अनुस्वार और अनुनासिक वाले शब्द

Anuswar Shabd: हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी है। हिंदी शुद्ध रूप से बोलने और लिखने के लिए इसकी व्याकरण को समझना बहुत ही जरूरी है। बोलचाल की भाषा में हम भले ही हिंदी को बहुत ही आसान भाषा समझते हैं। लेकिन बोलचाल की भाषा में हम शुद्ध हिंदी का प्रयोग नहीं करते हैं।

शुद्ध हिंदी बोलने के लिए या फिर लिखने के लिए इसकी व्याकरण को गहन रूप से पढ़ना पड़ता है। हिंदी का व्याकरण काफी ज्यादा व्यापक है, जिसमें काफी चीजों का संग्रह है। आज की इस लेख में हम अनुनासिक और अनुस्वर के बारे में पढ़ने वाले हैं।

Anuswar Shabd

इन दोनों ही उच्चारण का प्रयोग देवनागरी लिपि में होता है। यदि आप भी अपने हिंदी भाषा को शुद्ध करना चाहते हैं और इसके व्याकरण को अच्छे से समझना चाहते हैं तो यह आपके लिए बहुत ही उपयोगी साबित होने वाला है।

अनुनासिक की परिभाषा (Anunasik Shabd)

अनुनासिक ऐसे स्वर होते हैं, जिन का उच्चारण करते समय मुख और नाक दोनों का ही प्रयोग किया जाता है। इन स्वरों को लिखते समय उन पर चंद्रबिंदु (ँ) लगाया जाता है। चंद्रबिंदु शिरोरेखा के ऊपर लगता है। अनुनासिक शब्दों का जब उच्चारण किया जाता है तब मुंह से अधिक सांस निकलती है, वहीँ नाक से बहुत कम सांस निकलती हैं।

अनुनासिक शब्द के उदाहरण

जैसे – उँगली, काँच, बूँदें, रोएँ, पूँछ,पहुँच, बाँधकर, मियाँ,अँगूठा, बूँदा-बाँदी, गाँव, आँखें, बाँधकर, अजाँ, आँगन, कँप-कँपी, ठूँस, गूँथ, साँस, दाँत, झाँका, मुँहजोर, उँगली, काँच, बूँदें, रोएँ, कुआँ, काँप, मँहगाई, चाँद, भाँति, उँड़ेल, बाँस, सँभाले,  धँसकर, फूँकना, भाँति, रँगी, काँव-काँव, ऊँचाई, मुँह, धुँधले, धुआँ, चाँद, झाँकते, अँधेर, माँ, टाँग, पाँच, मुँहजोर, उँड़ेल, बाँस, सँभाले, धँसकर, सूँड, दाँया, बाँया, रस्सियाँ, भँवर, झाँकना, आँचल, साँस, ऊँट, मुँह, बाँका, साँच आदि।

अनुनासिक के स्थान पर बिंदु का प्रयोग

उपरोक्त हमने जाना कि अनुनासिक स्वरूप को दर्शाने के लिए जिन शब्दों में उनका प्रयोग होता है, उन पर चंद्रबिंदु लगाया जाता है और अ, आ, उ, ऊ तथा ऋ स्वर वाले शब्दों में अनुनासिक लगता है।

लेकिन क्या आपके मन में यह प्रश्न आया है कि इन स्वरों को छोड़कर बाकी इ, ई, ए, ऐ, ओ और औ भी तो हिंदी के स्वर है तो इनमें अनुनासिक क्यों नहीं लगता? दरअसल अनुनासिक शब्दों में इन स्वरों का भी प्रयोग होता है।

लेकिन जब इन स्वरों की मदद से व्यंजन को लिखा जाता है तो उसके ऊपर मात्रा लग जाती हैं। मात्रा लगने के कारण उसके ऊपर अनुनासिक लगाने की जगह बहुत कम रहती है। ऐसे में सुविधा के लिए अनुनासिक के चंद्रबिंदु की जगह पर सिर्फ अनुस्वार (ं) लगाया गया है।

जैसे – बिंदु, मैं, गोंद इत्यादि।

हालांकि आपके मन में यह भी प्रश्न होगा कि यदि अनुनासिक के जगह पर अनुस्वार का बिंदु का प्रयोग करते हैं तो क्या अनुस्वार और अनुनासिक में कोई अंतर रह जाएगा? यह बात सही है लेकिन उपरोक्त शब्दो में अनुनासिक के जगह पर अनुस्वार का प्रयोग करने पर उनके उच्चारण में कोई भी बदलाव नहीं आता।

लेकिन कुछ ऐसे भी शब्द होते हैं, जिनमें अनुनासिक के जगह पर अनुस्वार का प्रयोग करने पर उनके उच्चारण बदल जाते हैं, जिससे अर्थ भी बदल जाता है। जिसके बारे में आगे हम उदाहरण सहित जानेंगे।

अनुस्वार की परिभाषा

ऐसे वर्ण जिसका उच्चारण नाक से होता है, उन्हे अनुस्वार कहा जाता है। यह व्यंजन होते हैं। यदि अनुस्वर का संधि विच्छेद करते हैं तो अनु + स्वर बनता है। इससे अनुस्वार का अर्थ स्पष्ट होता है कि यह स्वर के बाद आता है, जिस कारण शब्दों के भाव भी कई बार बदल जाते हैं। अनुस्वार शब्दों में वर्ण के ऊपर बिंदु (ं) का प्रयोग किया जाता है।

उदाहरण

संकल्प, संक्रमण, गुंजायमान, अंकित, अंतरंग, बैंजनी, आशंका, बिंदु, पंक्ति, सुन्दर, रंगीन, तंबू, आनंद, निस्संकोच, चकाचौंध, श्रृंगार, संसर्ग, वंचित, गंध, उपरांत, सौंदर्य, संस्कृति, बंद, बंधन, पतंग, संबंध, ज़िंदा, नंगा, अंदाज़ा, संभ्रांत, क्रांति, इंद्रियों, कंप, खिंच, गुंजल्क, धौंकनी, अत्यंत, कुकिंग, सिलिंडर, कैंप, अधिकांश, श्रृंखला, संधि, संपादन, सिद्धांत, शूटिंग, हस्तांतरण, शांति, सींकें, अंधकार, गंदा, आशंका, डेंग, संदर्भ, आतंक, तांडव आदि।

अनुस्वार का प्रयोग पंचम वर्ण के रूप

यह जानना जरूरी है कि अनुस्वार का प्रयोग कई बार पंचम वर्ण (ङ्, ञ़्, ण्, न्, म्) के जगह पर भी किया जाता है। यह अनुस्वार के चिन्ह इस्तेमाल के बाद आने वाला वर्ण जिस भी वर्ग से जुड़े होते हैं, उसी वर्ग के पंचम वर्ण के लिए प्रयोग किया जाता है।

जैसे

  • कम्पन – कंपन
  • चञ़्चल – चंचल
  • गड्.गा – गंगा
  • झण्डा – झंडा
  • गन्दा – गंदा

अनुस्वार को पंचम वर्ण में बदलने का नियम

  • अनुस्वार के प्रयोग का पहला नियम यह है कि यदि पंचम अक्षर के बाद किसी अन्य वर्ग का अक्षरा जाता है तो उस पंचमाक्षर के जगह पर अनुस्वार का प्रयोग नहीं होता है। उदाहरण के लिए चिन्मय, वाड्.मय, उन्मुख, अन्य आदि। इन प्रत्येक शब्दों में पंचम वर्ण के बाद दूसरे वर्ग का अक्षर जुड़ा हुआ है, जिस कारण इन्हें चिंमय, वांमय, उंमुख, अंय के रूप में नहीं लिख सकते।
  • अनुस्वार का प्रयोग ऐसे शब्दों में भी नहीं किया जाता जहां पर य, र, ल, व पंचम वर्ण के बाद आता हो जैसे कि अन्य, कन्हैया, वन्य आदि।
  • तीसरा नियम यह है कि यदि पांचवें वर्ण द्वैत के रूप में आता हो तभी हम पांचवें वर्ण को अनुस्वार में नहीं बदल सकते जैसे कि अन्न, प्रसन्न, सम्मेलन आदि। इन प्रत्येक शब्दों में पांचवां वर्ण दो बार एक दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं, जिस कारण इन्हें अंन, प्रसंन, संमेलन के रूप में नहीं लिख सकते।

अनुनासिक और अनुस्वार में अंतर

  • अनुनासिक और अनुस्वार में मूल अंतर की बात करें तो अनुनासिक एक स्वर है जबकि अनुसार मूलतः व्यंजन है। यह स्वर के बाद प्रयुक्त होता है। अनुनासिक के चंद्रबिंदु को हम परिवर्तित नहीं कर सकते लेकिन अनुस्वार के बिंदु को हम वर्ग में जरूर बदल सकते हैं।
  • अनुस्वार का प्रयोग हम शिरोरेखा से ऊपर मात्रा लगी हुई शब्दों में भी कर सकते हैं जैसे कौंधा, डेंग, खिंच, नींव आदि। जबकि अनुनासिक का प्रयोग केवल उन शब्दों में कर सकते हैं, जिनकी मात्राएं शिरोरेखा से ऊपर नहीं लगी होती हैं। जैसे धुआँ, चाँद, काँप आदि। इस तरह अनुनासिक का प्रयोग मुख्य रूप से अ, आ, उ, ऊ तथा ऋ स्वर वाले शब्दों में करते हैं।
  • अनुनासिक शब्दों में सिरा रेखा से ऊपर मात्रा लगी होती है। ऐसे में अनुनासिक के स्थान पर हम अनुस्वार (ं) का प्रयोग कर सकते हैं। लेकिन कुछ शब्दों में अनुशासन के जगह पर अनुस्वार का प्रयोग करने से दोनों शब्दों के बीच का अंतर स्पष्ट नहीं हो पाता है जैसे
    • हँस (हँसने की क्रिया)- हंस ( पानी में रहने वाला एक पंछी)
    • अँगना (घर के बाहर खुला बरामदा) – अंगना (सुंदर अंगों वाली स्त्री),
    • स्वाँग (ढोंग) – स्वांग (अपने अंग)

अनुस्वार का प्रयोग कहा होता है?

हिंदी वर्णमाला में कुल पांच वर्ग होते हैं, इन वर्गों में पांचवे वर्ण को पंचमाक्षर कहा जाता हैं। जो निम्न है: ङ्, ञ़्, ण्, न्, म् इन शब्दों के स्थान पर अनुस्वार (ं) का प्रयोग किया जाता है।

हिंदी वर्णमाला में पांच वर्ग निम्न है:

  • क वर्ग
  • च वर्ग
  • ट वर्ग
  • त वर्ग
  • प वर्ग

क वर्ग के शब्द – क, ख, ग, घ, ड.
च वर्ग के शब्द – च, छ, ज, झ, ञ
ट वर्ग के शब्द – ट, ठ, ड, ढ, ण
त वर्ग के शब्द – त, थ, द, ध, न
प वर्ग के शब्द – प, फ, ब, भ, म, य, र, ल, व, श, ष, स, ह

उदाहरण: नन्द = नंद, ठण्ड = ठंड

अनुस्वार की मात्रा के शब्द (Anuswar Shabd)

घंटीडंकगंदाअंक
शंकुडंडातंगदंग
अंगतंबूपंखागेंद
शंखरंगकंठझंडा
सायंरंकपतंगबंदर
मंत्रयंत्रबंदतंत्र
मंत्रीठंडीलंगूरजंगल
भंगखंभातसंतगंगा
अंगूरपंखसंजयकंप
बंदूकमंडलज़िंदागंध
अंदरनंगालंबेकंघी
संगीतासींगोसंपूर्णआनंद
रंगीनमयंकशंकरपंक्ति
बंगलाघंटीसंतूरपिंजरा
धुरंधरमंजनसुंदरसंतरा
चंदनसुगंधपंडितवंचित
बैंजोमंदिरसंबंधअंडा
संभ्रांतश्रृंगारचोंचधंधा
सुरंगपंकजपंजापंजे
संदूकअंशोंमंगलसंपन्न
ठंडकखंबापलंगनारंगी
लंकापुंजहंसबसंत
पसंदअंकितपंजानींद
संसर्गबंधनलंबीसंतोष
अंतिमचिंतितसंक्षिप्तकंगन
तिरंगापंजाबफिरंगीघंटाघर
बंगालचंदनबिंदुमनोरंजन
मंजुलाआशंकानिरंजनअंतरंग
अत्यंतपंखुड़ीसंदेशउपरांत
सिलिंडरहुरदंगमांसाहारीपंचायत
संभावनाभंडारागंगारामसरपंच
कलंदरसंस्कृतिशकरकंदीकूदफांद
अंदाज़ाप्रशंसकअधिकांशसंचालक
anuswar wale shabd

अनुस्वार और अनुनासिक वाले शब्द (Anuswar Aur Anunasik Shabd)

अनुनासिक वाले शब्दअनुस्वार वाले शब्द
पूँछरंगीन
भाँतिपंक्ति
गाँवअत्यंत
आँगनसंक्रमण
दाँतपतंग
उँगलीबैंजनी
बाँधकरसंबंध
ऊँचाईअंदाज़ा
भाँतिआशंका
अँगूठाकुकिंग

FAQ

अनुनासिक का चिन्ह कौन सा है?

अनुनासिक का चिन्ह चंद्रबिंदु होता है।

चंद्रबिंदु का प्रयोग कब किया जाता है?

जब किसी स्वर का उच्चारण नाक एवं मुख दोनों से होता है तब चंद्रबिंदु का प्रयोग किया जाता है।

अनुस्वार का प्रयोग अनुनासिक के जगह पर कब कर सकते हैं?

जब किसी वर्ण में शिरोरेखा के ऊपर मात्रा लगी होती है तब सुविधा के लिए चंद्रबिंदु के जगह पर अनुनासिक का का मात्र बिंदु प्रयोग किया जाता है।

अनु शनासिका के कुछ उदाहरण क्या है?

अँगूठा, बाँधकर, गाँव, मुँह, धुँधले, अँधेर, माँ, पहुँच, ऊँचाई, टाँग, पाँच, दाँते, साँस, कुएँ, पाँच, फुँकार, ऊँगली, ठूँस आदि अनुनासिका का उदाहरण है।

अनुस्वार के उदाहरण क्या है?

अंग्रेजी, प्रशंसक, चौंका, खिंच, नींव, रौंदते, सींगो, त्योंही, उपरांत, नींद, खंभात, पंकज, कंठ,सौंप, संक्षिप्त, परंतु, हंस, चिंतित, कौंधा, शंकु, काकभुशुंडी, संदेश, पसंद, चिंतन, ढंग, संपूर्ण, फ़ेंक, संभावना, संघर्ष, प्रारंभ, संचालक, ग्रंथकार, धुरंधर, झुंड, ठंडक, पंजे आदि अनुस्वार के उदाहरण है।

निष्कर्ष

आज के इस लेख में आपने हिंदी व्याकरण का बहुत ही प्रमुख भाग उच्चारण के अंतर्गत आने वाले अनुनासिक एवं अनुस्वार के बारे में जाना। हमें उम्मीद है कि आज का यह लेख आपके लिए जानकारी पूर्ण रहा होगा।

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इनका नाम राहुल सिंह तंवर है। इनकी रूचि नई चीजों के बारे में लिखना और उन्हें आप तक पहुँचाने में अधिक है। इनको 4 वर्ष से अधिक SEO का अनुभव है और 6 वर्ष से भी अधिक समय से कंटेंट राइटिंग कर रहे है। इनके द्वारा लिखा गया कंटेंट आपको कैसा लगा, कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। आप इनसे नीचे दिए सोशल मीडिया हैंडल पर जरूर जुड़े।

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