व्यक्तित्व (व्यक्तित्व का विकास, अर्थ और परिभाषा)

व्यक्तित्व (व्यक्तित्व का विकास, अर्थ और परिभाषा) | Vyaktitva | Personality

Personality
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व्यक्तित्व (Personality)

मनोविज्ञान के क्षेत्र में विकास के कारण व्यक्तित्व की पुरानी विचार को बदल दिया गया है। अब व्यक्ति का आधार क्या होना चाहिए, यह प्रश्न मनोवैज्ञानिकों के लिए एक जटिल समस्या बन गई थी। उन्होंने इसके सुधार के लिए विभिन्न व्यक्ति को अध्ययन किया और उनके विभिन्न रूपों और दृष्टिकोण को देखते हुए व्यक्तित्व की पुरानी विचार को खत्म कर नए विचार स्थापित किया है।

विभिन्न मनोवैज्ञानिकों के अनुसार व्यक्तित्व परिभाषा

प्रोफेसर गौरिसन, प्रोफेसर कार्ल सी. और अन्य महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक प्रोफेसरों ने कहा है कि “व्यक्तित्व संपूर्ण मनुष्य है उसकी स्वभाविक अभिरुचि तथा क्षमता और उसके भूतकाल में अर्जित किए गए ज्ञान, इन कारकों का संगठन तथा समन्वय प्रतिमान, आदर्श, मूल्यों तथा अपेक्षाओं की विशेषता से पूर्ण होता है।”

“Personality is a complete human being characterized by his natural aptitudes and abilities and knowledge acquired in the past, the organization and coordination of these factors, characterized by norms, ideals, values and expectations.”

व्यक्तित्व का कोई स्थाई विचार नहीं होता है, समय समय पर लोगों का व्यक्तित्व बदलता रहता है। असल में व्यक्तित्व का स्वरूप वैसा होता है जैसे कि कोई व्यक्ति किसी वातावरण के अनुकूल खुद को ढालने की प्रक्रिया होती है। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि यदि किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व पूरी तरह से उसके वातावरण पर निर्भर करता है तो उसका व्यक्तित्व भी अच्छा हो सकता है। जब उसके आसपास का वातावरण अनुकूल और अच्छा हो।

अलग-अलग लोगों का व्यक्तित्व भी अलग होता है, क्योंकि जिस वातावरण में वे रहते हैं, वह भी अलग होता है। जिसके कारण हर व्यक्ति का व्यक्तित्व अलग होता है और लोगों के व्यक्तित्व को उसके व्यवहार से जाना जाता है। क्योंकि व्यवहार किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व का बाहरी रूप होता है। किसी व्यक्ति के व्यवहार में जितना अधिक एकता होगा। उसका व्यक्तित्व उतना ही अच्छा बनता जाता है।

समय के परिवर्तन के साथ व्यक्तित्व शब्द का अर्थ भी बदल गया, प्रसिद्ध लेखक और रोम कूटनीतिज्ञ सिसेरो ने पहली शताब्दी में चार अलग-अलग अर्थों में इसका इस्तेमाल किया।

1.जैसा एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को दिखाई देता है वैसा वह वास्तव में नहीं है।
2.वह कार्य जो जीवन में कोई करता है जैसे कि दार्शनिक।
3.व्यक्तित्व गुणों का संकलन जो है एक मनुष्य को उसके कार्य के योग्य बनाता है।
4.विशेषता और सम्मान जैसा कि लेखक शैली में होता रहा है।

तेरहवीं शताब्दी तक व्यक्तित्व के विशेषता के लिए व्यक्ति शब्द का उपयोग किया जाता था, लेकिन 14वीं शताब्दी में व्यक्ति के विशेषता के लिए एक नए शब्द के उपयोग की आवश्यकता महसूस की गई।

इस प्रकार 14वीं शताब्दी में व्यक्ति के विशेषताओं के वर्णन करने के लिए व्यक्तित्व शब्द का उपयोग किया गया और तब से हम व्यक्तित्व शब्द का उपयोग व्यक्तियों की विशेषताओं का वर्णन करने के लिए करते हैं।

व्यक्तित्व की प्रकृति

विभिन्न वैज्ञानिकों, मनोवैज्ञानिकों और शिक्षाविदों ने व्यक्तित्व की प्रकृति पर विभिन्न कार्य किए हैं, इसलिए व्यक्तित्व की प्रकृति को समझने के लिए तीन बातों पर ध्यान देकर इसका अर्थ समझने का प्रयास करें।

  1. व्यक्ति से संबंधित जो भी परिभाषाएँ हमें देखने को मिलती हैं, उन सभी में अंतर होता है।
  2. व्यक्ति की सही अवधारणा का चयन।
  3. ध्यान दें कि व्यक्तित्व की वह क्या परिभाषा है जो संपूर्ण व्यक्तित्व को परिभाषित करती है।

व्यक्तित्व की प्राचीन मत

व्यक्तित्व को अंग्रेजी भाषा में पर्सनालिटी कहते हैं। पर्सनालिटी शब्द लैटिन भाषा के पर्सोना शब्द से बना है। लैटिन भाषा में पर्सोना को नकली चेहरा बताया गया है।

प्रसिद्ध लेखक और रोम कूटनीतिज्ञ सिसेरो ने व्यक्तित्व विभिन्न रूपों में विवेचना की है।

  1. भूमिका के आधार या अनुसार अपने चेहरे को बदलना।
  2. उपयुक्त भूमिका के आधार पर संपूर्ण व्यक्तित्व की भूमिका बनाना।
  3. भूमिका के आधार पर गुणों का विकास करना।
  4. एक नवीन व्यक्तित्व को धारण करना जो कि असल में सर्वथा भिन्न हो।

किसी भी व्यक्ति के तुरंत बदले हुए व्यक्तित्व को देखकर उसके वास्तविक व्यक्तित्व पर विश्वास करना बिल्कुल गलत है। क्योंकि आजकल व्यक्ति के नए व्यक्तित्व की घटना शुरू हो गई है, जो सभी शक्ति क्षमताओं का संयोजन है।

व्यक्तित्व का आधुनिक मत

व्यक्ति और व्यक्तित्व दो अलग-अलग शब्द हैं, जिनका आपस में गहरा संबंध होने के बावजूद दोनों के अलग-अलग अर्थ हैं, यदि आप दोनों शब्दों को ध्यान से देखें तो आपको स्पष्ट होगा कि प्रत्येक व्यक्ति अपने गुणों से उन लोगों को प्रभावित करता है और अन्य लोगों को अपने गुणों से। आज के समय में व्यक्तित्व को एक मध्यवर्ती चर के रूप में माना जा रहा है।

वैज्ञानिकों और मनोवैज्ञानिकों ने साबित कर दिया है कि किसी व्यक्ति का उत्साह और प्रतिक्रिया तुरंत या अपने आप नहीं बदलती है, सभी प्राणी को प्रभावित करता है और उसकी प्रतिक्रिया भी अलग-अलग होती है। प्रत्येक व्यक्ति का उत्साह और प्रतिक्रिया दोनों काम करते हैं।

इसे एक उदाहरण के द्वारा समझते हैं: जब हम भूखे होते हैं तो हमारा उत्साह और प्रतिक्रिया किसी भोजन के प्रति होती है, लेकिन जब हमें भूख नहीं होती है तो हमारा झुकाव किसी भी भोजन की ओर नहीं होता है। हमें कोई प्रतिक्रिया होती है। हमें कुछ भी खाने की कोई इच्छा नहीं होती है। यह उत्साह और प्रतिक्रिया जो आपके व्यवहार को प्रभावित करती है। इसके बीच में एक मध्यवर्ती चर होता है। जो कि बुद्धि, प्रेरक, पूर्व-अनुभव, अनुभूति, मानसिक झुकाव को प्रभावित करती है जिससे आपका व्यवहार में परिवर्तन आता है।

दो प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्ति के व्यक्तित्व की प्रकृति को मध्यवर्ती चर को मुख्य मानकर परिभाषित किया है।

आलपोर्ट की व्याख्या

व्यक्तित्व व्यक्तियों का गतिशील संगठन है, जो पर्यावरण के प्रति पूर्ण समायोजन स्थापित करता है।

“Personality is a dynamic organization of individuals that establishes perfect adjustment to the environment.”

आलपोर्ट की व्याख्या व्यक्तित्व के प्रकृति के संबंध में विभिन्न समस्याओं को दूर करने में मदद करती है। ऑलपोर्ट व्यक्तित्व को एक गतिशील संगठन मानता है, जिससे यह साबित होता है कि व्यक्ति का व्यक्तित्व स्वभाव परिवर्तनशील है और यह व्यक्तित्व का आंतरिक है न कि बाहरी पहलू से ।भौतिक पद्धति से मतलब है कि व्यक्तियों की आदतें और लक्षणों से हैं।

सामाजिकता की भावना को व्यक्त करने के लिए, पर्यावरण के प्रति झुकाव होना या पर्यावरण के प्रति आपका लगाव होना बहुत आवश्यक है, इसका मतलब यह है कि व्यक्ति अपने वातावरण के साथ समायोजन करके उसके प्रति अपने व्यवहार को व्यक्त करता है, इससे व्यक्ति के अंदर के क्रियात्मक एवं रचनात्मक क्रियाएं भी शामिल होती है। आलपोर्ट की व्याख्या वैज्ञानिक पहुंच का प्रतीक है।

स्टैगनर और कारवोस्की की व्याख्या

स्टैगनर और कारवोस्की की व्याख्या व्यक्तित्व को उत्तेजना और प्रतिक्रिया के बीच एक मध्यवर्ती चरण के रूप में मानती है, उन्होंने लिखा है कि व्यक्तित्व अभिप्रेरणाओं तथा प्रत्यक्ष का एक ऐसा विलक्षण प्रतिरूप है जिससे एक विशिष्ट व्यक्ति का पता चलता है।

“Personality is such a unique pattern of motivations and perceptions that a particular person is revealed.”

स्टैगनर और कारवोस्की की दृष्टिकोण के आधार पर व्यक्ति की इच्छाएं कैसे होती है क्या होती है और उनकी पूर्ति के लिए कौन से साधनों का उपयोग किया जाता है। और वह किस प्रकार से अपनी इच्छा की पूर्ति के देखते हैं, उनकी महत्वकांक्षी आएं क्या होती है। व्यक्ति सम्मान रूपी व्यक्तित्व से कैसे प्रेरित होकर रहता है। जबकि कोई क्रूर व्यक्ति अपने उद्देश्य के लिए साधन मात्र मानता है।

स्टैगनर और कारवोस्की की व्याख्या ने विस्तृत रूप में व्यक्तित्व की परिभाषा को व्याख्या करते हुए कहा है कि “वास्तविक व्यक्तित्व किसी विशेष व्यक्ति की बाह्य अनुक्रिया का प्रतिरूप मात्र नहीं होता है और न एक व्यक्ति के सामाजिक प्रभाव होते हैं । वस्तुतः व्यक्तित्व प्रेरको, संवेगों, प्रत्यक्ष और स्मृतियों का ऐसा आन्तरिक संगठन होता है, जो व्यवहार की दिशा को निर्धारित करता है”।

“Real personality is not merely a pattern of the external response of a particular person, nor the social effects of a person. In fact, personality is such an internal organization of stimuli, emotions and memories, which determine the direction of behavior”.

उपर्युक्त परिभाषाओं का विश्लेषण करने पर व्यक्ति के चार अंग स्पष्ट हो जाते हैं, जैसे गत्यात्मकप्रतिरूप, प्रत्यक्ष अवयव, सीखना तथा बुद्धि, यह व्यक्तित्व की प्रकृति को स्पष्ट करने में सक्षम है।

  1. गत्यात्मक प्रतिरूप – गत्यात्मक प्रतिरूप अभिप्रेरकों, आवेगों पर किसी विशेष व्यक्ति के प्रभाव को संदर्भित करता है, जो उसके व्यवहार में बदलाव का कारण बनता है।
  2. प्रत्यक्ष अवयव- प्रत्यक्ष अवयव का अर्थ है कि यह किसी व्यक्ति की विशेष आंतरिक आवश्यकताओं की पूर्ति से है, यह आंतरिक आवश्यकता है, उसकी प्रेरणा और उसकी आवश्यकताओं के बीच अंतर स्थापित करते हुए, व्यक्ति को खुशी की भावना की ओर ले जाता है। जैसे कोई बच्चा अपने बाल्यावस्था में अपरिचित व्यक्तियों से दूर रहता है। और अपने माता-पिता के पास आनंद महसूस करता है, अजनबी और उसके माता-पिता के बीच अंतर करने की प्रत्यक्ष जरूरतों से प्रभावित होता है। और वह बच्चा अपने माता-पिता के साथ रहना पसंद करता है।
  3. सीखना- किसी भी व्यक्ति में सीखने की प्रक्रिया उसके जन्म के बाद ही शुरू होती है, कोई भी व्यक्ति सीखने की प्रक्रिया को अपनी मर्जी से और अपने मूल कारणों से अपनाता है, जिससे उसे खुशी और संतुष्टि मिलती है और जो काम पसंद नहीं करता हैवह इसे जल्द नहीं अपनाता है। तो इसका मतलब है कि किसी भी व्यक्ति में ज्ञान का भंडार और उसकी बुद्धि उसके सीखने की प्रक्रिया पर निर्भर करती है, जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, वह अपने जीवन में नई चीजें सीखता है। अपने जीवन में नई चीजें देखता है। और इन सबको मिलाकर किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण होता है।
  4. बुद्धि- किसी भी व्यक्ति की बुद्धि उसके जीवन में सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखती है और उसकी मानसिक प्रक्रिया भी उसके व्यक्तित्व के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्माण को प्रभावशाली बनाने के लिए उसकी बुद्धि अहम भूमिका निभाती है। एक व्यक्ति के जीवन में उसकी बुद्धि और उसके अनुभव और उससे संबंधित विचार उसकी योग्यता को बनाए रखता है और उन सभी के संयोजन उनके व्यक्तित्व को बढ़ाता है।

व्यक्तित्व की प्रकृति से संबंधित सभी शाखाएं पर दृष्टिकोण करने पर यह स्पष्ट होता है कि व्यक्ति की सभी लक्षणों व्यक्तित्व में आती है और कुछ विशेष लक्षणों को संयोग मात्र ना होकर उनका एक विशिष्ट संगठन होता है। जो व्यक्ति के व्यवहार का सभी गुण होता है व्यक्तित्व को दूसरों पर अपना प्रभाव डाले बिना नहीं रह सकते।

इसलिए हम कह सकते हैं कि व्यक्तित्व किसी भी व्यक्ति के अंदर उसके लक्षण उसकी योग्यताएं उसकी रुचियां उसके मूल्य उसके प्रेरक उसकी अभिवृत्ति से भी उसकी स्वाभाविक लक्षण है। किसी व्यक्ति के अंदर उसका व्यक्तित्व उसका स्वभाव होता है। उसका भाव होता है, उसकी दशाएं व्यक्ति का क्या गुण है क्या आचरण है। कैसी नैतिकता और मानवीय विचार हैं। यह सभी किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

व्यक्तित्व का अर्थ

विभिन्न मनोवैज्ञानिकों के दृष्टिकोण के आधार पर व्यक्तित्व को अर्थ समझने का नीचे प्रयास करते हैं:-

सामान्य दृष्टिकोण से व्यक्तित्व का अर्थ

सामान्य दृष्टिकोण से अगर किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व का अर्थ समझे तो उस व्यक्ति के प्रभाव और उसके गुणों का दूसरों के हृदय पर विजय पाने में सहायक होती है इसी कारण यह कहा जाता है कि व्यक्तित्व उत्तेजना एक मूल्य है जो एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के लिए रखता है इस प्रकार मनुष्य के व्यक्तित्व के पक्षों में उसकी शारीरिक पक्ष, बौद्धिक पक्ष, भावनात्मक पक्ष, सामाजिक पक्ष, तुलनात्मक पक्ष और उसके नैतिक विचार सभी सम्मिलित होते हैं।

समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से व्यक्तित्व का अर्थ

समाज के दृष्टिकोण से किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके समाज में किए जाने वाले विचार समाज के प्रति उसका क्या विचार है समाज भी उसका क्या कोई महत्वपूर्ण स्थान है, समाज में उसका क्या प्रभाव पड़ेगा इस पर निर्भर करता है। किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व वैसा होना चाहिए जो कि समाज में एक अच्छे विचार का प्रभाव पड़े।

क्योंकि हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के व्यक्तित्व से प्रभावित होता है इसीलिए सामाजिक दृष्टिकोण से किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व समाज के लिए अति महत्वपूर्ण है ताकि समाज में एक अच्छी और संस्कृतिक विचार का फैलाव हो। मनोवैज्ञानिक फारिस के अनुसार “व्यक्तित्व संस्कृति का वैयक्तिक पक्ष है”।

दार्शनिक दृष्टिकोण से व्यक्तित्व का अर्थ

दार्शनिक दृष्टिकोण से किसी व्यक्तित्व का अस्तित्व उसके आत्मज्ञान से होता है। व्यक्ति का व्यक्तित्व उसकी पूर्णता का प्रतीक होता है। व्यक्ति की पूर्णता उसके आदर्श होते हैं और जिससे उस व्यक्ति का आदर्श व्यक्तित्व प्रदर्शित होता है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से व्यक्तित्व का अर्थ

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके वातावरण और उसके वंशानुक्रम के आधार पर होता है।

मनोवैज्ञानिक मटन के अनुसार: व्यक्तित्व व्यक्ति के जन्मजात तथा अर्जित स्वभाव मूल प्रवृत्तियों भावनाएं तथा इच्छाओं आदि का समुदाय है” इससे साबित होता है कि किसी व्यक्तित्व का संबंध उस व्यक्ति के आसपास के माहौल उसका स्वभाव उसके ज्ञान अर्जित करने की कोशिश उसकी सोचने की शक्ति उसकी इच्छाएं उसकी कामनाएं और उसे जन्मजात जो स्वभाव मिला हो इन सभी के समुदाय का प्रभाव किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व होता है। ऐसा मान सकते हैं कि किसी व्यक्ति का व्यवहार का पूरा सार अगर समझना है, तो उसके व्यक्तित्व को समझाइए तो उस व्यक्ति को समझ जाइएगा।

मनोविश्लेषणात्मक दृष्टिकोण से व्यक्तित्व का अर्थ

मनोविश्लेषणात्मक दृष्टिकोण से व्यक्तित्व का अर्थ निकालने वाले जन्मदाता फ्रायड है जिन्होंने व्यक्तित्व को तीन भागों में बांटा है :- इदम्, अहम और परम अहम।

  • इदम्:- आपने चेतन मन की बारे में सुना ही होगा, चेतन मन में प्राकृतिक शक्तियांए स्थित होती है जो कि आपके अबोध या अज्ञान की अवस्था में मृत होती है। लेकिन जैसे ही इसे शीघ्र ही संतुष्टि मिलनी चाहिए ऐसा कहना है फ्राइड का इदम् के बारे में।
  • अहम:- अहम के बारे में मनोवैज्ञानिक फ्रायड कहते हैं। कि हम वह चेतन शक्ति होती है जिसमें आपके तर्क करने की शक्ति होती है आपकी बुद्धि की भी सकती सम्मिलित होती है इसका अर्थ है कि हमें आपका संबंध इदम् और अहम दोनों से हैं।
  • परम अहम:- मनोवैज्ञानिक फ्रायड परम अहम के बारे में कहा है कि व्यक्ति का अहम उसका आदर्श होता है। वह जिस नैतिकता के आधार पर अपने अहम की आलोचना करता है तथा उसे सही मार्ग दिखाता है। और उसे अच्छे और बुरे में फर्क करना भी बताता है।

मनोवैज्ञानिक युंग ने व्यक्तित्व को दो भागों में बांटा है:-

  1. व्यक्तिगत अज्ञात मन और
  2. सामूहिक अज्ञात मन

1.व्यक्तिगत अज्ञात मन:- मनोवैज्ञानिक युंग के अनुसार व्यक्तित्व अज्ञात मन व्यक्ति के उस मन की भाव होती है। जहां पर व्यक्ति अपने मन के नहीं कर पाती है। जहां पर व्यक्ति को हर इच्छाओं को दबाना पड़ता है। जैसे कि किसी व्यक्ति ने अपने मन में दबाए हुए हैं या फिर कोई दुख जो व्यक्ति के मन में संचित है साथ ही साथ उसके वह अनुभव, जो किसके लिए बहुत ही दर्दनाक है, जिसे धीरे-धीरे समय के साथ भुला भी देता है, लेकिन फिर भी उसके कुछ यादगार चिन्ह उसके मन में अभी भी बने हुए हैं, तो व्यक्ति के उस भाग को व्यक्ति के अज्ञात मन के रूप में युग ने व्यक्त किया है।

2. सामूहिक अज्ञात मन:- मनोवैज्ञानिकों के अनुसार सामूहिक अज्ञात मन में व्यक्ति के जातीय गुण समाविष्ट होते हैं। यह व्यक्ति के जातीय अर्थात उसके जो पूर्वज हैं उसके जो माता-पिता के गुणों से आए हैं या फिर भगवान के द्वारा हर व्यक्ति को जो एक विशेष गुण दिया जाता है। एक विशेषता दी जाती है उसे सम्मिलित किया गया है।

व्यक्तित्व की परिभाषाएं

विभिन्न शिक्ष- शास्त्रियों ने और मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्तित्व के संबंध में अनेक परिभाषाएं दिए हैं जो कि निम्नलिखित हैं:-

1.मार्नट प्रिंस (Morrain Prince) के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा

मार्नट प्रिंस के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा यह है कि “व्यक्तित्व समस्त शारीरिक और अर्जित वृत्तियों का योग होता है”।

“Personality is the sum total of all physical and acquired tendencies”.

2. वाट्सन (Watson) के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा

वाट्सन के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा यह है कि “हम जो कुछ भी करते हैं वही हमारा व्यक्तित्व होता है”।

“Whatever we do is our personality”.

3. बिग एवं हण्ट (Bigge and Hunt) के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा

बिग एवं हण्ट के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा यह है कि “व्यक्तित्व एक व्यक्ति का संपूर्ण व्यवहार प्रतिमान और उसकी विशेषताओं के योग का उल्लेख करता है”।

“Personality refers to the sum total of an individual’s overall behavioral pattern and his/her characteristics”.

4. परविन (Pervin 1971) के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा

परविन के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा में उन्होंने 1971 में दी थी, उन्होंने कहा था कि “व्यक्तित्व किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के उस रचनात्मक और गुणात्मक गुणों का प्रतिनिधित्व करता है, जो किसी विशेष परिस्थितियों के प्रति विशिष्ट प्रतिक्रियाएं द्वारा परिलक्षित होते हैं।”

“Personality represents that creative and qualitative qualities of a person or persons that are reflected by specific responses to particular situations”.

आइजनेक (HJ. Eysenek 1970) के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा

आइजनेक के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा उन्होंने 1970 में दी थी उन्होंने कहा कि “व्यक्ति की अभि प्रेरणात्मक व्यवस्थाओं का व्यक्तित्व सापेक्ष रूप से संगठन है जिसकी उत्पत्ति जैविक अन्तनोदो सामाजिक तथा भौतिक वातावरण की अंत क्रिया के फल स्वरुप होती है”।

“Personality is the relative organization of the motivational systems of the individual, which arise as a result of the interaction of biological interactions, social and physical environment”.

6. मे एवं हार्टशान (May and Hartshorn)  के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा

मे एवं हार्टशान के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा यह है कि “व्यक्तित्व किसी व्यक्ति का व्यास रूप वह स्वरूप है जो उसे प्रभावशाली बनाता है और दूसरों को भी प्रभावित करता है”।

“Personality is the form of a person that makes him influential and influences others too”.

7. एस. सी. वारेन (H.C. Warren) के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा

एस. सी. वारेन के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा यह है कि “व्यक्तित्व व्यक्ति के विकास की किसी व्यवस्था में होने वाला समग्र मानसिक संगठन है”।

“Personality is the overall mental organization of the individual in any system of development”.

8. गुथरी (Guthrie 1944) के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा

गुथरी के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा यह है कि “सामाजिक महत्व की उन आदतों तथा आदत संस्थानों के रूप में की जा सकती है, जो की स्थिति तथा परिवर्तन के अवरोध वाली होती है”।

“Those habits and habits of social importance can be characterized as institutions which are of condition and of resistance to change”.

9. आलपोर्ट (Alport) के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा

आलपोर्ट के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा यह है कि “व्यक्तित्व व्यक्ति की भीतर के उन मनोज गुणों का गत्यात्मक मनो दैहिक संगठन है जो परिवेश के प्रति होने वाले उनके अपूर्व अभी योजनाओं का निर्णय करते हैं”।

“Personality is the dynamic psycho-physical organization of those qualities within a person that decide their unique plans for the environment”.

10. डैशील (Daisheel) के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा

डैशील के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा यह है कि “व्यक्तित्व व्यक्ति की संपूर्ण प्रतिक्रियाओं एवं प्रतिक्रिया आत्मक प्रतिक्रिया त्मक संभावनाओं का संस्थान है जैसा कि उसके परिवेश में जो सामाजिक प्राणी है उसके द्वारा आंका जाता है यह व्यक्ति के व्यवहार का एक समायोजित संकलन है जो व्यक्ति अपने सामाजिक व्यवस्थापन के लिए करता है”।

“Personality is the body of the individual’s total reactions and reactions, subjective reflexive possibilities, as judged by the social beings in his environment, it is an adjusted collection of the behavior of the individual towards his social setting.”

11. मन एन. एल. (Mann N.L.) के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा

मन एन. एल. के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा यह है कि “एक व्यक्ति के गठन व्यवहार के तरीकों सूफियों दृष्टिकोण ओ क्षमताओं और तरीकों का सबसे विशिष्ट संगठन है”।

“Methods of Behavior Formation of a Person Sufi’s approach is the most distinctive organization of abilities and methods”.

12. रैक्स (Rex) के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा

रैक्स के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा यह है कि “व्यक्तित्व समाज द्वारा मान्य तथा अमान्य गुणों का संगठन है”।

“Personality is the organization of qualities recognized and rejected by society”.

13. वारेन (Warren) के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा

वारेन के अनुसार व्यक्तित्व की परिभाषा यह है कि “व्यक्तित्व किसी व्यक्ति का संपूर्ण मानसिक संगठन है जो उसके विकास की किसी भी अवस्था में होती है”।

“Personality is the whole mental organization of a person at any stage of his development”.

उपयुक्त सभी परिभाषाओं से हमें यह स्पष्ट होता है कि व्यक्तित्व किसी भी व्यक्ति को क्रियाशील बनाती है, उसके व्यवहार व्यवस्थित करने में उसे मदद करती है और किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके वंशानुक्रम और वातावरण के महत्व की ओर विशेष ध्यान आकर्षित करती है।

उपयुक्त परिभाषाओं से हमें यह ज्ञान प्राप्त होता है कि किसी भी व्यक्ति का व्यक्तित्व एक जटिल धारणा है जो कि मनुष्य को उसके आंतरिक और बाहरी गुणों का समावेश करती है। व्यक्ति के व्यवहार में जो कुछ भी परिवर्तन होता है या फिर जो भी उसके आदर्श व्यक्तित्व होते हैं। यह सभी उसके व्यक्तित्व का प्रतीक होता है।

अगर हम इन सभी परिभाषाओं को ध्यान से पढ़े तो हम इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे की व्यक्तित्व को परिभाषा करना कभी भी संभव नहीं है। परिभाषाबद्ध व्यक्तित्व गतिशील होती है वह हमेशा परिवर्तित होती रहती है।

किसी भी व्यक्ति का व्यक्तित्व वह नहीं जो उसे बाहर से दिखाई देता है। किसी भी व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके बाहरी और अंतर दोनों गुणों का सम्मिलित स्वरूप होता है।

“दूसरे शब्दों” में कहा जाए तो किसी भी व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके शारीरिक संख्यात्मक दोनों गुणों का सम्मिलित स्वरूप है परंतु इसमें अधिकांश और विशेष गुण प्रभावोत्पादक संज्ञानात्मक गुण, स्थाई भाव, अभिवृतिया, मानसिक ग्रंथियां तथा अचेतन मनोरचनाएं रचनाएं रुचियां विचार सभी सम्मिलित होती है।

व्यक्तित्व के पहलू

विभिन्न मनोवैज्ञानिक और शिक्षा- शास्त्री ने व्यक्तित्व के पहलू पर अपने विचार व्यक्त किए हैं, मनोवैज्ञानिक गैरिसन तथा अन्य के विचार नीचे जानेंगे:-

  1. क्रियात्मक पहलू (Action aspect):- मनोवैज्ञानिक गैरिसन के अनुसार क्रियात्मक पहलू किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व के उस पहलू से संबंध रखता है जिसमें व्यक्ति की क्रियाएं सम्मिलित होती है। इन क्रियाओं में व्यक्ति की भावुकता शांति मानसिक श्रेष्ठ का लोकप्रियता आदि को सम्मिलित किया जाता है।
  2. सामाजिक पहलू (Social aspect):- मनोवैज्ञानिक गैरिसन के अनुसार किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व का सामाजिक पहलू वह पहलू होता है जिसमें व्यक्ति समाज में क्या कार्य करता है समाज में दूसरों पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है इन सभी महत्वपूर्ण बातों को सम्मिलित किया जाता है सामाजिक पहलू किसी भी व्यक्ति के लिए अति आवश्यक है क्योंकि हर व्यक्ति का समाज में अपना अलग-अलग प्रभाव पड़ता है और वह दूसरों व्यक्ति को भी उसके व्यक्तित्व बनाने में प्रभाव को डालता है।
  3. कारण संबंधी पहलू (Cause aspect):- मनोवैज्ञानिक गैरिसन के अनुसार कारण संबंधी पहलू किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व में उस पहलू का संबंध होता है जो कि व्यक्ति के सामाजिक या सामाजिक कार्यों के कारण और उसके कार्यों के प्रति लोगों की क्या प्रतिक्रिया होती है इन सभी बातों को सम्मिलित किया जाता है यदि किसी व्यक्ति का कार्य उसके समाज में अच्छा होता है जो लोग उन्हें पसंद करते हैं या फिर लोग उन्हें पसंद नहीं करते हैं इन सभी का संबंध कारण संबंधी पहलू में रखा गया है।
  4. अन्य पहलू (Other aspect):- अन्य पहलू के संबंध में मनोवैज्ञानिक गैरिसन कहते हैं कि व्यक्तित्व के अन्य पहलुओं वह पहलू होते हैं जो दूसरों पर हमारा प्रभाव हमारे जीवन में होने वाली बातें और घटनाओं का हम पर क्या प्रभाव पड़ता है हमारे क्या गंभीर विचार होते हैं क्या भावनाएं होती है हमारी क्या रूचि होती है हमारी क्या इच्छाएं होती है हम अपने जीवन में क्या करना चाहते हैं और हमारी किए गए कार्यों का दूसरों पर क्या प्रभाव पड़ता है इन सभी विशेष बातों को अन्य पहलू में सम्मिलित किया गया है।

इन सभी पहलुओं को देखकर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि मनोवैज्ञानिक गैरिसन तथा अन्य ने लिखा है कि यह सभी पहलू अत्यधिक महत्वपूर्ण है। किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व में इनमें से कोई एक या सम्मिलित सभी पहलू किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का पूर्ण वर्णन नहीं कर पाते हैं। व्यक्तित्व इन सब का और इन सबसे अधिक का योग होता है। क्योंकि किसी भी व्यक्ति का व्यक्तित्व उसका संपूर्ण व्यक्ति होता है।

यह सभी पहलुओं व्यक्ति के सिर्फ विभिन्न गुणों और पक्षों पर प्रकाश डाल रहा है यह पक्ष व्यक्ति के संगठनात्मक स्वरूप पर प्रकाश डालते हैं।

इसलिए दूसरे मनोवैज्ञानिक बीसेन्ज एंव बीसेन्ज के शब्दों में “व्यक्तित्व मनुष्य की आदतों दृष्टिकोण तथा विशेषताओं का संगठन होता है यह जीव शास्त्रीय सामाजिक तथा सांस्कृतिक कार्य के संयुक्त कार्यों द्वारा उत्पन्न होता है”।

“Personality is the organization of man’s habits, attitudes and characteristics that arise from the combined action of biological, classical social and cultural work”.

व्यक्तित्व के विकास को प्रभावित करने वाले कारक

मनोवैज्ञानिक रैक्स एंड नाइट के अनुसार मनोविज्ञान का संबंध व्यक्तित्व के विकास को प्रभावित करने वाले कारकों से भी है इनमें से कुछ कारक शारीरिक रचना संबंधी और कुछ जन्मजात और दूसरा पर्यावरण से संबंधित है।

इस प्रकार व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाले कारक कुछ इस प्रकार हैं:-

  • वंशानुक्रम जैविक कारक
  • शारीरिक रचना
  • मानसिक योग्यता
  • दैहिक प्रप्रवृत्तियों
  • भौतिक वातावरण
  • सामाजिक वातावरण
  • सांस्कृतिक वातावरण
  • विशिष्ट रूचियां
  • परिवार
  • विघालय
  • अन्य कारकों का प्रभाव व्यक्तिव के विकास पर पूरा पड़ता है।

व्यक्तित्व के प्रकार

विभिन्न विभिन्न मनोवैज्ञानिक और विभिन्न विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने अपने विचार के अनुसार व्यक्तित्व को अलग-अलग प्रकार में बांटा है जो कि निम्न प्रकार से है:-

  1. केश्मर (Kreschmer) के अनुसार व्यक्तित्व को चार प्रकार में बैठे हैं जिसे केसर का व्यक्तित्व वर्गीकरण कहा जाता है।
  2. शेल्डन के अनुसार व्यक्तित्व को तीन प्रकार में बांटा है जिसे शेल्डन का व्यक्तित्व वर्गीकरण कहा जाता है।
  3. विलियम जेम्स के व्यक्तित्व को दो प्रकार में बांटा हैजिसे विलियम जेम्स का व्यक्तित्व वर्गीकरण कहा जाता है।
  4. न्यूमैन तथा स्टर्न ने व्यक्तित्व को दो भागों में बांटा है जिसे न्यूमैन तथा स्टंट का व्यक्तित्व वर्गीकरण कहा जाता है।
  5. शैल्डन ने शारीरिक गुणों के आधार पर व्यक्तित्व को तीन भागों में बांटा है जिससे सदन का व्यक्तित्व वर्गीकरण कहा जाता है।
  6. मनोविश्लेषण वादी युंग ने व्यक्तित्व को दो भागों में बांटा है जिससे युग का व्यक्तित्व वर्गीकरण कहा जाता है इन सभी वर्गीकरण को आप व्यक्तित्व के वर्गीकरण में पढ़ सकते हैं।

व्यक्तित्व निर्धारण

किसी भी व्यक्ति का व्यक्तित्व (Personality) निर्धारण उसके अंत: और बाहरी दोनों चरणों का समायोजन होता है उसके जन्मजात तथा अर्जित शिक्षाओं उसकी आदतें उसके विचार उसके भाव उसके आदर्श उसके जीवन के मूल्य इन सभी मुख्य बातों को मिलाकर किसी व्यक्ति का एक विशेष स्थाई भाव या आदर्श स्वभाव का जन्म होता है जो कि किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व का आधार होता है।

किसी भी व्यक्ति के विकास के लिए उसका व्यक्तित्व सबसे महत्वपूर्ण योगदान देता है और इसे निर्धारित करना एक समस्या की तरह होती है प्रत्येक देश की संस्कृति अलग अलग होती है उसके साधन भी अलग-अलग होते हैं और उसके व्यक्तित्व मापन की रूचि भी अलग-अलग होती है आजकल कपाल विद्या मुख के लक्षण आकार के आधार पर और हस्तरेखा आदि साधनों के द्वारा मानव के व्यक्तित्व को मापा जा रहा है।

आधुनिक समय में किसी व्यक्ति का संपूर्ण व्यक्तित्व का मूल्यांकन करना आवश्यक मान्य नहीं होगा बल्कि किसी प्रयोजन हेतु व्यक्ति का मापन आवश्यक समझा जाएगा उदाहरण के तौर पर समझे तो किसी कार्यालय में कर्मचारी वर्ग के मनोवैज्ञानिक ऐसे व्यक्तित्व (Personality) के गुण को अच्छे विक्रेता बनने में सहायक करते हैं फल स्वरुप व्यक्तित्व (Personality) निर्धारण की विभिन्न गतिविधियां अलग-अलग नियोजन में प्रयोग की जाती है।

समायोजन

हम सभी जानते हैं कि एक व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी होता है। वह अपने अंत समय तक किसी समाज में ही रहना चाहता है और वह सबसे अधिक खुश उस समय दिखाई देता है जब वह स्वयं के मन के अनुसार कार्य करें या अपने रूचि के अनुसार काम करें या फिर उसे अपने मन के अनुसार इच्छाओं की पूर्ति हो इन सभी समूह को वह प्राप्त कर ले तो वह व्यक्ति सबसे ज्यादा खुश होता है इस व्यवहारिक गतिशीलता का नाम ही समायोजन होता है जब व्यक्ति पसन्न नहीं दिखाई देता है तो वह उसके व्यवहार का कुसमायोजन होता है।

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इनका नाम राहुल सिंह तंवर है, इन्होंने स्नातक (रसायन, भौतिक, गणित) की पढ़ाई की है और आगे की भी जारी है। इनकी रूचि नई चीजों के बारे में लिखना और उन्हें आप तक पहुँचाने में अधिक है। इनको 3 वर्ष से भी अधिक SEO का अनुभव होने के साथ ही 3.5 वर्ष का कंटेंट राइटिंग का अनुभव है। इनके द्वारा लिखा गया कंटेंट आपको कैसा लगा, कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। आप इनसे नीचे दिए सोशल मीडिया हैंडल पर जुड़ सकते हैं।

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