छठ पूजा क्यों मनाया जाता है? (इतिहास, महत्व और पौराणिक कथा)

Chhath Puja Kyu Manaya Jata Hai: छठ पर्व बिहार की संस्कृति है। यहां के लोगों की भावना है। इस पर्व का इंतजार साल भर सभी बिहारी लोग करते हैं। यह पर्व ना केवल बिहार में बल्कि झारखंड, पश्चिम बंगाल, नेपाल के तराई क्षेत्र एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी मनाया जाता है। कहते हैं इस त्यौहार को न केवल हिंदू बल्कि इस्लाम सहित अन्य धर्म के लोग भी मनाते हुए देखे जाते हैं।

भारतीय हिंदू प्रवासियों के कारण यह त्यौहार आज विश्व भर में प्रचलित है। छठ पूजा एक तरह प्रकृति पूजा है क्योंकि इस दिन सूर्य देव की पूजा की जाती है, जिनके कारण पूरी पृथ्वी प्रकाशित है। छठ पर्व वैदिक काल से चला आ रहा है। कई पौराणिक ग्रंथों में भी सूर्य देव की उपासना एवं उन्हें जल अर्पण करने के महत्व बताए गए हैं। इस तरह लंबे समय से पारंपरिक रूप से यह त्यौहार मनाते आ रहा है।

इस त्यौहार में पहने जाने वाले पोशाक का भी काफी महत्व है। मिथिला में छठ के दौरान मैथिली महिलाएं मिथिला के शुद्ध पारंपरिक संस्कृति को दर्शाने के लिए बिना सिलाई के शुध्द सूती धोती पहनती है। पुरूष भी पीला धोती पहन के पूजा करते हैं। यह पर्व काफी कठिन पर्व होता है क्योंकि इससे जुड़ी काफी सारे नियम होती है, जिसका पालन करना होता है।

Chhath Puja Kyu Manaya Jata Hai
Image: Chhath Puja Kyu Manaya Jata Hai

इस पर्व के दौरान सभी लोगों को काफी सचेत रहना पड़ता है। यदि कुछ भी भूल हुई तो इसका नकारात्मक प्रभाव परिवार के लोगों पर पड़ता है, इसीलिए इस त्यौहार को सोच समझ कर किया जाता है। यदि आप भी जानना चाहते हैं कि आखिर इस पर्व से जुड़ी कौन सी पौराणिक कथाएं हैं और इस पर्व को मनाने के लिए किन नियमों का पालन करना होता है तो आप इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें।

छठ पूजा कब मनाया जाता है?

छठ का पर्व साल में दो बार मनाया जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार छठ का पहला पर्व कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है, जो दिवाली के कुछ दिनों के बाद आता है। वहीँ दूसरा छठ पर्व चैत्र माह की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। हालांकि मुख्य रूप से कार्तिक मास के छठ पर्व को मनाया जाता है।

छठ का पर्व काफी ज्यादा कठिन पर्व माना जाता है। क्योंकि इसमें लगभग 36 घंटे से भी ज्यादा समय का व्रत रखना होता है। इसमें निर्जला व्रत भी शामिल होता है और फिर पानी में कमर तक डूब कर सूर्य को अर्घ्य देना शामिल होता है। यह प्रकृति के भी अनुकूल है। इसे बहुत ही सादगी तरीके से मनाया जाता है।

इसमें किसी भी तरह की मूर्ति की पूजा नहीं की जाती है बल्कि प्रकृति आनी की सूर्य देव की पूजा की जाती है, जिससे पूरा संसार प्रकाशित है। छठी मैया सूर्य देव की बहन है। इस दिन भगवान सूर्य को ही अर्घ्य देखकर छठी मैया को प्रसन्न किया जाता है। इस पर्व के आने के कुछ सप्ताह पहले ही बिहार और झारखंड के हर गली मोहल्ले में छठ गीत बजना शुरू हो जाता है।

2022 में छठ पूजा कब है? (Chhath Puja Kab Hai 2022)

2022 में छठ पूजा 30 अक्टूबर (रविवार) को है।

छठ पूजा का महत्व

छठ पूजा के दिन सूर्य देव की पूजा की जाती है। सूर्य देव समस्त धरती को प्रकाश देते हैं और सूर्य के प्रकाश के कारण ही धरती पर सभी तरह के जीव अस्तित्व में है। ऐसे में सूर्य देव की पूजा करना बहुत ही ज्यादा महत्व रखता है। सूर्य देव की पूजा करने से घर में सुख समृद्धि आता है, उनकी कृपा हमेशा बनी रहती है।

छठ पूजा का व्रत रखी महिलाएं अपने परिवार के सदस्यों के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं। घर में किसी को रोग बीमारी हो तो उसे ठिक करने की प्रार्थना करती हैं। कहते हैं जिस स्त्री को संतान की प्राप्ति नहीं होती, ऐसे लोग छठ पूजा का व्रत रखे तो उनकी मनोकामना बहुत जल्दी पूरी होती है। इसीलिए हर साल कई महिलाएं संतान प्राप्ति के लिए छठ का व्रत रखती हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार छठ पूजा का महत्व सदियों से है लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी छठ पूजा का काफी ज्यादा महत्व है। सूर्य की रोशनी सभी जीवो के लिए लाभकारी होता है। छठ पूजा के दौरान लोग सूर्य के प्रकाश में सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं। यहां तक कि इस पर्व में भी ज्यादातर प्राकृतिक वस्तुओं का ही प्रयोग करते हैं जैसे कि बांस, फल फूल, गन्ने आदि।

यह व्रत ना केवल महिला ही मनवांछित फल प्राप्ति करने के लिए रखती है बल्कि पुरुष भी इस व्रत को रखते हैं।

छठ का पर्व कैसे मनाया जाता है?

बिहार का महापर्व छठ पूजा आमतौर पर 4 दिनों तक मनाया जाता है। जिसमें पहला दिन नहाए खाए का होता है, दूसरा दिन लोहंडा या जिसे खरना भी कहा जाता है, तीसरे दिन संध्या काल का अर्घ्य का समय होता है और चौथा दिन उषा अर्घ्य के रूप में मनाया जाता है।

नहाय खाय

नहाए खाए छठ पर्व का पहला दिन होता है। इस दिन घर का जो भी सदस्य छठ का व्रत रखने वाला होता है, वह प्रभात काल उठकर स्नान करके साफ-सुथरे कपड़े पहनता है और सादगी भोजन ग्रहण करता है।

इस दिन को कद्दू भात भी कहा जाता है। क्योंकि इस दिन लगभग सभी के घर पर चने दाल का दाल, भात और कद्दू की सब्जी बनती है। इसे इस दिन प्रसाद के रूप में खाया जाता है।

लोहंडा या खरना

खरना छठ का दूसरा दिन होता है। इसे खरना इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दिन घर का जो सदस्य छठ का व्रत रखा होता है, वह दिनभर उपवास रखा होता है। उसके बाद वो संध्याकाल में भोजन ग्रहण करके इस उपवास को तोड़ता है। इस दिन व्रती खीर और गुड़ खाकर ही खरना करता है।

बहुत जगह गन्ने के रस में चावल डालकर मीठा चावल बनाया जाता है। बहुत जगह पर दूध में चावल डालकर खीर बनाया जाता है, जिसके ऊपर गुड़ डालकर खाया जाता है। यही भोजन लगभग घर के अन्य सदस्य भी प्रसाद स्वरूप ग्रहण करता है। लेकिन सबसे पहले यह भोजन छठ का पर्व रखने वाला व्रती ग्रहण करता है।

पहला अर्घ्य

यह छठ का तीसरा दिन होता है। इस दिन सूर्य देव को पहला अर्घ्य दिया जाता है, जो संध्याकाल में डूबते सूरज को अर्पण किया जाता है। इस दिन पूरे दिन भर काफी चहल-पहल रहती है क्योंकि इस दिन सभी के घर पर घाट पर ले जाने के लिए डलिया तैयार किया जाता है। इस डलिये में विभिन्न प्रकार के फल, फूल, नारियल, पानी फल, सेब, केला ठेकुआ, लड्डू रखा जाता है।

उसके बाद घर का पूरा सदस्य नए कपड़े पहन कर तैयार हो जाता है। उसके बाद वे सभी यहां तक कि गांव के भी अन्य सदस्य लोग अपने-अपने घरों से छठी मां की डलिया को उठाकर घाट की ओर बढ़ते हैं और गीत गाते हैं। इस दिन यदि कोई मान्यता रखा होता है या फिर वह मान्यता रखने वाला होता है तो वह व्रती छठ घाट तक हर कदम पर सोते हुए एक अर्ध घेरा बनाकर जाता है, जिसे “ड़र देना” भी बोला जाता है।

घाट पर पहुंचने के बाद सभी लोग घाट के चारों ओर डलियो को रख देते हैं और फिर व्रती घाट के पानी में आधा डूब कर अगरबत्ती जलाती है और फिर सूर्य देव की पूजा करते हुए सूर्य देव को संध्या काल का अर्घ्य देती है। पूजा हो जाने के बाद सभी लोग डलिए को घाट से वापस ले आते हैं और घर में पूजा वाले स्थान पर रख देते हैं।

इस दिन बहुत सारे लोग तो रात भर सोते भी नहीं है क्योंकि दूसरे दिन लोगों को प्रसाद में बांटने के लिए लोग पुआ भी बनाते हैं। कुछ शहरों में जहां पर लोग दूर-दूर से छठ व्रत मनाने के लिए घाट पर आते हैं। ऐसे जगहों पर तो खूब साज सजावट की गई होती है। मेले भी आयोजित किए गए होते हैं, जो छठ के व्रती होते हैं। उनके मनोरंजन के लिए दूर-दूर से गायीका का भी प्रोग्राम रखा जाता है।

सुबह का अर्घ्य

छठ पर्व सुबह का अर्घ्य देने के बाद ही खत्म होता है। चौथे दिन सूर्योदय से पहले ही सभी लोग दोबारा नहा धोकर तैयार हो जाते हैं। साफ-सुथरे कपड़े पहन कर अपने-अपने घरों से डलिया लेकर दोबारा घाट पर गीत गाते हुए पहुंचते हैं। इस दिन भी बहुत सारे लोग डर देते हैं।

घाठ पहुंचने के बाद बिल्कुल तीसरे दिन की तरह ही छठ व्रती तालाब में कमर भर डूब कर सूर्योदय के समय भगवान सूर्य को जल अर्पण करती है और अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करती है। उसके बाद डलिया की भी पूजा की जाती है। पूजा पाठ हो जाने के बाद लोग दुबारा अपने घर पर आते हैं, जहां पर डलिया को खोला जाता है और प्रसाद का आदान प्रदान किया जाता है।

इस दिन व्रत रखने वाली व्रती भी प्रसाद खाने के बाद अपने व्रत को समाप्त करती है। उनका व्रत लगभग 36 घंटे से भी अधिक समय का होता हैं, इसीलिए इस पर्व को काफी कठिन पर्व माना जाता है। इस दिन तो लोगों की यह भी मान्यता होती है कि आसपास के जिन गांवों में छठ का पर्व नहीं होता, वहां तक एवं अपने रिश्तेदारों के घरों तक प्रसाद को पहुंचाना होता है।

कहते हैं इस दिन जितना ज्यादा छठ का प्रसाद वितरण किया जाता है, उतना अच्छा होता है। यदि कोई छठ का प्रसाद लेने से मना कर देता है तो छठी मां नाराज हो जाती हैं और उसका नकारात्मक प्रभाव देखने को मिलता है। इसीलिए इस दिन भूलकर भी कोई छठ प्रसाद खाने से मना नहीं करता यहां तक कि जिनके यहां नहीं होता है, वे लोग छठ का प्रसाद मांगकर ग्रहण करते हैं।

छठ पूजा क्यों मनाया जाता है? (Chhath Puja Kyu Manaya Jata Hai)

छठ पूजा मनाने के पीछे कई सारी पौराणिक कथाएं प्रचलित है, जिनमें से कुछ पौराणिक कथाएं यहाँ पर बता रहे है।

राजा प्रियवंद की कहानी

भारत में हर एक त्योहार को मनाने के पीछे कुछ ना कुछ पौराणिक कथाएं जुड़ी होती है। महापर्व छठ पूजा को मनाने के पीछे भी एक प्रचलित पौराणिक कथा है। माना जाता है कि बहुत समय पहले एक राजा प्रियंवद हुआ करता था, जिसकी कोई संतान नहीं थी। उसने संतान प्राप्ति के लिए हर जतन किए लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

तब एक दिन उसे महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराने की सलाह देते हैं। राजा यज्ञ कराने की सभी तैयारी करता है। यज्ञ आहुति में बनाई गई खीर वह अंत में पूजा के बाद अपनी पत्नी को खिलाता है, जिसके कुछ समय पश्चात उसे पुत्र की प्राप्ति होती है। लेकिन, उसका पुत्र मृत पैदा होता है। इस खबर को सुन पूरा राज्य शोक में डूब जाता है।

कहा जाता है जब राजा मृत बच्चे को दफनाने के लिए शमशान जाता है तो वहां पर वह पुत्र वियोग में अपना प्राण त्यागने लगता है, उसी वक्त आसमान से एक ज्योतिर्मयी विमान धरती पर उतरता है। इस विमान में भगवान की मानस पुत्री देवसेना होती है, जो राजा को कहती है कि मैं सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हूं, जिस कारण मुझे षष्टी कहा जाता है।

राजा यदि तुम सच्चे भाव से मेरी पूजा और व्रत रखोगे तो तुम्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी। वह राजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मां षष्टि देवी की पूजा करता है, जिसके पश्चात उसे पुत्र की प्राप्ति होती है। माना जाता है तब से ही लोग संतान प्राप्ति की चाह में हर साल कार्तिक माह के शुक्ल षष्ठी को इस व्रत को रखते हैं।

भगवान राम ने भी छठ व्रत किया था

जैसा आप जानते हैं कि छठ पूजा के दिन सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है। सूर्य देव को अर्घ्य समर्पित करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। भगवान राम के समय में भी भगवान राम अक्सर सूर्य देव को जल अर्पण करते थे। माना जाता है कि भगवान राम और माता सीता ने भी इस पर्व को मनाया था।

जब लंका विजय के बाद भगवान राम अपने भ्राता लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ अयोध्या रामराज्य की स्थापना करने के लिए आए तो कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने भगवान सूर्य देव के लिए उपवास रखा और सप्तमी को सूर्य भी सूर्यउदय के वक्त फिर से अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया।

कर्ण ने भी किया था छठ पर्व

सूर्यदेव को अर्घ्य देने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। महाभारत काल में भी सूर्य देव को अर्घ्य देने की परंपरा थी। महाभारत में भी इसके बारे में जिक्र है, जिसमें कहा गया है कि सूर्यपुत्र कर्ण हालांकि जो कुंती के पुत्र थे लेकिन इन्हें सूर्यपुत्र भी कहा जाता था क्योंकि सूर्य के आशीर्वाद से ही कुंती के गर्भ से जन्मे थे।

इसीलिए हमेशा से ही कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त रहे थे और वे अपने जीवन पर्यंत प्रतिदिन कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य देते थे, जिस कारण सदैव सूर्य देव की कृपा उन पर बनी रही और वे एक महान योद्धा कहलाए।

द्रोपदी ने भी किया था छठ पर्व

पौराणिक कथाओं के अनुसार माना जाता है कि द्रोपदी ने भी महाभारत काल में छठ पर्व किया था। माना जाता है कि जब पांचो पांडव भाई कौरवों से जुए के खेल में अपना राजपाट सब कुछ हार गए थे तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा था और सूर्य देव की महिमा से ही सभी पांडव अपनी राजपाट को वापस लेने में सक्षम हो पाए थे।

छठ पर्व से जुड़े नियम

छठ पर्व को बहुत कठिन पर्व माना जाता है। बिहार के लिए यह महापर्व होता है। इस पर्व में बहुत सावधानी रखनी होती है, जिस कारण हर कोई छठ व्रत नहीं रख पाता है। इस पर्व में चारों तरफ साफ सफाई का ध्यान रखा जाता है। इस पर्व में यदि सावधानी न बरती तो उसका नकारात्मक प्रभाव परिवार के सदस्यों पर पड़ता है, इसीलिए इस पर्व की खास तैयारी में कई नियम जुड़े हुए हैं।

  • घर में जो सदस्य छठ का व्रत रहता है, उसे बिस्तर पर सोना भी वर्जित माना जाता है, वह जमीन पर ही सोता है। पूजा वाले कमरे में आसन लगाकर वह सो सकता है।
  • छठ पर्व के दौरान घर का वातावरण भी शुद्ध एवं शांत रखना चाहिए। एक दूसरे से कलह नहीं करना चाहिए और ना ही गंदगी फैलानी चाहिए।
  • इस पर्व में सात्विक खाना ही बनाया जाता है। यहां तक कि भूल से भी खाना बनाते हुए हाथ से नमक नहीं छूना चाहिए। इतना ही नहीं बल्कि इस पर्व के दौरान कभी भी स्टील या शीशे के बर्तन का प्रयोग नहीं किया जाता है।
  • छठ पर्व में सूर्यास्त एवं सूर्योदय के समय सूर्य भगवान को अर्घ्य देने के लिए केवल तांबे के पात्र का ही प्रयोग करना चाहिए।
  • छठ के पर्व में जो प्रसाद बनाया जाता है, उसकी शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है। कभी भी छठी मैया के लिए प्रसाद पहले से इस्तेमाल किए गए चूल्हे या स्टोव पर नहीं बनाया जाता है, इसके लिए नए चूल्हे का प्रयोग किया जाता है। इस पर्व में ज्यादातर लोग मिट्टी से बने चूल्हे का ही प्रयोग करते हैं, जो खास करके इस पर्व के दिन ही बनाया जाता है।
  • छठ का व्रत परिवार का हर सदस्य नहीं रखता है। परिवार में कोई एक ही सदस्य छठ का व्रत रखता है, जिसमें उस सदस्यों को किसी एक कमरे में ही रहना होता है। जिसकी साफ सफाई होती है और वह उस कमरे में नियम पूर्वक रहता है। हालांकि परिवार के अन्य सदस्य भी घर की साफ सफाई और पवित्रता का विशेष ध्यान रखते हैं।
  • घर में जो व्यक्ति छठ का व्रत रखा होता है, उसके कमरे में दूसरे सदस्यों के लिए जाना वर्जित रहता है और उस जगह पर अन्य साधारण भोजन भी नहीं बनाए जाते हैं और ना ही उस स्थान पर खाया जाता है।
  • घर में जो सदस्य छठ का व्रत रखता है, उन्हें सूर्य को अर्घ्य देने से पहले भोजन नहीं करना होता है। सूर्यास्त के समय अर्घ्य देने के बाद एवं सूर्योदय के समय अर्घ्य देने के बाद ही भोजन का सेवन किया जाता है।
  • यदि कोई व्यक्ति छठी मां से कोई मनोकामना मांगता है और वह मनोकामना पूरी हो जाता है तो विशेष पूजा जरूर कराना चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं करता तो उसे बहुत बड़े रोग का शिकार होना पड़ता है।
  • छठ पर्व के 4 दिनों तक मांसाहार तो दूर लोग प्याज और लहसुन का भी प्रयोग नहीं करना चाहिए। यहां तक कि फल भी खाना वर्जित माना जाता है। क्योंकि फल का प्रयोग छठी माई को प्रसाद के रूप में किया जाता है, इसीलिए 4 दिनों तक लोग फलों का भी सेवन नहीं करते हैं।
  • छठ पर्व के दौरान हर किसी को शाकाहार अपनाना होता है। यहां तक कि पूरे कार्तिक महीने में बहुत लोग मांसाहारी भोजन का सेवन नहीं करते हैं। लेकिन खासकर के छठ पर्व के दौरान तो बिल्कुल भी मांसाहारी भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए और ना ही मदिरा का सेवन करना चाहिए।

FAQ

छठ के पर्व में नहाए खाए का क्या अर्थ होता है?

छठ का पर्व चार दिनों का पर्व होता है, जिसमें पहला दिन नहाए खाए का होता है जिस दिन छठ पर्व रखने वाली व्रती तालाब में स्नान करके कच्चा चावल का भात, चना दाल और कद्दू को प्रसाद के रूप में ग्रहण करती है और इस पर्व की शुरुआत करती है।

छठी मैया कौन है?

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार माना जाता है कि छठी मैया भगवान सूर्यदेव की बहन एवं भगवान ब्रह्मा की मानस पुत्री है। कहते हैं सृष्टि निर्माण के समय भगवान ब्रह्मा ने अपने आपको दो भागों में बांटा था, जिनके दाहिने भाग में पुरुष एवं बाएं भाग में प्रकृति का रूप सामने आया था। सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी के एक अंश को देवसेना के नाम से जाना जाता है और यह प्रकृति का छठा अंश होने के कारण षष्टी देवी के नाम से भी प्रचलित है, जिसे छठी मैया भी कहा जाता है।

छठ का व्रत कौन रखता है?

वैसे तो छठ का पर्व बिहार, झारखंड और नेपाल के भी कुछ क्षेत्रों में काफी धूमधाम से मनाया जाता है। लेकिन बात रही इस पर्व में रखे जाने वाले व्रत की तो परिवार का कोई एक सदस्य ही छठ का व्रत रखता है। क्योंकि इस पर्व में काफी ज्यादा नियमों का पालन करना होता है, इसीलिए हर कोई इस व्रत को नहीं रख पाता है।

ठेकुआ क्या होता है?

ठेकुआ एक तरह का मिठाई होता है, जो उत्तर भारत में काफी ज्यादा प्रख्यात है। यह सूजी और मैदे को शान कर के तेल में डिप फ्राई करके बनाया जाता है। हालांकि आटे से भी इसे बनाया जाता है। छठ के पर्व में ठेकुवे का काफी महत्व होता है। इस पर्व में ठेकुआ का इस्तेमाल प्रसाद की तरह करते हैं।

निष्कर्ष

आज के इस लेख के जरिए आपने बिहार, झारखंड का महापर्व छठ पूजा के बारे में विस्तार पूर्वक जाना। आज के इस लेख में हमने आपको छठ पूजा का महत्व, इसे मनाने की विधि एवं छठ पूजा कब मनाया जाता है (Chhath Puja Kyu Manaya Jata Hai) इसके बारे में जानकारी दी।

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