछ दिन की यात्रा के दौरान मैं अपने देश बगदाद पहुंच गया। बगदाद पहुंचकर मैंने महाराजाधिराज के दिए हुए पत्र को राजा हारू राशिद के पास पहुंचा दिया और उनके द्वारा भेजे हुए उपहार को उन को सौंप दिया । राजा हारू राशिद ने पत्र को पढ़ने के बाद मुझसे पूछा कि क्या यह जो भी लिखा हुआ है, वह सत्य है।

मैंने खुशी खुशी राजा हारू राशिद को बताया कि जी हां, महाराज जो आपने पत्र में पढ़ा है, महाराजाधिराज बिल्कुल वैसे ही हैं। उनके पास बहुत सारे महल और महाराजाधिराज के राज में बहुत सारे रत्न और मोती पाए जाते हैं, वह बहुत शक्तिशाली भी है, जिसके कारण वह किसी भी राजा से नहीं हारते हैं।

उनके राज्य दरबार में सभी लोग बहुत खुशी-खुशी रहते हैं। मेरी सारी बातें सुनकर हारू राशिद ने खुशी-खुशी महाराजाधिराज के भेजे हुए सभी उपहार और दासी को स्वीकार कर लिया और फिर अपने सेवकों से कहकर मेरा आदर सत्कार करवाया। खुशी-खुशी उन्होंने मुझे अपने महल में रहने के लिए बोला।

जिसके बाद मैंने उनकी आज्ञा का पालन करते हुए कुछ दिन उनके राज दरबार में रहकर बिताएं। जिसके कुछ दिन बाद मैं अपने घर वापस आ गया और खुशी-खुशी अपना जीवन व्यतीत करने लगा।

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इनका नाम राहुल सिंह तंवर है। इनकी रूचि नई चीजों के बारे में लिखना और उन्हें आप तक पहुँचाने में अधिक है। इनको 4 वर्ष से अधिक SEO का अनुभव है और 6 वर्ष से भी अधिक समय से कंटेंट राइटिंग कर रहे है। इनके द्वारा लिखा गया कंटेंट आपको कैसा लगा, कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। आप इनसे नीचे दिए सोशल मीडिया हैंडल पर जरूर जुड़े।

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