रानी लक्ष्मीबाई का जीवन परिचय

रानी लक्ष्मीबाई की बायोग्राफी (Rani Lakshmi Bai ka Jivan Parichay): अंग्रेजों को धुल चटाने वाली रानी लक्ष्मीबाई के जीवन के बारें में जितना लिखा जाए उतना कम है। इनके जीवन पर अनेक फ़िल्में बन चुकी है। आज हम इस आर्टिकल में रानी लक्ष्मीबाई की जीवनी लिख रहे हैं। अगर आप इनकी शौर्यगाथा पढना चाहते है तो इस आर्टिकल को पूरा जरुर पढ़ें थोड़ा समय निकालकर पढ़ें ताकि आपको इनके जीवन की छोटी-बड़ी सभी जानकारी मिल पाएं।

Rani Lakshmi Bai ka Jivan Parichay
Image: Rani Lakshmi Bai ka Jivan Parichay

रानी लक्ष्मीबाई ने अपने जीवन में अनेक परेशानियों का सामना किया लेकिन कभी हार नहीं मानी यही वजह है कि आज भी इन्हें याद किया जाता है और अनेक मंचो पर इनका बखान होता है।

रानी लक्ष्मीबाई का जीवन परिचय | Rani Lakshmi Bai ka Jivan Parichay

रानी लक्ष्मीबाई की जीवनी एक नज़र में

नाम मणिकर्णिका
उपनाममनु, रानी लक्ष्मीबाई, छबीली
पिता का नाममोरेपंत तांबे
माता का नामभागीरथी सापरे 
जन्म19 नवंबर 1828
जन्मस्थानवारणसी, भारत
पदवीरानी
विवाह1842 सन्
पति का नाममहाराज गंगाधर राव नेवालकर
पुत्र का नामदामोदर राव, आनंद राव
उपलब्धियांयुद्ध कला में निपुण
मृत्यु17-18 जून 1858 (29वर्ष)
मृत्यु स्थलग्वालियर, भारत
Biography of Rani Lakshmi Bai in Hindi

लक्ष्मीबाई का प्रारंभिक जीवन

19 नवंबर 1828 का वह दिन जब भारतीय इतिहास में मोरेपंथ तांबे, भागीरथी बाई के यहां गंगा के पावन तट उत्तर प्रदेश के वाराणसी में अद्भुत बालिका का जन्म हुआ, माता-पिता ने जिसे मणिकार्णिका नाम दिया। प्यार का नाम रखा मनु, मनु जब बहुत छोटी थी तब इनके माता भागीरथी बाई का आकस्मिक निधन हो गया तब इनकी संपूर्ण जवाबदारी इनके पिता मोरेपंथ तांबे पर आ गई।

इनके पिता बाजीराव द्वितीय के दरबार में दरबारी थे।  मनु बचपन से ही अपने पिता के साथ बाजीराव द्वितीय के दरबार में जाने लगी थी। पिता तो राज कार्य में व्यस्त हो जाते थे परंतु मनु अपने चंचल स्वभाव के कारण इधर उधर दौड़ा करती थी। मनु की चंचलता को देखकर दरबारी उन्हें छबीली कहकर भी बुलाते थे।

लक्ष्मी बाई की शिक्षा व्यवस्था

दरबारियों के कहने पर इनके पिता मोरेपंत तांबे ने इनकी शिक्षण व्यवस्था राज महल में ही कर दी। वहां मनु बाई को रामायण, महाभारत, वेद पुराण की शिक्षा के साथ-साथ युद्ध कला की शिक्षा भी दी जाने लगी। कुशाग्र बुद्धि की मनु जल्दी ही शास्त्र और शस्त्र की विद्या में प्रवीण हो गई।

हर पिता को अपनी पुत्री की विवाह की चिंता रहती है। उसी प्रकार इनके पिता मोरेपंथ तांबे को भी इनके विवाह की चिंता होने लगी। चिंता का मुख्य कारण था मनु के योग्य वर ढूंढना।

लक्ष्मीबाई का विवाह

मनु जब महज 14 वर्ष की थी तब इनका विवाह झांसी के महाराज शिवराव भाऊ के पुत्र गंगाधर राव के साथ 1842 में संपन्न हुआ था।

लक्ष्मीबाई का संघर्ष

इनके पति गंगाधर राव नेवलकर झांसी के राजा थे। वे रघुनाथ हरि नेवलकर के वंशज महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के थे। गंगाधर राव योग्य शासक होने के साथ-साथ प्रजा प्रिय महाराज भी थे। परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था। लक्ष्मी बाई और महाराज गंगाधर राव के यहाँ सन् 1851 में एक बालक का जन्म हुआ।

बहुत ही व्यापक रूप से बालक के जन्म का उत्सव मनाया गया। परंतु उनका यह पुत्र 4 महीने के बाद ही दुनिया छोड़ कर चला गया। पुत्र की मृत्यु के बाद गंगाधर राव बहुत ही उदास रहने लगे, इस कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। काफी उपचारों के बाद भी उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं हुआ। उन्हें पेचिश नाम की एक लाइलाज व्याधि ने जकड़ रखा था।

इसी लाइलाज बीमारी के कारण सन् 1853 नवरात्रि के दिन उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा और उनकी असमय मृत्यु हो गई। वहीं से ही रानी लक्ष्मीबाई का संघर्ष प्रारंभ हुआ। गंगाधर राव की अंतिम इच्छा को देखते हुए उत्तराधिकारी भी नियुक्त कर दिया गया।

उन्हीं के वंशज वासुदेव नेवलकर के पुत्र आनंद राव को रानी लक्ष्मीबाई और गंगाधर राव ने गोद लेकर उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया। तब उनका गोद लिया वह पुत्र महज 4 वर्ष का ही था। इसके बाद राज्य की बागडोर रानी लक्ष्मीबाई ने अपने ही हाथों में संभाली। यही से रानी लक्ष्मीबाई का संघर्ष प्रारंभ हुआ।

उस समय अंग्रेजी अफसर लॉर्ड डलहौजी बहुत खुश हुआ था। खुश होने का मुख्य कारण था वो कानून जो अंग्रेजों ने पारित किया था। The Doctrine सन् 1848-1856 के जो रियासत उत्तराधिकारी विहीन हैं, उस रियासत की सत्ता सर्वोच्च सत्ता कंपनी ब्रिटिश साम्राज्य में मिल जाएगी, जिसे हड़प नीति का नाम दिया गया। जिसकी कमान अंग्रेजों के हाथों में होगी।

इस प्रकार का एक कानून पारित किया गया था। रानी लक्ष्मीबाई की समिति की और से तर्क दिया गया था कि दत्तक पुत्र ही झांसी का राजा रहेगा परंतु अंग्रेजों ने लक्ष्मीबाई समिति के तर्कों को निरस्त कर दिया। यहीं से ही लक्ष्मीबाई और अंग्रेजो के मध्य युद्ध छिड़ गया।

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झांसी का युद्ध

झांसी के उत्तराधिकारी को लेकर रानी लक्ष्मी बाई और अंग्रेजों में अनबन हो गई। लक्ष्मीबाई किसी भी हालत में अंग्रेजों के समक्ष घुटने टेकने को तैयार नहीं थी। इसी बात को लेकर सन् 1857 में, अंग्रेज और रानी के मध्य युद्ध छिड़ गया। इस युद्ध में रानी ने अंग्रेजों को दहला दिया।

सन् 1858 सितंबर के अक्टूबर के महीने में पड़ोसी राज्य ओरछा और दतिया के राजाओं ने झांसी पर आक्रमण कर दिया, जो अंग्रेजों की एक रणनीति थी। रानी ने अंग्रेजों के इस मंसूबे को विफल कर दिया। अंग्रेजों ने झांसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया तथा झांसी शहर को घेर लिया। रानी लक्ष्मीबाई अपने नवजात पुत्र दामोदर राव के साथ अंग्रेजों से बचकर सुरक्षित जगह पर निकल गई।

रानी ने तात्या टोपे से इसके लिए सहायता मांगी तात्या टोपे और रानी की संयुक्त सेनाओं ने ग्वालियर के एक विद्रोही सैनिक की मदद से ग्वालियर के किले पर कब्जा कर लिया। इस युद्ध में बाजीराव प्रथम के वंशज अली बहादुर द्वितीय ने भी रानी लक्ष्मीबाई का साथ दिया।

18 जून 1858 में ग्वालियर के पास कोटा की सराय में अंग्रेज और रानी बाई के मध्य भयंकर युद्ध छिड़ा। इस युद्ध में रानी ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया और कई अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया। अंग्रेज रानी की वीरता देखकर आवक रह गए। अंत में रानी को अंग्रेजी सेनाओं ने आसपास से घेर लिया। इस तरह महारानी लक्ष्मी बाई अंग्रेजों से लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हो गई।

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रानी लक्ष्मीबाई का उल्लेखनीय योगदान

गंगा की बेटी झांसी की रानी ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अपना उल्लेखनीय योगदान दिया, स्वतंत्रता के लिए उन्होंने एक नई दिशा दिखलाई। महिलाओं को युद्ध कला मैं प्रशिक्षण देकर उन्हें दक्ष कराया। सामाजिक क्षेत्र में रानी लक्ष्मीबाई को इस सशक्त भूमिका के लिए आज भी याद किया जाता है।

रानी लक्ष्मी बाई की शासन प्रणाली

रानी ने जब झांसी की कमान अपने हाथों में संभाली, उस समय मानसिक रूप से बहुत टूटी हुई थी। एकमात्र नवजात पुत्र की मृत्यु, इसके बाद पति की असमय मृत्यु, परंतु रानी ने हिम्मत नही हारी और शासन की भागदौड़ अपने हाथ में संभाल कर राज्य की शासन व्यवस्था को मजबूत किया। सेना को और ज्यादा प्रशिक्षित करवाया। महिलाओं को सेना में भर्ती किया, बाजार व्यवस्था को व्यवस्थित करवाया, धर्म पूर्वक सभी के साथ समान न्याय किया।

लक्ष्मी बाई के बारे में रोचक तथ्य

  • रानी लक्ष्मी बाई के पास 4 फुट लंबी एक तलवार थी, जिससे कई अंग्रेजी सैनिकों के सर कलम किए।
  • रानी लक्ष्मी बाई के पास तीन घोड़े थे, जिनके नाम पवन, बादल और सारंगी थे। जो रानी के इशारे मात्र पर ही चलते थे।
  • रानी नानासाहेब की मुह बोली बहन थी।
  • रानी कराडे ब्राह्मण थी।
  • रानी की एक सहेली मेना जो वाराणसी से रानी के साथ ही आई थी और अंत समय तक रानी के साथ ही वीरगति को प्राप्त हुई।
  • रानी लक्ष्मीबाई की इष्ट देवी माता भवानी हैं।

लक्ष्मीबाई के नाम पर शिक्षण संस्था

  • रानी लक्ष्मीबाई नेशनल इंस्टीट्यूट आँफ फिजिकल एजुकेशन विश्वविद्यालय ग्वालियर।
  • रानी लक्ष्मीबाई महिला महा-विद्यालय नागपुर महाराष्ट्र।
  • रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय जो देश का पहला कृषि विश्वविद्यालय है, जिसे भारत सरकार द्वारा संसद के अधिनियम द्वारा राष्ट्रीय महत्व के संस्था के रूप में वर्ष 2014 में झांसी में स्थापित किया गया है।

रानी लक्ष्मीबाई जयंती

प्रतिवर्ष 19 नवंबर को महारानी लक्ष्मी बाई जयंती के रूप में मनाया जाता है। इस दिन रानी की शहादत को याद किया जाता है।

रानी लक्ष्मीबाई पुरस्कार

भारत सरकार और राज्य सरकार द्वारा प्रदान किए जाने वाला यह पुरस्कार उन महिला और बालिकाओं को दिया जाता है, जो अदम्य साहस का प्रदर्शन करते हुए समाज में एक आदर्श स्थापित करती है।

लक्ष्मीबाई का स्मारक

मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर के पड़ाव क्षेत्र में जहां रानी वीरगति को प्राप्त हुई थी, वहां उनकी याद में स्मारक बनाया गया है।

लक्ष्मी बाई के जीवन पर फिल्म टीवी/सीरियल

  • रानी के जीवन पर सर्वप्रथम “झांसी की रानी” फिल्म बनी। 1953 में जिसमें महताब ने रानी का कैरेक्टर प्ले किया था।
  • एक वीर स्त्री की कहानी: झांसी की रानी। इसमें उल्फा गुप्ता ने रानी का किरदार निभाया, जो 2009 में ज़ी टीवी पर प्रसारित।
  • मणिकार्णिका दा क्वीन ऑफ झांसी 2020 मूवी रिलीज। इस फिल्म में कंगना रनौत में रानी का कैरेक्टर निभाया।

रानी के जीवन पर किताब

  • झांसी की रानी लक्ष्मीबाई: लेखक, डॉक्टर भवानी सिंह राणा।
  • 1857 की क्रांतिकारी ललकारी बाई: लेखक, महास्वेता देवी।
  • रानी ऑफ़ झांसी: लेखक, प्रिंस माइकल।

रानी ऑफ़ झांसी पर विवाद

प्रिंस माइकल की पुस्तक रानी ऑफ़ झांसी में रानी के बारे में आपत्तिजनक लिखा गया था, जिसमें रानी के प्रेम प्रसंग के बारे में बताया गया। जिसको लेकर काफी विवाद भी हुआ। आधिकारिक तौर पर रानी के जीवन पर लिखी गई इस पुस्तक को सिरे से नकार दिया गया। क्योंकि ये रानी की छवि को खराब करने का एक षड्यंत्र था।

रानी लक्ष्मी बाई के जीवन का निष्कर्ष

रानी लक्ष्मी बाई का जीवन संघर्ष रहा बचपन से ही माँ का साया उठ गया था। जल्दी ही पुत्र और पति ने भी दुनिया से अलविदा कह दिया। मातृभूमि को बचाने के लिए अंग्रेजों से लोहा लिया और अंत में मातृभूमि की रक्षा करते करते 29 वर्ष की छोटी उम्र में वीरगति को प्राप्त हो गई। मालवा अंचल और बुंदेलखंड में आज भी रानी की वीरता का गुणगान किया जाता है।

निष्कर्ष

हमने यहाँ रानी लक्ष्मीबाई के जीवन (Rani Lakshmi Bai ka Jivan Parichay) के बारें में लिखा है। हमने कोशिश करी है उनके पुरे जीवन के बारे में लिखने की। अगर आपको हमारा यह आर्टिकल अच्छा लगा है तो आप इसे शेयर जरुर करें। ऐसे ही अच्छे आर्टिकल और जानकारी पाने के लिए हमारी वेबसाइट पर बने रहे। ताकि हर रोज आप अच्छी जानकारी पढ़ पायें।

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इनका नाम राहुल सिंह तंवर है, इन्होंने स्नातक (रसायन, भौतिक, गणित) की पढ़ाई की है और आगे की भी जारी है। इनकी रूचि नई चीजों के बारे में लिखना और उन्हें आप तक पहुँचाने में अधिक है। इनको 3 वर्ष से भी अधिक SEO का अनुभव होने के साथ ही 3.5 वर्ष का कंटेंट राइटिंग का अनुभव है। इनके द्वारा लिखा गया कंटेंट आपको कैसा लगा, कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। आप इनसे नीचे दिए सोशल मीडिया हैंडल पर जुड़ सकते हैं।

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