मोहम्मद गौरी का इतिहास और जीवन परिचय

Muhammad Ghori History in Hindi: यूं तो भारत पर कई मुस्लिम आक्रमणकारियों ने आक्रमण किया, जिन सभी में से मोहम्मद गौरी को सबसे ज्यादा बहादुर और तेज योद्धा माना जाता है। भारत पर सबसे पहले मोहम्मद बिन कासिम ने आक्रमण किया था, उसके बाद फिर मोहम्मद गजनबी आया। ये दोनों ही भारत के मंदिरों को तोड़कर कीमती गहनों को लूट कर वापस चले गए।

लेकिन मोहम्मद गौरी का उद्देश्य भारत में ना केवल लूटपाट करना था बल्कि वह भारत में मुस्लिम राज्य स्थापित करना चाहता था। इतिहास में भारत में तुर्क साम्राज्य की स्थापना का श्रेय मोहम्मद गौरी को ही जाता है। यह एक बहुत निर्भीक और साहसी अफगान योद्धा था, जिसने भारत में इस्लामिक साम्राज्य को फैलाने के लिए पहले सिंध फिर पंजाब के कई क्षेत्रों पर जीत हासिल की, उसके बाद वह मध्य भारत की ओर आगे बढ़ा।

Muhammad Ghori History in Hindi
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लेकिन यहां पर शासन कर रहे महान पृथ्वीराज चौहान की वीरता और इनके विशाल सेनाओं के सामने मोहम्मद गौरी को घुटने टेकने पड़े। इतिहास में पृथ्वीराज चौहान और गौरी के बीच हुए युद्ध तराइन का प्रथम युद्ध और तराइन का द्वितीय युद्ध काफी चर्चित रहा है।

हालांकि आपने इस युद्ध के बारे में तो जरूर सुना होगा। लेकिन आज के इस लेख में हम मोहम्मद गौरी के जीवन परिचय (Muhammad Ghori Biography in Hindi) के बारे में जानने वाले हैं।

मोहम्मद गौरी का इतिहास और जीवन परिचय | Muhammad Ghori History in Hindi

मोहम्मद गौरी का जन्म

इतिहासकार के अनुसार मोहम्मद गौरी का जन्म 1149 ईस्वी में अफगानिस्तान के घौर प्रांत में हुआ था। बचपन में यह शिहब अद-दिन के नाम से जाना जाता था। मोहम्मद गौरी अफगान का रहने वाला था, जिसने अपने राज्य में कई तुर्क सेवादार रखे हुए थे। इसने अपनी सेनाओं को बहुत अच्छी तरीके से प्रशिक्षित किया था।

इसकी कई सेना इसके लिए प्राणों की आहुति देने को तैयार थी। इसे अपने तुर्क सेना पर बहुत भरोसा था और अपनी सेनाओं के बलबूते इसने कई क्षेत्रों में शासन स्थापित किया। अफगानिस्तान के आसपास के राज्यों को जीतने के बाद इसने गजनी को अपनी राजधानी बनाई।

गौरी वंश की स्थापना

12वीं शताब्दी के आसपास गौरी वंश का उदय हुआ। मोहम्मद गौरी के चाचा जिनका नाम अला-उद-दीन जहांसोज था,इसने गौरी राजवंश की स्थापना की थी। इसकी मौत के बाद इसका पुत्र सैफ-उद-दीन गौरी राज गद्दी पर बैठा। हालांकि इसके पिता की मृत्यु से पहले उसके पिता ने अपने दो भतीजे साहब उद्दीन और गियासुद्दीन को बंदी बनाकर रखा था, जिसे सैफ-उद-दीन गौरी ने राज गद्दी पर बैठते ही कैद से बाहर कर दिया।

इस दौरान गौरी वंश गजनबी और संलजूको की अधीनता से निकलने की कोशिश कर रहा था कि तभी 1148 में सलजूको ने गजना व्यू को समाप्त कर दिया और कुछ साल के बाद गौर प्रांत पर भी सीधा कब्जा कर लिया। सलजूको ने सैफ-उद-दीन की पत्‍नी के गहने भी लूट लिये थे।

जब सैफ-उद-दीन ने किसी स्थानीय सरदार को अपनी पत्नी के गहने पहने देखा तो उसने उस सरदार को मार डाला, जिसके बाद सरदार के भाई ने कुछ महीने के बाद सैफ-उद-दीन की भी हत्या कर दी। जब इसकी मृत्यु हो गई तब गियासुद्दीन को शासक बनाया गया। मोहम्मद गौरी ने गियासुद्दीन को अपने राज्य के विस्तार करने में बहुत मदद की। इसके बाद 1173 में मोहम्मद गौरी को गौरी साम्राज्य का सुल्तान बना दिया गया।

मोहम्मद गौरी द्धारा भारत पर आक्रमण

मोहम्मद गौरी भारत पर आक्रमण करने वाला तीसरा मुस्लिम शासक था। इससे पहले मोहम्मद बिन कासिम और मोहम्मद गजनबी ने भारत पर आक्रमण किया था। हालांकि इन दोनों मुस्लिम शासकों ने भारत पर आक्रमण, भारत से सभी कीमती चीजों और मंदिरों से गहनों को लूटपाट करके वापस ले जाने के उद्देश्य से किया था।

परंतु मोहम्मद गौरी का उद्देश्य इन दोनों से काफी अलग था। वह न केवल भारत पर आक्रमण लूटपाट करने के उद्देश्य से किया था बल्कि वह यहां पर मुस्लिम राज्य की स्थापना भी करना चाहता था। इसी ने भारत में तुर्क साम्राज्य की स्थापना की थी।

1175 को मोहम्मद गौरी ने गोमल दर्रा के माध्यम से भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवेश किया। गौरी सबसे पहले सिंध और गुजरात पर हमला करके मध्य भारत को जीतना चाहता था। इसीलिए इसने गजनविद सुल्तान को घेर कर अपना जागीरदार बना लिया, उसके बाद इसने मुल्तान पर आक्रमण कर वहां के स्थानीय शासक पर कब्जा कर लिया।

इस समय यहां पर सियामत को मानने वाले करामत शासन कर रहे थे। गौरी ने मुल्तान पर विजय हासिल की। इसके बाद गौरी का अगला निशाना उच शहर था। चूंकि उस समय उच शहर की रानी ने अपने पति को मार डाला था और गौरी को उस शहर के बदले में अपनी बेटी से शादी करने का प्रस्ताव दिया, जिस कारण गौरी ने बहुत आसानी से उच शहर को जीत लिया।

इसके बाद पूरे भारत में इस्लामिक राज्य की स्थापना करने के उद्देश्य से मोहम्मद गौरी ने 1178 इसवी में गुजरात पर आक्रमण कर दिया। इस समय गुजरात के शासक मूलराज द्वितीय थे, जिनकी बड़ी सेना माउंट आबू के पास युद्ध के मैदान में मोहम्मद गौरी को पराजित किया और उसे खदेड़ कर वापस भेज दिया। यह मोहम्मद गौरी की पहली हार थी।

मोहम्मद गौरी का भारत पर दूसरी बार आक्रमण

मोहम्मद गौरी ने मूलराज द्वितीय से माउंट आबू के युद्ध में पराजित होकर सबक ली और फिर उसने भारत में अपने विजय अभियान के मार्ग में परिवर्तन कर अब पहले पंजाब को जीतने की योजना बनाई। इस उद्देश्य से इसने 1179 में खैबर दर्रे से पेशावर पर कब्जा किया।

पंजाब पर कब्जा करने के बाद 1181 में लाहौर पर कब्जा करने के लिए आक्रमण किया। उस समय यहां के शासक खुसरो मलिक थे, जो अपनी राजधानी की रक्षा के लिए बड़े साहस के साथ लड़े। लेकिन गौरी के साथ संधि करने के लिए अंत में मजबूर हो गए।

1182 में मोहम्मद गौरी ने सिंध पर आक्रमण किया और फिर सिंध की राजधानी देबला पर हमला किया। उस समय सिंध के शासक ने शांति के लिए मुकदमा दायर किया और फिर बातचीत करके मोहम्मद गौरी का जागीरदार बनना स्वीकार कर लिया।

उसके बाद गौरी ने सियालकोट शहर को जीत लिया और बाद में गौरी अफगानिस्तान लौट गया। गौरी के अफगानिस्तान लौटते ही खुसरो मलिक ने दोबारा सियालकोट को खोखर जनजाति के साथ मिलकर जीतने का प्रयास किया। इस बात का पता चलते ही मोहम्मद गौरी फिर से खैबर दर्रे से होकर सियालकोट की अपनी चौकी की रक्षा के लिए अफगानिस्तान से लौटा।

खुसरो मलिक ने सियालकोट की घेराबंदी कर दी और फिर वापस लाहौर लौटे गया, जहां पर गौरी ने शीघ्र ही घेराबंदी कर दी। इसके बाद खुसरो मालिक और उसके वफादार सेना ने बहुत बहादुरी से लाहौर की रक्षा के लिए लड़े। इस घेराबंदी को खत्म करने के लिए मोहम्मद गौरी ने चाल चला।

इसने खुसरो मालिक से खुलकर बातचीत करने का नाटक किया। उसके बाद खुसरो मलिक जैसे ही किले से बाहर आए मोहम्मद गौरी ने तुरंत उसे पकड़कर बंदी बना लिया। लेकिन जल्द ही खुसरो मलिक के नेतृत्वहिन सेना ने अपने किले को आत्मसमर्पण कर दिया।

इस तरीके से मोहम्मद गौरी ने सबसे पहले पेसवार फिर सियालकोट, लाहौर और भटिंडा में जीत हासिल की। इस तरह इसने पंजाब के ज्यादातर क्षेत्रों पर अपना शासन जमा लिया। इसके बाद यह उत्तर भारत की ओर मुड़ा।

मोहम्मद गौरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच पहला युद्ध

मोहम्मद गौरी ने सिंध और पंजाब को जीतने के बाद उत्तर भारत की ओर अपना शासन फैलाना चाहा। उस समय उत्तर भारत में दिल्ली और अजमेर के इलाकों में पृथ्वीराज चौहान का शासन था। मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण करने का निश्चय किया। लेकिन उसे पता नहीं था कि पृथ्वीराज चौहान की विशाल सेनाओं के सामने उसका टिकना मुश्किल है।

उसने बिना सोचे समझे पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध किया और युद्ध थानेश्वर के पास स्थित तराइन के मैदान में हुआ, जिसे तराइन का प्रथम युद्ध के नाम से जाना गया। युद्ध 1191 में हुआ था। इस युद्ध में मोहम्मद गौरी की बुरी तरीके से हार हुई। मोहम्मद गौरी को पराजित करने के बाद पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को बंदी बना लिया लेकिन कुछ समय के बाद इसे छोड़ दिया।

मोहम्मद गौरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच द्वितीय युद्ध

तराइन के प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को हरा दिया। उसके बाद मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान पर दोबारा अपनी विशाल सैन्य शक्ति के साथ आक्रमण करने की योजना बनाई। मोहम्मद गौरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच दोबारा युद्ध तराइन में ही हुआ, जिसे तराइन का द्वितीय युद्ध कहा गया। इस युद्ध में जयचंद ने मोहम्मद गौरी की मदद की।

जय चंद संयोगिता के पिता थे और संयोगिता पृथ्वीराज चौहान की पत्नी थी। जयचंद द्वारा अपनी पुत्री संयोगिता के लिए आयोजित स्वयंवर में पृथ्वीराज चौहान ने सभी के सामने संयोगिता को अपहरण कर अपने राज्य ले गए, जिसके कारण जयचंद को पृथ्वीराज चौहान से दुश्मनी हो गई। पृथ्वीराज चौहान और जयचंद की दुश्मनी का पता जब मोहम्मद गौरी को चला तो उसने इसका फायदा उठाया और जयचंद की मदद ली।

इस तरह जयचंद की मदद से मोहम्मद गौरी ने 1192 में दोबारा पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण किया। इस बार मोहम्मद गौरी बहुत योजना बनाकर विशाल सेनाओं के साथ आया था, जिसके सामने महान शासक पृथ्वीराज चौहान कमजोर पड़ गए और युद्ध में हार गए। पृथ्वीराज चौहान को पराजित कर मोहम्मद गौरी ने चौहान साम्राज्य का नाश कर दिल्ली और अजमेर पर खुद का साथ साम्राज्य स्थापित किया।

मोहम्मद गौरी से संबंधित रोचक तथ्य

  • मोहम्मद गौरी ने भारत पर सबसे पहले 1175 में मुल्ताना के विरुद्ध आक्रमण किया था, उसके बाद 1178 में गुजरात के पाटन पर आक्रमण किया था।
  • मोहम्मद गौरी द्वारा लड़े गए युद्ध में तराइन का प्रथम युद्ध, तराइन का द्वितीय युद्ध और चंदवार का युद्ध प्रमुख है।
  • मोहम्मद गौरी का गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक था, जिसने गुलाम वंश की स्थापना की और दिल्ली पर इस्लाम साम्राज्य का केंद्र बनाया।
  • इतिहासकार का मानना है कि मोहम्मद गौरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच 18 बार युद्ध हुआ था। मोहम्मद गौरी 17 बार पृथ्वीराज चौहान से हार गया थे। लेकिन अठरवीं बार इसने संयोगिता के पिता जयचंद के मदद से पृथ्वीराज चौहान को हरा दिया था।

मोहम्मद गौरी की मृत्यु

मोहम्मद गौरी की मृत्यु पर इतिहासकारों में मतभेद देखने को मिलते है। पृथ्वीराज रासो के रचयिता महान कवि चंदबरदाई जो पृथ्वीराज चौहान के राज्य कवि के साथ-साथ एक अच्छे मित्र थे।

उनके द्वारा लिखें पृथ्वीराज चौहान की जीवनी चंदबरदाई में उन्होंने मोहम्मद गौरी की मृत्यु का जिक्र करते हुए बताया है कि जब पृथ्वीराज चौहान को तराइन के द्वितीय युद्ध में मोहम्मद गौरी ने पराजित कर दिया तो उन्हें बंदी बनाकर वह अपने साथ गजनी ले गया।

यहां पर मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को बहुत तड़पाया। अंत में एक चाल चलकर पृथ्वीराज चौहान ने दरबार में आयोजित तीरंदाजी प्रतियोगिता में शब्दभेदी बाण की अद्भुत कला से मोहम्मद गौरी की हत्या कर दी। इस तरीके से मोहम्मद गौरी की मृत्यु हो गई।

वहीँ कुछ इतिहासकार मानते हैं कि तराइन के द्वितीय युद्ध में जब मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को हराया तब उन्होंने अपनी अधीनता स्वीकार कर ली, जिसके बाद मोहम्मद गौरी ने अपने अधीन रखकर पृथ्वीराज चौहान से अजमेर पे शासन करवाया। फिर बाद में उसी ने पृथ्वीराज चौहान को मरवा दिया और उसके कब्र को अफगानिस्तान में गढ़वा दिया।

उसके बाद 1193 में मोहम्मद गौरी ने कन्नौज राज्य पर आक्रमण किया और जयचंद जो संयोगिता के पिता थे, जिसने तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को हराने में मोहम्मद गौरी की मदद की थी। उसके साथ युद्ध हुआ। इस युद्ध को चंदवार का युद्ध कहा गया। इस युद्ध में मोहम्मद गौरी ने जयचंद को पराजित कर दिया, उसके बाद वह दिल्ली पर अपने गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक कै शासन का अधिकार देकर गजनी लौट आया।

उसके बाद 1203 में मोहम्मद गौरी के बड़े भाई की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उसने उनके राज्य का स्वतंत्र शासक ग्रहण किया। 1205 में मोहम्मद गौरी को ख्लारीज शाह ने खुली लड़ाई में हरा दिया। उसके तुरंत ही बात सुना गया कि नमक रेंज के खोखर जनजाति ने मोहम्मद गौरी के खिलाफ विद्रोह कर दिया है।

उनके विद्रोह को कुचलने के लिए मोहम्मद गौरी ने कुतुबुद्दीन ऐबक का समर्थन लेकर सेना का नेतृत्व किया। वहां पर उसने उन जनजातियों की विद्रोह को कुचला उसके बाद वह 1206 में फिर गजनी के लिए रवाना हुआ। यात्रा के दौरान वह सिंधु नदी के तट पर तंबू खड़ा किया था।

माना जाता है कुछ साहसी खोखर जनजाति के लोग सिंधु नदी को तैर कर आएं और तंबू में ही मोहम्मद गौरी की हत्या कर दी। इस प्रकार मोहम्मद गौरी का अंत हो गया।

FAQ

मोहम्मद गौरी ने भारत पर कब आक्रमण किया था?

मोहम्मद गौरी ने भारत पर सर्वप्रथम आक्रमण 1175 में मुल्तान के विरुद्ध किया था। यह भारत पर आक्रमण करने वाला तीसरा मुस्लिम शासक था।

मोहम्मद गौरी का असली नाम क्या था?

मोहम्मद गौरी का असली नाम शहाबुद्दीन उफ मोइनुद्दीन मोहम्मद गौरी था।

मोहम्मद गौरी ने दूसरा आक्रमण कब किया था?

मोहम्मद गौरी ने भारत पर दूसरा आक्रमण 1178 में गुजरात के पाटन पर किया था, जिसमें यहां के शासक भीम द्वितीय ने मोहम्मद गौरी को बुरी तरीके से पराजित कर दिया था।

मोहम्मद गौरी की मृत्यु कब हुई?

मोहम्मद गौरी की मृत्यु 15 मार्च 1206 ईस्वी में हुई थी।

मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज पर कितनी बार आक्रमण किया था?

इतिहासकार का मानना है कि मोहम्मद गौरी ने 18 बार पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण किया था, जिनमें से 17 बार पृथ्वीराज चौहान ने उसे माफ कर कर वापस भेज दिया।

मोहम्मद गौरी का कौन सा युद्ध प्रसिद्ध है?

मोहम्मद गौरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच 1191 और 1192 में तराइन का प्रथम युद्ध और तराइन का द्वितीय युद्ध हुआ था जो इतिहास में प्रसिद्ध है, जिसमें प्रथम तराइन के युद्ध में पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को हराया था। जबकि द्वितीय तराइन युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु हो गई थी।

चंदवार का युद्ध किसके बीच में हुआ था?

चंदावर का युद्ध 1194 में मोहम्मद गौरी और जयसिंह के बीच हुआ था। जयचंद पृथ्वीराज चौहान की पत्नी संयोगिता के पिता थे।

निष्कर्ष

आज के लेख में हमने आपको मोहम्मद गौरी के इतिहास (Muhammad Ghori History in Hindi) और उसके जीवन के बारे में बताया। हमें उम्मीद है कि इस लेख से आपको बहुत कुछ जानने को मिला होगा। लेख से संबंधित कोई भी प्रश्न हो तो आप कमेंट में लिख कर जरूर पूछें। लेख को अपने सोशल मीडिया अकाउंट व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम के जरिए अन्य लोगों में जरूर शेयर करें।

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