योग: कर्मसु कौशलम् का अर्थ क्या है?

भागवत गीता में कुल 18 अध्याय है, जिनमें कुल 700 श्लोक है। उन्हीं 700 श्लोक में से एक “योगः कर्मसु कौशलम” है। इसी श्लोक के माध्यम से गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को उनके कर्म के प्रति ध्यान आकर्षित करते हैं। क्योंकि कौरवो की सेना में अपने सगे, संबंधी, गुरु और परिचित जनों को देख अर्जुन अपने पथ से विचलित हो जाते हैं और उन्हें अपने कर्म का ज्ञान नहीं रहता है, वह अपनों की मोह माया में आकर कर्म से भागना चाहते हैं।

उन्हें लगता है कि अपनों की हत्या करके विजय प्राप्त करने से वह कभी खुश नहीं हो पाएंगे और ना ही इस युद्ध का परिणाम अच्छा आएगा। लेकिन भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि तुम कर्म करो, फल की चिंता मत करो। क्योंकि परिणाम कभी अनुकूल होगा तो कभी प्रतिकूल होगा, इसीलिए इसे ईश्वर को समर्पित कर दो।

Yogah Karmasu Kaushalam Meaning in Hindi

ईश्वर अपनी इच्छा के अनुसार ही परिणाम को तय करेगा। वे अर्जुन को कहते हैं कि कर्म पर तुम्हारा अधिकार है लेकिन फल पर तुम्हारा अधिकार नहीं है, इसीलिए फल की चिंता करना व्यर्थ है बस तुम अपने कर्म पर ध्यान दो, कर्म का आनंद लो।

इस प्रकार भागवत गीता में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को योगः कर्मसु कौशलम का अर्थ समझाया है। आइए लेख में आगे बढ़ते हैं और इस श्लोक का विस्तार से अर्थ जानते हैं।

योग: कर्मसु कौशलम् का अर्थ क्या है?

योग: कर्मसु कौशलम् इस शब्द का सामान्य अर्थ होता है योग से ही कर्मों में कुशलता है। भागवत गीता में भगवान श्री कृष्ण द्वारा कहे उपदेश को यदि व्यक्ति अपने जीवन में पालन करें तो वह अपने कर्म में कुशलता पा सकता है। इस श्लोक का उद्देश्य मानव को उनके काम के प्रति समर्पित भावना उत्पन्न करना है। कोई व्यक्ति किसी काम को कर रहा है तो उसे ऐसी मानसिक स्थिति में काम को करना चाहिए, जिससे काम अच्छे तरीके से हो और उसे फल की चिंता में पड कर खुद को व्यग्र नहीं करना चाहिए।

क्योंकि यदि व्यक्ति काम करने के दौरान काम के फल के बारे में सोचेगा तो निश्चित ही उसका फल कभी भी अच्छा नहीं आएगा। लेकिन यदि व्यक्ति अपना पूरा ध्यान अपने कर्मों में लगा है और उस कर्म को अच्छे तरीके से करें तो उसका निश्चित ही फल अच्छा होता है।

इस पर स्वामी विवेकानंद जी के गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस जी ने भी एक बहुत सुंदर बात कही है कि एक स्त्री ना केवल खाना बनाती है बल्कि वह अपने ध्यान को भी विकसित करती है। क्योंकि जब कोई खाना बनाता है तो उसे पूर्ण रूप से खाने पर ध्यान देना होता है। वरना 1 दिन नमक ज्यादा पड़ जाता है तो किसी दिन नमक कम पड़ जाता है। इसीलिए जब वह सावधानी और पूर्ण ध्यान से खाना बनाता है तभी खाना स्वादिष्ट बनता है। इससे स्पष्ट है कि इनका कहने का अर्थ यही है कि यदि व्यक्ति अपना पूर्ण ध्यान अपने कर्म पर रखें तो उसका फल अच्छा ही आने वाला है।

 मनुष्य के जीवन में तो कर्म सर्वोपरि है। बिना कर्म के मानव जन्म का कोई अर्थ ही नहीं है। कर्म ना करने से उसके जीवन में कष्ट और क्लेश उत्पन्न हो जाता है। बात करें कर्म के प्रकार की तो कर्म के दो प्रकार हैं स्वाभाविक कर्म और इच्छा से किया जाने वाला कर्म। इच्छा से जो कर्म होता है, व्यक्ति उस कर्म में पूर्ण ध्यान लगाता है, जिससे उसे उसमें अच्छा फल भी प्राप्त होता है।

लेकिन मनुष्य का स्वभाव ऐसा है कि कर्म करने से पहले वह फल की चिंता करने लगता है, जिसके कारण वह कुशलता से कर्म नहीं कर पाता। हालांकि इच्छा से वही कर्म किए जाते हैं, जिसमें मानव का स्वार्थ जुड़ा हो। कर्म में भले ही स्वार्थ सिद्ध हो या ना हो लेकिन कर्म को इच्छा या अनिच्छा से ऊपर उठकर ही करना चाहिए। ऐसे कर्म करने से व्यक्ति को सुख और प्रसन्नता मिलती है। यही नहीं व्यक्ति ऐसे कर्म से प्रतिष्ठा भी पाता है।

उदाहरण के लिए जब कोई व्यक्ति अन्य लोगों की मदद करता है तो वह इस उद्देश्य से मदद नहीं करता कि लोग उसकी जय जयकार करेंगे, वह बिना स्वार्थ के अपने कर्म को करता है, इसीलिए उसका फल सकारात्मक मिलता है

इस तरह की कोई भी व्यक्ति किसी काम को बिना छोटा बड़ा समझे सही तरीके से करें तो उसके अंदर मेहनत, लगन का भाव उत्पन्न होता है,अच्छे गुण विकसित होते हैं और वह सतत उस कार्य को करने के लिए प्रेरित रहता है और ऐसे व्यक्ति से अन्य लोग भी प्रेरणा पाते हैं। गीता में लिखा गया है कि स्वार्थ से किया गया काम मनुष्य को माया से बांध देता है। लेकिन मनुष्य को किसी भी कर्म को ईश्वर का आदेश समझकर मन लगाकर करना चाहिए।

हालांकि कर्म के फल के बारे में पहले से ही नहीं जाना जा सकता। क्योंकि कर्म तो मनुष्य के हाथ में है लेकिन उसके फल की प्राप्ति के बारे में कोई भी नहीं कह सकता। क्योंकि भविष्य की घटना का सही अनुमान तो कोई नहीं लगा सकता। लेकिन कुशलता से किए गए कर्म  का कोई नुकसान नहीं होता।

यहां तक कि यदि किसी भी कर्म का एक बार फल नहीं प्राप्त होता है तब भी व्यक्ति उस कर्म से ज्ञान और अनुभव को हासिल करता है, जिससे लह व्यक्ति अगली बार उस कर्म को और भी ज्यादा बेहतर से करता है और इस तरीके से अगली बार उसे सफलता निश्चित ही मिल जाती है।

हालांकि हम मनुष्य बहुत आलसी होते हैं और हम काम करना नहीं चाहते हैं। लेकिन व्यक्ति यदि काम में मन लगाए तो वह अपने तनाव को भूल जाता है। क्योंकि खाली बैठा व्यक्ति बस भविष्य की कल्पनाएं करते रहता है और बीते समय की घटनाओं को याद कर दुखी होते रहता है।

हालांकि मन तो बहुत चंचल होता है, इसीलिए मन को भविष्य के बारे में सोचने या भूतकाल की घटनाओं को याद करने से रोका तो नहीं जा सकता। लेकिन यदि मन को किसी कार्य में व्यस्त कर दे तो वह भूतकाल और भविष्य के बारे में सोचना बंद कर देता है और वर्तमान को जीता है और इसी स्थिति को योग कहते हैं।

निष्कर्ष

इस योग: कर्मसु कौशलम् के जरिए भगवान श्री कृष्ण कर्म के महत्व को बताते हुए कहते है कि यदि किसी कर्म को सही मानसिकता से किया जाए तो ऐसे कर्म से मनुष्य की निपुणता बढ़ती है और विपरीत परिस्थितियों में भी मनोबल बना रहता है। इस तरह जरूरी है कि मनुष्य कर्म को ईश्वर का आदेश समझकर प्रसन्नता से करें, जिससे उसके मन को शांति मिलेगी और उसका मन स्थिर रहेगा।

यदि व्यक्ति कर्म को भगवान का आदेश समझकर करें तो ऐसे कर्म से कष्ट होने पर भी वह हार मानने का नहीं सोचता है और बिना फल की चिंता किए अपने कर्म को करता ही रहता है, जिससे अंत में उसे उसके सोच से भी परे सकारात्मक फल मिलता है और यह फल उसके कर्म के दौरान सहे गए सभी कष्टों को भुला देता है।

इस प्रकार आज के लेख में हमने आपको गीता का एक बहुत ही महत्वपूर्ण श्लोक की एक लाइन योग: कर्मसु कौशलम् का अर्थ जाना। हमें उम्मीद है कि यह लेख आपको अच्छा लगा होगा। इस जानकारी को आगे शेयर जरूर करें।

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