भगवान शिव के सभी संस्कृत श्लोक

Mahadev Shlok with Hindi Meaning: भगवान शिव को देवों के देव महादेव कहा जाता है। क्योंकि जब सभी देवता हार मान जाते हैं तो भोले बाबा ही है जो हर संभव से नैय्या को पार लगाने में सहायता करते हैं। भगवान शिव की आराधना का मूल मंत्र तो “ऊं नम: शिवाय” ही है। लेकिन इस मंत्र के अतिरिक्त भी कुछ मंत्र हैं, जो महादेव को प्रिय हैं।

भगवान शंकर के 108 नाम

  1. शिव:- कल्याण स्वरूप
  2. महेश्वर:- माया के अधीश्वर
  3. शम्भू:- आनंद स्वरूप वाले
  4. पिनाकी:- पिनाक धनुष धारण करने वाले
  5. शशिशेखर:- चंद्रमा धारण करने वाले
  6. वामदेव:- अत्यंत सुंदर स्वरूप वाले
  7. विरूपाक्ष:- विचित्र अथवा तीन आंख वाले
  8. कपर्दी:- जटा धारण करने वाले
  9. नीललोहित:- नीले और लाल रंग वाले
  10. शंकर:- सबका कल्याण करने वाले
  11. शूलपाणी:- हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले
  12. खटवांगी:- खटिया का एक पाया रखने वाले
  13. विष्णुवल्लभ:- भगवान विष्णु के अति प्रिय
  14. शिपिविष्ट:- सितुहा में प्रवेश करने वाले
  15. अंबिकानाथ:- देवी भगवती के पति
  16. श्रीकण्ठ:- सुंदर कण्ठ वाले
  17. भक्तवत्सल:- भक्तों को अत्यंत स्नेह करने वाले
  18. भव:- संसार के रूप में प्रकट होने वाले
  19. शर्व:- कष्टों को नष्ट करने वाले
  20. त्रिलोकेश:- तीनों लोकों के स्वामी
  21. शितिकण्ठ:- सफेद कण्ठ वाले
  22. शिवाप्रिय:- पार्वती के प्रिय
  23. उग्र:- अत्यंत उग्र रूप वाले
  24. कपाली:- कपाल धारण करने वाले
  25. कामारी:- कामदेव के शत्रु, अंधकार को हरने वाले
  26. सुरसूदन:- अंधक दैत्य को मारने वाले
  27. गंगाधर:- गंगा को जटाओं में धारण करने वाले
  28. ललाटाक्ष:- माथे पर आंख धारण किए हुए
  29. महाकाल:- कालों के भी काल
  30. कृपानिधि:- करुणा की खान
  31. भीम:- भयंकर या रुद्र रूप वाले
  32. परशुहस्त:- हाथ में फरसा धारण करने वाले
  33. मृगपाणी:- हाथ में हिरण धारण करने वाले
  34. जटाधर:- जटा रखने वाले
  35. कैलाशवासी:- कैलाश पर निवास करने वाले
  36. कवची:- कवच धारण करने वाले
  37. कठोर:- अत्यंत मजबूत देह वाले
  38. त्रिपुरांतक:- त्रिपुरासुर का विनाश करने वाले
  39. वृषांक:- बैल-चिह्न की ध्वजा वाले
  40. वृषभारूढ़:- बैल पर सवार होने वाले
  41. भस्मोद्धूलितविग्रह:- भस्म लगाने वाले
  42. सामप्रिय:- सामगान से प्रेम करने वाले
  43. स्वरमयी:- सातों स्वरों में निवास करने वाले
  44. त्रयीमूर्ति:- वेद रूपी विग्रह करने वाले
  45. अनीश्वर:- जो स्वयं ही सबके स्वामी है
  46. सर्वज्ञ:- सब कुछ जानने वाले
  47. परमात्मा:- सब आत्माओं में सर्वोच्च
  48. सोमसूर्याग्निलोचन:- चंद्र, सूर्य और अग्निरूपी आंख वाले
  49. हवि:- आहुति रूपी द्रव्य वाले
  50. यज्ञमय:- यज्ञ स्वरूप वाले
  51. सोम:- उमा के सहित रूप वाले
  52. पंचवक्त्र:- पांच मुख वाले
  53. सदाशिव:- नित्य कल्याण रूप वाले
  54. विश्वेश्वर:- विश्व के ईश्वर
  55. वीरभद्र:- वीर तथा शांत स्वरूप वाले
  56. गणनाथ:- गणों के स्वामी
  57. प्रजापति:- प्रजा का पालन- पोषण करने वाले
  58. हिरण्यरेता:- स्वर्ण तेज वाले
  59. दुर्धुर्ष:- किसी से न हारने वाले
  60. गिरीश:- पर्वतों के स्वामी
  61. गिरिश्वर:- कैलाश पर्वत पर रहने वाले
  62. अनघ:- पापरहित या पुण्य आत्मा
  63. भुजंगभूषण:- सांपों व नागों के आभूषण धारण करने वाले
  64. भर्ग:- पापों का नाश करने वाले
  65. गिरिधन्वा:- मेरू पर्वत को धनुष बनाने वाले
  66. गिरिप्रिय:- पर्वत को प्रेम करने वाले
  67. कृत्तिवासा:- गजचर्म पहनने वाले
  68. पुराराति:- पुरों का नाश करने वाले
  69. भगवान्:- सर्वसमर्थ ऐश्वर्य संपन्न
  70. प्रमथाधिप:- प्रथम गणों के अधिपति
  71. मृत्युंजय:- मृत्यु को जीतने वाले
  72. सूक्ष्मतनु:- सूक्ष्म शरीर वाले
  73. जगद्व्यापी:- जगत में व्याप्त होकर रहने वाले
  74. जगद्गुरू:- जगत के गुरु
  75. व्योमकेश:- आकाश रूपी बाल वाले
  76. महासेनजनक:- कार्तिकेय के पिता
  77. चारुविक्रम:- सुन्दर पराक्रम वाले
  78. रूद्र:- उग्र रूप वाले
  79. भूतपति:- भूतप्रेत व पंचभूतों के स्वामी
  80. स्थाणु:- स्पंदन रहित कूटस्थ रूप वाले
  81. अहिर्बुध्न्य:- कुण्डलिनी- धारण करने वाले
  82. दिगम्बर:- नग्न, आकाश रूपी वस्त्र वाले
  83. अष्टमूर्ति:- आठ रूप वाले
  84. अनेकात्मा:- अनेक आत्मा वाले
  85. सात्त्विक:- सत्व गुण वाले
  86. शुद्धविग्रह:- दिव्यमूर्ति वाले
  87. शाश्वत:- नित्य रहने वाले
  88. खण्डपरशु:- टूटा हुआ फरसा धारण करने वाले
  89. अज:- जन्म रहित
  90. पाशविमोचन:- बंधन से छुड़ाने वाले
  91. मृड:- सुखस्वरूप वाले
  92. पशुपति:- पशुओं के स्वामी
  93. देव:- स्वयं प्रकाश रूप
  94. महादेव:- देवों के देव
  95. अव्यय:- खर्च होने पर भी न घटने वाले
  96. हरि:- विष्णु समरूपी
  97. पूषदन्तभित्:- पूषा के दांत उखाड़ने वाले
  98. अव्यग्र:- व्यथित न होने वाले
  99. दक्षाध्वरहर:- दक्ष के यज्ञ का नाश करने वाले
  100. हर:- पापों को हरने वाले
  101. भगनेत्रभिद्:- भग देवता की आंख फोड़ने वाले
  102. अव्यक्त:- इंद्रियों के सामने प्रकट न होने वाले
  103. सहस्राक्ष:- अनंत आँख वाले
  104. सहस्रपाद:- अनंत पैर वाले
  105. अपवर्गप्रद:- मोक्ष देने वाले
  106. अनंत:- देशकाल वस्तु रूपी परिच्छेद से रहित
  107. तारक:- तारने वाले
  108. परमेश्वर:- प्रथम ईश्वर

भगवान शिव के संस्कृत श्लोक – Mahadev Shlok with Hindi Meaning

महाशिवरात्रि संस्कृत श्लोक

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्,
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।

हम त्रि-नेत्रीय वास्तविकता का चिंतन करते हैं जो जीवन की मधुर परिपूर्णता को पोषित करता है और वृद्धि करता है। ककड़ी की तरह हम इसके तने से अलग हों, अमरत्व से नहीं बल्कि मृत्यु से हों।

महाशिवरात्रि संस्कृत श्लोक

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Mahashivratri Sanskrit Shlok

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपं।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं।

हे मोक्षरूप, विभु, व्यापक ब्रह्म, वेदस्वरूप ईशानदिशा के ईश्वर और हम सबके स्वामी शिवजी, आपको मैं नमस्कार करता हूं। निज स्वरूप में स्थित, चेतन, इच्छा रहित, भेद रहित, आकाश रूप शिवजी मैं आपको हमेशा भजता हूँ।

Mahashivratri Sanskrit Shlok

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शंकर जी के श्लोक

महाद्रिपार्श्वे च तटे रमन्तं सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रैः।
सुरासुरैर्यक्षमहोरगाद्यै: केदारमीशं शिवमेकमीडे।।

भगवान शिव शंकर जो पर्वतराज हिमालय के नजदीक पवित्र मन्दाकिनी के तट पर स्थित केदारखण्ड नामक श्रृंग में निवास करते हैं और हमेशा ऋषि मुनियों द्वारा पूजे जाते हैं। जिनकी यक्ष-किन्नर, नाग व देवता-असुर आदि भी हमेशा पूजा करते हैं उन अद्वितीय कल्याणकारी केदारनाथ नामक शिव शंकर की मैं स्तुति करता हूँ।

शंकर जी के श्लोक

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रूद्र श्लोक (Shiv Shlok)

पद्मावदातमणिकुण्डलगोवृषाय कृष्णागरुप्रचुरचन्दनचर्चिताय।
भस्मानुषक्तविकचोत्पलमल्लिकाय नीलाब्जकण्ठसदृशाय नम: शिवाय।।

जो स्वच्छ पद्मरागमणि के कुण्डलों से किरणों की वर्षा करने वाले हैं, चन्दन तथा अगरू से चर्चित तथा भस्म, जूही से सुशोभित और प्रफुल्लित कमल ऐसे नीलकमलसदृश कण्ठवाले शिव शंकर को प्रणाम।

Shiv Shlok

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शिव श्लोक इन संस्कृत (Mahadev Shlok)

यं डाकिनीशाकिनिकासमाजे निषेव्यमाणं पिशिताशनैश्च।
सदैव भीमादिपदप्रसिद्धं तं शंकरं भक्तहितं नमामि।।

शाकिनी और डाकिनी समुदाय में प्रेतों के द्वारा सदैव सेवित होने वाले और भक्तहितकारी भीमशंकर नाम से प्रख्यात भगवान शंकर को मेरा नमस्कार।

Mahadev Shlok

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Mahakal Shlok in Sanskrit

नमस्ते भगवान रुद्र भास्करामित तेजसे।
नमो भवाय देवाय रसायाम्बुमयात्मने।।

हे मेरे भगवान! हे मेरे रूद्र, अनंत सूर्यो से भी तेज आपका तेज है। रसरूप, जलमय विग्रहवाले हे! भवदेव मेरा आपको प्रणाम है।

Mahakal Shlok in Sanskrit

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महादेव संस्कृत मंत्र

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशं।
करालं महाकालकालं कृपालं। गुणागारसंसारपारं नतोऽहं।।

तुरीय वाणी, ओंकार के मूल, ज्ञान, निराकार और इन्द्रियों से परे महाकाल के भी काल, गुणों के धाम, कैलाशपति, कृपालु, विकराल संसार से परे परमेश्‍वर को मेरा प्रणाम।

महादेव संस्कृत मंत्र
mahadev shlok with hindi meaning

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Mahakal Shlok in Hindi

दृशं विदधमि क करोम्यनुतिशमि कथं भयाकुल:।
नु तिश्सि रक्ष रक्ष मामयि शम्भो शरणागतोस्मि ते।।

हे शम्भो, मैं अब दृष्टि लगाऊं, क्रिध्र देखूं, भयभीत में कैसे यहां रहूँ? मेरे प्रभु आप कहा पर है? आप मेरी रक्षा करों मैं आपकी शरण में आया हूँ।

Mahakal Shlok in Hindi
Mahadev Shlok with Hindi Meaning

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शिव संस्कृत श्लोक

आदित्य सोम वरुणानिलसेविताय यज्ञाग्निहोत्रवरधूमनिकेतनाय।
ऋक्सामवेदमुनिभि: स्तुतिसंयुताय गोपाय गोपनमिताय नम: शिवाय।।

जो चन्द्र, वरुण, सूर्य और अनिल द्वारा सेवित है और जिनका निवास अग्निहोत्र धूम एवं यज्ञ में है। वेद, मुनिजन तथा ऋक-सामादि जिसकी स्तुति प्रस्तुत करते हैं। उन नन्दीश्वरपूजित गौओं का पालन करने वाले भगवान शिव को मेरा प्रणाम।

शिव संस्कृत श्लोक
Mahadev Shlok with Hindi Meaning

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Mahadev Shlok in Sanskrit

अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम्।
अकालमृत्यो: परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम्।।

जो भगवान शिव शंकर संतजनों को मोक्ष प्रदान करने के लिए अवन्तिकापुरी उज्जैन में अवतार धारण किए हैं अकाल मृत्यु से बचने के लिए उन देवों के भी देव महाकाल नाम से विख्यात महादेव जी को मैं प्रणाम करता हूँ।

Mahadev Shlok in Sanskrit
Mahadev Shlok with Hindi Meaning

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महादेव स्टेटस श्लोक

मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय।
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै मकाराय नम: शिवाय।।

जो शिव आकाशगामिनी मन्दाकिनी के पवित्र जल से संयुक्त तथा चन्दन से सुशोभित हैं। नन्दीश्वर तथा प्रमथनाथ आदि गण विशेषों एवं षट् सम्पत्तियों से ऐश्वर्यशाली हैं, जो मन्दार–पारिजात आदि अनेक पवित्र पुष्पों द्वारा पूजित हैं। ऐसे उस मकार स्वरूप शिव को मैं प्रणाम करता हूँ।

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Shiv Shlok in Sanskrit

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति।।

जो मनुष्य इस स्तोत्र को भक्तिपूर्वक पढ़ते हैं, उन पर शम्भु विशेष रूप से प्रसन्न होते हैं।

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महाकाल संस्कृत स्टेटस

लम्बत्स पिङ्गल जटा मुकुटोत्कटाय दंष्ट्राकरालविकटोत्कटभैरवाय।
व्याघ्राजिनाम्बरधराय मनोहराय त्रिलोकनाथनमिताय नम: शिवाय।।

जो लटकती हुई पिङ्गवर्ण जटाओं के सहित मुकुट धारण करने से जो उत्कट जान पडते हैं। तीक्ष्ण दाढों के कारण जो अति विकट और भयानक प्रतीत होते हैं। साथ ही व्याघ्रचर्म धारण किए हुए हैं तथा अति मनोहर हैं तथा तीनों लोकों के अधीश्वर भी जिनके चरणों में झुकते हैं। उन भगवान शिव शंकर को मेरा प्रणाम।

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महाकाल संस्कृत श्लोक

सदुपायकथास्वपण्डितो हृदये दु:खशरेण खण्डित:।
शशिखण्डमण्डनं शरणं यामि शरण्यमीरम्।

हे शम्भो! मेरा हृदय दु:ख रूपी बाण से पीडित है और मैं इस दु:ख को दूर करने वाले किसी उत्तम उपाय को भी नहीं जानता हूँ। अतएव चन्द्रकला व शिखण्ड मयूरपिच्छ का आभूषण बनाने वाले, शरणागत के रक्षक परमेश्वर आपकी शरण में हूँ। अर्थात् आप ही मुझे इस भयंकर संसार के दु:ख से दूर करें।

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महाकाल मंत्र इन संस्कृत

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभीरं। मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरं।।
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगंगा। लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा।।

जो हिमाचल के समान गौरवर्ण तथा गंभीर हैं। जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है। जिनके सिर पर सुंदर नदी गंगाजी विराजमान हैं। जिनके ललाट पर द्वितीया का चन्द्रमा और गले में सर्प सुशोभित है।

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शिव श्लोक अर्थ सहित

देवगणार्चितसेवितलिंगम् भावैर्भक्तिभिरेव च लिंगम्।
दिनकरकोटिप्रभाकरलिंगम् तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम्।।

मैं भगवान् सदाशिव के उस लिंग को प्रणाम करता हूं। जो लिंग देवगणों से पूजित तथा भावना और भक्ति से सेवित है और जिस लिंग की प्रभा-कान्ति या चमक करोड़ों सूर्यों की तरह है।

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महादेव संस्कृत श्लोक

न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यं।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो।।

मैं न तो योग जानता हूं, न जप और न पूजा ही. हे शम्भो, मैं तो सदा-सर्वदा आप को ही नमस्कार करता हूं। हे प्रभो! बुढ़ापा तथा जन्म के दु:ख समूहों से जलते हुए मुझ दुखी की दु:खों से रक्षा कीजिए। हे शम्भो! मैं आपको नमस्कार करता हूं।

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सदा शिव मंत्र

देवमुनिप्रवरार्चितलिंगम् कामदहं करुणाकरलिंगम्।
रावणदर्पविनाशनलिंगम् तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम्।।

मैं भगवान् सदाशिव के उस लिंग को प्रणाम करता हूं, जो लिंग देवताओं व श्रेष्ठ मुनियों द्वारा पूजित है। जिसने क्रोधानल से कामदेव को भस्म कर दिया, जो दया का सागर है और जिसने लंकापति रावण के भी दर्प का नाश किया है।

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महाकाल मंत्र संस्कृत

सविषैरिव भोगपगैखवषयैरेभिरलं परिक्षतम्।
अमृतैरिव संभ्रमेण मामभिषिाशु दयावलोकनै:।।

विषधरी भारी साँपों के समान इन सांसारिक विषयों ने मुझे भयभीत कर रखा है। अत: इनसे मैं परेशान हूँ। कृपया अमृत के समान, जीवनदायक अथवा मुत्तिफसाध्कद्ध अपने कृपाकटाक्षों के अवलोकन से मुझे बचाइए।

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महाकाल श्लोक

तस्मै नम: परमकारणकारणाय दिप्तोज्ज्वलज्ज्वलित पिङ्गललोचनाय।
नागेन्द्रहारकृतकुण्डलभूषणाय ब्रह्मेन्द्रविष्णुवरदाय नम: शिवाय।।

जो शिव कारणों के भी परम कारण हैं। अति दिप्यमान उज्ज्वल एवं पिङ्गल नेत्रों वाले हैं। सर्पों के हार-कुण्डल आदि से भूषित हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्रादि को भी वर देने वालें हैं, उन शिवजी को नमस्कार करता हूँ।

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महाशिवरात्रि संस्कृत श्लोक

सुताम्रपर्णीजलराशियोगे निबध्य सेतुं विशिखैरसंख्यै:।
श्रीरामचन्द्रेण समर्पितं तं रामेश्वराख्यं नियतं नमामि।।

जो भगवान् शंकर सुन्दर ताम्रपर्णी नामक नदी व समुद्र के संगम में श्री रामचन्द्र जी के द्वारा अनेक बाणों से या वानरों द्वारा पुल बांधकर स्थापित किये गये हैं। उन्हीं श्रीरामेश्वर नामक शिव को मैं नियम से नमस्कार करता हूँ।

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शिव आराधना श्लोक

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं।अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं।।
त्रय: शूलनिर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं।।

प्रचंड, श्रेष्ठ तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोडों सूर्य के समान प्रकाश वाले, तीनों प्रकार के शूलों को निर्मूल करने वाले, हाथ में त्रिशूल धारण किए, भाव के द्वारा प्राप्त होने वाले भवानी के पति श्री शंकरजी को मैं भजता हूं।

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शंकर जी के श्लोक

सर्वसुगन्धिसुलेपितलिंगम् बुद्धिविवर्द्धनकारणलिंगम्।
सिद्धसुरासुरवन्दितलिंगम् तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम्।।

मैं भगवान् सदाशिव के उस लिंग को प्रणाम करता हूं, जो सभी प्रकार के सुगन्धित द्रव्यों से लिप्त है। अथवा सुगन्धयुक्त नाना द्रव्यों से पूजित है, और जिसका पूजन व भजन बुद्धि के विकास में एकमात्र कारण है तथा जिसकी पूजा सिद्ध, देव व दानव हमेशा करते हैं।

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शिव पुराण संस्कृत श्लोक

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नम: शिवाय।।

जो शिव नागराज वासुकि का हार पहिने हुए हैं, तीन नेत्रों वाले हैं, तथा भस्म की राख को सारे शरीर में लगाये हुए हैं। इस प्रकार महान् ऐश्वर्य सम्पन्न वे शिव नित्य-अविनाशी तथा शुभ हैं। दिशायें जिनके लिए वस्त्रों का कार्य करती हैं, अर्थात् वस्त्र आदि उपाधि से भी जो रहित हैं। ऐसे निरवच्छिन्न उस नकार स्वरूप शिव को मैं नमस्कार करता हूँ।

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शिव पञ्चाक्षर स्तोत्रम्

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नम:शिवाय।।1।।

मंदाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथ महेश्वराय।
मण्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै मकाराय नम:शिवाय।।2।।

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्दसूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।
श्रीनीलकण्ठाय बृषध्वजाय तस्मै शिकाराय नम:शिवाय।।3।।

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्यमुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै वकाराय नम:शिवाय।।4।।

यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै यकाराय नम:शिवाय।।5।।

पञ्चाक्षरिमदं पुण्यं य: पठेच्छिवसन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते।।6।।

रावण रचित शिव तांडव स्तोत्रम्

Shiva Aahvaan Mantra (शिव आह्वान मंत्र)

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इनका नाम राहुल सिंह तंवर है, इन्होंने स्नातक (रसायन, भौतिक, गणित) की पढ़ाई की है और आगे की भी जारी है। इनकी रूचि नई चीजों के बारे में लिखना और उन्हें आप तक पहुँचाने में अधिक है। इनको 3 वर्ष से भी अधिक SEO का अनुभव होने के साथ ही 3.5 वर्ष का कंटेंट राइटिंग का अनुभव है। इनके द्वारा लिखा गया कंटेंट आपको कैसा लगा, कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। आप इनसे नीचे दिए सोशल मीडिया हैंडल पर जुड़ सकते हैं।

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