क्या सीता मंदोदरी की बेटी थी? (रामायण की कहानी)

क्या सीता मंदोदरी की बेटी थी? (रामायण की कहानी) | Kya Sita Mandodari ki Beti Thi Ramayan Ki Kahani

अब तक राम के जीवन के बारे में 125 अलग-अलग भाषा में रामायण लिखी जा चुकी है और सभी रामायण में कुछ ना कुछ अलग देखने और सुनने को मिलता है। कुछ रामायण ग्रंथों में राम के जीवन से जुड़ी कई प्रसंगों को काल्पनिक रूप से बताया गया है। यही कारण है कि पाठक समझ नहीं पाता कि किस रामायण को सत्य माने और किसे काल्पनिक।

वैसे अभी तक आपने जिस भी रामायण ग्रंथ को पढ़ा होगा, उससे आपको यही जानने को मिला होगा कि माता सीता मिथिला के राजा जनक की पुत्री थी। यहां तक कि महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखी गई रामायण और महान लेखक तुलसीदास द्वारा लिखी गयी राम चरित्र मानस में भी माता सीता को राजा जनक की पुत्री बताई गई है।

लेकिन कुछ रामायण ग्रंथों में माता सीता को मंदोदरी की पुत्री यानी कि रावण की पुत्री बताई गई है। लेकिन फिर यह भी प्रश्न उठता है कि जब माता सीता रावण की पुत्री थी तो रावण ने उनका अपहरण क्यों किया और उसके बाद रावण माता सीता को विवाह का प्रस्ताव क्यों दे रहे थे?

Kya Sita Mandodari ki Beti Thi Ramayan Ki Kahani
Image: Kya Sita Mandodari ki Beti Thi Ramayan Ki Kahani

हालांकि इसे पूर्ण रूप से सत्य नहीं कहा जा सकता। लेकिन आज के इस लेख में हम जानेंगे कि आखिर क्यों माता सीता को मंदोदरी की पुत्री कहा जाता है और हम यह भी जानेंगे कि माता सीता यदि मंदोदरी की पुत्री थी तो वह राजा जनक की पुत्री कैसे कहलाई? यदि आप भी इस रहस्यमय कहानी को जानना चाहते हैं तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें।

क्या माता सीता मंदोदरी की पुत्री थी

रावण राक्षस कुल का था, इसीलिए वह पूरे ब्रह्मांड पर राज करना चाहता था। वह सबसे ज्यादा ताकतवर बनना चाहता था। यही लालसा लेकर वह एक बार भगवान ब्रह्मा की तपस्या करता है, उसकी कड़ी तपस्या से भगवान ब्रह्मा खुश हो जाते हैं और उसे वरदान मांगने के लिए कहते हैं। तब रावण भगवान ब्रह्मा को कहते हैं कि मुझे अमर होने का वरदान दे दीजिए।

भगवान ब्रह्मा कहते हैं कि मैं तुम्हें यह नहीं दे सकता, इसके अलावा दूसरा वरदान मांग सकते हो। वरदान मांगता है कि मुझे सुर, असुर, नाग, कन्या, भूत-पिचास कोई भी ना मार सके, ऐसा वरदान दे दीजिए। लेकिन इन जिवों में वह मनुष्य का नाम लेना भूल जाता है। यही कारण था कि रावण को मारने के लिए स्वयं भगवान विष्णु राम के रूप में मनुष्य रूप में धरती पर जन्म लेते हैं और रावण का वध करते हैं।

भगवान ब्रह्मा से वरदान पाने के बाद रावण चारों तरफ हाहाकार मचाने लगता है। वह सभी की हत्या करने लगता है। भूलवश उससे ऋषि-मुनियों की भी हत्या हो जाती है। रावण को ऋषि-मुनियों को मारना उचित नहीं लगता है, इसीलिए वह ऋषि-मुनियों के रक्त को एक कमंडल में इकट्ठा कर उसे अपने साथ ले जाता है। रावण जिसके कमंडल में ऋषि मुनियों का रक्त इकट्ठा किया रहता है, वह कमंडल ऋषि ‘गृत्समद ऋषि’ का होता है।

जो चाहते थे कि मां लक्ष्मी स्वयं उनके घर पुत्री के रूप में जन्म ले। इसीलिए मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए वे प्रतिदिन कुश के अग्र भाग से एक कमंडल में मंत्रोच्चारण के साथ दूध की बूंदे डालते थे। रावण इसी स्थान पर ऋषि मुनियों का वध किया था और अपनी गलती का एहसास होने पर वह भूल वंश इसी ‘गृत्समद ऋषि’के कमंडल में उन ऋषियों के रक्त को एकत्रित कर लेता है।

एकत्रित रक्त के कमंडल को रावण लंका ले जाकर अपनी पत्नी मंदोदरी को सुरक्षित रखने के लिए दे देता है और कहता है कि यह विषैली रक्त से भरा हुआ है, इसे संभाल कर रखना किसी को देना मत। ऐसा कहने के बाद वह सहयाद्री पर्वत पर विहार करने के लिए चला जाता है। स्वयं की इस तरह उपेक्षा करना रावण का विहार करने चला जाना मंदोदरी को अच्छा नहीं लगा और वह क्रोध वश कमंडल के रक्त को विष समझ कर पी जाती है।

उसको पीने के बाद मंदोदरी की मृत्यु तो नहीं होती लेकिन कुछ दिन के बाद वह गर्भवती हो जाती है। मंदोदरी को जब इस बात का पता चलता है तो वह बहुत घबरा जाती है। उसे लगता है कि अन्य लोगों को इसके बारे में पता चलेगा तब क्या होगा। वह अपनी पवित्रता पर कोई भी प्रश्न नहीं चाहती थी, इसीलिए लोकलज्जा के डर से वह कुरुक्षेत्र की यात्रा का बहाना बनाकर कुरुक्षेत्र चली जाती है, जहां पर वह अपने भ्रूण को एक कलश में रख जमीन में दफना देती है।

वही भ्रूण परिपक्व होकर एक बालिका के रूप में विकसित होता है। यह कलश राजा दशरथ को मिलता है और वे माता सीता को अपने घर ले जाते हैं और पुत्री के समान ही रखते हैं। इसीलिए माता सीता को धरतीपुत्री भी कहा जाता है। माता सीता धरती के कोख से निकलती है और अंत में जब 14 वर्ष के वनवास पूर्ण करने के बाद अयोध्यावासी माता सीता की पवित्रता पर प्रश्न उठाते हैं और फिर वह अयोध्या छोडकर वन चली जाती है।

जहां पर लव कुश को जन्म देती है और जिसके बाद लव कुश का भगवान राम के साथ युद्ध होता है। बाद में जब रामायण की कहानी का अंत होने वाला होता है, उसी वक्त अयोध्या के लोग दोबारा उनकी परीक्षा लेने के बाद करते हैं। उस समय मां सीता क्रोध में आकर धरती मां की गोद में समा जाती है। इस तरीके से माता सीता धरती के कोख से निकलती है और फिर अंत में धरती में ही समा जाती है।

माता सीता राजा जनक की पुत्री कैसे कह लाई?

हम यह तो जानते हैं कि माता सीता मिथिला राजा जनक की पुत्री थी। लेकिन बहुत से लोगों को यह भी पता है कि माता सीता राजा जनक की अपनी पुत्री नहीं थी। राजा जनक की केवल तीन ही पुत्री थी, माता सीता उन्हें जमीन से मिली थी।

दरअसल राजा जनक कि कोई संतान नहीं थी। धन-धान्य से संपन्न होने के बाद भी संतान न होने के कारण राजा जनक हमेशा ही चिंतित रहा करते थे। उसी दौरान एक बार मिथिला में अकाल पड़ गया होने के कारण लोगों ने हाहाकार मचाना शुरू कर दिया। इससे चिंतित होकर राजा जनक ऋषि-मुनियों के पास गए।

ऋषि-मुनियों ने सलाह दी राजा जनक यज्ञ का आयोजन करें। पूजा पाठ करने के बाद राजा को स्वयं खेत में हल चलाना पड़ेगा, जिससे भगवान इंद्र का उनपर कृपा होगी। राजा जनक ठीक वैसा ही करते हैं। यज्ञ का काम पूरा होने के बाद राजा जनक स्वयं खेत में हल चलाने जाते हैं। हल चलाते समय उनका हल का अग्रभाग जिसे सीता कहा जाता है, वह जमीन में एक धातु से टकराकर अटक जाता है।

हल को बाहर निकालने के लिए राजा जनक बहुत प्रयत्न करते हैं लेकिन वे निकाल नहीं पाते। तब उस भाग की खुदाई करते हैं। खुदाई करने के बाद उन्हें एक कलश मिलता है। जैसे ही राजा उस कलश के ढक्कन को हटाते हैं, उसमें एक छोटी सी बालिका हंसते हुए दिखती है। उस बालिका को राजा कलश से बाहर निकालते हैं।

वे कुछ समझ पाते कि वैसे ही वर्षा शुरू हो जाती है। राजा जानक की कोई संतान न होने के कारण वे उस बालिका को अपनी पुत्री के रूप में मिथिला ले जाते हैं और फिर अपनी पुत्री के समान ही उसका देखभाल करते हैं। उस बालिका का पता हल के अग्र भाग जिसे सीता कहा जाता है। उसके अटकने से चला था, इसीलिए उस कन्या का नाम सीता रख देते हैं।

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