नूरुद्दीन अली और बदरुद्दीन हसन की कहानी (अलिफ लैला की कहानी)

नूरुद्दीन अली और बदरुद्दीन हसन की कहानी (अलिफ लैला की कहानी) | Nuruddin Ali And Badruddin Hasan Ki Kahani Alif Laila Ki Kahani

एक राज्य में एक राजा हुआ करता था। वह बहुत दयावान और लोकप्रिय राजा था। उनके प्रति सभी सम्मान की भावना तथा आदर करते थे। वह राज्य में एक पक्षीय न्याय कभी नहीं करता था। राजा दोनों पक्ष के हित में ही न्याय करता था। उनके दो बेटे थे। शम्सुद्दीन मुहम्मद और नूरुद्दीन अली। दोनों ही जवान थे।

एक दिन किसी कारणवश राजा के मंत्री की मृत्यु हो गई और राजा को राज्य चलाने में कुछ परेशानी होने लगी क्योंकि राज्य का सारा भार मंत्री ही संभाला करते थे। इसलिए महाराज थोड़ा चिंतित रहने लगा।

उन्होंने अपने बेटे को बुलाया और दोनों को मंत्री पद पर रख दिया। बड़ा भाई जब राजा के साथ शिकार करने या अन्य राज में भ्रमण करने के लिए जाता तो, छोटा भाई राज सिंहासन अर्थात राज्य के कार्यभार को संभालता और जो छोटा भाई राजा के साथ जाता तो, बड़ा भाई राज्य के कार्यभार को संभाला करता था।

एक दिन छोटे भाई की पारी होने के उपरांत बड़े भाई को सुबह सिंहासन छोड़कर राजा के साथ जाना था। शाम का समय था। चांदनी रात थी। दोनों खुले आसमान के नीचे बैठे हंसी मजाक करते थे। एक दूसरे से बातें किया करते थे और साथ में शराब भी थी।

Nuruddin Ali And Badruddin Hasan Ki Kahani Alif Laila Ki Kahani
Image: Nuruddin Ali And Badruddin Hasan Ki Kahani Alif Laila Ki Kahani

दोनों ने कहा कि हम दोनों भाई यह सब मिलकर इस राज्य को चलाते हैं। बड़े भाई ने कहा क्यों ऐसा न हो कि एक दिन हमारी शादी भी किसी एक दिन ही हो जाए। छोटे ने कहा तुमने मेरी ही मुंह की बात छीन ली। बड़े भाई बात को आगे बढ़ाते हुए कहने लगा, “शादी होने के बाद हमारे बच्चे भी हो, तुम्हारा बेटा हो और मेरी बेटी भी और जब बड़े हो जाएं तो उनकी शादी भी हो जाए।

छोटे भाई ने कहा अगर ऐसा हुआ तो बहुत बढ़िया होगा। क्यों न ऐसा ही हो घर का घर में सब कुछ हो जाएगा और कहीं किसी को जाना भी नहीं पड़ेगा। ऐसा ही बातें करते करते दोनों और भी नशे में चूर होते जा रहे थे। बड़े भाई बातें करता जा रहा था। छोटे भाई हामी भरते हुए चले जा रहे थे।

धीरे-धीरे बातें बढ़ती गई। तभी बड़े भाई ने कहा,” मैं तो शादी में अशरफिया लूंगा। छोटे भाई ने कहा,”अशरफिया तो आपको देनी चाहिए। बड़े भाई ने गुस्से में कहा,” मैं क्यों दूं?” छोटे भाई ने कहा कि आप बड़े हैं। आप को देनी चाहिए। इसी प्रकार नशे में बातें, दोनों का मजाक गंभीर रूप में बदल गया।

दोनों एक दूसरे से अकड़ अकड़ कर बातें करने लगे थे। उसी और मजाक का माहौल गंभीर रूप ले लिया। बड़े भाई ने कहा,” मैं तुम्हें सुबह दंड दिलवा लूंगा।” यह कहकर दोनों अपने अपने कक्ष में सोने चले गए। छोटा भाई अपमान नहीं सह सका। उसने सुबह होने का इंतजार किया। बड़ा भाई सुबह हुआ तो राजा के साथ जंगल में शिकार करने के लिए चला गया। छोटे भाई यह अपमान बर्दाश्त नहीं कर सके और बहुत सारा सोना, धन, जेवर लेकर अपने घोड़े के साथ मिस्र देश के लिए रवाना हो गए।

ज्यादा सामान होने की कारण का घोड़ा रास्ते में मर गया। फिर यह सामान को अपने ऊपर लाकर आगे बढ़ते रहें। एक नगर में पहुंचे, जहां पर उस राज्य के मंत्री की मृत्यु हो गई थी और एक व्यक्ति ने नसरुद्दीन को देखा और कहां,” तुमसे बड़े घराने से लगते हो” परंतु नसरुद्दीन ने जवाब दिया कि,” आपसी मामलों और परिवारिक झगड़ों के कारण मैंने अपना देश छोड़ दिया।

नसरुद्दीन अब बसरा में उस व्यक्ति के साथ रहने लगा। नसरुद्दीन की समझ, परक और चेहरा पर वह व्यक्ति दीवाना हो गया। उसने अपनी कन्या के विवाह का प्रस्ताव नसरुद्दीन को दिया। नसरुद्दीन अपनी सारी कहानी फिर से उस व्यक्ति से बता दी। परंतु उस व्यक्ति ने विवाह के प्रस्ताव को ठुकराया नहीं और शादी करा दी। संजोग की बात यह है कि उसके बड़े भाई की शादी तथा उसकी शादी दोनों एक ही समय हुई और दोनों के घर संतान भी एक ही दिन हुई। बड़े भाई के यहां बेटी और इनके यहां बेटा।

नसरुद्दीन अपने बेटे का नाम बदरुद्दीन रखा। एक दिन उसी व्यक्ति ने नसरुद्दीन को महल में ले जाकर अपने मंत्री पद नसरुद्दीन को देने के लिए कहा। बादशाह ने उसे स्वीकार किया कि नसरुद्दीन बुद्धिमान और शक्तिशाली नेता है। उसने उसने कुछ प्रश्न पूछें।

उसके बाद उधर बदरुद्दीन भी जवान होता गया। एक दिन नसरुद्दीन बदरुद्दीन को भी राज्य में लेकर गए, जिससे कि वहां पर कुछ सवाल जवाब पूछे गए। बदरुद्दीन ने सभी सवालों का जवाब बड़ी स्पष्टता के साथ दिया।

एक दिन नसरुद्दीन बीमार पड़ गया और अब उसे लगने लगा कि मैं बच नहीं सकता। उसने अपने पुत्र को बुलाया और अपनी सारी कहानी अपने पुत्र को बता दी और अपने बारे में एक कागज पर लिख कर बेहोश होकर मर गया। बदरुद्दीन ने उसे दफनाया और सारे रीति रिवाज को बेटे होने का फर्ज निभाया। नसरुद्दीन की मृत्यु की खबर राज्य में पहुंचे तो राज ने मंत्री पद बदरुद्दीन को देने के लिए कहा।

उसे बदरूदिन को बुलाया। बदरूदिन के न जाने पर नसरुद्दीन के पद को किसी और को दे दिया गया और बदरुद्दीन की जमीन को जप्त करने के लिए आदेश दिया गया और उसको बंदी बनाने का आदेश मिला। लेकिन एक व्यक्ति दयावान दिखाते हुए बदुरुदीन को वहां से भगा दिया और भागते भागते अपने पिता की कब्र पर जा बैठा, थका ओर प्यासा बदरुद्दीन वही बैठा रहा।

वहां पर बैठने के काफी देर बाद तभी एक व्यक्ति उधर से जाता हुआ उसे पहचान लिया। उसने कहा कि तुम यहां क्यों बैठे हो। बदरुद्दीन ने जवाब दिया कि मुझे मेरे पिता सपने में आते हैं। इसलिए मैं उनसे मिलने के लिए यहां पर आया।

उस पर उसने कहा कि तुम्हारे पिता बड़े दयावान थे और कभी साहसी और व्यापार में भी चलते थे। इसलिए उन्होंने अपना काफी धन कई क्षेत्रों में लगाया, जिनमें से जहाज यात्रा पर निकल चुके हैं। यदि तुम मुझे पहला जहाज बेचना चाहो तो मैं 6 हजार दीनार में पहला जहाज खरीद लूंगा।

उसने बेच दिया और फिर सो गया। तब उधर से जिन वहां से गुजरा। जिन एक परी को लेकर जा रहा था। तभी उस परी ने उसे देखा और उसने मिस्र के राजा की बेटी के बारे संदेश दिया कि एक सुंदर कन्या है, जो 20 वर्षकी है। यदि आप उस उस कन्या से विवाह करवा देंगे तो अच्छा होगा। बदरुद्दीन ने जवाब दिया,” नहीं मुझे मेरे पिता के भाई की पुत्री से विवाह करना है।

बदरुद्दीन को वापस सो गया। जिन्न उस परी और बदरुद्दीन को उठाकर वही जगह पर ले गया, जहाँ उस मिस्र के बेटी की शादीएक व्यक्ति से हो रही थी। सब ने बदरुद्दीन के रूप की प्रशंसा की। जिन्न ने कहा तुम उस व्यक्ति के बगल में बैठ जाओ।

कुछ समय के बाद एक कमरे में बदरुद्दीन तथा वही स्त्री बचे और उन दोनों का विवाह हो गया और दोनों एक कक्ष में सोने के लिए चले गए। दोनों आराम से सो ही रहे थे तभी परी और जिन ने मजाक किया और बदरुद्दीन को सोते हुए उठाकर एक दमिश्‍क नगर की जामा मस्जिद के बाहर लेटा दिया।

बदरुद्दीन जब खुद को एक मस्जिद के सामने पाया तो आश्चर्य रह गया। उसने यह सब से बताया कि वह काहिरा में कि स्त्री से शादी कर कर सो रहा था। उसने सुबह खुद को यहां कैसे पाए? उसे पता नहीं। सब बदरुद्दीन को पागल समझने लगे और पत्थर मारने लगे। वह भागते भागते हलवाई के यहां पहुंच गया।

हलवाई बेचारा बहुत दयावान था। उसने उसका हाल पूछा। उसने उसे खाना खिलाया और उसे गोद ले लिया और हसन हलवाई नाम दिया और उससे हलवाई का सारा काम सिखा दिया। अब बदरुद्दीन हसन हलवाई के नाम से जाना जाने लगा।

उधर नसरुद्दीन की बेटी जो सुबह सो कर उठी तो उसने अपनी पत्नी को नहीं पाया। नसरुद्दीन वहां पर आया और उसने पूछा पर नसरुद्दीन के बेटी ने सारा किस्सा उसे सुना दिया और उससे खुशी भी और दुख भी था उसका दामाद कहां खो गया। बदरुद्दीन का सारा सामान देखा तो, उसमें एक पगड़ी और पत्र और कुछ सामान मिला। पत्र में सब कुछ लिखा हुआ था, जो बदरुद्दीन के पिता ने दिया था वह सब समझ गया।

उसने अपनी बेटी को धन्यवाद देते हुए उसका पत्र को कई बार चूमा और बहुत खुश था। उसकी बेटी ने 9 महीने बाद उसके पुत्र को जन्म दिया, जिसका आजब नाम रखा गया। आजब बहुत ही घमंडी और अहंकारी था। अपने दोस्तों से हमेशा लड़ा करता था। एक दिन उसके दोस्त ने उसे नीचा दिखाने के लिए खेल खेले में सबको अपने माता-पिता का नाम बताने के लिए कहा। आजब ने अपने माता का नाम सुहाना बताया और पिता का नसरुद्दीन बताया।

सब मजाक बनाने लगे। यह सहन न कर सका। वह अपने माता से अपने पिता का नाम पूछने आया। शम्सुद्दीन ने यह बात सुनकर अपने दामाद को खोजने की इच्छा जताई और वह बादशाह से आज्ञा लेकर अपने दामाद को खोजने के लिए निकल पड़ा।

शम्सुद्दीन अपने भाई नरुद्दीन के पुत्र को लेकर निकल पड़ा। एक जगह पर पहुचे और वहां पर आजब अपने नाना का हाथ छोड़कर एक दुकान पर पहुंचा, जहां पर बदरुद्दीन हलवाई का काम करता था। आजब को देखकर अत्यंत प्रसन्नता और छोटे बच्चे समझ कर उसे मलाई खाने के लिए दी और वह खाकर फिर से अपने नाना के साथ चला गया।

नसरुद्दीन ढूंढते ढूंढते अपने भाभी के पास होते, जो नूरुद्दीन की पत्नी थी और बदरुद्दीन की मां थी। नसरुद्दीन अपनी भाभी को लेकर बसरा आ पहुंचे और वहां पर खाने के लिए बैठे। तभी पता चला कि आजब कहां गया। आजब उसी हलवाई के यहां गया था और वह मलाई खाकर लौट आया।

और सब ने खाना शुरू किया तभी नसरुद्दीन की भाभी ने उसे मलाई दी। आजब ने पेट भरा ऐसा कह कर मना कर दिया। बदरुद्दीन की मां को गुस्सा आया। उसने कहा ऐसी मलाई मेरे सिवाय और कोई नहीं बना सकता। यह बहुत अच्छी मलाई है। तुम खा कर तो देखो। आजब ने कहा मैं इससे अच्छी खाकर आया हूँ।

नसरुद्दीन की भाभी ने कहा कि ऐसी को मलाई और कोई तो नहीं बना सकता। आजब ने कहा कि यहां पर एक हलवाई रहता है, जिसने बहुत अच्छी मलाई बनाई है। उसे खाकर आपको भी अच्छा लगेगा। उसकी भाभी गुस्सा होकर कहने लगी मुझे भी उस हलवाई की मिठाई खाना है। देखना है कैसा है। उसकी मलाई मंगाई गई। खाते ही उसकी भाभी ने बहुत तेज से कहा, पुत्र बर्रुउद्दीन।

नसरुद्दीन को यह बात पता चली। उसने तो बदुरुदीन को लाकर अपनी भाभी के सामने रखा। उसकी भाभी बेहोश हो गई। तभी वह समझ गया कि यही बदरुद्दीन है और उसे एक संदूक में बंद करवा कर अपने राज्य पहुंचा और अपनी पुत्री के कक्ष में, जो सुहागरात जैसा सजा हुआ था वहां पर छोड़ा।

बदरुद्दीन को संदूक से निकाला गया तो उसे लगा जब उसने अपना अच्छे दिनों को खोकर बुरे दिनों की शुरुआत की थी। 10 साल पुराने याद को देख कर वह खुश हुआ और सब पहले जैसा अच्छा होगा।

यह कहानी खलीफा सुनकर खुश हुए। उन्हें समझ आ गया और उसने उस व्यक्ति को दंडित करने के लिए आदेश से मना कर दिया। यह कहानी यहीं पर खत्म होती है खलीफा ने उस जवान को एक स्त्री के साथ विवाह करने का आदेश दिया और अपना सुखी जीवन बिताने के लिए कहा।

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